





यह सही है, कि भारतवर्ष में गृहस्थ धर्म श्रेष्ठ रूप से निभाया जाता है, पश्चिम की भांति यहां एक व्यक्ति के जीवन में बार-बार तलाक और पुनर्विवाह की स्थिति नहीं बनती है। लेकिन यह भी पाया गया है, कि ज्यादातर व्यक्तियों का गृहस्थ जीवन तो है, लेकिन उसमें मधुरता और श्रेष्ठता नहीं है।
विवाह सात फेरों का एक ऐसा बन्धन है, जिसमें भारतीय संस्कृति के अनुरूप पति अपनी पत्नी को अपना पूरा घर-बार सौंप देता है और इसी प्रकार स्त्री भी अपने माता-पिता, भाई-बहनों का साथ छोड़कर एक नये वातावरण में स्वयं को परिवर्तित कर देती है। पति को यह विश्वास होता है, कि इस पत्नी द्वारा मेरे घर की पूर्ण रूप से देख-भाल की जायेगी और इसके द्वारा ही मेरी श्रेष्ठ संतान उत्पन्न होगी और पत्नी को भी यह भावना रहती है, कि उसके जीवन में सर्वस्व पति ही है।
यह क्रिया कहने-सुनने में तो अत्यन्त सरल लगती है, लेकिन ऐसा क्यों होता है, कि विवाह के कुछ समय बाद ही जीवन में एक नीरसता आ जाती है, दोनों इस प्रकार साथ रह रहे होते हैं, मानों साथ रहना मजबूरी हो। इससे तो गृहस्थ जीवन नर्क बन जाता है, जिसमें पत्नी कर्कशा हो, व्यर्थ ही हर समय लड़ने-झगड़ने को तैयार रहती हो, पति की भावनाओं का आदर नहीं करती हो और पत्नी के लिये भी ऐसा जीवन नारकीय बन जाता है, जब पति उसकी भावनाओं का आदर नहीं करता और वह सुख के लिये अन्यत्र भटकता है।
शास्त्रों में दो शब्द आये हैं, एक गृहस्थ और दूसरा सद्गृहस्थ। सद्गृहस्थ बनने का सौभाग्य बहुत कम व्यक्तियों को मिल पाता है। ऐसा इसलिये होता है, कि पत्नी के मन में पति के प्रति जो प्रेम, विश्वास होना चाहिये, वह कम हो जाता है और पति के मन में पत्नी के प्रति जो उल्लास, हर्ष होना चाहिये, वह भावना सूखने लगती है।
वस्तुतः जीवन अनेक रसों का एक पुंजीभूत स्वरूप होता है। जिसके आधार पर जीवन यापन होता है, जहां एक ओर प्रत्येक गृहस्थ की इच्छा रहती है, कि उसे योग्य, मधुर, प्रेमभाषी और सफल जीवन साथी की प्राप्ति हो, वहीं दूसरी ओर उसकी इच्छा यह भी रहती है कि उसे श्रेष्ठ संस्कारवान संतान प्राप्त हो, सम्भवतः प्रत्येक व्यक्ति ऐसी इच्छा रखता है। नारियों में यह चिंतन विशेष कर होता है, वे अपने जीवन में इन सभी चिंतनो के प्रति अधिक सजग व चिंतित रहती हैं।
वात्सल्य शक्ति का स्वरूप पूर्ण रूप से नारी को ही समर्पित होता है, क्योंकि किसी भी शिशु की सृजनकर्ता वही तो होती हैं। एक बीज से एक वृक्ष बनने की साक्षी वही तो होती है। इसी कारणवश करूणा को ‘माँ’ की संज्ञा प्रदान कर नारी को अभिनंदन करने का प्रयास किया गया है। किन्तु ऐसी स्थिति में जहां संतान संस्कारों के अभाव में गलत मार्ग का चयन कर लेती हो, वह अनेक अर्नगल क्रियाओं में संलिप्त हो जाये और उससे बड़ी बात माता-पिता का सम्मान ना करती हो। ऐसी स्थितियां अत्यधिक कष्टदायक होती हैं। जिस पुत्र के कंधों पर प्रोढ़ावस्था का भार था, जब वह ही हाथ छुड़ा कर भागता हो, तो फिर माता-पिता किस के सहारे जीवन यापन करें।
इन सब क्रियाओं से केवल सामाजिक आलोचना ही नहीं वरन् माता-पिता की पीड़ा दोहरे स्तर पर होती है। बाह्य पीड़ा का तो फिर भी एक बार निदान संभव हो सकता हैं, किन्तु इसकी जो आन्तरिक पीड़ा पल-प्रतिपल जीवन में मथती रहती है, उसका व्याख्यान करना संभव ही नहीं होता। पुरूष के लिये ऐसी स्थितियां फिर भी इतना अधिक पीड़ादायक नहीं होती हैं। किन्तु इसके विपरीत स्त्री के लिये यह स्थिति बहुत पीड़ादायक होता है।
वास्तव में नारी के लिये सौभाग्य संतान से वंचित होना, उसे किसी दुर्भाग्य से कम नहीं प्रतीत होता और यह स्थिति तो किसी भी स्त्री के जीवन में घटित हो सकती है चाहे वह निर्धन हो अथवा धनवान, शिक्षित हो अथवा अशिक्षित्, रूपवान हो या कुरूप, बाह्य भेद कोई भी हो, किन्तु आन्तरिक पीड़ा प्रत्येक नारी में एक समान ही होती है। ऐसी स्थिति में जीवन के सभी सुख उपभोग, धन-सम्पत्ति, स्वतः व्यर्थ सिद्ध होने लग जाते हैं, जब घर में उनकी ही संतान उनके विपरीत हो, उनका मान-सम्मान करने के उलट उनका ही अपमान करते हों। ऐसे में प्रश्न यह भी नहीं रह जाता, कि संतान बालक हो अथवा बालिका, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में माता-पिता को उतना ही कष्ट होता है।
इन स्थितियां का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इन कारणों में तंत्र प्रयोग, गृह दोष, पितृ दोष अथवा पूर्वजन्म कृत दोष आदि आते हैं। माता-पिता द्वारा दिया संस्कार भी एक कारण हो सकता है, किन्तु प्रत्येक स्थिति में उपेक्षा का पात्र माता-पिता ही होते हैं। वर्तमान में स्थितियां अत्यन्त भयावह होती जा रही हैं, जगह-जगह खुल रहे वृद्धाश्रम इसके साक्ष्य हैं। यदि ऐसे में भी आज का व्यक्ति जाग्रत नहीं हुआ और अपनी संतान को श्रेष्ठ चेतनावान सुसंस्कारों से आपूरित नहीं कर पाता है, तो उसे भविष्य में अनेक दुष्कर परिणाम भुगतने पड़ते है।
क्योंकि समय का चक्र बहुत तेजी से बदल रहा है, और यह चक्र अपने साथ अनेक परिवर्तन लेकर आता है, जो पुरानी परम्पराओं, विचारों को नेस्तानाबूद करता हुआ आगे बढ़ रहा है, पाश्चात्य संस्कृति हमारी प्राचीन सभ्यता को पूरी तरह नष्ट करने को आतुर है, ऐसे में हमे प्रारम्भ में ही ऐसे उपाय करने होगें, जो हमारी संतानों को श्रेष्ठ सुसंस्कार से आपूरित कर सके। उन्हें जीवन का सद्मार्ग और सद्चेतना प्राप्त हो सके, इन सब चेतनाओं से युक्त जीवन ही सौभाग्य शक्ति सम्पन्न माना जा सकता है।
मूलतः यह साधना सौभाग्य शक्ति युक्त सुसंस्कारवान संतान प्राप्ति की साधना है। संतान सम्पन्न दम्पत्तियों के लिये इस साधना का महत्व सर्वोपरि है, साथ ही संतान प्राप्ति में भी यह साधना पूर्ण प्रभावशाली है। जो संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण करती है।
इस साधना को केवल स्त्री द्वारा सम्पन्न करने का निर्देश है। यह साधना संतान शक्ति दिवस 29 दिसम्बर को आरम्भ करें या स्त्रियां यह साधना ऋतुमति होने के उपरान्त ऋतु स्नान के एक दिन बाद सम्पन्न करें। साधिका को चाहिये, कि वह प्रातः पांच-छह बजे के मध्य स्वच्छ पीले वस्त्र पहन, पूर्वाभिमुख हो पीले आसन पर बैठे तथा अपने समक्ष, पहले से धोकर स्वच्छ की गई भूमि पर कुंकुम से स्वास्तिक का निशान बनायें, स्वास्तिक के मध्य चावल की ढे़री बनाकर उस पर सौभाग्य शक्ति यंत्र स्थापित करें।
इसके उपरान्त साधिका यंत्र के मध्य में तेजस को स्थापित कर उसका पूजन कुंकुम, अक्षत एवं पुष्प की पंखुडि़यों से करें। दीपक अथवा अगरबत्ती की आवश्यकता विशेष नहीं कही गई है, किन्तु साधना स्थान का स्वच्छ होना अति आवश्यक है। साधना स्थान घर के किसी भी स्वच्छ भाग में बनाया जा सकता है, किन्तु घर के भीतर होना आवश्यक है। इसके पश्चात साधिका हकीक माला से निम्न मंत्र की 5 माला मंत्र जप सम्पन्न करें-
मंत्र जप पूर्ण होने के बाद यंत्र को प्रणाम कर आसन छोड़े और अगले तीन दिनों तक उपरोक्त क्रम को अक्षुण्ण बनाये रखें। साधना काल के मध्य में तामसिक भोजन अधिक वार्तालाप, अस्वच्छता एवं पति साहचर्य पूर्ण रूपेण वर्जित है, यदि संभव हो तो साधिका का पति भी इस अवधि में सात्विक जीवन व्यतीत करें। साधना की समाप्ति के उपरान्त साधिका तेजस को अपने गले में धारण कर ले तथा यंत्र व माला को कुछ दक्षिणा के साथ किसी भी पवित्र स्थान पर विसर्जित कर दे।
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