





ब्रह्माण्ड में घटित होने वाली प्रत्येक क्रिया का प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है। जिस प्रकार ऋतु परिवर्तन होने पर हमारे भाव, विचार, क्रियाओं, रहना, खाना-पीना आदि में परिवर्तन होता रहता है। उसी तरह ब्रह्माण्ड में घटने वाली घटना से उत्पन्न हो रही तरंगे मानव जीवन को प्रभावित करती हैं। जो व्यक्ति जितना अधिक चेतनावान, सजग, जागृत होता है, वह व्यक्ति उतना ही अधिक लाभ प्राप्त कर पाता है।
साधक एक किसान की भांति है, जो चेतनावान मुहुर्त, सिद्ध दिवस, महापर्व आदि की महत्ता को गंभीरता से समझते हुये, उसके अनुसार अपनी साधनात्मक बीज का रोपण कर लेता है, समय आने पर जब वह बीज वृक्ष बनता है, तब उसे उस वृक्ष की साधनात्मक ऊर्जामय शीतलता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब वह ऊर्जा शक्ति उसके जीवन की विषमताओं पर प्रहार कर, न्यूनताओं का शमन कर उसे भय मुक्त, अवरोध मुक्त, बाधा मुक्त जीवन प्रदान करती है। इसीलिये ऐसे दिव्य चैतन्य क्षणों का सद्-उपयोग साधक को अपने जीवन में निरन्तर करते रहना चाहिये।
ऐसा ही दिव्य साधनात्मक चेतनामय चन्द्र ग्रहण शक्ति युक्त पौषीय शाकम्भरी दिवस है, जो हर तरह से प्रगति पथ पर अग्रसर और जीवन के चतुर्मुखी विकास में सहायक सिद्ध होगी।
जीवन जीना कोई बहुत महत्वपूर्ण नहीं है, जीवन प्रत्येक मनुष्य जी लेता है, ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से पशु अपना जीवन जी लेते हैं। भूख प्यास, नींद, कामवासना, संतान उत्पति और मृत्यु, ये सब क्रिया कलाप पशु भी करते हैं और मनुष्य को भी करने पड़ते हैं। दोनों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। मनुष्य चाहे तो अपने जीवन का प्लानिंग कर सकता है, अपने जीवन को संतुलित बनाने के लिए योजना बना सकता है, अपने बिगड़ते हुए जीवन को व्यवस्थित कर सकता है और अपने जीवन को उन ऊँचाइयों पर पहुँचा सकता है, जो मानव का स्वप्न है।
संतुलित जीवन की कोई बंधी बंधायी परिभाषा नहीं है। शास्त्रें में यह बताया गया है, कि जिससे भी जीवन सुखमय हो सके, जिससे भी जीवन में आनन्द प्राप्त हो सके और जिससे जीवन में पूर्णता आ सके, वह संतुलित जीवन है। योग ऋषि वशिष्ठ ने संतुलित जीवन के चौदह सूत्र बताये हैं और जो इन चौदह सूत्रों को परिपूर्ण नहीं कर पाता, उसका जीवन अधूरा और अपूर्ण कहलाता है। अपूर्ण जीवन अपने आपमें अकाल मृत्यु है, क्योंकि उसे फिर मल-मूत्र भरी जिन्दगी में आना पड़ता है। इस जीवन में यदि व्यक्ति चाहे तो अपने जीवन को साधना के द्वारा पूर्णता दे सकता है, अपने जीवन में जो न्यूनताएं हैं, जो कमियाँ हैं, उनको परिपूर्ण कर सकता है और ऐसे ही संतुलित जीवन की कामना हमारे ऋषियों ने की है। योग वशिष्ठ के अनुसार संतुलित जीवन के निम्न चौदह सूत्र हैं।
सुन्दर, रोग रहित स्वस्थ देह पूर्ण आयु प्राप्ति मन में प्रसन्नता, आनन्द सफल गृहस्थ जीवन सुन्दर स्वभाव वाली पत्नी सौभाग्यशाली संतान शत्रु रहित सम्पूर्ण जीवन सम्मान, पद, प्रतिष्ठा निरन्तर आर्थिक सम्पन्नता तीर्थ यात्रायें, साधना शुभ एवं श्रेष्ठ कार्यों में व्यय चिरकालीन पौरूषत्व गुरु और इष्ट से साक्षात्कार मृत्यु उपरान्त सद्गति सम्पूर्ण चौदह सूत्रें से युक्त जीवन में निर्मित कर लेते हैं, तो वह संतुलित जीवन है। यदि इनमें से किसी का अभाव है, तो वह जीवन असंतुलित पशुवत् जीवन कहा जाता है।
संतुलित जीवन की प्राप्ति के लिए वर्ष के दिव्यतम विशिष्ट दिवसों में साधना, मंत्र जाप करने से ही सुस्थितियां प्राप्त होती है। इसी हेतु इस चन्द्र ग्रहण शक्ति युक्त पूर्णिमा दिवस पर शाकम्भरी शक्ति साधना से वह असमानता, न्यूनता और अभाव निश्चित रूप से दूर होता है और थोडे़ ही दिनों में संतुलित जीवन की प्राप्ति संभव हो जाती है।
भगवती दुर्गा की साधना करते हुये कहा गया है कि तुम सही रूप में शाकम्भरी बनकर मेरे जीवन में आओ जिससे कि मैं अपने जीवन को सभी दृष्टियों से पूर्ण नियोजित कर सकूं, मेरा जीवन पुत्र-पौत्र, धन-धान्य, यश- समृद्धि से परिपूर्ण हो और किसी प्रकार की कोई न्यूनता न रहे। सप्तशती में जहां शाकम्भरी देवी का वर्णन किया गया है, वहां स्पष्ट रूप से उल्लेख आया है कि भले ही मैं भगवती दुर्गा के अन्य रूपों का स्मरण न करूं, भले ही मुझे आराधना, साधना या पूजन विधि का ज्ञान न हो, भले ही मैं पवित्रता के साथ मंत्र उच्चारण न कर सकूं, परन्तु मेरे जीवन पर भगवती शाकम्भरी सदैव ही पूर्ण कृपा दृष्टि बनाये रखें, जिससे कि मैं इस जीवन में ही धर्म, अर्थ, कामरूपी पूर्णता की स्थितियों को प्राप्त कर सकूं। सभी पुरूषार्थों की प्राप्ति करता हुआ, समाज में सम्मान और यश अर्जित करता हुआ जीवन को पुरुषोत्तममय बना सकूं।
वास्तव में ही यह शाकम्भरी चन्द्र ग्रहण पूर्णिमा प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है, क्योंकि जब हम अपने जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो जीवन में कई न्यूनतायें एवं असमानतायें दिखाई देती हैं। पुत्र का आज्ञाकारी न होना, पति-पत्नी में कलह, कलिष्ट रोग, मानसिक तनाव, बन्धु बान्धवों से विरोध, निरन्तर शत्रु भय, अचानक आने वाली राज्य बाधायें आदि ऐसी सैंकड़ों समस्यायें निरन्तर बनी रहती हैं। हमारी जीवट शक्ति का बहुत बड़ा हिस्सा इस प्रकार की समस्याओं के निराकरण में और झूंझने में ही व्यय हो जाता है, हम अपने जीवन में जो कुछ नूतन सृजन करना चाहते हैं, वह नहीं कर पाते और एक प्रकार से सारा जीवन हाय-तौबा, आशा-निराशा तथा मानसिक संताप में ही समाप्त हो जाता है।
साधक के लिए यह चन्द्र ग्रहण शक्ति युक्त शाकम्भरी पूर्णिमा एक वरदान की तरह है, जीवन की यह अमूल्य साधना है, जिसका सही रूप में उपयोग कर जीवन को सर्व सौभाग्य शक्ति युक्त बनाया जा सकता है। भगवती शाकम्भरी शिव परिवार से युक्त हैं। जिस तरह से भगवान महादेव का परिवार सृष्टि में परिपूर्ण है वैसा ही सांसारिक व्यक्ति का जीवन शिवमय बन सके। शिव परिवार में लक्ष्मी स्वरूपा माता गौरी हैं और उनकी श्रेष्ठ संतान कार्तिकेय और विघ्नहर्त्ता गणपति हैं साथ ही रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ जैसे गण भी हैं। ऐसा ही हमारा परिवार बन सके जिससे कि हमारा जीवन संतुलित बन सके इस साधना से निश्चय ही हमारे जीवन में जो कमियां हैं, वे दूर हो पाती हैं और हम सभी दृष्टियों से सफलता के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं और जीवन में पूर्णता की प्राप्ति संभव होती ही है। हम ज्यों ही साधना सम्पन्न करते हैं, त्यों ही जीवन में अनुकूलता प्रारम्भ होने लगती है और जीवन की जो कुछ न्यूनताएं हैं, जीवन की जो कुछ कमियां हैं, वे अपने आप ठीक होने लगती हैं। वास्तव में यह साधना मानव जाति के लिए वरदान स्वरूप है।
साधक इस दिन प्रातः 8 बजे से 1 बजे के मध्य जब चन्द्र ग्रहण की पूर्ण चैतन्यता व्याप्त हो, ठीक उसी समय स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर पूजा स्थान में बैठ जाये और सामने एक लकड़ी का बाजोट रख कर उस पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा दें और उस पर दुर्लभ शाकम्भरी शक्तिमय शिव सिद्धि दत्तात्रेय महायंत्र स्थापित करें। फिर संकल्प करे कि मैं चन्द्र ग्रहण शक्तिमय शाकम्भरी पूर्णिमा दिवस पर जीवन को पूर्णमदः बनाने में सहायक जो 14 भाव हैं, उन्हें पूर्णता से आत्मसात कर सकूं और जीवन श्रेष्ठमय शाकम्भरी शिव-शक्ति बन सके, यह उल्लेख कर जल जमीन पर छोड़ दें। इसके बाद शाकम्भरी मंत्र की 9 माला मंत्र जाप योग ऋषित्व माला से करें।
मंत्र जप के बाद साधक भगवती दुर्गा और शिव की आरती सम्पन्न करें और जो शाकम्भरी देवी को भोग लगाया है, वह भोग प्रसाद रूप में ग्रहण करें, माला गले में धारण कर लें और महायंत्र किसी पवित्र नदी में विसर्जित कर दें।
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