





वास्तव में सबसे बड़ा योगी गृहस्थ होता है, जो इतने बन्धनों को संभालते हुये भी जीवन की यात्रा पर निरन्तर गतिशील रहता है, साथ ही ईश्वर के चिंतन, ध्यान, पूजन, साधना में संलग्न रहता है। जो भी सांसारिक मनुष्य अपने जीवन में कृष्ण को समझ लिया, गीता का ज्ञान अपने जीवन में उतार लिया, तो समझ लें कि वह योगी बन गया, गीता में कृष्ण कहते हैं-
तात्पर्य कि जहां कर्म स्वरूप अर्जुन है, वहीं योगी स्वरूप कृष्ण हैं, वहीं विजय, श्रेष्ठता, श्री एवं नीति है। कृष्ण केवल भक्ति स्वरूप में ही नहीं हैं, उनका सम्पूर्ण जीवन, कर्म, गीता में निहित उपदेश, नीति-अनीति, आशा- आकांक्षा, मर्यादा-आचरण प्रत्येक पक्ष को पूर्ण रूप से समझ कर भीतर उतारने का साधन हैं। कृष्ण की नीति, आदर्श एवं मर्यादा का परम रूप न होकर व्यावहारिकता से परिपूर्ण है। दुष्टों के साथ दुष्टता का व्यवहार तथा सज्जनों के साथ श्रेष्ठता का व्यवहार, मित्र और शत्रु की पहचान किस नीति से किस प्रकार किया जाये, यह सब आज भी व्यावहारिक रूप में हैं।
कृष्ण के जीवन में राजनीति, संगीत जैसे विषय भी पूर्णरूप से समाहित थे और वे अपने जीवन में षोडश कला पूर्ण होकर ‘पुरूषोत्तम’ कहलाए। जहां उन्होंने प्रेम, त्याग और श्रद्धा जैसे दुरूह विषयों को समाज के सामने रखा, वहीं जब समाज में झूठ, असत्य, व्याभिचार और पाख्ंड का बोलबाला बढ़ गया, तो उस समय कृष्ण ने जो युद्धनीति, रणनीति तथा कुशलता का प्रदर्शन किया, वह अपने-आप में आश्चर्यजनक ही था। कुरूक्षेत्र-युद्ध के मैदान में जो ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को प्रदान किया, वह अत्यन्त ही विशिष्ट तथा समाज की कुरीतियों पर कड़ा प्रहार करने वाला है। उन्होंने अर्जुन का मोह भंग करते हुए कहा-
हे अर्जुन! तू कभी शोक करता है और कभी अपने-आप को विद्वान भी कहता है। परन्तु जो विद्वान होते हैं, वे ना तो जीवित के लिये और ना जो जीवित नहीं हैं उनके लिए शोक करते हैं। इस प्रकार जो ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को दिया, वह अपने-आप में प्रहारात्मक है और अधर्म का नाश करने वाला है।
श्रीमद् भगवत् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जिस योग विद्या का उपदेश दिया और उसकी एक-एक शंकाओं का समाधान कर उसमें कर्त्तव्य युक्त कर्म की भावना को जाग्रत किया। कृष्ण द्वारा दी गई योग विद्या जिसमें कर्म योग, ज्ञान योग, क्रिया योग के साथ-साथ सतोगुण, तमोगुण, रजोगुण का विषय समाहित था, जिसके कारण आज गीता भारतीय जन जीवन केा आधारभूत ग्रंथ रूप में विद्यमान है।
कृष्ण ने अपने जीवनकाल में शुद्धता, पवित्रता एवं सत्यता पर ही अधिक बल दिया। अधर्म, व्याभिचार, असत्य के मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक जीव को उन्होंने वध करने योग्य ठहराया, फिर वह चाहे परिवार का सदस्य ही क्यों न हो और सम्पूर्ण महाभारत एक प्रकार से पारिवारिक युद्ध ही तो था। कृष्ण ज्ञानार्जन हेतु सांदीपन ऋषि के आश्रम में गये, तब उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पण कर ज्ञानार्जित किया, गुरु-सेवा की, साधनाएं की और साधना की बारीकियों व अध्यात्म के नये आयाम को जन-सामान्य के समक्ष प्रस्तुत किया। यह तो समय की विडम्बना और समाज की अपनी ही एक विचारशैली है, जो कृष्ण की उपस्थिति का सही मूल्यांकन नहीं कर पाया।
भारतीय संस्कृति के इतिहास में कृष्ण जैसा अद्भुत व्यक्तित्व कोई दूसरा है ही नहीं, पूरे जीवन सामान्य पुरुष की तरह रहते हुए सृष्टि की धारा बदल दी। आर्यावर्त में अधर्म का समूल नाश कर शुद्ध धर्म की स्थापना की। सबसे बड़ी बात उन्होंने जीवन में कर्म का सिद्धान्त दिया। अपने जीवन में षोडश कलाओं को सिद्ध कर जीवन में कर्म सिद्धान्त स्थापित कर दिया।
श्रीकृष्ण के जीवन का एक-एक क्षण मानव जीवन के लिये प्रेरणादायक है, वे केवल सम्मोहन, वशीकरण, सौन्दर्य तक ही सीमित नहीं हैं। वे तो पूर्ण योगेश्वरमय हैं, पूर्णता के परिचायक हैं, जिनकी साधना, उपासना कर साधक अपने आपको योग-भोग से युक्त कर सकता है। भोग का तात्पर्य केवल वासना नहीं होता, भोग का तात्पर्य है कि आपके जीवन में कोई अभाव ना हो, आप समाज में पूज्य हों, आपके ज्ञान का स्तर उच्चतम हो, जिससे स्वयं के साथ-साथ जनमानस का कल्याण हो सके।
ऐसे जगद्गुरु महापुरुष की साधना करने से साधक अपने जीवन में अनुकूलता प्राप्त करता है। उसके जीवन में भोग के साथ ही साथ योग का मार्ग भी प्रशस्त होता है। जिसकी पूर्णता के लिये बड़े से बड़ा साधक, योगी, संन्यासी भी प्रयत्न करते हैं, क्योंकि बिना भोग के योग की प्राप्ति नहीं हो पाती। भगवती की आठ शक्तियां लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कीर्ति, कान्ति, तुष्टि एवं पुष्टि को धारण कर ही कृष्ण योग-भोग की चेतना से युक्त हो सके थे। उनके योगेश्वर स्वरूप के मूल में यही अष्ट शक्तियां विद्यमान हैं। इस साधना को सम्पन्न कर साधक अपने जीवन में इन्हीं आठ शक्तियों से ओत-प्रोत होता है।
साथ ही उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता, ये शक्तियां सदा उसके जीवन में अपने आठ स्वरूपों में विद्यमान रहती हैं। जिससे साधक का जीवन सभी भौतिक सुख-सम्पदा, भोग-विलास, ऐश्वर्य, लक्ष्मी, कार्य-व्यापार, वाहन, भवन, सुलक्षणा पत्नी, संतान सुख, आर्थिक सम्पन्नता से युक्त योगमय बनता है। कृष्ण का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्धरात्रि में हुआ था, जो भी अंधकारमय कंस रूपी स्थितियां जीवन में हैं, उसके समापन के लिये यह श्रेष्ठतम दिवस है। इसीलिये इस दिवस को साधनात्मक दृष्टि से अत्यन्त श्रेष्ठ माना गया है। क्योंकि सामाजिक जीवन जीने के लिये जिन शक्तियों, गुणों की आवश्यकता है, उसके प्रदाता भगवान कृष्ण ही हैं। इस चैतन्य दिवस पर साधना सम्पन्न कर साधक अपनी मनोकामनायें सरलता से पूर्ण करने में समर्थ होते हैं। साथ ही इस दिवस पर जीवन की कालिमा को समाप्त कर प्रकाश से ओत-प्रोत हुआ जा सकता है, अर्थात् ज्ञान में अग्रणी बना जा सकता है।
कृष्ण जन्माष्टमी या किसी भी अष्टमी अथवा किसी भी शुक्रवार को रात्रि में स्वच्छ वस्त्र धारण कर गुरु-गणपति पूजन सम्पन्न कर अपने सामने बाजोट पर रखे ताम्रपत्र में कुंकुम से क्लीं बीज मंत्र कर श्रीकृष्ण यंत्र स्थापित कर दें, यंत्र के ऊपर योग-भोग प्रदायक जीवट रखकर तीन पुष्प अर्पित करें, फिर तीन बार ऊँ का उच्चारण कर गहरी सांस लें।
अब जीवट पर अपना दाहिना हाथ रख कर अपनी कामना अनुसार संकल्प करें, फिर जीवट को अपने ललाट, कंठ पर स्पर्श कराकर पुनः उसी स्थान पर रख दें। यंत्र पर कुंकुम से तिलक लगायें और जीवट पर दो कमल बीज पर अष्टगंध का लेपन कर जीवट पर अर्पित करें, जो योग-भोग प्राप्ति की कामना से युक्त है, अब भगवान श्रीकृष्ण से दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें-
स्मरेद् वृक्ष वने रम्ये मोहयंतमनारतम्।
गोविन्द पुण्डरीकाक्षं गोपकन्याः सहस्त्रशः।।
आत्मनो वदनां भोज प्रेणिताक्षिमधुव्रताः।
पीडि़ता कामबाणेना विरामा श्लेषणोत्सुकाः।
गोविदं केशवाये त्वं चरणारविन्दे नमोस्तुते ।।
फिर चौसठ कला शक्ति माला से योग-भोग प्रदायक मंत्र का 7 माला जप करें।
मंत्र जप के पश्चात् यंत्र, जीवट, माला पीले कपड़े में लपेट कर पूजा स्थान में 27 दिन तक रहने दें, 27 दिन पश्चात् पूज्य सद्गुरुदेव से व्यक्तिगत रूप से मिलकर उन्हें समर्पित करें।
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