





सम्राट अकबर की एक कहानी आपको सुनाता हूं, प्रेरणादायक है ध्यान समझें-
एक दिन अकबर शिकार के लिए अपने महल से निकले, आगरा से बहुत दूर वो मार्ग भटक गए। भूख बहुत लगी थी, प्यास भी, परन्तु सामने कोई घर, मकान, कस्बा आदि दिखाई नहीं दिया। थोड़ी दूर और जाने पर खेत में बैठा एक किसान दिखा, उसके पास जाकर बोले- क्यों भाई किसान! कुछ खाने को है? मुझे बहुत भूख लगी है। किसान बोला- हां भाई! दो रोटियां है, कुछ सब्जी और पानी भी है, आओ बैठो, खाओ। अकबर को भूख बहुत सता रही थी तो वही रोटियां खाई, पानी पिया और जब थोड़ा चैन आया तो पूछा- तुम क्या करते हो? किसान ने कहा- भूमि है, खेती-बाड़ी करके जीवन बिताता हूं।
अकबर बोला- देखो! मैं हूं भारत का सम्राट अकबर, यदि कभी कोई आवश्यकता पड़े तो आगरा आ जाना। इस बात को तीन-चार वर्ष बीत गए, बारिश हुई नहीं, खेत में कुछ उगा नहीं, किसान भूखा मरने पर विवश हो रहा था, तब उसकी पत्नी ने कहा- तुम तो कहते थे कि सम्राट ने तुम्हें मित्र बनाया है, उससे जाकर कुछ सहायता मांगो न! ऐसे कब तक चलेगा ? किसान पहुंचा आगरा, लोगो से पूछने लगा- यहां कोई अकबर रहता है क्या? लोगों ने सुना तो भयभीत होकर बोले- अरे मूर्ख! स्रमाट अकबर कहो। किसान बोला- हां वही, वह मेरा मित्र है, मुझे उसके घर का रास्ता बता दो। लोगों ने कहा- तू तो शायद भांग पीकर आया है, सम्राट और तेरा मित्र! उसके घर तक तेरी पहुंच कैसे होगी? परन्तु यदि तू उसे देखना चाहता है, तो इस बाजार में एक ओर खड़ा हो जा, सांयकाल सम्राट की सवारी निकलेगी, तब देख लेना सम्राट को। किसान खड़ा रहा, संध्या हुई, सवारी आई, सम्राट हाथी पर बैठे थे, किसान ने पहचाना कि यही वह व्यक्ति है जिसे रोटी खिलाई थी।
चिल्लाकर बोला- अकबरा! ओ अकबरा! सम्राट के सिपाही उसे इस धृष्टता का दण्ड देने के लिए, पकड़ने लगे तो सम्राट ने उसे देखा और बोले- पकड़ो नहीं, मेरे पास आने दो, अकबर हाथी से नीचे उतरे, किसान से मिले, उसे अपने साथ हाथी पर बैठाया। महल ले गए, अपने साथ वाले कमरे में ठहराया, किसान वहां रात भर रहा। प्रातः उठकर अकबर के कमरे में गया तो देखा कि वह दोनों घुटने टेक कर बैठा है, दोनों हाथों को ऊपर करके पता नहीं किससे क्या मांग रहा है। गांव के लोग तो वैसे भी सरल होते हैं, उन्हें शहर वालों की तरह प्रपंच नहीं आता और यह किसान तो अकबर के जमाने का निहायत देहाती था, उसे कुछ पता तो था नहीं खेती-किसानी के सिवा, अकबर से पूछता है- यह क्या कर रहे थे आप?
सम्राट ने कहा- दुआ मांग रहा था, किसान बोला- तुम भी मांगते हो? सम्राट ने कहा- हां वह प्रभु तो सबका स्वामी है, सबको देने वाला है, उससे मांग रहा था। किसान ने अपना डण्डा उठाया और महल के द्वार की ओर चल दिया। उसे जाते देख अकबर ने पूछा- अरे भाई! अपना हाल तो सुनाया नहीं तुमने, कुछ चाहिए तो बताओ। किसान जाते-जाते ही बोला- आया तो था मांगने के लिए ही, परन्तु तुमसे क्या मांगना? तुम तो स्वयं भिखारी हो और भिखारी से जो भीख मांगे उस पर धिक्कार है, मैं उससे मांगूगा जिससे तुम मांग रहे थे।
उसी से मांगो! वही सबको देने वाला है, उसका भण्डार इतना भरा है कि कभी रिक्त नहीं होता, तू झोली फैला, तू हृदय से मांग, तू समर्पण से मांग, तू श्रद्धा से मांग और जब तेरी मांग ऐसी हो जायेगी तो तू मांगता थक जायेगा, वह देता नही थकेगा। उससे मांगों, उनकी आराधना करो, पूजा करो, साधना करो, ध्यान करो जो तुमसे हो पाता है, वह करो मूल में उन्हीं निखिलेश्वर का चिंतन होना चाहिए, गुरुत्व शक्ति की उपासना होनी चाहिए।
लेकिन तुम संसार वालो के गुण गाते हो, उनकी प्रशंसा करते हो, परन्तु वे करेंगे क्या? किसी बड़े अफसर की प्रशंसा की आपने, तो वह प्रसन्न होकर अपने दफ्तर का चपरासी बना देगा, नहीं तो क्लर्क या हैड क्लर्क बना देगा। परन्तु उस परमात्मा का गुणगान करो, उनकी उपासना करो तो पता नहीं कहां पहुंच जाओगे, कोई सीमा नहीं उस ऊंचाई की और फिर जो व्यक्ति ईश्वर का गुणगान करता है, उसकी वाणी में एक अवर्चनीय आकर्षण और मिठास आ जाती है। अकबर की एक और बात सुनें!
अकबर के दरबार में प्रसिद्ध गायक तानसेन रहते थे, खूब गाते थे वे। अकबर उस संगीत को सुनता तो झूम उठता, एक दिन सम्राट ने कहा- तानसेन! तुम इतना अच्छा गाते हो, तुम्हारे गुरु कैसे गाते होंगे? तानसेन ने कहा- वे गाते तो नहीं सरकार! जादू करते हैं, उनकी बात क्या पूछते हैं! अकबर बोला- हम चलेंगे उनके पास।
तानसेन ने कहा- आप चले तो जायेंगे, मैं भी चलूंगा, परन्तु वे तो अपनी मौज के मालिक हैं, क्या पता गाये या ना गायें? अकबर बोला- फिर भी कोई युक्ति सोचो, तानसेन ने सोचकर कहा- वहां चलते हैं, उनके पास कोई सितार, दुतारा, तानपुरा आदि तो पड़ा ही होगा, मैं उसे उठाकर गलत बजाना शुरु कर दूंगा, तो हो सकता है कि वे मुझसे लेकर बजाना शुरु कर दें और तब आप उनकी संगीत सुन सकें, जिसके लिए कोई उन्हें विवश नहीं कर सकता। दोनो चले आगरा से मथुरा पहुंचे, वृन्दावन की ओर चले जहां स्वामी हरिदास एक जंगल में रहते थे। तानसेन ने कहा- सम्राट! स्वामी जी के पास चलना है तो सेना, नौकर और मन्त्रियों को यही छोडि़ए, इनको लेकर जायेंगे तो शायद स्वामी जी नाराज हो जाएं।
अकबर ने सबको वहीं छोड़ा, तानसेन के साथ वृन्दावन में स्वामी हरिदास के झोंपड़ी पहुंच गए, जहां वे बाहर ध्यान में मग्न बैठे थे, उनकी सितार उनके पास रखी थी, तानसेन ने उनके निकट बैठकर सितार उठाया और बजाना शुरु कर दिया। जान-बूजकर गलत अलाप बजाया, स्वामी हरिदास ने आंखे खोल दीं, आश्चर्य से बोले- तानसेन! तुम इतना गलत बजाते हो? इतना अशुद्ध आलापते हो? यही सिखाया था मैंने तुमको? इधर लाओ, मैं तुम्हें बजाकर सुनाता हूं। और सितार लेकर वे बजाने लगे, गाने लगे और देखते ही देखते ऐसा प्रतीत हुआ कि सारे जंगल पर, सारी प्रकृति पर जादू हुआ जाता है, पक्षियों ने उड़ना और चहचहाना बन्द कर दिया। जंगल के हिरण और दूसरे जानवर उनके पास आकर खड़े हो गए, ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वायु थम गई है और सम्राट तो जैसे बेहोश हो गया हो। तभी तानसेन ने अकबर से संकेत में कहा- चलिये! अकबर चले, रास्ते में अकबर ने बोला- ऐसा प्रतीत होता है तानसेन! मैंने जीवन में पहली बार वास्तविक संगीत सुना है, ऐसा जादू पहले कभी नहीं देखा। तानसेन ने कहा- हां, सरकार! मैंने आपसे कहा तो था कि वे गाते नहीं, जादू करते हैं। अकबर बोला- तुमने भी उनसे संगीत सीखा, तुममें और उनमें इतना अन्तर क्यों है? तानसेन ने कहा- सुनिये सम्राट! मैं दिल्लीपति का गवैया हूं, वे जगतपति के गवैया हैं, दिल्लीपति और जगत्पति में जो अन्तर है, वही मुझमें और मेरे गुरु जी में है।
जगत्पति के गवैया बनिये, उनकी धुन पर पैर थिरकने लगे तो समझ लो सच्ची श्रद्धा आने लगी है और जो जगत्पति के गवैया होते हैं, उनकी वाणी में ऐसी मधुरता, ऐसा आकर्षण आ जाता है कि वह किसी को भी मोहित कर लेता है। ऐसा मनुष्य जब प्रभु के प्रेम में मग्न होकर ओम् की धुन लगाता है तो लोगों के हृदय झनझना जाते हैं। प्रभु से, गुरु से इतना प्रेम करो कि उसके जैसा दूसरा कोई न लगे, उससे अधिक प्रिय कोई समझ में ना आये, संसार वाले जब अपने संसार वाली से प्यार करते हैं, तो वे उससे सुन्दर किसी को समझते नहीं। तुम भी अपने उस प्रीतम को इस तरह प्रेम करो, कि उससे अधिक सुन्दर, मधुर और आकर्षक कोई लगे ही ना, यदि कोई अन्य उससे अधिक प्रिय लगे तो वह प्रेम ही क्या हुआ? प्रेम करना है तो इस तरह से होना चाहिए- बस रहा है मेरी आंखों मे वही जाने बहार जिसका हमरंगा कोई इस फूल चमन में नहीं।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,