





कालीदास गायें-बैलों की देखभाल कर अपने पिता की सहायता करते थे। दूध, मक्खन व दही का भोजन कर कालीदास एक सुगठित व बलवान युवक के रूप में बड़े हुये, परन्तु वे थे बिलकुल अनपढ़। अपने खाली समय में वे गाँव में स्थित काली मन्दिर में माता काली की पूजा-अर्चना में लीन रहते थे, इसमें उन्हें अत्यन्त सुख की अनुभूति होती थी, बचपन से माँ काली के परम भक्त होने के कारण ही उनका नाम कालीदास यानि कि माँ काली का सेवक हो गया था।
उस समय वाराणसी के राजा को अपनी पुत्री वसंती के विवाह योग्य वर ढूंढने में बड़ी कठिनाई हो रही थी, क्योंकि राजकुमारी सुंदर होने के साथ-साथ अत्यन्त प्रतिभावान भी थी उन्हें अपने ज्ञान पर अभिमान था। राजकुमारी ने अपने पिता को उसके लिये एक ऐसे वर को ढूंढ लाने को कहा जो उसे शास्त्र सम्बन्धित प्रतिस्पर्धा में पराजित कर सके। उस समय वररूचि नाम का एक प्रसिद्ध विद्वान था, राजकुमारी वसंती के माता-पिता को भी वररूचि ही विवाह के लिये पसंद था। परन्तु वसंती को वररूचि से विवाह स्वीकार नहीं था, उसे भय था कि कहीं वह वाद-विवाद में उससे विजयी न हो जाये, ऐसा न हो इसके लिये वह मूक प्रतिस्पर्धा का आयोजन करने को कहती हैं, जिसमें वह सभी विद्वानों से इशारों में प्रश्न करेंगी और जो भी उनके प्रश्नों का सही उत्तर देगा, वह उससे विवाह स्वीकार कर लेंगी। निश्चित दिवस पर राजकुमारी के लिये उचित वर के चुनाव हेतु मूक-प्रतिस्पर्धा आयोजित हुआ, नियम अनुसार प्रश्न के लिये वसंती ने अपनी उंगली से ऊपर आकाश की ओर इशारा किया परन्तु वररूचि व आये अन्य विद्वानों में सभी निरूत्तर थे और वररूचि ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली, राजकुमारी वसंती ने उनकी बुद्धिमत्ता का उपहास किया व उन्हें वहाँ से प्रस्थान करने को कह दिया। वररूचि को अपमानित व ठगा सा महसूस हुआ वे राजकुमारी से बदला लेकर उसका अभिमान तोड़ना चाहते थे।
इतने में उन्हें अपने मार्ग में एक युवक दिखा जो पेड़ की उसी शाखा को काट रहा था जिस पर वह बैठा था, वररूचि ने उसे सावधान किया कि वह ऐसा न करें, अन्यथा वह धरती पर गिर पडे़गा, परन्तु वह युवक नहीं माना, वह युवक कालीदास ही था। वररूचि ने सोचा इस मूर्ख को समझाने का कोई फायदा नहीं और वे आगे निकल गये, वे थोड़ा ही आगे पहुँचे थे कि कालीदास धरती पर आ गिरा। कालीदास वररूचि के पीछे दौड़ा और उन्हें कहा कि आपने यह भविष्यवाणी कैसे कर दी कि मैं गिरने वाला हूँ, आप तो महान ज्योतिषी प्रतीत होते हैं। वररूचि ने कहा कि यह कोई भी बता सकता था, यह कोई भविष्यवाणी नहीं थी। परन्तु कालीदास नहीं माना व वररूचि के पैरों में जा गिरा और अपना भविष्य पूछने लगा। वररूचि को राजकुमारी वसंती से बदला लेने का उपाय सूझ गया, उन्होंने सोचा कि इस बुद्धिहीन युवक से राजकुमारी का विवाह करवा कर उसका अभिमान तोड़ सकते है। उन्होंने कालीदास को कहा कि उसका विवाह एक राजकुमारी से होने वाला है लेकिन इसके लिये उसे वैसा ही करना होगा जैसा वे उसे बता रहे है।
वररूचि कालीदास को अपने घर ले गये और उन्हें पण्डित की वेश-भूषा में तैयार कर फूलों की एक टोकरी दे दी। वररूचि ने कालीदास को राजा से मिलने पर उन पर पुष्प वर्षा कर ‘ओम् स्वस्ति’ बोलने को कहा। वे दोनों फिर महल की ओर चल दिये, वहाँ पहुँचने पर कालीदास ने पुष्प वर्षा कर ऊँ स्वस्ति के स्थान पर भूलवश राजा को ऊष्ट्र कह दिया। राजा को यह अट-पटा लगा वे कालीदास द्वारा स्वयं को ऊँट बुलाये जाने पर क्रोधित हुये परन्तु वररूचि ने चतुराई से कालीदास का बचाव कर लिया। उन्होंने बताया कि कालीदास एक महान पण्डित हैं जो राजकुमारी वसंती के साथ प्रतियोगिता में भाग लेने के इच्छुक हैं।
राजा इसके लिये मान गये और निश्चित दिन पर कालीदास व राजकुमारी वसंती के बीच मूक प्रतियोगिता आयोजित कराई गई। वररूचि ने कालीदास को बिना कुछ बोले अपने इशारों द्वारा ही राजकुमारी के प्रश्नों का उत्तर देने को कहा। वसंती ने पहले की ही भांति अपनी उंगली से ऊपर की ओर इशारा किया। राजकुमारी को कालीदास प्रथम दृष्टि में ही भा गये थे।
परन्तु उसे शंका थी कि वह उसके इशारे का अर्थ शायद ही समझ पाये (राजकुमारी के प्रश्न का अर्थ था कि क्या ईश्वर ही सत्य व शाश्वत है?) परन्तु मन के भोले कालीदास ने राजकुमारी द्वारा ऊपर की ओर इशारा कर पूछे गये सवाल का बिल्कुल ही अलग अर्थ निकाल लिया। उन्हें लगा वह राजकुमारी उनकी आँख फोड़ना चाहती है, उन्होंने उत्तर में ‘अपनी दो अंगुलिया ऊपर कर दी, जिसका अर्थ था कि यदि राजकुमारी ने उसकी एक आँख फोड़ी तो वह उनकी दोनों आँखें फोड़ देगा। उधर राजकुमारी ने उसके इस उत्तर का अर्थ निकाला कि कालीदास के अनुसार ईश्वर के साथ-साथ यह मानव शरीर भी सत्य व शाश्वत है, इसलिये इसका उत्तर एक नहीं दो है। दूसरे प्रश्न में वसंती ने पाँच अंगुलियाँ दिखाई, जिससे उनका तात्पर्य था कि यह मानव शरीर पाँच तत्व-पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल व आकाश से बना हैं और राजकुमारी वसंती के प्रश्न को कालीदास ने यह मान लिया कि वह उसे थप्पड़ मारना चाहिती है और इसीलिये उसने अपनी मुठ्ठी बंद करके राजकुमारी की ओर कर दी कि यदि वह उसे थप्पड़ मारती है तो वह उसे एक घूसा जड़ देगा। राजकुमारी कालीदास से अत्यन्त प्रभावित हो गई क्योंकि उन्होंने उसके मुठ्ठी के इशारे से यह उत्तर समझा कि यह पाँचों तत्व मानव शरीर में जाकर एक हो जाते हैं। इस प्रकार राजकुमारी वसंती अपनी हार स्वीकार कर लेती हैं। कालीदास व वसंती का विवाह भी हो गया। परन्तु वसंती को कालीदास के विद्याहीन होने की बात जानने में देर नहीं लगी, जब कालीदास ने उसे अपने चरवाहे होने के बारे में बताया, तब वसंती को ज्ञात हो गया कि यह सब वररूचि की चाल थी, उससे बदला लेने की। वसंती ने क्रोधवश कालीदास को वहाँ से चले जाने को कहा क्योंकि उसे अपने पति के रूप में एक अनपढ़ चरवाहा स्वीकार्य नहीं था।
वसंती के कटु शब्द सुनकर कालीदास तुरन्त वहां से चला गये, वसंती को अपने कहे शब्दों पर पछतावा हुआ परन्तु कालीदास जा चुके थे। वे अपनी आराध्या माँ काली के मन्दिर में जाकर उनकी तपस्या में लीन हो गये, कई दिनों तक निर्जल तपस्या से खुश होकर माँ काली उन्हें विद्या व ज्ञान से संपन्न व प्रतिभावान होने का आशीर्वाद देती हैं। वे खुशी-खुशी अपनी कुटिया की ओर लौटते हैं, उन्हें देख वसंती प्रसन्न होती है। कालीदास ने वंसती को बताया की माँ माली की कृपा से उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ है और आपके कारण ही मुझे यह प्रेरणा मिली है, इसीलिये आज से आप मेरी गुरु हैं। वसंती को जब ज्ञात हुआ कि कालीदास उसे अब अपनी पत्नी के रूप में नहीं स्वीकार करेंगे, वह आश्चर्यचकित थी, गुस्से में उसने कालीदास को श्राप दे दिया कि उनका अंत एक स्त्री के हाथों ही होगा।
इसके बाद कालीदास प्रकृति की गोद में जीवन यापन करने लगे, प्रकृति के सौन्दर्य से प्रभावित होकर वे उन पर संस्कृत भाषा में काव्य-रचना करने लगे। समय-समय पर वे विभिन्न राज-दरबार में अपनी रचनाओं की प्रस्तुति देते, वे सभी को अति प्रिय थे। परन्तु कालीदास को राजा भोज का दरबार सबसे प्रिय था। राजा भोज साहित्य व कला प्रेमी थे। कालीदास व राजा भोज में गहरी मित्रता थी। कालीदास को राज-दरबार में हुये अपने अनुभवों पर एक नाट्य लिखने की प्रेरणा मिली। उनकी पहली रचना ‘मालविका अग्निमित्रं’ थी। जिसमें एक राजा का एक दासी के प्रति प्रेम दर्शाया गया था। नाटक की प्रस्तावना में कालीदास ने नाट्य लेखक के रूप में स्वीकार करने की अपनी इच्छा भी प्रस्तुत की थी। कालीदास का मानना था कि बुद्धिमान व्यक्ति अपना कार्य संपन्न कर लेने पर अपनी स्वयं की राय स्वीकार करता है जबकि मूर्ख व्यक्ति दूसरों के निर्णय पर आश्रित रहता हैं। उनकी पहली नाट्य रचना सफल रही। उनकी दूसरी रचना ‘शकुन्तला’ पहले से भी अधिक सफल रही व इससे उन्हें चहुं ओर प्रसिद्धि प्राप्त हुई।
कालीदास ने कई काव्य रचनायें भी की जिनमें कुमार संभव, मेघदूत, रघुवंश, ट्टतु संहार अति प्रसिद्ध हुई। एक बार राजा भोज ने कालीदास को स्वयं की प्रशंसा में एक काव्य प्रस्तुत करने को कहा परन्तु कालीदास इसके लिये तैयार नहीं थे उनका मानना था कि काव्य रचना का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष की प्रशंसा करना नहीं है क्योंकि यह शरीर तो नश्वर है। राजा भोज से अच्छी मित्रता होने पर भी कालीदास इसके लिये नहीं माने। राजा भोज ने कालिदास को कहा कि जब अन्य कवि मेरी प्रशंसा में काव्य रचना कर सकते हैं तो आप क्यों नहीं? इस बात से आहत होकर कालीदास राजा भोज का दरबार छोड़ एक शांत गाँव में रहने चले गये। इसके बारे में उन्होंने किसी को सूचित नहीं किया।
बहुत दिन बीत गये राजा भोज को अपने राज दरबार के रत्न व अपने मित्र की चिंता सताने लगी। उन्होंने मंत्रियों द्वारा हर स्थान पर कालीदास को ढूंढा, परन्तु सारे प्रयास विफल हुये। उन्हें कालीदास का पता लगाने की एक युक्ति सूझी। अगले ही दिन उन्होंने अपने दरबार में घोषणा करवाई कि जो कोई भी एक नवीन काव्य रचना दरबार में प्रस्तुत करेगा उसे पुरस्कार स्वरूप एक लाख स्वर्ण मुद्रयें दी जायेंगी, बशर्ते वह रचना नवीन हो जिसे किसी ने कहीं सुना न हो।
कई महान रचनाकार कवि आये परन्तु किसी की रचना अनसुनी नहीं थी। अंततः यह सूचना कालिदास तक पहुँची, उन्हें राजा की योजना भी समझ आ गई थी। उन्होंने एक नवीन काव्य लिखा और एक अनजान व्यक्ति को दिया और उसे बताया कि यदि वह उस कविता को राजा भोज के दरबार में जाकर प्रस्तुत करेगा तो पुरस्कार स्वरूप ढेर सारी राशि प्राप्त होगी। वह व्यक्ति कहता है कि वह न तो कवि है और न ही ज्ञानी तो फिर वह ऐसा कैसे कर सकता है, कालिदास द्वारा समझाने व पुरस्कार के लोभ में वह व्यक्ति मान गया और उसने कविता प्रस्तुत की, राजा भोज प्रसन्न हुये क्योंकि उन्हें ज्ञात हो गया था कि यह रचना कालिदास की ही थी, उन्होंने उस व्यक्ति को सत्य बताने को कहा, अन्यथा दण्डित कर देने को कहा। उसने बताया कि उसके गाँव में एक ज्ञानी ने उसे ऐसा करने को कहा था।
राजा ने उस व्यक्ति को पुरस्कृत किया व उसके गाँव पहुँचकर कालिदास से पुनः अपने दरबार चलने की विनती की। उन्होंने कहा कि वे स्वयं पर काव्य रचने की माँग को वापस लेते हैं। कालिदास मना नहीं कर सके और उनके साथ चल दिये। कुछ समय बाद फिर से राजा भोज व कालिदास में कुछ गलतफहमी हो गई और वे समुद्र पथ द्वारा लंका आ गये। लंका के राजा कुमारदास के महल में आमंत्रित होने पर भी उन्होंने वहाँ न जाने का निश्चय लिया था क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि यदि राजा कुमारदास को उनके लंका में होने की सूचना मिलेगी, तब वे राजा भोज को भी सूचित कर देंगे, परन्तु कालिदास ऐसा नहीं चाहते थे। इसीलिये राज-दरबार से दूर रहते हुये उन्होंने एक नर्तकी के यहाँ शरण ले ली और अपनी पहचान किसी को नहीं बताई। राजा कुमारदास भी राजा भोज की भांति साहित्य-कला के संरक्षक थे।
उन्होंने उनके दरबार में सर्वश्रेष्ठ कृति प्रस्तुत करने वाले के लिये हजारों स्वर्ण मुद्रयें पुरस्कार स्वरूप देने की घोषणा की थी। यह सूचना सभी ओर फैल गई, परन्तु कई दिन बीत जाने पर भी कोई राजा द्वारा घोषित काव्य-छन्द को पूर्ण नहीं कर पाया था। कालिदास को उस नर्तकी द्वारा इस बात की सूचना मिलती है, वे उसकी काव्य को पूर्ण करने में सहायता करते हैं। पुरस्कार की राशि कहीं कालिदास को न मिल जाये इस लोभ में वह नर्तकी उन पर छूरा घोंप देती है। कालिदास को वसंती द्वारा दिये गये श्राप का स्मरण होता है और वे अपने प्राण त्याग देते हैं।
नर्तकी वह काव्य राज्य-दरबार में प्रस्तुत करती है, राजा पहचान जाते है कि यह किसी प्रतिभावान की ही कृति हो सकती है, उन्हें वह काव्य शैली चिर-परिचित प्रतीत होती है, उन्हें ज्ञात हो गया था वह कालिदास ही है। उन्हें उस औरत पर शक हुआ बहुत पूछने पर भी वह सत्य छिपा रही थी, जब उसे कालकोठरी की सजा देकर दण्डित करने को धमकाया, तब उसने बताया लोभ में अंधी होकर उसने कालिदास जैसे महान विद्वान की मृत्यु कर दी। जब वे नर्तकी के घर पहुँचे तो कालिदास को मृत पाकर अति व्यथित हो गये। राजा कुमारदास कालिदास जैसे महान कवि की मृत्यु से इतने शोकाकुल हो गये कि कालिदास की चिता में कूदकर स्वयं के भी प्राण त्याग दिये।
निधि श्रीमाली
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