





अधिकतम व्यक्ति इस मार्ग पर चलकर ज्ञान की जानकारी एकत्र कर लेते है जिस प्रकार धन, हीरे-जवाहरातों को एकत्र कर लेते है लेकिन उस ज्ञान से स्वयं को आचरण में नहीं लेकर अपने अहंकार को बढ़ावा ही देते है कि मेरे पास इतना ज्ञान है वह स्वयं के चारों ओर शास्त्रों, वेदों, पुराणों के वचनों की दीवार खड़ी कर लेता है यह ज्ञान नहीं है। उससे तो अज्ञान ही अच्छा है अज्ञान कभी अहंकार को प्रबल नहीं करता अज्ञान मनुष्य को जैसा है वैसा ही रखता है झूठा तो नहीं बनाता, पाखण्ड करने को प्रेरित नहीं करता।
पाखण्ड अर्थात् पण्डित। जिसे अनुभव कोई भी नहीं होता है लेकिन वेद पुराणों के वचनों पर दूसरों को ज्ञान बांटता रहता है। जो जानकारी, जो ज्ञान पण्डित की कैद में होता है। वह उसका मालिक होता है। वह ज्ञान हमें कहीं नहीं ले जा पाता। हम वहीं के वहीं रह जाते है। लेकिन हम उस जानकारी का उपयोग कर सकते है दूसरों का शोषण करके, उस ज्ञान का व्यवसाय करके। पण्डित का ज्ञान ऐसा ही है। वह ज्ञान ऐसे व्यक्ति का है जो चला तो बहुत है लेकिन मंजिल पर नहीं पहुंच पाता। अनेक जन्मों की यात्रा करते हुये जानकारी एकत्र करता रहा लेकिन कभी ध्यान के सागर में उतरने का स्वयं प्रयास नहीं किया। और आप भी देखते है कि पण्डित असहज होता है। वह अपने ज्ञान के अनुसार स्वयं को ढ़ालने की कोशिशें करता रहता है।
वह कोशिशें करता है अतः वह सहज नहीं कि स्वयं ही स्वतः ज्ञानानुसार आचरण हो जाये। अनुशासन में चलने का ढोंग करना पड़ता है क्योंकि अनुशासन टूट ही जाता है। वह नाचने की कोशिश करता है स्वयं नृत्य युक्त नहीं होता उसके पाँवों में स्वतः थिरकन नहीं होती वह परमात्मा से प्रार्थना भी करता है तो वह भी शिकायत से भरी होती है कि मैं इतना पूजा-पाठ, पुण्य कर्म करता हूं फिर भी दुखी हूं। और जो अनैतिक कार्यों में लिप्त है वे सुख भोग रहे है। यह कैसा न्याय है। वह परमात्मा की तरफ से कृतज्ञ नहीं होता तथा जो स्वयं पर ज्ञान को जबरन आरोपित करेगा उससे परमात्मा उतना ही दूर होता चला जाता है।
और परमात्मा को जान लेने पर तो सहजता स्वतः उपलब्ध हो जाती है। उसे कोई जोर या जबरन नहीं करने पड़ती उसे पाने के पश्चात् तो आचरण स्वयं ही ज्ञानानुसार होने लगता है। लेकिन हमें ध्यान के बारे में यदि परीक्षा देनी हो तो उस ध्यान की प्रक्रिया को अपने मस्तिष्क में याद कर लेंगे। तथा परीक्षा के समय में उसे ज्यों का त्यों नोट बुक में उतार देंगे। हमने ध्यान की उस विधि को जान तो लिया लेकिन उसको आचरण में नहीं डाला, न ही कोई क्रिया की जो उसके अनुभव को प्राप्त कर पाते। केवल शास्त्रों, पोथियों की बातों को याद तो कर लिया।
और जो वास्तविक ज्ञानी है उन्हें समझ है, उन्हें बोध है वहां आचरण उसी प्रकार आता है जिस प्रकार तुम्हारी छाया तुम्हारे पीछे पीछे आती है। वहां कोई दिखावा नहीं होता। वहां सहजता उपलब्ध होती है। वास्तविक ज्ञान आंधी की तरह आता है तथा हमें और हमारे अहंकार को पूरी तरह समाप्त कर जाता है जिस प्रकार आंधी (तूफान) बडे-बडे वृक्षों को धरती पर गिरा देती है। ज्ञान के मार्ग पर परमात्मा से साक्षात्कार के मार्ग पर बढ़ना बडा अद्भुत और विलक्षण है। इस मार्ग पर बढ़ने वाले स्वयं को समाप्त करने की, अहंकार की मृत्यु की ओर कदम बढ़ाते है। जब ज्ञान की ज्योति जगती है तो मनुष्य स्वयं परमात्मा की भांति हो जाता है, अनन्त हो जाता है असीम हो जाता है क्योंकि उसका सम्बन्ध पूर्ण से हो गया होता है।
उसको पाने के लिये दुस्साहस करना पड़ता है व्यवसाय नहीं, व्यवसाय करने वाला पण्डित बन जाता है और दुस्साहस करने वाले, अनुभव करने वाले, उस तूफान को झेलने वाले ज्ञान को उपलब्ध होते है। फिर उन्हें किसी ज्ञान के संग्रह की जानकारी को संचय करने की अवश्यकता नहीं रह जाती। वह स्वयं ही एक नये शास्त्र की रचना करने में सक्षम हो जाता है। आचरण स्वतः ही सहजता पूर्वक होने लगता है। कोई ढोंग या पाखण्ड की आवश्यकता नहीं रहती। परमात्मा को पाने के लिये कोई होशियारी, कोई गणित गुणा भाग नहीं चल सकता, केवल वही चल सकता है जिसने निश्चय कर लिया हो कि चाहे जो भी हो अब दांव पूरा ही लगा देना है। स्वयं के पास कुछ भी नहीं बचाना है।
हम ज्ञान को उपलब्ध होते हैं तो सारे भ्रमजाल टूट जाते है सभी स्वप्न बिखर जाते है तथा सभी दीवारें गिर जाती है कोई भी हमारे और परमात्मा के बीच नहीं होता माया भी नहीं टिक पाती जैसे कि कहते है कि भगवान ने हमारे और अपने बीच माया फैला रखी है जिसके कारण हम उसे पाने में सफल नहीं हो पाते लेकिन जब ज्ञान की आंधी आती है तो वह माया भी नहीं टिक पाती। हमें जब बोध हो गया तो माया कहां रहेगी? माया के कारण ही तो हमें बोध नहीं हो पाता, हमारे सभी अज्ञान का केंद्र माया ही है। हमें सही प्रकार से ज्ञान न होने का कारण भी माया ही है। अज्ञान में माया से भागकर कहीं नहीं जा सकते, जहां भी जायेंगे माया साथ-साथ चलती है हम जो भी करेंगे माया उसी पर सवार हो जायेगी। शास्त्र पढ़ोगे तो शास्त्र पर सवार हो जायेगी, त्याग करोगे तो त्याग पर सवार हो जायेगी, जब तक माया का आवरण अन्तर्तम में होगा वह सभी को ढ़क लेती है। चाहे कोई झोपड़ी में रहता हो या महल में, धनपति हो या गरीब, माया का प्रभाव सब पर समान रूप से पड़ता है। वह सब को समान रूप से पकडती है।
माया को पकडने के लिये कुछ न कुछ चाहिये, कुटिया या महल हो, हीरा हो या कंकड बस कुछ न कुछ चाहिये। कहीं भी जायेंगे माया तुम्हारे साथ जायेगी। क्योंकि माया तुम्हारे भीतर है जो कुछ भी तुम करते हो उसी को पकड लेगी। अतः कुछ भी करने से पहले ज्ञान की आंधी को आमंत्रित करना आवश्यक है जो तुम्हें बोध करा सकें और तुम माया के पकड में न आ सको तथा ध्यान में शुद्ध होकर साधक की उल्टी दशा हो जाती है। माया को बांध कर रखे तो भी वह नहीं बंधती। यह उसी प्रकार होता है जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अंधकार स्वतः ही समाप्त हो जाता है। यदि लाख कोशिश करें तो भी अंधकार का अस्तित्व नहीं रहता, इसी प्रकार जब तक ज्ञान का सूर्य हमारे भीतर उदय नहीं होता तब तक अज्ञान के अंधकार का साम्राज्य फैला होता है। जब ज्ञान का प्रकाश हमारे भीतर हो जाता है तो सभी दोष, विकार, भ्रम, माया आदि उड जाते है।
और जीवन में प्रत्येक विपरीत स्थिति से हम जुडे हुये होते है चाहे वह कुछ भी हो जैसे – हम प्रेम करते है तो घृणा भी करते है, यदि सुंदरता दिखाई पड़ती है तो गंदगी भी नजर आती है, हम किसी पर शक करते है तो किसी पर विश्वास भी करते है, कोई वस्तु हमारे लिये लाभदायक प्रतीत होती है तो कोई वस्तु हमारे लिये हानिकारक भी होती है दोनों स्थितियां एक दूसरे की पहलू है अर्थात् द्वैत साथ-साथ चलता है।
और हमारे जीवन की धुरी इस द्वैत पर ही आधारित है। हमारी आसक्ति दोनों तरफ है और यह आसक्ति हमारी तृष्णा के कारण है, इस तृष्णा के कारण ही हमारी मति कुमति में बदल जाती है। हम यह जानते समझते हुये भी कि किसी वस्तु पर हमारा हक नहीं है अथवा हमारा अधिकार नहीं है फिर भी हम उससे अपना सम्बंध जोड लेते है यदि कुछ सोना राह में पडा है तो यह जानते हुये भी कि यह मेरा नहीं है फिर भी तृष्णा के कारण कुमति से हम उसे उठाकर अपने सपने संजोते है कि मैं इससे यह करूंगा वह करूंगा। अपने अन्तः करण की आवाज तो आती है कि यह वस्तु अपनी नहीं है, पुकार तो अंदर से निकलती है लेकिन यह पुकार दब जाती है। तृष्णा का विस्तार होता जाता है कि कई रोज से सोच रहा था कि गले में एक चैन बनवाऊंगा। उंगलियों में पहनने के लिये अंगूठी बनवाऊंगा तब सपने साकार रूप ले लेते है और इस पाये हुये सोने से न जाने कितनी इच्छाओं की पूर्ति हो जाने का विचार मन में आता है और इन इच्छाओं के संसार के आगे हमारे अन्तः करण की आवाज धीरे-धीरे विलीन हो जाती है ऐसा नहीं है कि यह आवाज बन्द हो गयी हो। यह बन्द नहीं होती यह गूंजती रहती है लेकिन हमें सुनाई पडना बन्द हो जाता है। यह आवाज धीमी तो होती है, इसे सुनने के लिये शांति चाहिये और तृष्णाओं के जाल में उलझ कर शांति कहां?
और कोई देख रहा है अथवा नहीं, अच्छा है या बुरा है कोई भी निर्णय तभी लिया जा सकता है जब तक शांति पूर्वक उस पर विचार करे। और तुम रास्ते में पडा हुआ सोना उठा लेते हो और उसे छिपाने के प्रयास में लग जाते हो, तुम्हें इस बात का अहसास भी नहीं होता कि तुम क्या कर रहे हो। तुम घर पहुंचकर ही दम लेते हो और फिर जब शांत होते हो तो फिर अन्तः करण की आवाज तुम्हें सुनाई देती है कि तुमने क्या किया? तुम ऐसा क्यों करते हो? ऐसा तुम अपनी कुमति के कारण करते हो क्योंकि जब मति मारी जाती है अर्थात् तुम अपने होशोहवास में नहीं होते हो। तुम जो यह सब करते हो तो उसका तुम्हें भान भी नहीं होता कुमति का अर्थ है कि तुम नशे में हो, कुमति रूपी शराब तुम्हारे मन मस्तिष्क पर हावी होती है, वह जो भी विचार संप्रेषित करेगी वही तुम करोगे। यदि यह तृष्णा साधक की समाप्त हो जाये तो कुमति अपना प्रभाव नहीं दिखा सकती। जब इच्छाओं का घड़ा फूट जाता है तथा कामनाओं का जाल नहीं होता है तो कुमति कैसे प्रभाव दिखायेगी?
अतः हमें एक तरफ ही झुकना है द्वैत नहीं चलेगा अर्थात हमें स्वयं का योग करना है परमात्मा से। और इस सांसारिक जीवन में कैसा भी घर बनाया जाये उसमें सुख का अभाव सदैव रहता ही है वह स्वर्ग नहीं बन पाता क्योंकि हमारी तृष्णा रूपी छत कितनी भी मजबूत हो तो भी इच्छाओं के कारण कोई न कोई कमी दुःख का कारण बनी रहती है और हम कभी भी निश्चिन्त नहीं हो पाते और तृष्णाओं के कारण हम चिंतातुर रहते ही है। ये तृष्णा रूपी छिद्रवाला घड़ा जो तुम्हारे अन्दर है वह दूर से तो भरा हुआ दिखाई पड़ता है लेकिन तुम्हारे पास आते-आते यह रिस जाता है और तुम उसे खाली पाते हो। तुम्हारे अंदर ये कामना रूपी जो फालतू की बकवास चीजें है उनसे छुटकारा पाना आवश्यक है ये जो घड़े में छेद है उन्हें बन्द करें तो ही पानी भरे अर्थात् तुम तृष्णा से मुक्त होओ तो ही तुम वह प्राप्त कर लोगे जो तुम्हारी आकांक्षा है। इसको इस प्रकार से भी तुम समझ सकते हो कि हमारे शरीर में जो दस इन्द्रियां है वे दस छिद्र है यदि उन छिद्रों को तुम बन्द करने की क्रिया करो जैसे आंख बन्द करो तो भीतर देखने का प्रयास करो तो भीतर दिखाई पड़ना शुरू हो जायेगा, कान बन्द करलो तो अन्दर की गुंजरण की ध्वनि है वह सुनाई देने लगेगी, संभोग बंद करों तो जो ऊर्जा बाहर निष्कासित हो रही है वही ऊर्जा ऊर्ध्वगत होकर समाधि के समीप पहुंचा सकती है, सभी छिद्रों से बाहर निकलने की क्रिया ही तो हो रही है जब सभी द्वार बंद हो जाते है तो हम स्वयं के अन्दर ही रहते है और तब हमारा परमात्मा से मिलने की क्रिया प्रारम्भ होती है। यह क्रिया गुरु से समझे। और परमात्मा से मिले बिना यह यात्रा कभी पूर्ण नहीं होती, शांति नहीं होती, विश्राम नहीं होता जब तक उसकी छत्र छाया नहीं मिलती तब तक विश्राम कहां?
और ऐसा नहीं है कि इस मानव शरीर में ही यह तृष्णा समाई है, इस शरीर के समाप्त होने पर भी तृष्णा पीछा नहीं छोडती मृत शरीर को जला देने पर ही आत्मा उसका पीछा छोडती है तथा आत्मा फिर से नए गर्भ में प्रवेश के लिये लालायित रहती है। वह भी तृष्णा के वशीभूत होती है अतः हम कहते है कि जो तृष्णा से पार हो गया वह पुनर्जन्म नहीं लेता क्योंकि फिर जन्म लेने का कोई भी कारण नहीं रहता। इस ज्ञान के तूफान में व्यक्ति को अपने शरीर का भान नहीं रहता उसे तो चारों तरफ परमात्मा ही दृष्टिगोचर होता है और तुम्हें स्वयं का भान न होना ही तुम्हारी पात्रता सिद्ध करता है कि तुम खाली हो चुके हो। अब परमात्मा तुम्हारे अंदर उतर सकता है, तुम अनुपस्थित होते हो तो वह उपस्थित होता है क्योंकि वह विराट है उसका आवाहन करना हो तो उसके लिये विराट जगह भी चाहिये और यह तभी हो सकता है जब हम स्वयं न होकर उसी के स्मरण से, उसी से मिलन के लिये तडप उठें। जब अपने भीतर का सूरज उगता है तो फिर तुम्हारे अंदर शाश्वत प्रकाश का आविर्भाव होता है क्योंकि बाहर के प्रकाश के लिये तो सूरज का उगना आवश्यक है। जब सूरज छिप जाता है तो पुनः अंधकार हो जाता है। दीपक जलाते है तो अंधकार दूर होता है और इस दीपक में तेल समाप्त हुआ तो बाती बुझ जाती है और अंधकार को अपना विस्तार करने के लिये कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती जिस प्रकार प्रकाश को करने के लिये करनी पडती है तेल लाना पड़ता है, बाती बनानी पड़ती है तथा फिर दीपक में डाल कर जलाया जाता है तो ही प्रकाश होता है।
लेकिन अपने भीतर की स्थिति इसके विपरीत है वहां प्रकाश एक बार हो जाये तो वह शाश्वत होता है वहां किसी तेल दीपक आदि की आवश्यकता नहीं होती यदि वहां इन चीजों की आवश्यकता पडती तो आत्मा मिल कर भी बार-बार खो जाती। परमात्मा से भी मिलकर वियोग होता भीतर का प्रकाश तो बिन पानी बिन तेल के जलता हैं वह अभी भी जल रहा है और सदैव जलता रहता है वह कभी बुझता नहीं वह जलाना नहीं है सिर्फ अपनी दृष्टि घुमानी है। तुम्हें पण्डित की तरह ज्ञान को एकत्र नहीं करना है उसका व्यवसाय नहीं करना है, किताबें पढ़-पढ़ कर जो ज्ञान तुमने एकत्र किया है उसको यदि आचरण में नहीं डालोगे तो कोई अनुभव नहीं करोगे। फिर अज्ञान कैसे मिट पायेगा। अज्ञान को मिटाने के लिये तुम ज्ञान की आंधी को निमंत्रण दो। वह निमंत्रण का शुभारम्भ होता है ध्यान के द्वारा तुम जैसे-जैसे निर्विचार होकर ध्यान में अग्रसर होते हो तो तुम उस आंधी को निमंत्रण दे रहे हो।
यह ऐसे ही होता है जिस प्रकार बाहर प्रकृति में आंधी आने की प्रक्रिया है वह इस प्रकार है कि जब अधिक गर्मी होती है सूरज का जहां पर ताप अधिक होता है वहां की वायु विरल हो जाती है और वातावरण में उमस हो जाती है। उमस के कारण वायु फैलती है तो वहां गड्ढे़ पैदा हो जाते है चारो तरफ हवा भरी होती है और जहां हवा के गड्ढ़े बने हुये होते है उन्हें भरने के लिये वायु वेग पूर्ण होकर दौडती है, इसी प्रकार आंधी का निर्माण होता है। जिस प्रकार नदी से किसी पात्र में जल भरे तो वहां गड्ढ़ा उत्पन्न हो जाता है लेकिन आस-पास का जल तुरन्त उस ओर आकर्षित होकर गड्ढ़े को तुरन्त भर देता है इसी प्रकार वायु के गड्ढ़ों को भरने के लिये भी वायु तेजी से आती है। इसीलिये जब अत्यधिक गर्मी होती है तो हम कहते है कि वर्षा होगी और आंधी आयेगी और आंधी आ जाती है। और साथ ही बादल भी साथ में उडा ले आती है और वर्षा हो जाती है।
यही प्रक्रिया हमारे भीतर की भी है। हम ध्यान में, साधना में स्वयं को तपाते है, तपाने का अर्थ अपने भीतर गर्मी को उत्पन्न कर रहे है ध्यान से हमारे अंदर एक निश्चित ताप पैदा होता है, इस ताप से हमारे भीतर जो वासनायें तृष्णा आदि कूडा करकट भरा है वह भस्म हो जाती है और जो खाली जगह बनती है, जो शून्य उत्पन्न होता है परमात्मा की आंधी वेगपूर्ण होकर तूफान की तरह आती है। साथ ही अमृत रूपी वर्षा के बादल भी साथ लाती है और हमें भिगाती है अपने प्रेम रस से और हम पूर्णत्व को उपलब्ध हो जाते है। और जो व्यक्ति बुद्धत्व का उपलब्ध हो जाता है जो परमात्मा से साक्षात्कार कर लेते है उसे बाहर चारों ओर ही परमात्मा के दर्शन तो होते ही है साथ ही उसे तो अपने भीतर भी परमात्मा के दर्शन होते है जो मनुष्य अपने जन्म के उद्देश्य को भूल कर संसार में आसक्ति रखते है, माया उनको पकडकर संसार में अनेकों दुःख भोगने के लिये विवश करती है यह माया ईश्वर की जड़ शक्ति है जो भजन से विमुख तथा ध्यान हीन मनुष्यों का आकर्षण कर उन्हें विषय भोगों के नर्क में धकेल देती है।
प्रत्येक मनुष्य कर्म करने के लिये स्वतंत्र है, परन्तु उसका फल उसके हाथ में नहीं है उसका फल भोगने के लिये वह परतंत्र है माया स्वयं उसे ईश्वर से दूर नहीं करती अपितु जब मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का सदुपयोग न करके विषयों के प्रति रूचि रखता है तब माया उस पर हावी हो जाती है दूर से सुखी जैसे प्रतीत होने वाले भोग कर्म आदि, अंत में दुःख का कारण बनते है। मनुष्य परमात्मा का ही अंश होने के कारण उसमे लघु रूप से सत-चित्त-आनन्द विराजमान है। एक बार साधना से च्युत हो जाने पर विषय भोगों के मोहों से निकलना आसान नहीं होता जिस प्रकार यदि कोई मनुष्य गहरे समुद्र में डूब जायें तो वह किनारे पर पहुंचने पर मृत अवस्था में ही तैरता हुआ प्राप्त होता है। इसी प्रकार माया भी मनुष्य का पीछा सहजता से नहीं छोड़ती। भगवान ने स्वयं कहा भी है –
हे अर्जुन! मेरी बहिरंगा माया (जो सात्विक, राजस एवं तामसिक गुणोंवाली) है। बडी दुस्तर है किन्तु जो मेरा ही आश्रय ग्रहण करते है, अर्थात् मेरे नाम, रूप, गुण, लीला और धाम (वैकुण्ठ) का आश्रय लेते है वह मेरी कृपा से ही उस दुस्तर माया को पार कर जाते है। इन सभी बातों को ध्यान से देखें कि मनुष्य योनि में जन्म लेकर भी विषयों की तरफ अपना ध्यान न लगाना चाहिये क्योंकि विषयों का अन्त नहीं होता लेकिन एक दिन मनुष्य का अन्त अवश्य हो जाता है। मनुष्य की इन्द्रियां भी भोगों को भोग-भोग कर शिथिल हो जाती है लेकिन विषय भोग कामना कभी शिथिल नहीं होती और वास्तव में विषय भोग ही मनुष्य को भोगते है। मनुष्य किसी विषय भोगों को नहीं भोगता।
तुमने जिन रिश्ते-नातों, माता-पिता, पुत्र, स्त्री, धन-सम्पत्ति को अज्ञान वश अपना मान लिया है, क्या वह सब तुम्हारे जन्म से पहले तुम्हारे थे? और क्या तुम्हारी मृत्यु के पश्चात् भी तुम्हारे होंगे? इन सब को पाने और सन्तुष्ट करने के लिये तुम अनेक अनर्गल कार्यों को करके धनार्जन कर रहे हो जिसका फल तुम्हें अकेले ही भोगना पडेगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम जीवन निर्वाह के लिये कर्म करना छोड़ दो अपितु यह है कि धर्मानुसार न्याय संगत तरीके से दूसरों को पीडा न पहुंचाकर अपनी आजीविका का निर्वाह करना चाहिये तथा स्वयं ध्यान साधनाओं के मार्ग पर चलते हुये दूसरों को भी ईश्वर की तरफ, साधनाओं की तरफ चलने के लिये प्रेरित करना चाहिये। यह मानव मात्र के लक्ष्य है, होने चाहिये।
श्रीमद्भागवत में स्पष्ट रूप में कहा गया है –
अर्थात् वह गुरु-गुरु नहीं है, वह मित्र-मित्र नहीं है, वह पिता-पिता नहीं है, वह माता-माता नहीं है, वह देव-देव नहीं है, वह पति-पति नहीं है – जो अपने आश्रित जनों को ईश्वर का ज्ञान कराकर मृत्यु संसार से उद्धार न करा सकें अर्थात् उसे ईश्वर की ओर चलने की प्रेरणा न देकर इस मार्ग पर न बढ़ने दें।
गोस्वामी जी के अनुसार यह मानव देह ही मोक्ष का हेतु है इसके द्वारा ही तथा इसकी सहायता से ही मनुष्य साधन कर सकता है क्योंकि अन्य योनियों में ज्ञान एवं बुद्धि के अभाव के कारण शास्त्रानुकूल ध्यान साधनादि करना संभव नहीं है जिससे परमात्मा को पा सकें। इसलिये जिसके पुण्यों का उदय होता है वहीं मनुष्य जन्म ले पाता है। वह बडा भाग्यशाली होता है कि वह ईश्वर को पाने की क्रिया को करने में सक्षम हो सकता है।
और मनुष्य जन्म लेने के पश्चात एक-एक क्षण मृत्यु की ओर अग्रसर होता रहता है। पता नहीं मृत्यु कब उठा लें, यह तो नितान्त अनिश्चित है। यदि मृत्यु अल्पायु में ही हो गई तो मनुष्य जन्म का होना निरर्थक है। अतः परमात्मा को पाने के लिये इस मार्ग पर चलने के लिये कोई आयु या समय सीमा कि प्रतीक्षा करना उचित नहीं है। जिस प्रकार युवा अवस्था में परिश्रम से कमाया गया धन, शरीर, विद्या, बल, पुत्र, आदि वृद्धावस्था में सहायक सिद्ध होते है उसी प्रकार बाल्य काल में तथा युवावस्था में ही साधना मार्ग पर चलने वाले, वृद्धावस्था में ही नहीं दूसरे जन्मों में भी लाख गुणा आनन्ददायक गुणों से परिपूर्ण होते है। तथा अमृत्व प्राप्त कर लेते है। उदाहरण रूप में बाल्य काल में तप मार्ग पर लगे ध्रुव, प्रहलाद, मीरा आदि के नाम अमर है।
सद्गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली
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