





अनन्त चतुर्दशी एक ऐसा ही दिवस है, जो भगवान विष्णु के आदि से अनन्त तक का स्वरूप स्पष्ट करता है। जिन्हें समय की सीमा में नहीं बांधा जा सकता, श्री विष्णु आकाश तत्व के अधिष्ठाता हैं, आकाश का तात्पर्य विशालता, महानता, ऊंचाई, अद्वितीयता से है।
अनन्त इच्छाओं की पूर्ति संभव है इसके लिए व्यक्ति में विष्णुत्व का होना प्रबल आवश्यक है, क्योंकि बिना विष्णुत्व के नेतृत्व की क्षमता आ पाना संभव नहीं है। जिसमें विष्णुत्व का उद्भव नहीं है, वह तो केवल आश्रय युक्त, दूसरों पर निर्भर होकर जीवन व्यतीत करता है और जीवन तो केवल स्वयं के बलबूते जिया जाता है, स्वयं के भीतर वह ऊष्मा, ऊर्जा होनी चाहिए, जिससे अपने जीवन के पालनकर्त्ता साधक स्वयं बन सके। विष्णुत्व चेतना का तात्पर्य भी यही है कि अपने जीवन की बागडोर अपने हाथों में हो और साथ में हो अनन्त लक्ष्मी की ज्योति जिसका प्रकाश सभी आकांक्षाओं, इच्छाओं को पूर्ण कर सकें।
भगवती लक्ष्मी जो भगवान विष्णु की भार्या हैं, जो निरन्तर उनकी ही सेवा में रत रहती हैं। परन्तु लक्ष्मी का परिचय केवल इतना ही नहीं है, वे अनन्त की देवी हैं, लक्ष्मी के स्वरूप को केवल धन-सम्पदा आदि में नहीं बांधा जा सकता है। भगवती लक्ष्मी ही वह शक्ति हैं जो भगवान विष्णु के अनन्त कार्यों को पूर्ण करती हैं, किसी भी देवता के मूल में तो उनकी वह शक्ति ही होती है, जो उस देव के सारे कार्यों को संचालित करती है। परन्तु यह तथ्य स्पष्ट है कि लक्ष्मी को चिरस्थिर करने के लिए विष्णु का होना अनिवार्य है, जहां नारायण होते हैं, लक्ष्मी का वास वहीं होता है।
गृहस्थ जीवन का अधिकांश कार्य पालन-पोषण व अपनी कामनाओं को पूर्णता देते हुए जीवन यापन करना होता है। गृहस्थ जीवन में नित्य अनेक-अनेक इच्छाएं, आवश्यकताएं और जिम्मेदारियां परिवार के पालन-पोषण की नैतिक जिम्मेदारी होती हैं। जिसकी पूर्ति करना प्रत्येक पुरुष के लिए उसका सामाजिक-पारिवारिक दायित्व होता है।
परन्तु वर्तमान की परिस्थितियों में यह कार्य पहले जितना सरल ना रहा, सुरसा मुंह की तरह बढ़ती महंगाई, जनसंख्या वृद्धि के कारण उपजी गला-काट प्रतिस्पर्धा, व्यापार प्रतिद्वंद्वियों का सामना करना, नौकरी में अपना स्थान बनाये रखने के लिए नित्य संघर्ष करना, बच्चों-पत्नी की मांगो, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दिन-रात भागते-दौड़ते जीवन का क्या हश्र होता है, यह कोई भी सामान्य गृहस्थी भलीभांति समझ सकता है। इस प्रकार गृहस्थ जीवन में छोटे-बड़े अनेकानेक कार्य होते हैं, जिनका निर्वाह करने का दबाव अधिकांश व्यक्तियों पर होता है। विष्णु-लक्ष्मी ही वे देव हैं, जिनकी चेतना आत्मसात कर गृहस्थी के सभी कार्यों को पूर्ण करना सहज हो पाता है।
इसके साथ ही भगवान विष्णु को पुरुषोत्तम कहा गया है और पुरुषोत्तम का तात्पर्य है पुरुषों में सबसे उत्तम, मनुष्य जीवन की यात्रा भी पुरुष से पुरुषोत्तम बनने की यात्रा है, विष्णु से मन और इन्द्रियों की उत्पत्ति हुई है, प्रत्येक मनुष्य विष्णु का ही एक रूप है और उसके भीतर भी वह ऊर्जा शक्ति है, जिससे वह पुरुषोत्तम की यात्रा पूर्ण कर सकता है, परन्तु वह सुप्त, अचैतन्य अवस्था में है। जिसे जाग्रत कर मनुष्य भी भगवान विष्णु की तरह अपने जीवन का पालनकर्ता स्वयं बन सकता है और लक्ष्मी रूपी शक्ति सदा उसके साथ विद्यमान रह सकती है। यही क्रिया साधक को पुरुष से पुरुषोत्तम स्वरूप में पूर्ण करती है।
यह एक ऐसी साधना है, जिसमें विष्ण, लक्ष्मी तत्व का पूर्णता से समावेश है, जो सांसारिक जीवन के आधार स्तम्भ को सुदृढ़ व सशक्त चेतना रूप प्रदान करती है। साथ ही इस साधना के माध्यम से भीतर विशुद्ध भाव का उद्भव होता है, मन, वाणी, कर्म, विचार में शुद्धता का भाव जाग्रत होता है और लक्ष्मी अपने सभी सद्गुणों के साथ साधक के जीवन में चिरस्थिर रूप में विद्यमान रहती है।
यह साधना अनन्त चतुर्दशी 23 सितम्बर अथवा किसी भी रविवार को सम्पन्न कर सकते हैं।
यह साधना रात्रिकालीन है। इसके लिए साधक को विष्णु- लक्ष्मी तत्व आपूरित सौभाग्योदय यंत्र, अनन्त शक्ति चैतन्य जीवट व सर्व कार्य सिद्धि माला की आवश्यकता होती है।
सर्वप्रथम साधक स्नान कर रात्रि में 9 बजे स्वच्छ वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाए।
अपने सामने बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर कुंकुम से त्रिकोण की आकृति बनाकर, उस पर यंत्र स्थापित कर, भगवान विष्णु का ध्यान करें-
इसके बाद यंत्र के ऊपर जीवट रख कर साधना में सफलता के लिए प्रार्थना करें फिर सर्व कार्य सिद्धि माला से निम्न मंत्र का 5 माला मंत्र जप करें।
मंत्र जप पश्चात् सभी सामग्री किसी पवित्र नदी में विसर्जित या गुरु चरणों में अर्पित कर दें।
प्रत्येक मनुष्य की यही इच्छा होती है कि वह विष्णु के समान अपने जीवन का पालनकर्ता स्वयं हो और उसका जीवन किसी के अधीन ना रहे साथ ही लक्ष्मी रूपी शक्ति सदैव उसके साथ रहे। यही अनन्त साधना का रहस्य है जिसमें साधक अपने भीतर छुपी शक्तियों को विकसित कर अपने जीवन को सर्व स्वरूप में सम्पन्न बना पाता है।
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