





‘अर्थशास्त्र’ के रचनाकार कोटिल्य जिन्हें हम चाणक्य के नाम से भी जानते हैं, उनकी यह रचना राज्य प्रशासन पर केन्द्रित है। अपनी पुस्तक में कोटिल्य ने राजा, मंत्री व अन्य राज्य अधिकारियों के कर्त्तव्यों व अधिकारों का वर्णन किया है। इसके साथ ही ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य के व्यापारिक मुद्दों का, न्याय प्रणाली का, युद्ध व शांति का, वाणिज्य और व्यापार का, शादी व अलगाव का, सैन्य रणनीति जैसी कई नीतियों का विस्तृत वर्णन है। वर्तमान में भी ‘अर्थशास्त्र’ राजनीति व कूटनीति के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है।
चाणक्य ने ही मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त को नंद के सिंहासन पर विजय प्राप्त करने में सहायता की थी। चाणक्य की ही सलाह व मार्गदर्शन पर चलकर चंद्रगुप्त एक महान शासक बनें।
326 ई-पू- में जब ग्रीस के शूरवीर ऐलेक्जेडर ने भारत पर आक्रमण किया, तब हमारे देश के कई राज्यों में एकता नहीं थी, जिसके कारण शासन कमजोर हो रहा था और इसी कमी का फायदा उठाते हुये ऐलेक्जेंडर ने कई छोटे-छोटे विभाजित राज्यों को युद्ध में परास्त कर दिया था। चाणक्य भारत की यह कमजोर स्थिति देखकर चिंतित थे, उस समय वे कुटिया में रहकर अपने शिष्यों को राजनीतिक, भौतिक, वाणिज्यिक आदि विषयों में शिक्षा-दीक्षा दिया करते थे। चाणक्य का मानना था कि एकजुट होकर ही विदेशी आक्रमण कारियों का विरोध किया जा सकता है। वे भारत में एक मजबूत साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे।
एक दिन मगध राज्य के मंत्री शक्तर चाणक्य की कुटिया के सामने से गुजर रहे थे, चाणक्य को घास उखाड़ते देख वे वहाँ रूके और चाणक्य से इसका कारण पूछने लगे, तब चाणक्य ने कहा यह घास मेरे पैरों में चुभने लग गई है और इसीलिये आज मैं इन्हें निकाल फेंक रहा हूँ। यह सुन शक्तर जिसे उसी के राजा धनानंद ने भरी सभा में अपमानित किया था, उससे बदला लेने का विचार आया, शक्तर को चाणक्य प्रखर बुद्धि वाले प्रतीत हुये। उन्होंने चाणक्य को अपने राजा धनानंद के दरबार में आने का निमंत्रण दिया, उसने बताया कि मगध के राजा धनानंद आप जैसे विद्वान से मिलकर अत्यन्त प्रसन्न होंगे। धनानंद एक अकुशल शासक था, जिससे उसकी जिम्मेदारियाँ पूर्ण नहीं हो पाती थी, प्रजा भी उससे अप्रसन्न थी। वह अत्यधिक मदिरापान करता था। जब चाणक्य उसके दरबार में गये तो राजा ने उनसे उनका परिचय पूछा, चाणक्य ने बताया कि वे रसायन-शास्त्र, चिकित्सा, राजनीति व अर्थशास्त्र में ज्ञानी हैं। नशे में होने के कारण धनानंद ने चाणक्य का उपहास किया व उनके ज्ञान की उपेक्षा की, इससे चाणक्य अत्यन्त क्रोधित हुये व उन्होंने राजा व उसके पुत्रों का सर्वनाश करने का वचन ले लिया और इस प्रकार शक्तर की तरकीब काम कर गई, उसे ज्ञात था कि अब चाणक्य के इस प्रण से राजा कभी नहीं बच पायेगा। चाणक्य ने शक्तर को बताया कि मगध में एक कुशल शासक ही सभी प्रदेशों में एकता स्थापित कर सकता है और भारत में प्रवेश करने वाले आक्रमणकारियों को निकाल फेंक सकता है। यह कार्य धनानंद के शासन में संभव नहीं है, इसके लिये उन्हें एक सुदृढ़ व बुद्धिमान राजा की तलाश आरंभ करनी होगी।
शक्तर ने चाणक्य को चन्द्रगुप्त के बारे में बताया जो नंदा के नौ पुत्रों में ज्येष्ठ थे, उसके आठों भाई उससे ईर्ष्या करते थे क्योंकि वह उन सभी से अधिक बहादुर, बलवान व बुद्धिमान था। प्रजा का भी प्रिय था। सभी पुत्रों में ज्येष्ठ होने पर भी उसे राज गद्दी नहीं प्राप्त हुई क्योंकि उसकी माता एक निम्न वर्ग की थी। चाणक्य और शक्तर चन्द्रगुप्त से मिल कर बताते हैं कि अब मगध प्रदेश को शक्तिशाली बनाने का समय आ गया है और तुम्हें ही भविष्य में यहाँ का शासन संभालना है। चाणक्य चन्द्रगुप्त को नंदा सम्राज्य के विरूद्ध अपनी सेना तैयार करने की सलाह देते हैं।
चन्द्रगुप्त अपने गुरु चाणक्य का आशीर्वाद प्राप्त कर मगध की जनता व दुःखी किसानों से मिलकर समझाते हैं कि अब हमारा राष्ट्र मुसीबत में है और वर्तमान में मगध ही सबसे मजबूत राज्य साबित हो सकता है और इसके लिये शासन की कमान एक निडर और बहादुर राजा के हाथों में होनी चाहिये। चन्द्रगुप्त इस प्रकार जनता का विश्वास जीत लेते हैं। इसके बाद नंदा से युद्ध करने हेतु उन्हें सशस्त्र सेना की आवश्यकता होती है। इसके लिये चाणक्य पर्वतक नाम के एक लोभी राजा से मिलते हैं और उसे चन्द्रगुप्त द्वारा मगध पर विजय प्राप्त कर लेने पर मगध का आधा राज्य दे देने की बात कहते हैं।
पर्वतक चन्द्रगुप्त की मित्रता स्वीकार कर उसे सेना की सहायता देता है। पूर्ण तैयारी के साथ चन्द्रगुप्त सेना व नंदा की सेना में युद्ध आरंभ होता है। नंदा की सेना अधिक शक्तिशाली होने पर भी चन्द्रगुप्त की बुद्धिमता व निडरता के कारण परास्त हो जाती है। चन्द्रगुप्त अपनी इस जीत का श्रेय अपने गुरु चाणक्य को देते हैं, चाणक्य उन्हें सतर्क रहने को कहते है क्योंकि नंदा अपनी इस पराजय के बाद चुप बैठने वाला नहीं था। नंदा व उसके आठों पुत्रों को चाणक्य के गुप्तचर नंदा की प्रिय सेविका के हाथो विष दिलवाकर चाणक्य उन्हें चन्द्रगुप्त के मार्ग से हटा देते हैं और अंततः चन्द्रगुप्त को राजगद्दी का अधिकार मिल जाता है।
नंदा की सभा का महामंत्री रक्षस बचा होता है, वह नंदा को पसंद नहीं करता था। परन्तु उसके नमक का कर्ज चुकाने के लिये वह चन्द्रगुप्त के लिये मुसीबत बढ़ाना चाहता था। रक्षस भी चतुर था, उसे ज्ञात था कि लोभवश ही राजा पर्वतक ने चन्द्रगुप्त की सहायता की थी, इसीलिये वह भी पर्वतक के समीप जा उसे पूर्ण मगध राज्य ले लेने का लालच देता है क्योंकि उसी की सेना की सहायता से चन्द्रगुप्त मगध पर जीत हासिल कर पाये थे। रक्षस पहले तो चन्द्रगुप्त को राज्य वैद्य के हाथों जहर देने की कोशिश करता है परन्तु चाणक्य की बुद्धिमता के आगे सफल नहीं हो पाता है। कुछ दिन बाद रक्षस को उसके गुप्तचरो द्वारा ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त नंदा के महल में रहने आ रहें हैं और यह जानकर रक्षस को चन्द्रगुप्त को समाप्त कर देने की एक युक्ति सूझती है।
चन्द्रगुप्त के महल में प्रवेश करने से पूर्व चाणक्य सैनिकों द्वारा महल के सुरक्षा की जांच करवाते हैं। मंत्रियों द्वारा उसे सुरक्षित कर देने पर भी चाणक्य इससे संतुष्ट नहीं होते और इसीलिये वे स्वयं सभी कक्ष की जांच करते हैं, चाणक्य को बेशक यह ज्ञात नहीं था कि रक्षस ने पर्वतक के सशस्त्र सैनिकों को महल के नीचे तहखाने में छिपाया हुआ था, जिससे वे मौका देखकर चन्द्रगप्त पर हमला कर सके परन्तु चाणक्य हमेशा सतर्क रहते थे, वे जांच कर ही रहे थे कि इतने में उन्होंने चीटियों के बड़े झुंड को महल के फर्श में हुये छेद से अन्न के दाने लाते हुये देखा, उन्होंने बाहर आकर तुरन्त सैनिकों को महल को घेरकर आग लगा देने को कहा, और इस तरह धधकती आग में तहखाने में छिपे सभी विरोधी सैनिक मारे जाते हैं। स्थिति अपने हाथों से निकलते देख रक्षस दूसरी युक्ति अपनाता है। वह चन्द्रगुप्त के महल में एक सुन्दर नर्तकी पेश करते हैं, जो उनका मनोरंजन कर सके, परन्तु चाणक्य रक्षस की रणनीति भांपकर चन्द्रगुप्त को लोभी राजा पर्वतक के महल वह सुन्दर नर्तकी उपहार स्वरूप उनके मनोरंजन के लिये भेजने को कहते हैं, न चाहते हुये भी चन्द्रगुप्त उनका कहा मानकर ऐसा ही आदेश देते हैं और अगले ही दिन पर्वतक की मृत्यु का समाचार आ जाता है क्योंकि वह नर्तकी एक विष कन्या थी, इस प्रकार चाणक्य समझदारी के साथ बिना किसी युद्ध के पर्वतक को भी चन्द्रगुप्त के मार्ग से हटा देते है और रक्षस को मात दे देते हैं। रक्षस इतनी जल्दी हार नहीं मानने वाला था, वह पर्वतक के पुत्र मलयकेतु व पाँच अन्य राजाओं को मगध पर आक्रमण करने के लिये तैयार कर लेता है।
राज्य के गुप्तचर द्वारा यह बात सुनने पर चाणक्य महामंत्री रक्षस की निष्ठा व दृढ़ संकल्प शक्ति से प्रसन्न होते हैं, परन्तु रक्षस तो चन्द्रगुप्त के विरोध में था, इसलिये उसे चन्द्रगुप्त के मार्ग से हटाना भी आवश्यक था।
मगध राज्य का गुप्तचर चाणक्य को समाचार देता है कि रक्षस का परिवार मगध में ही छिपकर रह रहा है और उसे रक्षस की पत्नी की मुहर लगी अंगुठी भी मिली है। चाणक्य उस गुप्तचर को उस अंगुठी के साथ एक पत्र देते हैं और उसे स्वयं ही मलयकेतु की सेना द्वारा पकड़े जाने के लिये निर्देश देते हैं। वह गुप्तचर वैसा ही करता है, मलयकेतु के सैनिकों को उसके पास पत्र व रक्षस की मुहर मिलती है, पत्र रक्षस द्वारा चन्द्रगुप्त को लिखा गया था जिसमें रक्षस ने लिखा था कि ‘चाणक्य को महल से निकाल देने से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मैं आपके राज्य में महा मंत्री बनने को तैयार हूँ। मलयकेतु के विरूद्ध युद्ध में विजय प्राप्त करने में मैं आपकी सहायता करूँगा। वे पाँच राजा है वे भी मलयकेतु के साथ दगा करेंगे, इसके लिये आपको मलयकेतु का वध कर उसका राज्य उन पाँचों राजाओं में बांट देना होगा।’ पत्र पढ़कर क्रुद्ध मलयकेतु उसी क्षण अपने सैनिकों को आदेश दे उन पाँचों राजाओं का वध करवा देता है। रक्षस को जब ये सब ज्ञात होता है तो वे मलयकेतु को उनके वध का कारण पूछता है, वह उन्हें पत्र दिखाता है जो रक्षस द्वारा चन्द्रगुप्त को लिखा गया था, रक्षस के कहने पर कि यह पत्र उन्होंने नहीं लिखा और न ही यह उनकी लिखावट है, मलयकेतु उनकी बात पर यकीन नहीं करता। रक्षस के ब्राह्मण होने के कारण मलयकेतु उनका वध नहीं करता।
इन सब से व्यथित व निराश होकर रक्षस अज्ञात वन की ओर चल पड़ता है, वह सोचता है कि काश! उनके राजा भी चन्द्रगुप्त के समान बुद्धिमान व बहादुर होते। थोड़ा आगे पहुँचने पर उसे एक रथ आता हुआ दिखाई देता है, जिसमें चाणक्य रक्षस को मगध ले जाने आये थे, चाणक्य कहते हैं कि उनके राज्य को रक्षस जैसे बुद्धिमान महामंत्री की आवश्यकता है और वहाँ उनका परिवार भी उनकी राह देख रहा है। रक्षस चाणक्य से कहता है कि अब उसके राजा नंद नहीं रहे और वे महामंत्री बनकर चाणक्य का स्थान नहीं लेना चाहते।
चाणक्य का मानना था कि शासक को राजतिलक के समय लिये गये प्रजा की देखभाल व सेवा के वचन का पूर्णतया पालन करना चाहिये और यदि ऐसा न हो तो प्रजा को ऐसे राजा को निष्काषित करने का अधिकार होना चाहिये। इस पर चाणक्य कहते हैं कि ‘आपका राष्ट्र अब भी जीवित है और मैं मंत्री नहीं बन सकता, मै एक कुटिया में रहने वाला ब्राह्मण हूँ और मेरा कार्य अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करना है। एकजुट व मजबूत भारत बनाना मेरा एक स्वप्न है जिसे मैं पूरा करने में कार्यरत हूँ। आपकी सहायता से चन्द्रगुप्त इसे वास्तविकता में परिवर्तित कर सकते हैं। कृपया आप उनके महामंत्री का पदभार पुनः संभाल लें!’ चाणक्य के आग्रह पर रक्षस राजा चन्द्रगुप्त की सभा के महामंत्री बन जाते हैं। चाणक्य चन्द्रगुप्त को आशीर्वाद दे अपने आश्रम आ जाते हैं। मजबूत साम्राज्य तैयार कर लेने के बाद चन्द्रगुप्त ग्रीक आक्रमण कारियों पर हमला करते हैं और बुरी तरह से उन्हें परास्त भी कर देते हैं।
चन्द्रगुप्त ग्रीक सेना को हरा, उसके प्रमुख सैल्युकस की पुत्री से विवाह कर लेते हैं और इस प्रकार चाणक्य का भारत को एकजुट कर एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का स्वप्न पूर्ण हो जाता है। वे पुनः अपने आश्रम आकर अपने शिष्यों को विभिन्न शास्त्रें में निपुण बनाने में तत्पर हो जाते हैं। चाणक्य की पुस्तक ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ आज भी अर्थशास्त्र व राजनीति के क्षेत्र में एक उत्कृष्ट मार्गदर्शक का कार्य करती है।
निधि श्रीमाली
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