





स्कन्द पुराण में वर्णन है- सुमेरु पर्वत पर बैठे हुए ब्रह्मा आदि अनेक देवताओं को प्रणाम कर ऋषियों ने पूछा- हे प्रभो! आप में सबसे बड़ा कौन है?
भगवान शंकर की माया के वशीभूत होकर ब्रह्मा जी ने अहंकार में कहा- ऋषियों! इस सम्पूर्ण दृश्यमान सृष्टि को उत्पन्न करेन वाला मैं ही हूं, अनादि ब्रह्म होने के कारण मैं सब देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हूं। ब्रह्मा के अहं को सुनकर समीप बैठे श्री विष्णु के अंश ऋतु को क्रोध आ गया।
उन्होंने कहा- ब्रह्मा तुम अज्ञान के वशीभूत होकर ऐसी बात कह रहे हो। सम्पूर्ण जगत् का पालनकर्ता तो मैं हूं। मैं ही नारायण की परम ज्योति हूं। मेरी प्रेरणा से तुम सृष्टि को उत्पन्न करने वाले हो। मैं सबका स्वामी तथा परमतत्व नारायण हूं। इस प्रकार ब्रह्मा और ऋतु दोनों परस्पर विवाद करने लगे। अन्त में इस विषय पर वेदों की सम्मति लेने का निर्णय हुआ।
बह्मा और ऋतु ने वेदों से जाकर कहा- हे श्रुतियो! आप हमारे सन्देह का निवारण करो कि हम में से बड़ा कौन है? ऋग्वेद ने कहा- जिससे सबका प्रादुर्भाव हुआ है और जिसमें सब कुछ समाहित होता है, वे एकमात्र रूद्र ही परम तत्व हैं। यजुर्वेद ने कहा- जिनकी योग शक्ति से सब कुछ प्राप्त होता हैं, वे एकमात्र शिव ही हैं।
सामवेद ने कहा- जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व प्रकाशमय रहता है, योगीजन जिसका ध्यान लगाए रहते हैं, सारा संसार जिसके भीतर है वह एकमेव त्रयम्बक ही श्रेष्ठ हैं। अथर्ववेद ने कहा- जो अपने भक्तों के साधारण अनुग्रह पर ही उसके सारे कष्टों को दूर करते हैं, वह आनन्दमय कैवल्य रूप भगवान शंकर हैं।
माया से अत्यधिक मोहित ऋतु तथा ब्रह्मा यह बात सुनकर भी अहंकार में कहने लगे- जो शिव धूलि, धूसरित, जटाधारी, नागों को ही आभूषण समझते हैं, दिगम्बर और सवारी के लिए भी जिसे बैल मिला है, वह परब्रह्म कैसे हो सकता है? हम उन्हें परमात्मा नहीं मानते।
तभी अचानक उन दोनों के मध्य एक महा तेजस्वी ज्योति उठी। उस ज्योति ने अपनी आभा में सभी को समेट लिया। फिर उस ज्योति में एक विकराल पुरुष को देख कर ब्रह्मा का पांचवा मस्तक अत्यन्त क्रुध होकर बोला- हम दोनों के बीच आने वाला तू कौन है? उसी क्षण वह पुरुष बालक रूप में परिवर्तित होकर रोने लगा। तब ब्रह्मा ने समझा कि यह बालक मेरे मस्तक से उत्पन्न हुआ है और कहने लगे- तुम मेरे मस्तक से प्रकट होकर रुदन कर रहे हो इसलिए आज से तुम रूद्र कहलाओंगे, तुम मेरी शरण में रहो, मैं तुम्हारी रक्षा करुंगा। ब्रह्मा की बात सुनकर वह बालक पूर्व की आकृति में बदल गया।
फिर ब्रह्मा उस ज्योति से उत्पन्न पुरुष से कहने लगे- वत्स! सम्पूर्ण विश्व के भरण-पोषण की सामर्थ्य रखने के कारण तुम्हारा नाम भैरव होगा। तुमसे काल भी भयभीत रहेगा अतः तुम काल भैरव के नाम से भी प्रसिद्ध होगे। तुम दुष्टों का दमन करते रहोगे अतः तुम्हें आमर्दक भी कहा जायेगा। तुम भक्तों के पापों को क्षण में ही भक्षण कर लोगे इसलिए तुम्हें लोग ‘पाप भक्षण’ भी कहेंगे।
तुम मुक्तिदायिनी काशीपुरी के अधिपति होकर कालराज का पद प्राप्त करोगे। सर्वप्रथम तो ब्रह्मा द्वारा दिए गए वरदानो को भैरव ने ग्रहण किया फिर ब्रह्मा के पांचवें मस्तक को जिसने शिव की निन्दा की थी, अपने बांये हाथ की उंगली के नख द्वारा काट दिया और कहा- हे ब्रह्मा! तुम्हारे जिस भाग ने अपराध किया था, उसे मैंने दण्ड दे दिया है। तुम्हारे पांचवें मस्तक ने शिव की निन्दा की थी, इसलिए मैंने उसे काट डाला।
अपना मस्तक कट जाने के बाद ब्रह्मा को यह ज्ञात हुआ कि शिव ही सर्वश्रेष्ठ और परम ब्रह्म हैं। तब ब्रह्मा भयभीत होकर भगवान शंकर की स्तुति करने लगे। फिर विष्णु भी वहीं प्रकट होकर ब्रह्मा के साथ-साथ शिव की प्रसन्नता के लिए अनेक प्रकार से स्तुति करने लगे। विष्णु और ब्रह्मा द्वारा की गई स्तुति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अभय प्रदान किया।
इसके पश्चात् उन्होंने अपने अवतार भैरव को यह आज्ञा दी- भैरव! तुम लोक प्रदर्शन के लिए ब्रह्मा के इस कटे हुए मस्तक को अपने हाथ में लेकर भिक्षा याचना करते हुए सृष्टि का भ्रमण करो और ब्रह्म हत्या के पाप का प्रायश्चित करो।
यह कह कर शिव ने ब्रह्महत्या नाम की एक कन्या उत्पन्न की, वह लाल वस्त्रों को धारण किये हुए थी तथा उसके शरीर पर लाल रंग का लेप था। उसका मुख डरावना था और जीभ लपलपा रही थी। वह आसमान से टपकने वाले रक्त का पान कर रही थी। उसके एक हाथ में कटार तथा दूसरे हाथ में खप्पर था। शिव ने उसे आज्ञा दी- ब्रह्महत्ये! जब तक भैरव तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए काशीपुरी में नहीं पहुंच जाते तब तक तुम इसी भीषण रूप में इनका पीछा करती रहो। तुम सर्वत्र प्रवेश कर सकोगी परन्तु काशीपुरी में तुम प्रवेश नही कर सकोगी। यह कह कर शिवजी अर्न्तध्यान हो गये। तब भैरव हाथ में कपाल लिये ब्रह्म हत्या से मुक्ति पाने के लिए भ्रमण करने लगे।
जब भैरव विष्णु लोक पहुंचे, उस समय भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा- हे प्रिये! यह शिव जी की परम लीला ही है कि समस्त पापों के नाश की सामर्थ्य रखते हुए भी वे भैरव स्वरूप में ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए सर्वत्र भटक रहें हैं। इस प्रकार वे अपनी लीला द्वारा मानव को पापकर्म ना करने के लिए सचेत कर रहें हैं।
समस्त लोकों का भ्रमण करते हुए भैरव अविमुक्त तीर्थ काशीपुरी में प्रवेश कर गये। काशी में प्रवेश करते ही ब्रह्म हत्या नाम की कन्या ने उनका पीछा छोड़ दिया। काशी पुरी में प्रवेश करते ही उनके हाथ से ब्रह्म का कपाल स्वयं ही गिर गया। जिस स्थान पर वह मस्तक गिरा था वह स्थान आज भी कपाल मोचन के नाम से प्रसिद्ध है और भगवान को काशी अर्थात् भगवान सदाशिव का कोतवाल कहा जाता है।
इस प्रकार श्री भैरव को भगवान सदाशिव का अंश अवतार अथवा प्रतिरुप माना जाता है। मार्गशीर्ष माह की कृष्ण अष्टमी दिवस पर उनका अवतरण हुआ था। इस दिवस को कालाष्टमी भी कहा जाता है। जो व्यक्ति प्रत्येक माह की अष्टमी को भगवान भैरव की साधना, उपासना करता है, उसके सभी पाप-ताप, शत्रु बाधा, अष्ट पाश आदि समाप्त होते हैं और वह संसार में सर्वत्र विजय प्राप्त करता हुआ यश, ऐश्वर्य, वैभव युक्त जीवन प्राप्त करता है।
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