





वास्तव में जीवात्मा आत्मरूप है, साक्षी है, व्यापक है, पूर्ण है, अद्वितीय है, मुक्त है, चैतन्य है, सभी प्रकार की क्रियाओं से परे है (न क्रिया करता है, न ही उसमें क्रियायें घटती है) किसी भी प्रकार का संग होने पर उस पर प्रभाव नहीं पड़ता, उसमें किसी प्रकार की कोई इच्छा नहीं है, शान्त है। संसारवान यदि यह दिखाई दे रहा है अर्थात् यह जैसा है उसके उलट दिखाई देता है तो यह भ्रम के कारण है।
महर्षि आत्मा के बारे में कहते है कि यह निस्पृहः अर्थात् जिसके अन्दर किसी भी इच्छा का स्फुरण नहीं होता क्योंकि इच्छा या कामना तो वहां उत्पन्न होती है जहां कुछ कमी हो। कमी को पूर्ण करने के लिये ही इच्छा का स्फुरण होता है बिना किसी इच्छा यदि कुछ करे तो वह मात्र खेल होता है इसी को लीला कहते है। अभाव की प्रतिक्रिया नहीं होती लीला इसमें किसी प्रकार का बन्धन नहीं होता है तथा न ही मुक्ति। इसमें कोई द्वन्द भी नहीं है। जो लक्षण आत्मा के कहे गये है उनके अनुसार वह संसारी सिद्ध नहीं होता। वह असंसारी है। संसार के गुण धर्मों से परे है। वह संसारी यदि प्रतीत होता है तो इसका कारण केवल भ्रम है।
और यह भ्रम है तुम्हारा अज्ञान। तुम अपनी कल्पनाओं में जी रहे हो। तुम अनेक जन्मों से आत्मा को देह से जोडकर देखते आये हो इसी वजह से आत्मा को जो असंसारी है तुम्हे संसारी प्रतीत होता है जैसे ही भ्रम टूटेगा, अर्थात् अज्ञान का अन्धकार हटेगा संसार से परे आत्मा की अनुभूति होने लगेगी। वेदान्त के अनुसार- कोई बालक बादलों की गति को देखकर कहता है कि चन्द्रमा चल रहा है, जब कि यह सत्य नहीं है, इसी प्रकार अज्ञानी संसार की वस्तुओं का आरोप आत्मा पर करता है।
प्रतीत रूप में (जीवात्मा के) भ्रम को और इस आभास को, भ्रम को त्याग कर कि मैं अन्दर हूं अथवा बाहर, स्वयं को कूटस्थ, बोधरूप और अद्वैत रूप विचार। कूटस्थ- जिस पर लोहा रखकर चोट मार कर लोहे को भिन्न-भिन्न आकार का बनाया जाता है। उसे कूटस्थ कहते हैं। लोहार की चोटें लोहे पर पड़ने के साथ-साथ कूटस्थ पर भी पड़ती है। लेकिन लोहा तो भिन्न आकार ले लेता है और कूटस्थ ज्यों का त्यों ही रहता है। उसमें कोई बदलाव नहीं आता, इसी प्रकार आत्मा भी है, वह अद्वैत है उसमें किसी प्रकार का मिश्रण नहीं है अर्थात द्वैत नहीं है यही स्वरूप तुम्हारा है इसलिये स्वयं को प्रत्येक क्षण बदलने वाला, अज्ञान रूप और द्वैत स्वभाव वाला मत मानो। तुम आभास रूप नहीं हो तुम तो अधिष्ठान रूप हो, स्वयं को परिवर्तनशील अज्ञान रूप और स्वयं को दूसरे के स्थान पर देखने के कारण तुम्हारा भ्रम है, तुम इस भ्रम को त्याग कर कर्मेंन्द्रियों और ज्ञानेंन्द्रियों से जोडते हुये उनके धर्म को अपना धर्म नहीं मानो। बाह्य जगत तथा आंतरिक जगत दोनों से विलक्षण आत्म रूप जानो।
हे पुत्र ‘मैं देह हूं’ इस अभिमान रूपी पाश में तू जन्म-जन्मांतरों से, चिर काल से बन्धा हुआ है ‘मैं देह नहीं हूं’ ‘ज्ञान रूप हूं’ इस ज्ञान की (अनुभव रूपी) तलवार से उस बन्धन को काट कर सुखी हो।
महर्षि हमारे जन्म लेने की यात्रा की तरफ इशारा करते है वे कह रहे है तुम्हारी देह अनेक जन्मों में बदलती रही है यह बन्धन कई-कई जन्मों पुराना है। तुम आत्म रूप हो, ज्ञान रूप हो। देह के अभिमान के कारण ही अज्ञान है। अज्ञान के कारण अनेक प्रकार के अभिमान के जाल में तुम उलझ गये और उलझते ही चले गये। अब तुम इस मिथ्या अभिमान रूपी जाल को कि ‘मैं देह हूं’ को ज्ञान (मैं बोध रूप आत्मा हूं) रूपी तलवार से काट डालो और उस जाल से बाहर निकल कर सुखी हो जाओ।
इस सूत्र में ऋषि ने गुरु रूप में शिष्य की बुद्धि, हृदय से होते हुये आत्मा में प्रवेश कर लिया और वहां पर गुरु का शिष्य की परम जिज्ञासा के स्वरूप को जानकर शिष्य के प्रति स्नेह का भाव गहरा हो गया है अब वे चाहते है कि शिष्य अपनी जिज्ञासा का परम लक्ष्य पा ही ले इसीलिये वे उसे आत्मीय शब्द पुत्र से सम्बोधन करते है पिता जिस प्रकार पुत्र में अपनी ही झलक देखता है उसी प्रकार गुरु भी शिष्य में अपनी परछाई देखता है और यदि गुरु शिष्य में स्वयं को देखने लगे तो शिष्य के तो भाग्य खुल गये समझो ऐसी स्थिति में गुरु व शिष्य दोनों कृतार्थ हो जाते है समझो एक दीपक से दूसरा दीपक जल गया।
मुक्त होने के लिये अनेक साधनायें है लेकिन एक साधना है ज्ञान की जब कि बाकी साधनायें द्वैत की है अर्थात् जिस साधना में हमें कोई दूसरा मुक्त करे दूसरे को ही लक्ष्य मानकर साधना की जाती है।
और ज्ञान की साधना में द्वैत का कोई अर्थ ही नहीं है ज्ञान की साधना में स्वयं को ही जानना होता है और जब ज्ञान होता है तो स्वयं को ही जानते है गुरु का अभिप्राय है कि यदि हम समाधि में जाने के लिये कोई क्रिया, अभ्यास आदि को प्रयोग में लाते है तो स्वयं को बन्धन युक्त ही करते है क्योंकि कर्म से फल तथा पुनः कर्म का जन्म होता है। कर्म का कारण है बन्धन, चाहे वह विशिष्ट हो अथवा साधारण।
यह सम्पूर्ण जगत तुम में ही समाया हुआ है और तुम इस जगत में पिरोये हुये हो, यही वास्तविकता है इसीलिये सभी दोषों से परे और ज्ञान रूप तुम भ्रामक एवं विपरीत इस चित्त वृत्ति को प्राप्त न होओ कि तुम संग दोष से प्रभावित होने वाले और दूसरों के अस्तित्वों से अस्तित्ववान हो अर्थात् दूसरे के होने के कारण ही तुम हो ऐसा न मानो।
गुरु अष्टावक्र का अभिप्राय है कि तुम इस जगत में समाये हो और यह जगत तुम में। मुझमें यह जगत वैसे ही समाया हुआ है जिस प्रकार माला के मनकों के बीच से धागा (सूत) पिरोया जाता है अर्थात् माला जो मनकों, सुमेरू आदि से मिलकर बनी है। वह सूत के कारण ही बनी है। यह सब दिखाई तो अलग अलग देते है, इनके नाम रूप भी अलग-अलग हैं, लेकिन वास्तव में वह सूत ही हैं। इसी प्रकार तत्ववेत्ता भी व्यवहार में उन्हीं शब्दों का प्रयोग आत्मा के भिन्न-भिन्न नाम रूपों के लिये करता है। परन्तु वे उस पारमार्थिकता को भी जानता है जो सत्य है। इसी प्रकार तुम भी जानो स्वयं को अनात्म मानते हुये देहाभिमानी होते हुये तुम क्षुद्रता को न प्राप्त करों स्वयं को पापात्मा न मानो। इस विपरीत बुद्धि के कारण ही तुम वह करते हो जो तुम करना नहीं चाहते। तुम्हारे मुक्त न होने का यही कारण है।
और जब तुम्हें बोध हो जायेगा अर्थात् बन्धन मुक्त हो जाओगे तो जो तुम देख रहे हो वह दृश्य तो वैसा ही दिखेगा जैसा है परन्तु तुम्हारी दृष्टि बदल जाती है। क्रमशः आगे——–!
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