





पराजय का तात्पर्य है, पीड़ा, हानि, बाधा, विरोध, कार्य में अपूर्णता, अपमान इत्यादि। यदि कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है तो वह आपकी पराजय है और बार-बार पराजय मिलती है, तो उत्साह भी समाप्त हो जाता है। पराजित होना अथवा न होना आप पर ही निर्भर करता है क्योंकि आपमें स्वयं कोई कमी अथवा दोष रहता है। चाहे वह दोष किसी प्रकार के तांत्रिक प्रयोग से हो अथवा ग्रहदोष, शत्रु बाधा, असुरी प्रवृत्ति की शक्तियों का वर्चस्व आदि किसी भी स्वरूप में हो सकता है।
पराजित होने का तात्पर्य है, कि आप पर कोई हावी है, चाहे वह कोई व्यक्ति विशेष हो अथवा किसी शक्ति का प्रभाव आप पर हो। अपराजेय होने का तात्पर्य है कि आपकी बाधायें, आपके शत्रु, आपके दोष आप से दूर हो जायें। आप अपनी पूरी क्षमता के साथ बिना किसी रूकावट के अपना कार्य कर सके, यदि कोई आपको हानि पहुंचाने का प्रयास करे, तो आपको हानि न पहुंचे, आप पर किये गए तांत्रिक क्रिया अथवा असुरी कार्य करता है, तो वह उलट जाये, आपको प्रभावित करने के बजाय उलटा करने वाले को ही हानि दे, उक्त स्थितियों में आपका वर्चस्व बना रहे, इसे ही अपराजेय कहा गया है और ये सभी स्थितियों को प्राप्त करने के लिए भैरव साधना सर्वोत्तम है।
क्योंकि जीवन के संकटों को समाप्त करने में भगवान भैरव की साधना सर्वोत्तम है। शत्रुहंता विजय स्वरूप में भैरव साधना सम्पन्न करना वास्तव में जीवन का सौभाग्य ही होता है। भैरव जहां उग्र देव हैं वहीं अन्तर्मन भाव से पूर्ण शांत व चैतन्य देव भी हैं।
भगवान श्री भैरव केवल- बिभेति शत्रून इति भैरव अर्थात जो शत्रुओं को भयभीत करने वाले हैं वे भैरव हैं ही नहीं वरन्- बिभर्ति जगदिति भैरवः अर्थात् जो समस्त जगत का भरण-पोषण करने वाले हैं वे भी भैरव हैं। जीवन में भौतिक बाधाओं की समाप्ति और भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति, धन, धान्य, सुख- शांति प्रदान करने में पूर्ण समर्थ देव हैं।
भगवान शिव की भांति ये भी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं और साधक के मनोभाव अनुरुप उसे फल प्रदान करते हैं।
इन सभी स्थितियों में भैरव साधना तो करना ही चाहिए साथ ही भैरव साधना सम्पन्न करने से साधक को एक विशेष सुरक्षा चक्र प्राप्त होता है, जिससे उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई अनहोनी नहीं घटित होती और वह किसी भी आकस्मिक स्थिति का सामना करने समर्थ होता है। यह एक विजय प्रदायक साधना है जिससे साधक रोग-शोक, शत्रुबाधा, षड़यंत्र और गुप्त शत्रुओं का भय आदि मानसिक क्लेशों से मुक्त होकर प्रत्येक क्षेत्र में विजय युक्त सफलता प्राप्त करता है।
यह साधना भैरव जयंती 29 नवम्बर अथवा किसी भी माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात्रि 8 बजे के बाद प्रारम्भ कर सकते हैं। सर्वप्रथम स्नान कर, शुद्ध वस्त्र धारण कर अपने सामने लकड़ी के तख्ते पर काला वस्त्र बिछा कर बीचो-बीच काल भैरव यंत्र स्थापित करें। यंत्र पर सिन्दूर, चावल, पुष्प, अष्टगंध चढ़ायें। चारो कोनों पर चार भैरव चक्र रखकर उसके ऊपर एक-एक दीपक प्रज्ज्वलित कर गुरु ध्यान व गणेश पूजन करें।
अब अपनी बाधाओं, शत्रुओं के शमन और विजय प्राप्ति हेतु भगवान भैरव व सद्गुरुदेव से प्रार्थना करें। बायां घुटना जमीन पर टिकायें तथा दायां पंजा या दायां पैर जमीन पर रखते हुए वज्र मुद्रा में अर्द्ध पालथी के रूप में बैंठ जायें तथा विजय सिद्धि माला से 3 माला मंत्र जप करें।
अन्तिम माला मंत्र जप करते समय अपने पास एक मुठ्ठी काली सरसों लेकर प्रत्येक मंत्र जप के साथ सभी दिशाओं में निरन्तर दो-चार दाने फेंकते रहें, जिससे सभी दिशाओं के भैरव जाग्रत होकर पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं।
जप समाप्ति के पश्चात् चारों भैरव चक्र बायें हाथ की मुठ्ठी में बंद कर उग्र भाव से भैरव चालीसा का पाठ करें। फिर गुरु आरती सम्पन्न करें।
साधना समाप्ति पर भैरव चक्र किसी चौराहे पर फेंक दें। अन्य सभी सामग्री किसी पवित्र नदी में विसर्जित कर दें अथवा गुरु चरणों में अर्पित करें। इस साधना से कार्य बाधा में अवरोध समाप्त होने लगते हैं तथा शत्रुओं की बुद्धि व बल क्षीण होने लगता है।
साधक भैरव बाहु धारण कर नित्य एक बार भैरव चालीसा का पाठ करें, जिससे जीवन में रोग-शोक कलह- क्लेश से निवृत्ति प्राप्त होती है। बालक-बालिकाओं को भैरव बाहु धारण कराने से बार-बार बीमार नहीं होते हैं, साथ ही बच्चों को नजर दोष नहीं लगती है, दीर्घायु जीवन की प्राप्ति होती है। इसके प्रभाव से बुरी संगत, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं होता है।
।। दोहा ।।
श्री भैरव संकट हरन, मंगल करन कृपालु।
करहु दया निज दास पै, निशदिन दीन दयालु।।
जय डमरूधर नयन विशाला, श्यामवर्ण, वपु महा कराला ।।
जय त्रिशूलधर जयडमरूधर, काशी कोतवाल संकटहर ।।
जय गिरिजासुत परमकृपाला, संकट हरण हरसु भ्रमजाला ।।
जयति बटुक भैरव भयहारी, जयति काल भैरव बलधारी ।।
अष्ट रूप तुम्हरे सब गाये, सकल एक ते एक सिवाये ।।
शिवस्वरूप शिव के अनुगामी, गणाधीश तुम सबके स्वामी ।।
जटाजूट पर मुकुट सुहावै, भालचन्द्र अति शोभा पावै ।।
कटिकरधनी घुंघरू बाजैं, दर्शन करत सकल भय भाजैं ।।
कर त्रिशूल डमरू अति सुन्दर, मोरपंख को चंवर मनोहर ।।
खप्पर खड्ग लिये बलवाना, रूप चतुर्भुज नाथ बखाना ।
वाहन श्वान सदा सुखरासी, तुम अनन्त प्रभु, तुम अविनाशी ।।
जय जय जय भैरव भय भंजन, जय कृपालु भक्तन मनरंजन ।।
नयन विशाल लाल अति भारी, रक्तवर्ण तुम अहहु पुरारी ।।
बं बं बं बोलत दिन-राती, शिव कहं भजहु असुर आराती ।।
एक रूप तुम शंभु कहाये, दूजै भैरव रूप बनाये ।।
सेवक तुमहिं तुमहिं प्रभु स्वामी, अगजंग के तुम अन्तर्यामी ।।
रक्तवर्ण वपु अहहि तुम्हारा, श्यामवर्ण कहुं होइ प्रचारा ।।
श्वेतवर्ण पुनि कहा बखानी, तीनि वर्ण तुम्हरे गुणखानी ।।
तीनि नयन प्रभु परम सहावहिं, सुर नर मुनि सब ध्यान लगावहिं ।।
व्याघ्रचर्मधर तुम जग स्वामी, प्रेतनाथ तुम पूर्ण अकामी ।।
चक्रनाथ नकुलेश प्रचण्डा, निमिष दिगम्बर कीरति चण्डा ।।
क्रोधवत्स भूतेश कालधर, चक्रतुण्ड दशबाहु व्यालधर ।।
अहहिं कोटि प्रभु नाम तुम्हारे, जपत सदा मेटत दुःख भारे ।।
चौंसठ योगिनी नाचहिं संगा, क्रोधवान तुम अति रणरंगा ।।
भूतनाथ तुम परम पुनीता, तुम भविष्य तुम अहहु अतीता ।।
वर्तमान तुम्हरो शुचि रूपा, कालजयी तुम परम अनूपा ।।
ऐलादी को संकट टारयो, साद भक्त को कारज सारयो ।।
कालीपुत्र कहावहु नाथा, तब चरणनु नावहुं नित माथा ।।
श्रीक्रोधेश कृपा विस्तारहु, दीन जानि मोहि पार उतारहु ।।
भवसागर बूड़त दिन-राती, होहु कृपालु दुष्ट आरती ।।
सेवक जानि कृपा प्रभु कीजै, मोहिं भगति अपनी सब दीजै ।।
करहुं सदा भैरव की सेवा, तुम समान दूजो को देवा ।।
अश्वनाथ तुम परम मनोहर, दुष्टन कहं प्रभु अहहु भयंकर ।।
तुम्हरो दास जहां जो होई, ता कहं संकट परै न कोई ।।
हरहु नाथ तुम जान की पीरा, तुम समान प्रभु को बलवीरा ।।
सब अपराध क्षमा करि दीजै, दीन जानि आपुन मोहिं कीजै ।।
जो यह पाठ कर चालीसा, तापै कृपा करहु जगदीसा ।।
।। दोहा ।।
जय भैरव जय भूतपति जय जय जय सुखकन्द ।
करहु कृपा नित दास पै, देहु सदा आनन्द ।।
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