





माँ वह अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण रोम- रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार उमड़ने लगता है। माँ अपने आप में ऐसा अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है।
जिस रूप में माँ को अभी तक जाना गया है, वह अत्यन्त लघु स्वरूप है। माँ तो उससे कहीं अधिक विशाल और विराट स्वरूप में आदि काल से विद्यमान है। केवल वह ही माँ नहीं है, जिसने जन्म दिया हो, पालन-पोषण किया हो। आदि काल से जब जीवन की संरचना हुई, जब जीवात्मा के रूप का निर्माण हुआ, जब सृष्टि प्रारम्भ हुई, तब भी तो सभी शिशु रूप जीवात्माओ का माँ ने ही पालन-पोषण किया है, वृद्धि के बीज रोप कर गति प्रदान कर सम्बलता युक्त बनाया। वह वात्सल्य शक्ति, ममतामयी, कारुण्य रूप आदि काल से विद्यमान है।
और यह माँ जिसने इस जीवन को संवारा, पालन- पोषण किया, उसी विराट स्वरूप माँ की चेतना शक्ति के माध्यम से वो जन्मदात्री बन पाती है और एक शिशु को युवा अवस्था तक माँ शक्ति के द्वारा पूर्ण करती है। इसीलिए स्त्री को शक्ति स्वरूपा कहा जाता है, क्योंकि स्त्री की अभिव्यक्ति शक्ति के रूप में, वात्सल्य व ममतामयी हृदय के रूप में किया गया है।
स्त्री रूप में प्रकृति स्वरूपा माँ अपने विराट स्वरूप को व्यक्त करती है। संसार में जीवात्मा का जब आगमन होता है, वह चाहे जिस रूप में हो, चाहे जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि किसी भी रूप में हो, वह जिस भी शब्द में कहे, पहला शब्द, पहला भाव माँ को पुकारने का ही होता है।
प्रकृति स्वरूप में माँ ही विद्यमान है, जो जल, वायु, वनस्पति, अन्न आदि रूपों में हमारा पालन-पोषण कर रही है। जीवन में उपलब्ध सभी वस्तुएं प्रकृति स्वरूपा माँ की दी हुई है, जिससे हमारा जीवन अबाध रूप से गतिशील है। वह माँ ही अनन्त स्वरूपों में सभी का पालन- पोषण कर रही है। त्रिगुणा स्वरूप, नव शक्ति व दस महाविद्यादि अनेक रूपों में विद्यमान वह शक्ति माँ ही है।
16 अक्टूबर 2017 को हम सभी की मातृ शक्ति माँ भगवती उन्हीं विराट वात्सल्य शक्ति माँ में एकरस होकर सम्पूर्ण प्रकृति में व्याप्त हो गयीं। अपने मूल देवमय भगवती शक्ति स्वरूप को पुनः आरूढ़ कर लिया, उनका यह अवतरण मात्र अपने स्वरूप से परिचित कराने का पर्याय था। नारायण तत्व में विलीन माँ भगवती अब सम्पूर्णता से ज्योति रूप में, शक्ति स्वरूप में, चेतना स्वरूप में हम सभी के मध्य विद्यमान हैं। ईश्वरीय सत्ता को मातृ-पितृ दोनों स्वरूपों में व्यक्त किया गया है। सृष्टि क्रम में वे अलग-अलग रूपों में अवश्य अभिव्यक्त होते हैं, लेकिन मूल स्वरूप एक ही होता है।
16 अक्टूबर का यह दिव्य दिवस सिद्धाश्रम शक्ति स्वरूपा माँ के समक्ष अपने हृदय के भावनाओं को व्यक्त करने, उनकी महिमा का गुणगान, पूजन, ध्यान, मंत्र जाप, श्रद्धा, समपर्ण व्यक्त करने का अवसर है और माँ भगवती की वात्सल्य शक्ति की सानिध्यता, उनका प्रेम, स्नेह, करुणा, सदा सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी के साथ प्राप्त होता रहे और वह मातृ शक्ति स्वरूप में आदि से अनन्त तक हमें अपने पुत्र-पुत्री के रूप में स्वीकार कर अभिवृद्धि का भाव प्रदान करें, मंगलमय जीवन की हमारे कामनायें पूर्ण करें और हमारा पालन-पोषण अनन्त स्वरूपों में करती रहें, इन्हीं भाव-चिंतन को व्यक्त करने का यह चैतन्य दिवस है। इस अवसर पर आप सभी सपरिवार सद्गुरुदेव नारायण व माँ भगवती का पूर्ण मनोभाव व श्रद्धा से पूजन, अर्चन कर उनके वात्सल्य शक्तिमय चेतना को अक्षुण्ण स्वरूप में बनाएं रखने की साधनात्मक क्रिया सम्पन्न कर अपना और अपने परिवार के लिए अभ्युदय युक्त चेतना की प्राप्ति कर सकेंगे।
पूजन-विधान
सबसे पहले परिवार के सभी लोग स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। पूजन कक्ष में सद्गुरुदेव व माता जी का चित्र स्थापित करें। पश्चात् पवित्रीकरण, आचमन, शुद्धि आदि क्रियाओं को पूर्ण कर गणपति स्मरण के पश्चात् हाथों में पुष्प लेकर भगवान सच्चिदानन्द को अर्पित करते हुए नमन करें-
सिद्धाश्रमोऽयं परमं विदूषं, ज्ञानं च दिव्यं महतं महीतं ।
आतेव नित्यं परमं पवित्रं, दिव्यात्म रूपं प्रणमं नमामि ।।
ध्यानः दोनों हाथ जोड़कर भगवती-नारायण का ध्यान करें-
मम् प्राण स्वरूपं, आत्म स्वरूपं, चिन्त्य स्वरूपं,
समस्त स्वरूपं गुरुवं नमामि ।
न आदि र्न अन्तं न बद्धो न च चोत्पत्तिः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुत्तफ़ः इत्येषा परमार्थता ।।
त्वं नारायण भगवत्यै चरणेभ्यो नमः ध्यानं समर्पयामि।।
आवाहनः दोनों हाथ सामने उठाकर भक्तिभाव से आवाहन करें-
आवाहयामि आवाहयामि
शरण्यं शरण्यं सदाहं भजामि ।
त्वं मातृ-पितृ रूपं नाथमेवं प्रपद्ये प्रसन्न।
त्वमेव शरण्यं त्वमेव शरण्यं
नारायण भगवत्यै चरणेभ्यो आवाहनं समर्पयामि।।
चन्दनः सद्गुरुदेव नारायण व माँ भगवती को तिलक लगायें-
श्री खण्ड चन्दनं दिव्यं गन्धाढयं सुमनोहरम् ।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ! चन्दनं प्रतिगृह्यताम्। ।
नारायण भगवत्यै चरणेभ्यो नमः चंदन समर्पयामि ।।
अक्षतः कुंकुम से रंगे अक्षत अर्पित करें-
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ! कुंकुमाक्तकां सुशोभिताः ।
मया निवेदिता गृहाण भगवती-नारायणौ ।।
नारायण भगवत्यै चरणेभ्यो नमः अक्षतान समर्पयामि ।।
पुष्पहारः सद्गुरुदेव व माता जी को पुष्प की मालायें पहनायें-
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो ।
मयाहिृतानी पुष्पाणि गृहाण भगवती-नारायणौ ।।
नारायण भगवत्यै चरणेभ्यो नमः पुष्पहारं समर्पयामि ।।
धूपः सुगन्धित धूप प्रज्ज्वलित करें-
वनस्पति रसोद्भूतः गन्धाढयः सुमनोहरः ।
आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ।।
नारायण भगवत्यै चरणेभ्यो नमः धूपं आघ्रापयामि ।।
दीपः दीपक हाथ में लेकर ज्योति अर्पित करें-
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहिना योजितं मया।
दीपं गृहाण त्रैलोक्य तिमिरापहा।।
नारायण भगवत्यै चरणेभ्यो नमः दीपं दर्शयामि ।।
नैवेद्यः स्वादिष्ट भोजन, खीर, फल, नैवेद्य का भोग लगायें-
शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादु खीरं ।
उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ।।
नारायण भगवत्यै चरणेभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि ।।
पूजन पश्चात् इस मंत्र का 10 मिनट तक जप कर प्रार्थना करें, हे गुरुदेव! मां भगवती! आप दोनों संयुक्त रूप से अपनी कृपा दृष्टि प्रदान कर हमारे जीवन को मंगलमय चेतना से आप्लावित करें।
मंत्र जप पश्चात् गुरु व दुर्गा आरती सम्पन्न कर, क्षमा प्रार्थना करें, पश्चात् सभी लोग प्रसाद स्वरूप में भोजन ग्रहण करें। साथ ही जब भी आपको अवसर मिले या किसी शुभ मुहूर्त में संयुक्त पूजन कर मंगलमय जीवन की कामना व्यक्त करें।
सद्गुरुदेव नारायण व माँ भगवती आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करें और आपका जीवन उनके पूजन, ध्यान, स्तुति के माध्यम से मंगलमय चेतनाओं से आपूरित हो आप सभी के लिए ऐसी ही कामना करती हूं।
नवरात्रि शक्ति महापर्व 10 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक का विशेष समय साधनात्मक काल निर्मित हो रहा है सद्गुरुदेव कैलाश जी अपने सभी साधकों को निमंत्रित करते हैं, आप सभी कैलाश सिद्धाश्रम साधना स्थली-जोधपुर में आकर विशेष साधनायें अवश्य ही सम्पन्न करें। वे ही साधक जोधपुर आयें जो वास्तव में सद्गुरुदेव जी के सानिधय में साधना कर अपने आपको भगवती नारायणमय चेतना से पूरित कर सकें, आश्रम से सम्पर्क कर पूर्व में स्वीकृति तथा नियमों का पालन आवश्यक है।
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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