





यजुर्वेद का रूद्राष्टाध्याय भगवान रूद्र को समर्पित है। शिव पुराण में रूद्र संहिता, शतरूद्र संहिता और कोटिरूद्र संहिता आदि नामों से भगवान शिव के रूद्र स्वरूप की व्याख्या की गयी है। रूद्रसंहिता में कहा गया है- इस लोक में शिव की जैसी इच्छा होती है, वैसा ही होता है। समस्त विश्व उन्ही की इच्छा के अधीन है और उन्हीं की वाणी रूपी चेतना से बंधा हुआ है।
भगवान रूद्र तो एक ही हैं किन्तु जगत के कल्याण के लिये वे अनेक नाम व रूपों में 11 रूद्र स्वरूप में विद्यमान हैं। इन्हें एकादश रूद्र भी कहते हैं। वे शरीर के दस महत्वपूर्ण ऊर्जा ड्डोत व 11 वें को आत्म स्वरूप माने गये हैं। ट्टग्वेद और यजुर्वेद में रूद्र भगवान को पृथ्वी और अन्य ग्रहों के ईष्ट देव के रूप में बताया गया है, जिस प्रकार इस सृष्टि में जीवित रहने के लिये प्राण वायु का महत्व है, ठीक उसी प्रकार रूद्र रूप का भी अस्तित्व सर्वोपरि है। उपनिषदों में भगवान रूद्र के ग्यारह रूपों को सृष्टि में जो भी जीवित है, इन्हीं की बदौलत है। मृत्यु पश्चात् आपके सगे-संबंधियों को रोना आता है। इसलिये रूद्र को पवित्र अर्थों में रूलाने वाला भी कहा जाता है। हमारे शास्त्रों द्वारा भगवान रूद्र का बेहद ही सुंदर वर्णन जानने को मिलता है।
जिसमें उनके पाँच सिर और धड़ के साथ इन्हे एकदम पारदर्शी और चमकीला बताया गया है। उनके बालों में चंद्रमा विद्यमान है और वहां से गंगा निरंतर प्रवाहित होती दिखती है। गले में सर्प और उनके पास में माता पार्वती बैठीं दिखाई देती हैं। त्रिनेत्रधारी भगवान रूद्र के चार हाथों में से एक में त्रिशूल, बाकी आशीर्वाद वरदान देते हुए नन्दी पर विराजमान है।
यदि ‘रूद्र’ नाम का अर्थ जाना जाये तो इसमें रू का तात्पर्य है चिंता और द्र मतलब होता है दूर करना। अतः रूद्र का अर्थ चिंता-हरण होता है। जैसा कि मैंने बताया रूद्र नाम का अर्थ विभिन्न कथाओं में भिन्न-भिन्न है, विष्णु पुराण में इस नाम का व भगवान रूद्र जन्म का मनभावन कथा के रूप में वर्णन है।
विष्णु पुराण में वर्णित भगवान शिव के रूद्र के रूप में जन्म की कहानी शायद भगवान शिव का एकमात्र बाल-रूप वर्णन है। इसके अनुसार जब धरती, आकाश, पाताल सहित पूरा ब्रह्माण्ड जलमग्न था, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) के अलावा कोई भी देव या प्राणी नहीं था। तब केवल विष्णु ही जल सतह पर अपने शेषनाग पर लेटे नजर आ रहे थे। तब उनकी नाभि कमल पर ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्मा-विष्णु जब सृष्टि के संबंध में वार्तालाप कर रहे थे, तब ही भगवान शिव भी वहाँ प्रकट हुए।
ब्रह्मा जी ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। तब भगवान शिव के रूठ जाने के भय से, भगवान विष्णु ने दिव्य दृष्टि प्रदान कर ब्रह्मा जी को शिव जी का पुनः स्मरण कराया। भगवान ब्रह्मा को अपनी गलती का अनुभव हुआ और शिव से क्षमा मांगते हुए उन्होंने उनसे अपने पुत्र के रूप में जन्म लेने का आशीर्वाद मांगा। शिव ने ब्रह्मा की प्रार्थना स्वीकार करते हुए उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। कालांतर पश्चात् ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना आरंभ की, तब उन्हें एक शिशु की आवश्यकता पड़ी तब उन्हें भगवान शिव द्वारा प्रदत्त आशीर्वाद का स्मरण हुआ। अतः ब्रह्मा जी ने कई वर्षों तक तपस्या की और बालक शिव शिशु के रूप में उनकी गोद में प्रकट हुए। बालक बहुत रो रहा था, उसके रूदन ने ब्रह्माजी को करूणामयी बना दिया, वे अत्यन्त प्रसन्न थे, भगवान शिव को पुत्र रूप में प्राप्त कर। उन्होंने बालक का नाम ‘रूद्र’ रखा, जिसका अर्थ था सभी रूदन पूर्ण स्थितियों का शमन करने वाला।
एक बार देवताओं व दैत्यों के मध्य युद्ध छिड़ गया। जिसमें दैत्य विजयी हो गये और इन्द्र आदि सभी देवताओं को अमरावतीपुरी छोड़ना पड़ा। वे सभी अपने पिता महर्षि कश्यप के आश्रम में आ गये। उन सभी देवताओं ने ट्टषि कश्यप को अपना कष्ट सुनाया। शिव भक्त महर्षि कश्यप देवताओं को कष्ट दूर करने का आश्वासन देकर काशीपुरी आ गये और वहां नदी तट पर शिवलिंग की स्थापना कर तप करने लगे। बहुत समय बीत जाने पर भगवान शिव प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। कश्यप जी ने कहा, दैत्यों ने देवताओं को पराजित कर दिया है, इसीलिये आप मेरे पुत्र रूप में प्रकट होकर देवताओं के कष्टों को दूर कीजिये व पुनः शांति स्थापित करने में सहायता कीजिये।
भगवान शिव तथास्तु कह कर अन्तर्ध्यान हो गये। आश्रम वापस आकर उन्होंने देवताओं को भगवान शंकर के अवतार लेने की बात सुनाई, सभी देवता प्रसन्न हो गये।
भगवान शिव ने अपने वचन को पूर्ण करने के लिये कश्यप ट्टषि की पत्नी सुरभी के गर्भ से ग्यारह रूद्रों के रूप में अवतार लिया। देवताओं ने उनके जन्म को उत्सव के रूप में मनाया। भगवान शिव के इन रूद्रावतारों से सारा जगत शिवमय हो गया। ये सभी एकादश रूद्र बहुत ही बली और पराक्रमी थे। इन्होंने युद्ध में दैत्यों को पराजित कर इन्द्र को पुनः स्वर्ग का राज्य दिला दिया। सभी देवता निर्भय होकर अपना-अपना राजकार्य संभालने लगे।
विभिन्न पुराणें व ग्रन्थों में एकादश रूद्रों के नाम में भिन्नता है, शिवपुराण के अनुसार ये नाम वर्णित है-
कपाली पिंगल भीम
विरूपाक्ष विलोहित शास्ता
अजपाद अहिर्बुधन्य शंभु
चण्ड भव
आज भी भगवान शिव के स्वरूप में सभी एकादश रूद्र, सृष्टि की रक्षा के लिये विद्यमान हैं। उनके अनुचर करोड़ों रूद्र कहे गये हैं, जो तीनों लोकों में व्याप्त है।
उपनिषदों में प्राण-दस इन्द्रियां और मन को एकादश रूद्र कहा गया है, ये देह में अवस्थित रूद्र हैं और शरीर रूपी तंत्र को क्रियान्वित रखते हैं। ये बराबर क्रियाशील रहे, तो मनुष्य का जीवन पूर्ण शिव स्वरूप कल्याणमय निर्मित रहता है, अन्यथा एक की भी गति बिगड़ी तो शरीर बेकार हो जाता है। जो इन एकादश प्राणों को संयमित आहार-विहार और योगाभ्यास द्वारा वश में रखता है, वही सुख पाता है। अतः दस इन्द्रियां और मन ही एकादश रूद्र हैं। भगवान रूद्र द्वारा उत्पन्न रूद्राक्ष सभी देवताओं को अन्यतम प्रिय है।
हिंदू धर्म में तिलक लगाना एक बहुत ही शुभ और पवित्र कार्य माना जाता है। इस धर्म में प्राचीन काल से ही तिलक लगाने का परंपरा चली आ रही है और इसके पीछे का कारण है इससे उत्पन्न होने वाला प्रभाव। ऐसा माना गया है कि व्यक्ति के शरीर में सात प्रकार के ऊर्जा केंद्र होते हैं।
इन उर्जा केंद्रों को चक्र भी कहा जाता है। मस्तिष्क के केंद्र में जहां तिलक लगाया जाता है वहां गुरु स्वरूप आज्ञा चक्र होता है। आज्ञाचक्र को भगवान बृहस्पति का केंद्र माना गया है, बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं, तिलक के माध्यम से आज्ञा चक्र में देवताओं को स्थापित करते हैं और उसी के प्रभाव से देव-शक्तियों में वृद्धि होती है, जिससे प्रसन्न होकर वो मानसिक शांति और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
सनातन धर्म में तिलक लगाने को शुभ माना गया है। इसके साथ ही ऐसी मान्यता है कि सफलता प्राप्त करने के लिये रोली, हल्दी, चन्दन या कुमकुम से तिलक लगाना चाहिये।
निधि श्रीमाली
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