





कार्तिक मास करवा चतुर्थी, धन त्रयोदशी, रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, छठ पूजा, लाभ पंचमी, देवत्थान एकादशी, तुलसी विवाह, देव दीपावली आदि महोत्सवों का मास है। एक प्रकार से इसे देव पर्व माह कहा जा सकता है, जिसमें अनेक देवी-देवताओं की पूजा, अर्चना, उपासना की जाती है।
शास्त्रों के अनुसार दीपावली के 15 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा दिवस पर देव दीवाली पर्व सम्पन्न होता है। इसकी अपनी एक अलग ही विशेषता है। मान्यता है कि इस दिन दीपावली पर्व मनाने के लिए देवतागण स्वर्ग से माँ गंगा के पावन पवित्र घाटों पर अलौकिक रूप में आते हैं। लोक कथाओं में कहा जाता है कि इस दिन देवता अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं और सच्चे मन से पूजा, अर्चना करने वाले की सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।
विश्वनाथ महादेव की नगरी काशी में इस दिन माँ गंगा की विशेष पूजा, अर्चना और महाआरती की जाती है। गंगा नदी के सभी घाटों पर लाखों दीपक प्रज्ज्वलित किये जाते हैं। इस दिन एक अद्भुत मनोहर दृश्य वाराणसी की घाटों पर दृष्टित होती है।
इस दिवस पर यहां का प्रकाशवान और भक्तिमय वातावरण चित्त में असीम शांति व संतुष्टि का भाव प्रदान करता है। देव दीवाली पर गंगा स्नान, दर्शन, पूजन के लिए इस दिन देश-विदेश से श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या उपस्थिति होती है। देव दीवाली मनाने के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं-
एक कथा के अनुसार इसी दिन बलि के पास से वामन अवतार के पश्चात् भगवान विष्णु बैकुण्ठ धाम वापस आये थे और भगवान विष्णु के वापस आने की प्रसन्नता में सभी देवों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था, इसी कारण इस दिन दीवाली पर्व सम्पन्न किया जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार इसी दिन सायंकाल के समय भगवान विष्णु जी का मत्स्यावतार हुआ था, इसलिए इस दिन दीप दान को दस यज्ञ के समान पुण्य फल प्रदान करने वाला बताया गया है।
कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसी दिन भगवान शिव ने असुर त्रिपुरासुर का संहार किया था, जिसके पापों से मनुष्य, ऋषि, देवता सभी त्रस्त थे। त्रिपुरासुर और उसकी असुरी सेना के संहार के पश्चात सभी देवताओं ने दीप जलाकर भगवान शिव की पूजा, अर्चना, आराधना की थी।
शिव पुराण के अनुसार इस दिन व्रत रख कर दान करने से शिवत्व की प्राप्ति होती है। यह भी कहा जाता है कि जो भक्त त्रिपुरी पूर्णिमा व्रत रखकर भगवान शिव की पूजा करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है। त्रिपुरी पूर्णिमा के दिन कृतिका नक्षत्र में भगवान त्रिपुरारी का पारद शिवलिंग पर अभिषेक, पूजन, शुद्ध नैवेद्य अर्पित कर दीप प्रज्ज्वलित आदि साधनात्मक क्रियाओं से मनुष्य आने वाले सात जन्म तक ज्ञानी, धनवान और भाग्यशाली बना रहता है।
एक और वर्णन के अनुसार एक बार महर्षि विश्वामित्र ने राजा त्रिशंकु को अपने तपोबल से स्वर्ग में पहुंचा दिया। इससे देवता क्षुब्ध हो गए और उन्होंने त्रिशंकु को स्वर्ग से वापस पृथ्वी पर भेज दिया। श्राप ग्रस्त होकर त्रिशंकु धरती और आकाश के मध्य अधर में लटके रहे। त्रिशंकु को स्वर्ग से वापस भेजने से क्रोधित विश्वामित्र जी ने अपने तपोबल से पृथ्वी-स्वर्ग आदि से भिन्न एक नई सृष्टि की रचना प्रारंभ कर दी।
उन्होंने रचना क्रम में कुश, मिट्टी, जीव-जन्तु, वनस्पति आदि के बाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतिमा बनाकर अपने तप से उन्हें अभिमंत्रित करके उनमें प्राण चेतना की क्रिया आरंभ कर दी। इससे सम्पूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवता विश्वामित्र से विनम्र पूर्वक विनती कर उन्हें प्रसन्न करने लगे।
देवताओं के विनय से प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने नई सृष्टि की रचना पर विराम लगा दिया। जिससे देवता, ऋषि- मुनि और मनुष्य सभी ने प्रसन्न होकर सभी लोकों में दीप प्रज्ज्वलित किये थे, जिसके पश्चात् प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली पर्व मनाया जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा दिवस पर तुलसी विवाह की सभी रस्में पूरी की जाती है, जिससे आने वाला नूतन जीवन हर स्वरूप में हरा-भरा, सुंगधमय और सर्व वृद्धिकारक बना रहे। इसीलिए इस दिन तुलसी पूजा और संध्या काल में तुलसी के पास दीप प्रज्ज्वलित करना अक्षय पुण्यदायक होता है।
सभी साधक-साधिकायें कार्तिक पूर्णिमा दिवस पर संध्या काल में घर के मंदिर, आंगन, द्वार के दोनों ओर, तुलसी के पौधे, आंवला अथवा पीपल वृक्ष के नीचे, मन्दिर में, जलाशय, नदी के तट पर और ईशान कोण अर्थात घर की उत्तर-पूर्व दिशा जिसे देवस्थान कहा जाता है वहां पर अवश्य ही दीप प्रज्ज्वलित कर पूजन सम्पन्न करें और सद्गुरुदेव की आरती कर सभी देव शक्तियों की अनुकम्पा जीवन निरन्तर में प्राप्त होती रहे और सद्गुरुदेव के ज्ञान शक्ति चेतना द्वारा जीवन में सर्व सुखमय स्थितियों की प्राप्ति हो इस हेतु सद्गुरुदेव और सभी देवताओं से प्रार्थना करें। ऐसी भक्तिमय क्रियाओं द्वारा जीवन के पाप-दोष समाप्त होते हैं और जीवन में अनुकूलता प्राप्त होती है।
हिन्दू धर्म में देव दीपावली पर्व अत्यन्त शुभ फ़ल प्रदायक माना जाता है। इस दिन स्नान, दान और दीप प्रज्ज्वलित कर सर्व देव शक्तियों के सुमंगलमय आशीर्वाद् के लिए पूजन, उपवास आदि भावमय क्रियायें सम्पन्न की जाती हैं ।
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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