





जब कभी आप अपने जीवन में निराशा से घिर जाये, आपको लगे कि दुर्भाग्य आपका साथ नहीं छोड़ रहा, आपके लाख प्रयत्न करने पर भी आप हमेशा पराजित हो जाये, दूसरों का भला करने पर भी आपको उपहास ही प्राप्त हो, तो निराशाजनक जीवन न जीकर एक बार महाभारत के इस महान पात्र कर्ण के जीवन के बारे में जरूर जान लें, कि कैसे नियति ने उनके साथ एक क्रूर खेल खेला। ऐसा इसलिये नहीं कि यह पढ़ कर आप अपने आपको दिलासा दे सके, कि उनके जीवन ने आप से भी अधिक परीक्षायें ली, बल्कि इसलिये कि हम यह सीख सकें कि इतना कुछ बुरा होने के बावजूद भी हम कर्ण की तरह सम्मानजनक जीवन जी सकें। इतना अधिक सम्मानीय कि हजारों वर्ष व्यतीत होने के बाद भी उनके समान कोई श्रेष्ठ व्यक्तित्व नहीं बन सका।
अधिरथ नाम का एक बूढ़ा आदमी था, वह हमेशा गंगा नदी के किनारे जाकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हुये रोजाना संतान प्राप्ति की प्रार्थना करता था, वह कहता कि ‘हे सूर्यदेव! आप समस्त सृष्टि को अपने तेज से प्रकाशित करते है। मेरे कोई संतान नहीं है और मेरा जीवन अत्यन्त दयनीय है। मुझ पर दया करिये, मुझे संतान हीनता के श्राप से मुक्त करें। मेरे जीवन पर भी अपनी कृपा प्रदान कीजिये।’
एक दिन जैसे ही अधिरथ की प्रार्थना समाप्त हुई उसकी आँखे अश्रुओं से भर गई, वह सोच रहा था कि वह प्रतिदिन सूर्यदेव से यही प्रार्थना करता रहा है, वह वृद्ध भी हो रहा है, परन्तु भगवान ने उसकी प्रार्थना कभी नहीं सुनी। ऐसा सोच वह जाने ही वाला था कि उसे गंगा नदी में कुछ तैरता हुआ दिखाई दिया। जब वह वस्तु अधिरथ के समीप आयी तो उसने उसे उठा लिया। वह एक बड़ी टोकरी थी जिसमें एक शिशु था, वह चमकीला कवच पहने हुए था व कान में सोने के कुण्डल थे, उस शिशु के मुख पर सूर्य के समान तेज था। अधिरथ यह देख आश्चर्य चकित व प्रसन्न था। उसे विश्वास हो गया कि भगवान ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, वह उसे ले अपने घर गया, उसकी पत्नी राधा उस शिशु को देख बहुत प्रसन्न हुई। उसने बड़े प्यार से उसका लालन-पालन किया। अधिरथ व राधा ने उस शिशु का नाम वसुसेना रखा। जो आगे चलकर कर्ण बना।
समय के साथ कर्ण एक तेजस्वी बालक के रूप में बड़ा हुआ। वह अपने हम उम्र बालकों से अधिक बहादुर व बलिष्ठ था। उसे हमेशा से ही धनुष-बाण चलाने में रूचि थी। वह तीरंदाजी व निशाने बाजी में दूसरों से कोसो आगे था। सभी लोग उसकी इस कला पर सदा अचंभित होते थे। कर्ण हमेशा से ही स्वयं को एक उत्कृष्ट तीरंदाज व एक महान योद्धा के रूप में देखना चाहता था और इसीलिये वह तीरंदाजी की कला में दक्षता प्राप्त करना चाहता था। परन्तु इस के लिये उसे गुरु की आवश्यकता थी, जो उसे इस कला की बारीकियां सिखा सके। इसी विषय पर चर्चा करते हुये उसे परशुराम के बारे में पता चला। लोगों द्वारा पूछने पर उसे ज्ञात हुआ कि वे ऋषि जमदाग्नि के पुत्र हैं। ऋषि होने के साथ-साथ वे एक महान योद्धा भी हैं। परशुराम ने इक्कीस बार सम्पूर्ण विश्व पर विजय प्राप्त भी की थी, कोई भी क्षत्रिय उन्हें पराजित नहीं कर पाया था। उन्हें तीरंदाजी की समस्त बारीकियों का ज्ञान था।
उन दिनों में केवल क्षत्रिय व ब्राह्मण वर्ग के लोग ही तीरंदाजी सीख सकते थे। लोग परशुराम को धरती पर भगवान का अवतार मानते थे, जो अन्याय का नाश करने के लिये पृथ्वी पर आये। यह सब सुनकर कर्ण के हृदय में परशुराम जी के लिये जो आदर व भाव थे, वे और बढ़ गये। वह परशुराम को अपने गुरु के रूप में देखने लगा। परन्तु उसकी एक दुविधा थी, कि क्या वे कर्ण को अपना शिष्य बनायेंगे।
एक दिन साहस करके कर्ण परशुराम की कुटिया में गया और उनका शिष्य बनने की अपनी मनोकामना व्यक्त की। परशुराम भी कर्ण की विनम्रता और सीखने की लगन देख मना नहीं कर पाये। परशुराम के कहने पर कर्ण ने अपनी कला का प्रदर्शन किया, वे उसकी निपुणता व एकाग्रता देखकर आश्चर्य- चकित हुये, क्योंकि कर्ण की दक्षता उसकी उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्व थी। परशुराम प्रसन्न हुये व कर्ण को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया। परशुराम क्षत्रिय वर्ग के विरूद्ध थे और इसीलिये ब्राह्मणों को ही अपना शिष्य बनाते थे। उन्हें लगा कि शायद कर्ण भी ब्राह्मण-पुत्र है। जबकि वह क्षत्रिय होने के बावजूद सूत-पुत्र था, क्योंकि उसके पालन करने वाले पिता अधिरथ सूत जाति के थे। बिना किसी अड़चन के कर्ण की शिक्षा आरम्भ हुई। वह कोई भी निर्देश जल्दी समझ लेता था, कर्ण अपने सभी सहभागियों में श्रेष्ठ थे। वह प्रथम प्रयास में ही सफलता पा लेता था। वह अपने गुरु का प्रिय भी था।
एक दिन परशुराम अपने प्रिय शिष्य कर्ण की गोद में सर रख कर, वृक्ष की छाया में आराम कर रहे थे, क्योंकि वे थके हुये थे, इसीलिये नींद भी आ गयी। ठीक उसी समय एक मधुमक्खी आई और कर्ण की जंघा पर आकर बैठ गई और तीव्र गति के साथ भेदन करने लगी, कर्ण को असहनीय पीड़ा होने के बावजूद भी टस से मस नहीं हुये क्योंकि उसके जरा से हिलने से उसके परम गुरु की नींद में खलल हो सकता था, जो कि कर्ण को जरा भी स्वीकृत न था। वह मधुमक्खी भी भेदन कर जा रही थी, घाव इतना गहरा हो गया कि कर्ण की जंघा से रक्त निकलने लग गया, पर उसने इतनी पीड़ा सहन करने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जब रक्त बहता हुआ परशुराम के गाल तक पहुँच गया, तब उनकी नींद खुली। वे इतना गहरा घांव देखकर आश्चर्य चकित होकर कर्ण से इतनी पीड़ा चुपचाप सहने का कारण पूछने लगे। तब कर्ण ने कहा कि आपकी सेवा के आगे यह घाव तुच्छ मात्र है, इसका कोई अस्तित्व ही नहीं हैं कर्ण की शारीरिक क्षमता को देखकर परशुराम को संदेह हुआ कि इतना दर्द सहने वाला, ब्राह्मण नहीं हो सकता, यह ब्राह्मण नहीं जरूर क्षत्रिय ही है। इस बालक ने मुझे भ्रम में रखकर अपनी पहचान छुपा कर मुझसे शिक्षा ली। परशुराम जो कि क्षत्रिय वर्ग को शिक्षा नहीं देने का बहुत पहले प्रण ले चुके थे, अत्यन्त क्रुद्ध अवस्था में कर्ण से उसकी सच्चाई पूछते हैं, कर्ण कुछ नहीं बोल पाता क्योंकि उसके अनुसार वह न तो ब्राह्मण था और न ही क्षत्रिय, वह अधिरथ को ही अपना पिता मानता था, जो सूत वर्ग का था, जिसे समाज द्वारा निम्न श्रेणी माना जाता था, वह अपने गुरु को क्या जवाब देता? वह दयनीय अवस्था में उनके समक्ष चुपचाप खड़ा था। कर्ण की चुप्पी ने परशुराम को भरोसा दिला दिया कि वह एक क्षत्रिय-पुत्र ही है।
कर्ण की विनम्रता, साहस, गुरु के प्रति श्रद्धा, सीखने के प्रति उनकी लगन, सभी परशुराम के क्रोध के आगे धूल हो गयी। परशुराम क्रोधित थे, उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि, ‘सुनो! तुमने अपने गुरु को धोखा देकर प्रशिक्षण प्राप्त किया। मैने तुम्हें शक्तिशाली शस्त्रों का इस्तेमाल करना सिखाया है, लेकिन जब तुम्हें सबसे ज्यादा इस ज्ञान की आवश्यकता होगी, उस समय तुम अपना सारा ज्ञान भूल जाओगे!’ यह सुन कर कर्ण के पैरों तले से धरती खिसक गई। वह बहुत दुखी हुआ क्योंकि उसने अपने गुरु की भावनाओं को ठेस पहुँचाया था, जिसके कारण उसे श्राप मिला था। कर्ण की निष्ठा, मित्रता व पराक्रम का विवेचन अगले अंक में—–!
निधि श्रीमाली
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