





भगवान विष्णु ने तो एक ही हिरण्यकश्यप को समाप्त करने के लिये नृसिंह स्वरूप में, पौराणिक गाथाओं के अनुसार अवतरण लिया था, किंतु मनुष्य के जीवन में तो प्रतिदिन नूतन राक्षस आते रहते हैं, जो हिरण्यकश्यप की ही भांति अस्पष्ट होते हैं, यह अस्पष्ट ही होता कि उनका समापन कैसे संभव हो, उनसे मुक्ति पाने का क्या उपाय हो सकता है? और यह भी सत्य है, कि यदि जीवन में अभाव, तनाव, पीड़ा (शारीरिक अथवा दोनों), दारिद्रय जैसे राक्षसों से एक-एक करके निपटने का चिंतन किया जाये, तो मनुष्य की आधी से अधिक क्षमता तो इसी विचार-विमर्श में निकल जाती है, शेष जो आधी बचती है, वह किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देती। साथ ही जीवन के ऐसे राक्षसों से तो केवल सामान्य प्रयास से ही नहीं वरन् ऐसे क्षमता युक्त प्रयास से जूझना आवश्यक होता है, जो साक्षात् नरकेसरी की ही क्षमता हो। तभी जीवन में कुछ ऐसा घटित हो सकता है, जिस पर गर्वित हुआ जा सकता है।
क्षमता और शक्ति प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि दुर्गा या महाविद्याओं की चेतना से युक्त हो सके और ऐसी ही धूमावती महाविद्या साधना अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस साधना के बारे में दो बातें विशेष रूप से हैं, प्रथम तो यह दुर्गा की विशेष कलह निवारणी शक्ति है, दूसरी यह कि यह पार्वती का विशाल एवं रक्ष स्वरूप है। जो क्षुधा (भूख) से विकलित कृष्ण वर्णीय रूप हैं, जो अपने भक्तों को अभय देने वाली तथा उनके शत्रुओं के लिये साक्षात् काल स्वरूप हैं।
माँ धूमावती भूत-प्रेत, पिशाच व अन्य तंत्र बाधा से साधक व उसके परिवार की रक्षा करती है। जब भगवती धूमावती साधक से प्रसन्न होती है तब साधक के शत्रुओं का भक्षण कर लेती हैं और साधक को अभय प्रदान करती हैं।
‘धूमावती’ दस महाविद्याओं में से एक हैं। जिस प्रकार ‘तारा’ बुद्धि और समृद्धि की, ‘त्रिपुर सुन्दरी’ पराक्रम एवं सौभाग्य की सूचक मानी जाती हैं, इसी प्रकार ‘धूमावती’ शत्रुओं पर प्रचण्ड वज्र की तरह प्रहार करने वाली मानी जाती हैं। यह अपने आराधक को अप्रतिम बल प्रदान करने वाली देवी हैं जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सहायक सिद्ध होती ही हैं।
जो समय पर हावी हो जाता है, वह उससे भी ज्यादा बलशाली कहलाता है। शक्ति सम्बलित होना और शक्तिशाली होना तो केवल शक्ति-साधना के माध्यम से ही संभव है, जिसके माध्यम से दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित किया जा सकता है। जो बहादुर होते हैं, वे सब कुछ अर्जित कर, जो कुछ उनके भाग्य में नहीं है, उसे भी किसी महाविद्या दीक्षा व साधना के बल पर प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हैं क्योंकि दस महाविद्याओं में से किसी एक महाविद्या को सिद्ध कर लेना भी जीवन का अप्रतिम सौभाग्य कहलाता हैं।
धूमावती ‘दारूण विद्या’ हैं। सृष्टि में जितने भी दुःख हैं, व्याधियां है, बाधायें हैं, इनके शमन हेतु उनकी दीक्षा व साधना श्रेष्ठतम मानी जाती है। जो व्यक्ति या साधक इस महाशक्ति की आराधना-उपासना करता है, ये उस साधक पर अति प्रसन्न हो, उसके शत्रुओं का भक्षण तो करती ही हैं, साथ ही उसके जीवन में धन-धान्य, समृद्धि की कमी नहीं होने देतीं, क्योंकि यह लक्ष्मी प्राप्ति में आने वाली बाधाओं का पूर्ण भक्षण कर लेती हैं। अतः लक्ष्मी प्राप्ति के लिये भी साधक को इस शक्ति की आराधना करते रहना चाहिये।
यह जीवन का एक सुस्वीकृत तथ्य है, कि केवल इस युग में ही नहीं वरन् प्रत्येक युग में वही व्यक्ति जीवित रह सका है, जिसने जीवन में संघर्ष किया है। जीवन संघर्षों का एक अविराम क्रम होता है जीवन उसकी प्राण शक्ति का हनन कर देता है और फिर ऐसा व्यक्ति जिसके प्राणों का ही हनन किया जा चुका हो, कोई आवश्यक नहीं, कि जीवित रहते हुये भी वह जीवित व्यक्तियों की श्रेणी में आता हो, क्योंकि केवल श्वास-प्रश्वास के चलते रहने को ही तो ‘जीवन’ नहीं कहा जा सकता।
सामान्यतः साधना का क्षेत्र अत्यन्त दुष्कर प्रतीत होता है, क्योंकि साधना जीव को वास्तविकताओं का यथावत् प्रस्तुतिकरण व विवेचन कर देती है। उसमें अन्ततोगत्वा व्यक्ति का हित, साधना से ही साधित होता है, क्योंकि साधना जीवन की कटु वास्तविकताओं का यथावत् वर्णन करने के साथ-साथ उससे मुक्त होने का उपाय भी वर्णित करती चलती है।
होली महोत्सव ऐसा ही वर्ष का श्रेष्ठतम महापर्व है जिसके माध्यम से शारीरिक मानसिक शत्रुओं को पूर्ण भस्म कर सकें। ऐसी ही स्थितियों की प्राप्ति से जीवन में शांति, सुवृद्धि, श्रेष्ठता, उच्चता की प्राप्ति का मार्ग निर्मित होता है और इन क्रियाओं से भौतिक सुखों की प्राप्ति संभव हो पाती है। नृसिंहवतार की संक्षिप्त व्याख्या से भी यही तात्पर्य था कि सांसारिक मनुष्य नृसिंहमय बन सकें और यह भाव जिस साधक में दृढ़ निश्चयमयी स्वरूप होता है वही जीवन की अनेक विफलताओं को समाप्त कर सकता है और ऐसी ही निर्माण की क्रिया इस होली महोत्सव पर सम्पन्न होंगी निश्चित रूप में आपका आना सार्थक हो सकेगा। वे अवश्यमेव ऐसी साधना सम्पन्न कर अपने जीवन को एक नया ओज व क्षमता देंगे।
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