





अर्थात् जिसके द्वारा मनुष्य इस संसार सागर से तर जाये उसी को तीर्थ कहते हैं। ये तीर्थ अलौकिक हैं, स्वर्ग के सोपान हैं और भगवान की विविध लीलाओं के चैतन्य स्वरूपमय होने से जीवन में धर्म, अर्थ, काम की पूर्णता प्रदान करने में सहायक हैं। अतः वहां के रज कण को मस्तक पर धारण करने मात्र से सम्पूर्ण पाप-ताप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार भगवान भास्कर के उदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है।
स्कन्द पुराण में लिखा गया है –
यह सच है कि श्रेष्ठ (श्रद्धालु एवं सरल हृदय) पुरूषों ज्ञानवान साधना-तपस्या से पूर्ण चैतन्य सद्गुरु रूपी साधुवाद महापुरूषों के साथ साधना, पूजा, आध्यात्मिक क्रिया करना तीर्थ से भी बढ़कर है। सद्गुरु की संगत से हजारो किरणो से प्रकाशमान सूर्योदय की भांति प्राप्त चेतना अद्भुत प्रभावशाली है। क्योंकि वे जीवन अन्तः करण में व्याप्त अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करते ही हैं।
सिद्धाश्रम के योगी अति सरल हृदय, करूणाशील संत, निखिल धर्म की स्थापना हेतु निरंतर-निरंतर गतिशील सद्गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी का संग, स्पर्श, दर्शन आदि यदि किसी मनुष्य को तीर्थ स्थान में हो जाये तो ऐसा दुर्लभ योग किसी सौभाग्यशाली मनुष्य को ही प्राप्त होता है।
प्रायः सभी तीर्थ भगवान और उनके भक्तों के प्रभाव से ही बने है। अर्थात् उनके जन्म और लीलाओं एवं संग-सानिध्य के कारण ही उन्हे तीर्थ माना गया। तीर्थ यात्रा का वास्तविक प्रयोजन है- जीवन का उद्धार करना है। इस लोक व परलोक के भोगो की प्राप्ति के लिये तो और भी बहुत से साधन हैं, अतः सांसारिक मनुष्य हर स्वरूप में पूर्णता और श्रेष्ठता सद्गुरु रूपी पवित्र देव शक्तियों रूपी तीर्थो पर ध्यान, साधना, पूजन, अर्चन से अपने आपको पुरुषोत्तममय बनाने की ओर क्रियाशील होता है।
प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन काल में चारो धामो की यात्रा करने की इच्छा रखता है। परन्तु यदि वह एक या दो धामों की यात्रा भी कर लें तो स्वयं को सौभाग्यशाली समझता है। भगवान बद्रीनाथ धाम चारो धामो में अत्यन्त पावन धाम है जो हिमालय की पर्वत मालाओं के उच्च शिखर नारायण पर्वत पर स्थित है। यहां पर भगवान नारायण ने तपस्या की थी और तपस्या करते समय उन्हें वर्षा, धूप, लू, तूफान आदि प्रकोपों से बचाने के लिये लक्ष्मी जी ने अपने प्राण प्रिय श्री हरि की रक्षा की। उन्हीं लक्ष्मीनाथ को इसीलिये बद्रीनाथ कहा जाने लगा।
कहा जाता है बद्री विशाल की सेवा करने के लिये स्वर्ग लोक से लक्ष्मी की गणिकायें भी सूक्ष्म रूप में प्रतिदिन प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से आती हैं, जो कभी-कभी सच्चे पूर्ण आस्थावान साधक को दर्शन दे देती हैं। इस धाम की यात्रा तथा बद्री विशाल के दर्शन बडे ही सौभाग्य के जागने पर प्राप्त होते हैं।
जून सन् 2012 में सद्गुरुदेव कैलाश जी के सानिध्य में मंजुल- महोत्सव का आयोजन बद्रीनाथ धाम में हुआ था। उसमे उपस्थित साधको को साधनाओ एवं दीक्षाओ के माध्यम से तत्काल मनोवांछित फल की प्राप्ति हुयी। साधको, शिष्यो द्वारा पुनः बद्रीनाथ धाम में साधनात्मक आयोजन करने के लिये अनेको बार गुरुदेव को निवेदन किया, जिसकी स्वीकृति सिद्धाश्रम योगी स्वरूप सद्गुरुदेव के आदेशानुसार सद्गुरुदेव कैलाश जी को प्रदान की।
भगवान नर-नारायण की यह तप स्थली होने के साथ-साथ यह अनेकों-अनेकों ऋषियों तपस्वियों तथा सद्गुरुदेव निखिल की तपः स्थली भी है, जहां पर दिव्य देवालयों के दर्शन, मंत्र जप, साधना तथा दीक्षा भागीरथी अलकनन्दा के अमृतमय जल से सरोबार होना अपने आप में अन्यतम है।
यहां पर ब्रह्मकपाल तीर्थ (कपाल मोचन) प्रसिद्ध स्थल है, जहां पर भक्त अपने पूर्वजों के निमित्त पिण्ड दान करते हैं, जिससे पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त होती है तथा साधक अनेकों श्राप व तंत्र बाधाओं से मुक्त होता है। कहा जाता है, शंकर जी ने जब ब्रह्माजी का पांचवा मस्तक कटुभाषी होने के दोष के कारण काट दिया था, तब वह मस्तक उनके हाथ में चिपक गया। सृष्टि भ्रमण करते हुये शंकर जी इसी स्थान पर आयें तब वह हाथ से चिपका हुआ कपाल स्वतः छूटकर गिर पड़ा तब से इस जगह का नाम ब्रह्म कपाल मोचन तीर्थ पड़ा। अनेकों दिव्यतम तीर्थ स्थान इस बद्री धाम में विद्यमान है।
कैलाश सिद्धाश्रम से योगमय स्वरूप में जुड़े हुये साधकों और शिष्यों की तपस्यांश चेतना पूर्ण शुद्ध, निर्मल, आत्मीय भाव और जीवट इच्छा शक्ति को देखते हुये सद्गुरुदेव नारायण स्वरूप ने हमारे सौभाग्य को और अधिक जाज्वल्यमान और चैतन्य युक्त बनाने के लिये वैशाख मास की अक्षय एकादशी महापर्व पर बद्रीनाथ धाम में पापमोचनी अलकनन्दा तीर्थ पर तीन दिवसीय 19-20-21 मई 2017 को पूर्णतः ऋर्षित्व युक्त गुरुमय शक्ति साधनात्मक महोत्सव सम्पन्न होगा।
यदि भाग्य स्थान में गुरु (स्वग्रही उच्चादि राशि में स्थित) हो तो मनुष्य विविध तीर्थों की यात्रा करने वाला, सुन्दर, सुखी, गुणवान, यशस्वी देव यज्ञादि परायण और परमार्थ तत्व का ज्ञाता तथा अपने कुल की वृद्धि करने वाला होता है। संचित पुण्य के प्रभाव से और गुरु कृपा से जिन मनुष्य की जन्म कुण्डली में तीर्थ कृत योग आता है, प्रायः उन्हे ही पवित्र, दिव्यतम्, तीर्थ यात्रा में सद्गुरु का सानिध्य प्राप्त होता है व जीवन की दुर्गति का नाश होता है और गुरु कृपा से जीवन के सभी सुखों का उपभोग करता है।
इस यात्रा का प्रबन्ध शिविर आयोजन से बहुत पहले से व्यवस्थित करना होता है। इस स्वरूप में साधकों के ठहरने, भोजन, आने-जाने के लिये बसों की व्यवस्था, टेंट, होटल, गरम बिस्तर आदि अनेक-अनेक तरह की सामग्री हरिद्वार से ही संभव हो पाती है, दिव्यतम पूर्ण प्रभावशाली साधनात्मक स्थल, साधक के व्यक्तिगत गोत्र, वंश की गणना कर पूर्ण चैतन्य मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त साधनात्मक सामग्री निर्मित करनी होती है।
अतः जो भी साधक-शिष्य सद्गुरुदेव का सानिध्य प्राप्त करना चाहें और अपनी देह के रोम-रोम को पूर्ण तीर्थमय आनन्द युक्त निर्मित करने के इच्छुक हों वे ही पंजीकरण करायें।
सर्व प्रथम पंजीकृत साधकों के लिये 17 मई को हरिद्वार में पहुंचने के बाद ठहरने, विश्राम, भोजन की व्यवस्था स्वामी नारायण मंदिर, निकट सप्तऋषि आश्रम, पावन धाम, भूपतवाला, हरिद्वार में की गयी है।
इस यात्रा का प्रबन्ध शिविर आयोजन से बहुत पहले से व्यवस्थित करना होता है। इस स्वरूप में साधकों के ठहरने, भोजन, आने-जाने के लिये बसों की व्यवस्था, टेंट, होटल, गरम बिस्तर आदि अनेक-अनेक तरह की सामग्री हरिद्वार से ही संभव हो पाती है, अतः जो भी साधक-शिष्य सद्गुरुदेव नारायण का दिव्यपात प्राप्त करना चाहें और अपने जीवन को सर्व भौतिक सुखमय बनाने के इच्छुक हों वे ही पंजीकरण करायें। इस हेतु अपना व अपने पिता का नाम जन्म तारीख, जन्म स्थान अवश्य लिखे जिससे उसकी गणना कर पूर्ण व्यक्तिगत रूप से चैतन्य मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त साधनात्मक सामग्री निर्मित हो सकेगी ।
सरकारी नियमानुसार अपना परिचय पत्र और उसकी दो फ़ोटो कापी अवश्य साथ रखें ।
सर्वप्रथम यह ध्यान रखें कि आप कितने भी श्रेष्ठ आयोजक, कार्यकर्ता या समर्पित शिष्य रहें हों परन्तु ऐसे दिव्यतम स्थान पर आप केवल साधक ही हैं, अतः प्रत्येक का पंजीकरण अनिवार्य है, धार्मिक व साधनात्मक यात्रा हेतु परिवार के सभी सदस्यों के साथ पंजीकरण कराने से सांसारिक सुखों को पूर्ण रूपेण समवेत स्वरूप में प्राप्त कर सकेंगे।
न्यून मानसिकता, ओछी सोच व सदैव अनिर्णय के भाव से ग्रसित शिष्य नहीं आये। जिस साधक में सजगता, चेतना, ठोस निर्णय लेने की क्षमता होगी वे ही शिष्य अपने आपको अहम् ब्रह्मस्मि युक्त करने हेतु पंजीकरण करायेंगे।
वैशाख मास की अक्षय एकादशी के दिव्यतम अवसर पर जीवन अमृतमय प्राप्ति साधना व कर्ण पिशाचिनी शत्रुहन्ता दीक्षा तथा सिद्धाश्रम शक्ति दिवस पर वैभव धन लक्ष्मी साधना, सहस्त्र चक्र कुण्डलिनी जागरण दीक्षा, दिव्यतम पवित्र अलकनन्दा नदी, ब्रह्म कपाल मंदिर, गणेश गफ़ुा व चैतन्य स्थानों पर प्रदान की जायेगी। उक्त साधनात्मक क्रियायें बस यात्रा, भोजन, बद्रीनाथ में ठहरने की व्यवस्था पंजीकरण शुल्क में सम्मिलित है।
17 मई 2017 बुधवार को हरिद्वार पहुंचना अनिवार्य हैं, पंजीकृत साधकों के लिये ही ठहरने और भोजन की व्यवस्था हरिद्वार में 17 मई सांय 04 बजे से 18 मई प्रातः 4 बजे तक ही संभव हो सकेगी।
18 मई 2017 को प्रातः 04 बजे से आराम दायक बसों से बद्रीनाथ धाम की यात्रा प्रारम्भ करना आवश्यक होगा तब ही सांय 06 बजे तक बद्रीनाथ पहुंचना संभव हो सकेगा। रूद्र प्रयाग के पास रतूड़ा स्थान पर भोजन, चाय प्रदान की जायेगी।
प्रातः 04 बजे के बाद बद्रीनाथ की यात्रा के लिये रवाना होने पर किसी भी स्थिति में उस दिन बद्रीनाथ पहुचना संभव नहीं होगा और बीच में ही साधक को स्वयं की व्यवस्था से ही ठहरना होगा और दूसरे दिन बद्रीनाथ पहुंच सकेंगे।
बहन, बेटियां, मातायें किसी भी स्थिति में अकेली नहीं आये। अस्थमा, हृदय रोगी, गठिया रोगी व अन्य बीमारी से युक्त साधक इस शिविर में भाग नहीं लें। पूरी यात्रा में सामान की और स्वयं की सुरक्षा की जिम्मेदारी साधक की स्वयं की रहेगी।
अकाल मृत्यु, दोषो, क्लिष्ट रोगो से निवृत्ति हेतु महामृत्युज्ंय रूद्राभिषेक, दुर्गति नाशक सौभाग्य प्रदायक निखिल शक्ति व शिव गौरी नारायण दीक्षा, हवन, अंकन का न्यौछावर अलग से न्यूनतम रूप में प्रदान कर सिद्धाश्रम शक्ति युक्त हो सकेंगे।
बद्रीनाथ धाम में ठहरने हेतु Dormitory में अलग-अलग पलंग की व्यवस्था की गयी है।
22 मई 2017 को प्रातः 5 बजे से हरिद्वार लौटने की व्यवस्था बसों द्वारा होगी। हरिद्वार पहुंचने पर वंहा ठहरना या अपने घर को लौटने की व्यवस्था साधक को स्वयं ही करनी होगी।
पंजीकरण शुल्क केवल कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर या गुरुधाम दिल्ली में व्यक्तिगत रूप से जमा करायें। ड्रॉफ़ट या सीधे खाते में जमा कर पंजीकरण REGISTRATION कराना होगा। पंजीकरण शुल्क J 11000 ( Eleven Thousand Only)
पंजीकरण शुल्क भेजने के लिए आप प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान जोधपुर कार्यालय के फोन नं- 0291-2517025, 2517028, साथ ही मोबाईल नं- 7895727019, 8010088551 पर संपर्क कर विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,