





वास्तव में यह सम्पूर्ण संसार केवल और केवल शक्ति का ही स्वरूप है, महामाया शक्ति के अधीन है। जो भी साधना, तप, ध्यान, ज्ञान, चिंतन, भाव, विचार आदि जो भी है, उसके पीछे शक्ति संचय करने का ही भाव-चिंतन होता है। संसार में एक मात्र शक्ति ही सर्वोपरि है, शक्ति ही जीवन है। इसीलिये शक्ति साधनाओं पर सर्वाधिक जोर सभी ऋषि-मुनियो ने दिया, क्योंकि शक्ति द्वारा ही सृजन, संहार और वृद्धि होता है, अर्थात् यदि शक्ति ना हो तो आप कुछ भी नहीं कर सकते, किसी भी देवी-देवता की पूजा, साधना की जाये, उसके पीछे शक्ति की ही आराधना छिपी होती है। नाम, वर्ण में भेद हो सकते हैं, परन्तु परिणाम एक ही है शक्ति की आराधना के माध्यम से स्वयं का कल्याण करना, उच्चता प्राप्त करना।
साथ ही तामसिक देवता, तामसिक पूजा, तामसिक आचार ये सभी घोर नरक में ले जाने वाले कृत्य हैं, चाहे उनसे थोड़े काल के लिये सुख मिलता हुआ सा प्रतीत भले ही हो। वास्तव में देवता तामसिक नहीं होते, पूजक अपनी भावना के अनुसार उन्हें तामसिक बना लेता है। जो पूजक मांस-मद्य, पशु बलि, तामसिक वस्तुओ का प्रयोग करते हैं, जिन्हें तामसिक आचार की प्रयोजनीयता प्रतीत होती है, ऐसा पूजन करने वाले और कराने वाले को बार-बार नारकीय दुख पूर्ण जीवन प्राप्त होता है।
बलिदान जरूर करो, परन्तु करो अपने स्वार्थ का, अपने दोषों का, दुखी, संतप्त व्यक्तियो के लिये अपने अर्जित धन का दान करो, धन का बलिदान करो, जरूरतमंद के लिये अपने सुखों का बलिदान करो, न्यौछावर कर सको, तो कर दो अपना धन, बुद्धि, बल, ऐश्वर्य, सत्ता, साधन निष्काम भाव से माँ के चरणो में उसकी दीन, हीन, दुखी सन्तान के आंसूओ को पोछने में, इस प्रकार का बलिदान कर तुम माँ आद्या शक्ति भगवती की पूर्ण दिव्यता और चेतना प्राप्त कर सकते हो, इस नूतन वर्ष 2075 की चैत्रीय नवरात्रि पर तुम्हारे लिये यही सबसे उपयुक्त साधना तपमय होगी, जिसके द्वारा तुम सर्वशक्ति से युक्त हो सकोगे साथ ही जीवन भर माँ का वात्सल्य प्राप्त कर सकोगे।
बलि चढ़ाना है, तो बलि चढ़ाओ अपने काम, क्रोध, लोभ, हिंसा, असत्य और वासना की और प्रार्थना करो कि माँ आद्या शक्ति तुम्हारी इन बुराईयों का नाश कर दें, एक बात का ध्यान रखना शक्ति की आराधना, आद्या शक्ति की साधना किसी का बुरा करने, स्वयं के स्वार्थ, राग, द्वेष के कारण नही करना, क्योंकि वात्सल्य शक्ति रूपिणी माँ तुम्हारे कहने से अपनी सन्तान का बुरा नहीं कर सकती, वस्तुतः जो दूसरो का बुरा चाहेगा, उसकी अपनी स्वयं की बुराई हो जायेगी। मारण, उच्चाट्न, सम्मोहन आदि के लिये भी शक्ति की पूजा ना करो, शक्ति की पूजा करनी ही है, तो उनकी पूजा करो, देवमय बनने के लिये, पुरूषोत्तमय गुणों से विभूषित होने के लिये, सबकी और अपने स्वयं के जीवन की बाधाओ, विपत्तियों के नाश के लिये जिससे जीवन सम्पूर्ण रूप में सुमंगलमय बन सके।
हिन्दू नववर्ष विक्रम सम्वत् 2075 चैत्र नवरात्रि का प्रारम्भ शक्ति की आराधना और उच्चकोटि के भाव-चिंतन के साथ कर तुम अनुभव करोगे कि तुम्हें शक्ति का संरक्षण निरन्तर प्राप्त हो रहा है, तुम्हारे जीवन में मधुर करूणा की वर्षा, वात्सल्यमय छत्रछाया बनी हुयी है, जो प्रत्येक क्षण तुम्हें संरक्षण प्रदान कर रही है, यही वास्तविक रूप से तप का तात्पर्य होता है। शक्ति कल्याण के मार्ग पर गतिशील तुम्हें तब ही करेगी, जब तुम्हारा हृदय सात्विक भावों, विचारों, चिन्तनों से भरा होगा और तुम शिशु की भांति निर्विकार, अबोध रूप से शक्ति का आवाहन कर सको। शक्ति का संरक्षण उन्हें ही प्राप्त होता है, जो शिशुवत् हों, जो मातृत्व भाव से भरे हों।
ऐसा तुम तब कर सकोगे, जब तुम्हारी क्रियायें निष्पाप होकर राग, द्वेष, मलिन चिन्तन से विमुक्त हों और तुम शुद्ध, सात्विक क्रियाओ में संलग्न हो, जन कल्याण की भावना से भर सको। तुम्हारी आस्था, श्रद्धा का केन्द्र बिन्दु स्पष्ट हो, तो तुम्हारे जीवन में अस्पष्टता के काले बादल पूर्ण रूपेण छंट सकते हैं, तुम्हारे जीवन से कोहरा मिट सकता है और तुम वास्तविक रूप से शक्ति की सानिध्यता प्राप्त कर पाओगे। जीवन का मात्र एक ही उद्देश्य है, स्वयं को पूर्ण बनाना, जिसे तुम्हारी भाषा में मोक्ष कहा जाता है, वास्तव में मोक्ष का तात्पर्य ही जीवन में पूर्णता प्राप्त करने की क्रिया है और पूर्ण वही हो सकता है, जिसमें शक्ति हो, जो शक्ति से युक्त हो, जो शक्तिमय हो, जिसे शक्ति का संरक्षण प्राप्त हो, जो शक्ति की सानिध्यता में रहता हो।
जिस दिन तुम मातृत्व भाव से भर जाओगे, उस दिन से तुम्हें अपनी चिन्ता करनी की आवश्यकता नहीं, बिल्कुल उसी प्रकार जिस तरह शिशु की चिन्ता प्रत्येक क्षण उसकी जननी माँ करती है और वह शिशु प्रत्येक क्षण आनन्द में रहता है। ना उसे अपने खाने की परवाह, ना सोने की, ना कुछ बनने की, ना ही कुछ प्राप्त करने की, सब कुछ उसे स्वतः ही उपलब्ध हो जाता है, उसे तो केवल माँ को हृदय की गहराईयों से पुकारना होता है और तुम्हारा हृदय जितना अधिक निश्छल होगा, शुद्ध होगा, उतना ही तुम शक्ति की सामीप्यता प्राप्त कर सकोगे।
समय रहते तुम शक्ति की सामीप्यता प्राप्त कर लो, क्योंकि समय का जीवन में जो योगदान है, उससे तुम भली-भांति परिचित हो, यदि तुम चूक गये, तो यह संभव है कि तुम इस जीवन में जो प्राप्त करने आये थे, उसे नहीं प्राप्त कर पाये और यह समय का चक्र कब फिर तुम्हारी ओर घूमेगा यह काल ज्ञाता रूपी परमात्मा को ही पता है। इसलिये समय का सही उपयोग कर, श्रेष्ठता के मार्ग का चयन करो, शक्ति संचय की क्रिया में संलग्न हो, यही शक्ति तुम्हें पूर्णता प्रदान करेगी।
गुरु तुम्हें सदा वही मार्ग बतायेगा, जिस पर तुम्हारा कल्याण है, सुख, समृद्धि, साधन और आध्यात्मिक चेतना का संचार है, उसी मार्ग पर गुरु सदा तुम्हे लेकर चलेगा, तुम्हें भ्रान्ति हो सकती है, परन्तु गुरु का उद्देश्य स्पष्ट है, इसलिये वह हमेशा तुम्हारे अनुकूल स्थितियां निर्माण करने में सहायता करता है, जिससे तुम अपने लक्ष्य तक पहुंच सको। गुरु तुम्हारे अनुकूल स्थितियां निर्मित करता है, इसका तात्पर्य यही है कि तुम्हें निरन्तर क्रियाशील व कर्मशील बनना ही होगा, क्योंकि क्रियाशीलता व कर्मशीलता में संघर्ष का भाव होना आवश्यक है, तब ही तुम लक्ष्य प्राप्ति की महत्ता समझ सकोगे और जैसे-जैसे तुम इस मार्ग पर बढ़ते जाओगे, वैसे-वैसे तुम परिपक्व होते जाओगे, अनेक रहस्य स्वतः ही स्पष्ट होते जायेंगे। तुम्हें कुछ भी, किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। लेकिन ध्यान रहे, जब तुम शक्ति से युक्त होगे, तो धीरे-धीरे अंह तत्व तुम्हे जकड़ने की कोशिश करेगा, इसलिये गुरु का हाथ मजबूती से पकड़े रहना, वरना कभी भी जोखिम हो सकता है, उच्चता की जगह खाई प्राप्त हो सकती है।
नववर्ष विक्रम सम्वत् 2075 जो कि 18 मार्च रविवार से सुस्थिर योग के साथ प्रारम्भ हो रहा है। मैं भगवती नारायण सद्गुरु से युक्त आपके पूरे परिवार को सुमंगलमय आशीर्वाद् प्रदान करता हूं। इस शक्ति पर्व पर उपासना, आराधना व तप साधना से सृजनात्मक शक्ति को आत्मसात कर सको और जीवन में वर्धन अर्थात् वृद्धिमय स्थितियों की ओर अग्रसर हो, शक्ति द्वारा तुम्हारा रोम-रोम जाग्रत हो सके, आद्या शक्ति भगवती नारायण की चेतना द्वारा यह नवरात्रि पर्व तुम्हारे जीवन के अंधकार पक्ष को समाप्त कर प्रकाशित शक्तिमय जीवन निर्मित हो ऐसा ही तुम्हें शुभाशीर्वाद प्रदान करता हूं—!!!
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