





दक्षिणामूर्ति संहिता के अनुसार भगवती भुवनेश्वरी के बीज मंत्र हकार में कैलाशादि सम्माहित हैं, वहीं बीज रेफ् में पृथ्वी समाहित है तथा ईकार में पाताल स्थित है। अतः तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु और पाताल) के समाहित होने के कारण ही इन्हें त्रिभुवनों की नायिका भुवनेश्वरी कहा गया है। देवी भागवत में वर्णित भुवनेश्वरी देवी का तथा महालक्ष्मी का समन्वित रूप ह्रीं बीज है।
भुवनेश्वरी साधना का अर्थ है – साधक समस्त प्रकार की भौतिक सम्पदाओं को प्राप्त करता हुआ साधना के उस उच्चतम सोपान को प्राप्त करे, जहां साधक कालपुरुष बन जाता है। अमृत से विश्व का पोषण करने के लिये भगवती ने अपने किरीट पर चन्द्रमा धारण किया।
भगवती के इस स्वरूप का इन्दु किरीटी के रूप में चिन्तन किया गया है। भगवती त्रिनेत्र स्वरूपा हैं, अतः उन्हें नेत्रों द्वारा सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करने का हेतु कहा गया। समस्त योनियों के पोषण करने के फलस्वरूप उन्हें वरदा कहा गया। अत्यन्त कृपायुक्त, स्नेहयुक्त, दयामयी भगवती को स्मेरमुखी (मन्द हास्य युक्त मुख वाली) माना गया है तथा उनके हाथ में शोभित अंकुल शासन शक्ति के प्राप्ति का प्रतीक है।
वस्तुतः भुवनेश्वरी साधना अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मात्र भुवनेश्वरी साधना से ही जीवन के सभी कार्य सहज संभव हो सकते हैं। दस महाविद्या साधना क्रम में भोगस्था ब्राह्मणी भुवनेश्वरी साधना ऐसी अद्वितीय साधना है, जिसे सम्पन्न कर साधक श्रेष्ठ व्यक्तित्व बनने की योग्यता प्राप्त करने की क्रिया में संलग्न हो जाता है।
भोगस्था का तात्पर्य है जो जीवन को सभी सुख-भोग, विलास, भौतिक सम्पदा, विवाह, संतान सुख, आरोग्यता आदि स्थितियों से करे। ब्राह्माणी स्वरूप में भगवती ब्रह्म विद्या का ज्ञान, चेतना, संयम, धैर्य, जप-तप, साधना, कुण्डलिनी शक्ति आदि रूपों में साधक को श्रेष्ठताओं से युक्त करती हैं।
इस साधना को सम्पन्न करने के बाद साधक सौभाग्य लाभ की समस्त स्थितियों से युक्त होने के साथ-साथ चर-अचर सभी को सम्मोहित करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, उसके समक्ष समस्त प्राणियों की वाणी स्तम्भित हो जाती है तथा निर्बल शक्तिहीन व्यक्ति भी शक्ति सम्पन्न बन जाता है, क्योंकि भगवती भुवनेश्वरी की साधना में सफलता के पश्चात् साधक वशीकरण, सम्मोहन, सुख-समृद्धि तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है।
शास्त्रों और प्रामाणिक ग्रन्थों के अनुसार भुवनेश्वरी तीनों महाशक्तियों का समन्वित रूप भुवनेश्वरी है, अतः केवल मात्र भुवनेश्वरी की साधना से ही तीनों महाशक्तियों की साधना सम्पन्न हो जाती है तथा उसके जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव या बाधा नहीं रह जाता। महालक्ष्मी जहां व्यापार वृद्धि, आर्थिक उन्नति और भौतिक समृद्धि देने में समर्थ है, महासरस्वती जहां विद्या, मान, प्रतिष्ठा, सम्मान, वाक् सिद्धि और कला, संगीत आदि क्षेत्रों में समर्थता देने में सहायक है, वहीं महाकाली शत्रु संहार तथा विरोधियों पर विजय प्राप्त करने और जीवन की समस्त विपरीत स्थितियों को दूर कर अनुकूल बनाने में समर्थ है। अतः जीवन में इन तीनों महाशक्तियों की साधना से ही पूर्णता आ पाती है।
जिन साधकों ने और गृहस्थ स्त्री-पुरुषों ने इस साधना को सम्पन्न किया है, यदि उनके अनुभवों को लिखा जाये तो एक पूरा ग्रन्थ बन सकता है, परन्तु समग्र रूप से उन सब का यही अनुभव रहा है कि भुवनेश्वरी साधना सुगम है, सरल है, साथ ही साथ इस साधना से तुरन्त फल प्राप्त होता है और जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी या अभाव नहीं रहता।
जो साधक जीवन में पूर्णता चाहते हैं, जो गृहस्थ अपने व्यापार में उन्नति और आर्थिक दृष्टि से श्रेष्ठता चाहते हैं, जो व्यक्ति अपने जीवन में भोग और पूर्णता एक साथ प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें भोगस्था ब्राह्मणी अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिये। जिससे कि वह अपने जीवन में सभी दृष्टियों से पूर्णता श्रेष्ठता प्राप्त कर सकें और अपने जीवन को पूर्णता दे सकें।
10 सितम्बर अथवा किसी भी मंगलवार को रात्रि 8 बजे स्नानादि से निवृत्त होने के उपरान्त, स्वच्छ वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर आसन पर बैठ जायें। अपने सामने बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर ताम्रपात्र में भुवनेश्वरी यंत्र स्थापित कर बायीं ओर भोगस्था जीवट और दायीं ओर सद्गुरु चित्र स्थापित करें।
घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर पूजन सम्पन्न करें। इसके पश्चात् संकल्प लें। जल अपने दाहिने हाथ में लेकर नाम व गोत्र का उच्चारण करते हुये, तिथि, संवत्, वार, स्थान आदि का उच्चारण करते हुये कहें, ‘मैं (नाम) अपने जीवन में सर्व भौतिक सुख-सम्पदा, ऐश्वर्य धन लक्ष्मी, संतान सुख, आरोग्यता व आध्यात्मिक चेतना वृद्धि के निमित्त यह साधना सम्पन्न कर रहा हूं, हे देवि! मुझे पूर्ण सफलता प्रदान करें’ जल ग्रहण कर लें।
पश्चात् ललाट पर कुंकुम का तिलक कर यंत्र व जीवट का पवित्र जल से स्नान कराकर स्वच्छ कपड़े से पोंछ लें तथा कुंकुम, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करें। साधक 21 बार गुरु मंत्र का जाप कर इस मंत्र का ब्राह्मणी माला से 5 माला मंत्र जप करें-
मंत्र जप पूर्णता पर गुरु आरती व समर्पण स्तुति सम्पन्न करें और अगले दिन यंत्र, जीवट, माला किसी पवित्र स्वच्छ नदी में प्रवाहित कर दें अथवा श्री गुरु चरणों में व्यक्तिगत रूप से अर्पित कर साधना अनुभव उनके समक्ष व्यक्त कर आशीर्वाद आत्मसात करें।
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