





यह निर्विवाद सत्य है कि, भोगों की अधिकता मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार की शक्तियों का ह्रास कर देती है। भोग जिनमें भ्रमवश मनुष्य आनंद की कल्पना करता है, वास्तव में विषरूपी ही होते हैं। यह रोग युवावस्था में ही अधिक लगता है। यद्यपि उठती आयु में शारीरिक शक्तियों का बाहुल्य होता है, साथ ही कुछ न कुछ जीवनतत्व का नव निर्माण होता रहता है। इसलिये उस समय उसका कुप्रभाव शीघ्र दृष्टिगोचर नहीं होता। किन्तु अवस्था उत्थान रुकते ही इसके कुपरिणाम सामने आने लगते है। लोग अकारण वृद्ध हो जाते हैं। नाना प्रकार की कमजोरियों और व्याधियों के शिकार बन जाते हैं। चालीस तक पहुंचते-पहुंचते ज्ञान, बुद्धि, विवेक न्यून होने लगता है। इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं और जीवन एक भार बन जाता है। शरीर का तत्व वीर्य जो कि मनुष्य की शक्ति और वास्तविक जीवन कहा गया है, अपव्यय हो जाता है, जिससे सारा शरीर एकदम शक्तिहीन हो जाता है।
ईसामसीह जीवन भर ब्रह्मचारी रहे, ज्ञान, चेतना से ऊंचे उठे हुये बुद्धिजीवी लोग अधिकतर संयमी जीवन ही बिताते हैं। वैज्ञानिक, दार्शनिक, विचारक, सुधारक तथा ऐसी ही उच्च चेतना वाले लोग संयमता का ही जीवन जीते हुये दृष्टिगोचर होते हैं।
गृहस्थ आश्रम में संतानोत्पादन का बहाना लेकर भोगपूर्ण जीवन बिताने वाले गृहस्थाश्रम का सही मंतव्य नहीं समझते। सृष्टि क्रम को स्थिर रखने के लिये दाम्पत्य जीवन की अनिर्वायता स्वीकार अवश्य की गई है। तथापि उसमें भी संयम का महत्व कम नहीं किया गया है। धर्म कर्तव्य के रूप में संतान सृजन और बात है और कामुकता के वशीभूत होकर दाम्पत्य जीवन को भोग का माध्यम बना डालना भिन्न बात है। उस प्रकार के आचरण को संसार को सभी विद्वान तथा विवेकशील व्यक्तियों ने अनुचित तथा मानव जीवन को नष्ट करने वाला बतलाया है। वेद भगवान ने तो यहां तक कहा है कि ब्रह्मचर्येण तपसा देवा म मुमुपाध्रत ब्रह्मचर्य के प्रभाव से मनुष्य बलवान तथा शक्तिवान ही नहीं बनता, वरन मृत्यु को जीत लेता है।
ब्रह्मचर्य की महिमा बतलाते हुये छांदोग्योपनिषद् में तो यहां तक कहा गया है- एक तरफ चारों वेदों का उपदेश और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य, यदि दोनों को तोला जाए तो ब्रह्मचर्य का पलड़ा, वेदों के उपदेश के पलड़े से श्रेष्ठ है। विषयों का निषेध करते हुये, भगवान ने गीता में स्पष्ट कहा है-
जो इंद्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब सुख हैं, यद्यपि वे विषयी पुरुष को सुख रूप प्रतीत होते हैं, किन्तु वास्तव में होते वे दुःख के ही हेतु हैं और नाशवान भी। इसलिये हे कुंती पुत्र अर्जुन! बुद्धिमान व्यक्ति, उनमें आसक्त और लिप्त नहीं होते।
न केवल धर्म शास्त्रों में ही, अपितु लौकिक शास्त्रों में भी ब्रह्मचर्य की महिमा का बखान किया गया है। आयुर्वेद सम्बन्धी ग्रंथ चरक संहिता में कहा गया है-
सज्जनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास, धर्म शास्त्र के नियमों का ज्ञान और अभ्यास आत्मकल्याण का मार्ग है।
यहीं नहीं कि भारतीय मनीषियों ने ही जीवन मे ब्रह्मचर्य संयम का गुण गाया हो, विदेशी विचारकों ने भी इसकी प्रशंसा नहीं की है। प्रसिद्ध जीव शास्त्री डॅा- क्राउन एम-डी- ने लिखा है- ब्रह्मचारी यह नहीं जानता कि, व्याधि ग्रस्त दिन कैसा होता है? उसकी पाचन शक्ति सदा नियंत्रित रहती है और उसको वृद्धावस्था में भी बाल्यावस्था जैसा आनंद आता है।
अमेरिका के प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक डॅाबेनीडिक्ट लुस्टा का कथन है, जितने अंशों तक जो मनुष्य ब्रह्मचर्य की विशेष रूप से रक्षा करता है, उतने अंशों तक वह विशेष महत्व का कार्य कर सकता है।
सिद्ध संत स्वामी रामतीर्थ और योगी अरविंद ने वीर्य का वैज्ञानिक महत्व प्रकट करते हुये, अपने अनुभव इस प्रकार व्यक्त किये हैं, जैसे दीपक का तेल, बत्ती के द्वारा ऊपर चढ़कर प्रकाश के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अंदर का वीर्य सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान दीप्ति में परिणत हो जाता है। रेतस (वीर्य) का जो तत्व रति करने के समय काम में लगता है, जितेन्द्रिय होने से वह तत्व, प्राण, मन और शरीर की शक्तियों को पोषण देने वाले एक-दूसरे ही महत्वपूर्ण तत्व में बदल जाता है।
अपने पिता आशुतोष शिवजी को प्रसन्नचित्त जानकर कुमार संभव ने उनके पास जाकर पूछा तात! आपने जिस प्रकार दुर्लभ साधनाएं की, वैसा साहस किसी में न हो और वह सिद्धियों का स्वामित्व तथा ब्रह्म को प्राप्त करना चाहता हो, तो उसे क्या करना चाहिये? वह सरल उपाय आप हमें बताने की कृपा करें। लोक कल्याण की इच्छा रखने वाले भगवान शंकर ने बताया-
वत्स! उसका एक उपाय है अखंड ब्रह्मचर्य अर्थात् जिसने यत्नपूर्वक अपने वीर्य को सिद्ध कर लिया है, उसके लिये इस पृथ्वी में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। सिद्ध वीर्य पुरुष तो मेरे समान समर्थ हो सकता है।
अर्थात्- जिस प्रकार दुग्ध में घी, तिल में तेल, ईख में मीठापन तथा काष्ठ में अग्नितत्व सर्वत्र विद्यमान रहता है, उसी प्रकार वीर्य सारे शरीर में व्याप्त रहता है।
यदि 25 वर्ष की आयु तक आहार-विहार को दूषित नहीं होने दिया गया और ब्रह्मचर्य खंडित न हुआ, तो इस आयु में शक्ति की मस्ती और विचारों की प्रफुल्लता देखते ही बनती है। ऐसे बच्चे प्रायः जीवन भर स्वस्थ रहते हैं। काम-विकार से घिरे बच्चों को दमित वासना का संकट हो सकता है। जिस बालक के मस्तिष्क में मातृभाव रहा, काम-वासना प्रदीप्त नहीं होने पाई, उसे दमित वासना की तो कल्पना भी नहीं आयेगी, वरन ऐसा सोचने वाले उसके सम्मुख कीततत्व जैसे हीन बुद्धि युक्त लगेंगे। प्रफुल्ल्ता, मानसिक उन्मुक्तता, साहस, निर्भयता, वाक्-विनोद का अपने आप में उतना आनंद है जितना संभोग में। संभोग का आनंद तो थोड़ी देर तक का है, पर यदि वीर्य अच्छी तरह शरीर में बच गया है, तो वह आनंद जीवन के हर क्षेत्र में उत्साह और सफलता के रूप में सर्वत्र लिया जा सकता है।
उपस्थ में आये स्थूल वीर्य को ऊर्ध्वरेता, बनाकर पुनः उसी ललाट में लाना, जहां से वह मूलाधार तक आया था, योग विद्या का काम है। कुंडलिनी साधना में विभिन्न प्राणायाम साधनाओं द्वारा सूर्य की चक्र की ऊष्मा को प्रज्वलित कर (ईधन बनाकर) इस वीर्य को पकाया जाता है और उसे सूक्ष्मशक्ति का रूप दिया जाता है, तब यह फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहसत्रार चक्र में ले जाता हुआ ललाट में पहुंचाता है। शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुंच जाना और सहसत्रार चक्र की अनुभूति कर लेना ही अहं ब्रह्मास्मि का भाव चिंतन है। ऐसे व्यक्ति को ही भगवान शिव ने अपने समान सिद्ध और पूर्ण योगी बताया है।
कठिन योग साधनायें न करने पर भी जो लोग वीर्य को अखंड रख लेते हैं, वे अपने अंदर शक्ति का अक्षय भंडार अनुभव करते हैं और जीवन की सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं। प्रज्ञावान आत्मायें उसके लिये गर्भधारण के समय से सचेष्ट रहती हैं और वीर्य को अधोमुखी नहीं होने देकर, उसे ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रयत्न करती रहती है। सामाजिक कर्तव्यों के पालन द्वारा भी ऐसा संभव है, पर उसके लिये आज की पारिवारिक परिस्थितियों से लेकर शिक्षा पद्धति तक में परिवर्तन करना पड़ेगा। वीर्य सृष्टि का मूल उपादान है, उसकी सामर्थ्य को समझा जाना चाहिये, उसकी रक्षा की जानी चाहिये तथा ऊर्ध्वरेता के लाभों से लाभान्वित होकर मनुष्य की यथार्थता को समझना और पाना चाहिये। जो अपने वीर्य की रक्षा कर लेते हैं। उनमें निरन्तर आत्म शक्ति की वृद्धि होती है और यही शक्ति योग सिद्धि में सहायक रहती है। यह शक्ति और सिद्धि ही हमें समर्थ और अपराजेय बनाती है और कोई दूसरी शक्ति नहीं। अखंड आनंद की प्राप्ति इसी से संभव है।
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