





और तुम मेरे पास मूढ़ता भरे प्रश्न लेकर चले आते हो शायद जिनका जवाब दिया नहीं जा सकता है, इसीलिए तुम ऐसे प्रश्न पूछते हो और उन प्रश्नों को मैं छोड़ देता हूं। क्योंकि वह निरर्थक है, वे मेरा और तुम्हारा समय खराब करेंगे। उनमें से चुनने जैसा कुछ भी नहीं है।
जब से मैंने कहा है, कि तुम लोग दस्तखत करके दो, तब से मूढ़ता पूर्ण प्रश्नों की संख्या एकदम से कम हो गई है, इसीलिए तो मैंने दस्तखत करवाना शुरू किया। क्योंकि मूढ़ता पूर्ण प्रश्नों की संख्या काफी थी, करीब-करीब पचास प्रतिशत थी। जब से मैंने दस्तखत करवाने का कहा, उनकी संख्या पांच प्रतिशत ही रह गई है। पैतालीस प्रतिशत एकदम से गिर गई। क्योंकि मूढ़ भी इतना सोचता है, कि यह प्रश्न अपने गुरू से पूछना ठीक है कि नहीं।
दूसरा एक और बड़ा वर्ग है, ठीक तुम्हारी ही तरह के मैं कभी उसे भी उत्तर नहीं देता। वे तुम्हारे अन्दर का पांडित्य है। न तो मैं मूढ़ को उत्तर देता हूं, न पंडितों को। पंडित के प्रश्न भी तुम्हारी ही तरह होते है, वेद में ऐसा कहा है, और आपने ऐसा क्यों कहा?
वेद ने कुछ ठेका लिया है, मेरे ऊपर कोई वेद की जिम्मेवारी नहीं है, कि वेद ने ऐसा क्यों कहा कब कहा? लाखों वर्ष पहले वेदों की रचना उस समय की वर्तमान स्थिति को देखकर रचित की गयी थी, आज युग परिवर्तित है, प्राचीन युग को वर्तमान से मिलाया नहीं जा सकता, समय-समय पर धारणायें और चेतनायें बदलती रहती हैं। उदाहरण स्वरूप वेद रचित के समय जीवन के चार सौपान थे- बालब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम उस युग में बहुसंख्यक सांसारिक मनुष्य इन सौपानों का पालन करते थे, परन्तु वर्तमान युग में इन सौपानों का पालन करना असंभव सा है।
तुम्हारें प्रश्न ऐसे होते है, जैसे मेरी परीक्षा ले रहे हो। और मूढ़ ऐसे पूछता है, जैसे वह मुझ पर एहसान कर रहा हो। जैसे उसके प्रश्न का जवाब उसे पहले से मालूम है। वह सिर्फ एक परीक्षा का मौका दे रहा है, इसलियें मैं इन दोनों को छोड़ देता हूं। तब बचे रहते है, मुश्किल से दस प्रतिशत प्रश्न, जो जिज्ञासा से जन्मते है, जो तुम्हारी जीवन की खोज से आविर्भूत हो रहे है। जो तुम्हारे जीवन की समस्या से संबंधित होते है। जो प्रामाणिक है, जिनको हल करने पर तुम्हारे जीवन का अर्थ निर्भर हैं, जो हल होंगें तो तुम्हारे जीवन का ढंग रूपांतरित होगा। जो तुम्हारी प्यास है, भूख है जो बौद्धिक नहीं है, खोपड़ी से नहीं आ रहे हैं। तुम्हारे समग्र अस्तित्व से आविर्भूत हो रहे है, जिनके ऊपर तुम्हारी जिंदगी दांव पर लगी है। उनके हल होने पर तुम अपने जीवन में बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हो, क्योंकि उन प्रश्नों में तुम खुद जीवन्त हो। न तो तुमने शास्त्रों से उधार लिए है, न ही तुम्हारे अंहकार की जड़ता से पैदा हुए हैं।
जब मैं देखता हूं कि यह प्रश्न प्रामाणिक है- इसे देखने में देर नहीं लगती। क्योंकि उस प्रश्न में तुम्हारी भावना तुम्हरा समर्पण तुम्हारे आंसू छिपे हुए होते है। तुम्हारे उस प्रश्न में प्यास छिपी होती है। तुम्हारे प्रश्न में प्राण धड़कते है, और उन प्रश्नों के माध्यम से तुम मेरे और पास आते हो। न तो तुम्हारे पास उन प्रश्नो का उत्तर है, और न तुमने मूढ़तावश पूछा है, क्योंकि तुम खोजी हो, तुम यात्रा पर निकले हो। तुम्हारी यात्रा में तुम्हारे साथ हूं जिससे तुम्हारा बोझ थोड़ा कम हो सकेगा, तुम्हारे भटकाव को कम कर सकूं, तुम्हें मार्ग पर ले जा सकूं, उन्ही प्रश्नों के उत्तर देता हूं।
और ये जो प्रश्न है, इनके रूप ही भिन्न-भिन्न् होते है, पर इनके प्राण एक ही होते है, अगर बहुत गौर से देखो तो ये जो तीसरी कोटि के प्रश्न है, जिनके मैं उत्तर देता हूं, ये एक ही प्रश्न के विभिन्न ढ़ग हैं और इनका एक ही उत्तर है। जिस दिन तुम जानोगे, उस दिन तुम पाओगे कि तुम्हारे सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर मैंने बहुत ढंग से दिया था। जैसे ही मुझे उस एक की प्रतिध्वनि मिलती है, किसी प्रश्न में, मैं सदा तत्पर हूं उत्तर देने को, इसलिए कोई धर्म-संकट खड़ा नहीं होता। मामला बिलकुल सीधा-साफ है। गणित बिलकुल स्पष्ट है, मुझे जरा सी भी दुविधा नही होती। तुम्हारे प्रश्न को हाथ में लेते ही, तुम्हारी पंक्तियों को पढ़ते ही तुम्हारे प्राण मेरे सामने उपस्थित हो जाते है, जैसे ही तुम प्रश्न पूछते हो।
एक कहानी है, टोकियो के गवर्नर की एक बार झेन एक फकीर को मिलने गया। तो उसने अपना नाम लिखा और साथ में लिखा टोकियो का गवर्नर। फकीर के पास चिट्टी पहुंची, उसने चिट्टी नीचे फेंक दी और कहा, इस तरह के आदमी को मैं जानता नहीं। उससे कह दो, वापस लौट जाए। यहां कोई जगह नहीं है।
गवर्नर तो बहुत चकित हुआ। इस फकीर के चरणों में बहुत बार आया हूं। और यह फकीर उसे भलीभांति जानता है, आज क्या हो गया? लेकिन तभी उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने टोकियो का गवर्नर जो उस कार्ड पर लिखा था, उसे काट दिया फिर से कार्ड भेजा। और उस फकीर ने कहा, अरे तुम हो भीतर आ जाओ।
जो शिष्य कार्ड को लाया था, ले गया था दो बार, वह थोड़ा हैरान हुआ। उसने कहा, यह आदमी वहीं है, यह कार्ड भी वहीं है, लेकिन उस फकीर ने कहा, सब बदल गया है, इस आदमी का ढंग बदल गया। पहले यह आया था- टोकियो के गवर्नर की तरह ओर टोकियो के गवर्नर से फकीर को क्या लेना-देना यह भीतर से भी टोकियों के गवर्नर की तरह आता तो मुलाकात व्यर्थ हो जाती, यह पूछता हम बोलते वह कहीं मेल ही नही खाता। अब यह शुद्ध आदमी की तरह आया है, समझ कर आया है, गवर्नर को बाहर छोड़कर आया है। अब कुछ मुलाकात हो सकती है, कोई संवाद हो सकता है। तुम उसी प्रश्न को दोबारा पूछकर देखना, जो मैंने तुम्हारा उत्तर न दिया हो, और अगर तुमने टोकियो के गवर्नर को छोड़ दिया हो तो मैं उत्तर दूंगा। और तुम मुझे धोखा नहीं दे सकते। तुम किसी भी तरह प्रश्न को बनाना, उससे कोई फर्क नहीं पडेगा। अगर टोकियों का गवर्नर पीछे है, मैं उत्तर नहीं दूगा।
जिस दिन तुम सरलता से, सहजता से समस्या को हल करने की आकांक्षा से, सद्भाव से पूछते हो, उस दिन मैं सदा तत्पर हूं। धर्म-संकट कुछ भी नही है। चीजें बिलकुल साफ है। जैसे तुम्हारे चेहरे पर मैं तुम्हारे क्रोध को पढ़ता हूं, तुम्हारी आंखों में तुम्हारे अहंकार को ऐसे ही तुम्हारे हस्ताक्षरों में, तुम्हारे शब्दों में, तुम्हारे वचन के विन्यास में, तुम्हारे प्रश्न के बनाने में भी तुम्हें पढ़ता हूं। वह भी तुम्हारा है, तुम उसमें भी पूरे-पूरे मेरे सामने उपस्थित हो जाते हो। मैं तुम्हारे प्रश्न नहीं चुनता, तुम्हें चुनता हूं, और जब तुम्हारें प्रश्नों के उत्तर न दूं तो तुम विचार करना कि तुम क्यों नहीं चुने गये?
तुम जरूर दो में से कोई एक बात पाओगे। या तो मूढ़ता से पूछा था, या पांडित्य से पूछा था, मैं यहां हूं कि तुम्हारा जीवन सरल हो जाए। वह तुम्हारी मुमुक्षा के बिना नहीं होगा। मैं तुम्हें पूर्णता की तरफ इशारा कर सकता हूं, जब तुम्हारे प्रश्न में निर्मलता हो, आकांक्षा हो उससे अन्यथा कोई उपाय नहीं। व्यक्ति अपने को असहाय पा ले, हेल्पलेस कि कुछ भी किये नहीं होता। जो भी करता हूं, वहीं अधूरा रह जाता है, जो भी पैर उठाता हूं, वह भी कहीं नहीं पहुंचता मालूम पड़ता। सब कर लिया है, व्यर्थ पाया है, मंजिल नहीं आती। भरोसा भी टूट गया है, ऐसी असहाय दशा की तीव्र पीड़ा तुम्हें अनुभव हो जाए, तो यहीं से भक्त का जन्म होता है।
भक्ति का अर्थ है, परमात्मा तू करेगा तो ही होगा मेरे किये नहीं होता। मेरी पूजा भी अधूरी है, मेरी प्रार्थना, साधना भी काम-चलाऊ है। मैं जीवन को जुआरी की तरह दांव पर नहीं लगा पाता। मेरी व्यावसायिक बुद्धि सब जगह मौजूद है। मेरा संदेह मेरी श्रद्धा को दूषित कर देता है। तुम पूछ रहे हो मैं क्या करू? मैं तुमसे कहूंगा कुछ भी मत करो। अब असहाय अनुभव होना शुरू हुए हो ठीक से असहाय हो जाओं। टोटल हेल्पलेस संपूर्ण असहाय हो जाओं कह दो कि अब मुझसे किये कुछ भी नही होता अब तेरी जो मर्जी। असहाय अवस्था में ही कोई कह सकता है, तेरी जो मर्जी।
असहाय का अर्थ है, मेरी अपने पर से श्रद्धा उठ गई। अब अहंकार को खडे़ होने की जगह नहीं रह गई। भूमि खिसक गई नीचे से। अहंकार का बल टूट गया। क्योंकि जो भी किया व्यर्थ हुआ। यह बड़ी उपलब्धि है, तुम इसे ऐसे ही मत गंवा देना। असहाय अवस्था को पूरी तरह छा जाने दो। इसी अवस्था से प्रभु के शरण में जाने का भाव उठता है। शरण कोई जायेगा कब? जब तक असहाय नहीं हो जाता। जो असहाय हो गया, तभी शरण का बोध उठता है, तब सब छोड़ने का मन करता है। तुमने अपनी तरफ से काफी चला ली जीवन की पतवार परन्तु जीवन रूपी नाव कही जाती नहीं, उलट तुम देखते हो, वहीं गोल-गोल घुमती है। कभी तुमने नाव चलाई एक पतवार से चला कर देखना। एक पतवार से अगर नाव चलाओगे, गोल-गोल घुमेगी वहीं चक्कर काटेगी कहीं जाएगी ही नहीं। और तुम जैसी नाव चला रहे हो वह एक पतवार की नाव है। उसमें तुम अकेले ही चला रहें हो, परमात्मा का हाथ नहीं है। परमात्मा को तुमने काटकर अलग कर दिया है, तुम अकेले ही चला रहे हो। इसलिए वह गोल-गोल घुमती है, एक दुष्चक्र पैदा हो जाता है- वहीं-वहीं।
पुनरूक्ति करती है, कहीं जाती ही नहीं कोई यात्रा नहीं होती कोई मंजिल नहीं होती। जब तक परमात्मा रूपी ईश्वरमय सद्गुरु का निरन्तर मार्गदर्शन प्राप्त नहीं करोगे तो यह जीवन यात्रा पूर्णरूपेण मंझधार में ही रहेगी।
अब इस पतवार को भी रखा दो इससे कोई सहारा नहीं है, अब तो तुम पाल खोल दो नाव का। और परमात्मा को कहो, जहां तेरी मर्जी वहां ले चल अब हम वहीं जाएंगें।
रामकृष्ण से कोई पूछता था, मैं क्या करूं? तो रामकृष्ण ने कहा, तुम कुछ मत करों। तुम काफी कर चुकें हो। बहुत उपद्रव हो गया है। अब तुम पाल खोल दो और पतवार रख लो। रामकृष्ण ने कहा पहले मैंने भी पतवार चलाकर देख ली कहीं न पहुंचा। फिर मैंने पाल खोल दिया और हवायें नाव को ले जाने लगी।
वे सदा तत्पर है, तुम्हें ले जाने को। तुम ही राजी नहीं हो। तुम ही आनाकानी करते हो। उसका हाथ बढ़ा हुआ है, तुम थोड़ा हाथ बढ़ाओं। अगर हाथ नहीं बढ़ा सकते हो, तो खडे रह जाओं। उससे कहो, तेरी जो मर्जी। तु ही हाथ बढ़ा। तो ही घटना घटित होती है, जिस दिन व्यक्ति सब कुछ छोड़ कर समर्पण कर दे उसी दिन से क्रांति शुरू हो जाती है। तो दुनिया में दो मार्ग है, एक मार्ग है साधक का और एक मार्ग है, भक्त का। साधक के मार्ग पर तो सदेंह पूर्ण होना चाहिए, ताकि श्रद्धा का जन्म हो जाए। भक्त के मार्ग पर संदेह के पूर्ण होने की भी जरूरत नहीं है, किसी चीज के पूर्ण होने की कोई जरूरत नहीं है, भक्त के मार्ग पर तो असहय अवस्था की प्रतीति होनी चाहिए। उसी असहाय अवस्था में से श्रद्धा का कमल निकल कर बाहर आता है।
असहाय अवस्था तो बहुत बुरी लगती है, वह कीचड़ जैसी है। लेकिन जब उसमें समर्पण का कमल निकलता है, तो कीचड़ और कमल में जमीन आसमान का फर्क होता है। कमल निकलता कीचड़ से है पर कीचड़ जैसा बिलकुल नही होता। अगर तुम्हें पता न हो कि कमल कीचड़ से पैदा होता है, तो कमल को देखकर तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि इसका कीचड़ से कोई संबंध होगा। समर्पण असहाय अवस्था से निकलता है, असहाय अवस्था कीचड़ है। जब तुम कीचड़ में फंसे हो, तुम सोच भी नहीं सकते कि इससे कमल के पैदा होने की संभावना है, कि कमल का बीज यहां छिपा है, लेकिन जब कमल निकलता है, तभी तुम जानोगे। असहाय अवस्था से लोगों ने समर्पण को पा लिया।
तो तुम कुछ करो मत करना छोड़ दो, तैर लियें बहुत। तैरो मत। नदी ले जाएगी। नदी जा ही रही है, सागर की तरफ। तुम नाहक ही शोरगुल मचाते हो। हाथ पैर तड़फाते हो। नदी उसी परमात्मा की तरफ जा रही है, जीवन उस तरफ बह रह है। अगर तुम अड़चन न डालों तो काफी है। तो तुम पहुंच जाओंगें। मैंने देखा परमात्मा और तुम्हारे बीच कोई बड़ी बाधा नही है, कोई पाजिटिव डिफरेन्स नहीं है। एक नेगेटिव, नकारात्मक बाधा है। नकारात्मक बाधा का अर्थ है कि तुम अड़चनें खडी करते हो, इसीलिए परमात्मा से नहीं मिल पाते। अन्यथा कोई बाधा नही है। तुम अड़चन खड़ी न करो तो अभी मिलन हो जाए।
ऐसे ही है, जैसे सूरज निकला है, और तुमने दरवाजे बंद कर लियें हैं, सूरज के भीतर आने में कोई बाधा नही है, तुम ही दरवाजे बंद किये खड़े हो। दरवाज खोल दो, सूरज अपने आप भीतर चला जाता है। सूरज को भीतर थोडे़ ही लाना पड़ता है, समझाना- बुझाना थोड़े ही पड़ता है, किरणों को कि आओं भीतर। फुसलाना थोड़े ही पड़ता हैं, कि आ जाओं भीतर, डरो मत सिर्फ द्वार खुला हो सूरज भीतर आ जाता है। और यह भी हो सकता है, कि द्वार भी खुला हो लेकिन तुम पीठ किये खडे़ हो।
आंख बंद किये हो खड़े हो, जरा सी पलक खोलने की बात है। ठीक उसी तरह हम जीवन की समस्याओं की ओर पीठ किये रहेंगे तो समस्यायें हमें और अधिक आगे ही धकेलती रहेंगी। जबकि इसके विपरीत समस्याओं के सामने अटलता से खड़े हो जायेंगे तो समस्यायें समाप्त होना प्रारम्भ हो जायेंगी। तब ही जीवन में प्रकाशमय स्थितियों का विस्तार होगा। तो तुम थोडा असहायता को समझो और असहाय अवस्था में जीयें। और असहायता से डरों मत भागों मत। उसे छिपाओं भी मत। उसी असहाय-भाव की कीचड़ से तुम पाओगे, कि कमल खिलने लगा है।
मैं तुम्हें जो भी करने को कहूंगा, तुम उसमें भी कुनकुन ही करोंगे। तुमने कुनकुन ही करने की आदत बना ली है। तुम ध्यान भी करोगे, तो आधा-आधा ही करोगें। तुम प्रार्थना करोगें तो भी आधी-आधी होगी। आधा मन से ही करोगे, आधा बाजार में होगा, आधा कहीं और होगा। तुम कहीं पूरे नहीं हो पाओगे।
लेकिन यह असहाय अवस्था तो करने की बात ही नहीं है, यह तो तुम्हें खुद अनुभव हो रही है। इसे तो तुम खुद ही जान रहे हो। यह कोई मैंने नहीं कहा है कि तुम करों। यह किसी ने तुम्हें सिखाया ही नहीं है, कि तुम करो। यह तो तुमने अपने ही जीवन की स्थिति को समझ कर पाया है, कि असहाय स्थिति हेल्पलेस, बस इसमें ही रम जाओ।
अभी तो लगेगा कीचड़ में बैठ गये। लेकिन अगर कीचड़ में बैठने की हिम्मत हो, तो कमल कीचड़ से बहुत दूर नहीं है, जरा सा फासला है, और जो भी कीचड़ में बैठने के लिए हिम्मत रखता है, उसके जीवन में कमल खिल जाता है। और सब तुम करके देख चुके, अब असहाय होकर ही देख लो। अब कुछ मत करो। अड़चन आयेगी क्योंकि तुम्हारा अहंकार कहेगा कि ऐसे बैठे रहने से क्या होगा? तुम्हारा अहंकार गणित रखता है, वह कहेगा करने से नही हुआ तो न करने से कैसे होगा? जब कर-करके नहीं हुआ तो न करने से तो बिलकुल डूब जाओगें। कहीं पहुंचे नही तो मर्जिल नहीं आई यह न करके तो रास्तों के किनारे बैठे रह जाओगे।
और मैं तुमसे कहता हूं, रास्ते के किनारे जो बैठ गया, वही मजिल पर पहुंच जाता है। जापान में एक पर्वत-शिखर पर एक मंदिर है, तीर्थ है। हजारों यात्री प्रतिवर्ष वहां जाते हैं। बुद्ध की बड़ी सुंदर प्रतिमा वहां विराजमान है। पहाड़ चढ़ते है। एक फकीर लिंची गया था तीर्थयात्रा को और पहाड़ के नीचे ही बैठा रहा, कभी ऊपर नहीं गया। लिंची जिस गांव से आया था, उस गांव के लोग जब यात्रा करने आये तो उन्होंने उसे पहचाना और कहा, कि तुम यहीं बैठे हो? आये थे यात्रा करने को ।
लिंची ने जो उत्तर दिया उसे तुम याद रख लो। लिंची बुढ़ा था, शरीर दुर्बल, पहाड़ चढने की क्षमता नहीं थी। चाहता तो किसी के ऊपर बैठ कर जा सकता था, लेकिन वह उसने ठीक न समझा, कि तीर्थ यात्रा पर भी डोली में बैठ कर जाना क्या शोभा देता है? अपने पैर से चलकर परमात्मा के मंदिर तक न आ सके और अपने पैर पर चलकर जहां नहीं पहुंचे वहां पहुंचने का अर्थ भी क्या है।
तो लिंची यह सोचकर डोली पर सवार न हुआ। वह वहीं पहाड़ के नीचे बैठ गया और उसने कहा, मैं तो असहाय हूं, पैर मेरे कमजोर है, पहाड़ मैं चढ़ नहीं सकता बूढ़ा हूं, जीवन का भी भरोसा नहीं। दूसरे के कंधो पर बैठकर जाना भी शोभा नहीं देता कि यह भी कोई यात्रा हुई? और दूसरे के कंधो पर बैठकर पहुंच गया तो क्या यह कोई पहुंचना हुआ? कम से कम तेरे मंदिर तक तो अपने पैर से चल कर आते। तो अब तो एक ही उपाय है, कि अगर तेरी मर्जी हो, तो तू ही आ जा, अन्यथा हम यही बैठे रहेंगे।
और कहते हैं कि बुद्ध का आगमन वहीं हुआ। क्योंकि लिंची में बुद्ध के प्रति श्रद्धा, विश्वास, समर्पणं बहुत अधिक था। तो जब गांव के लोग आये और उन्होंने कहा, तुम यहीं बैठे हो? तो लिंची ने कहा, जरा मुझें गौर से देखो, मैं वही नहीं हूं जो तुम्हारें गांव से यात्रा पर निकला था।
निश्चित ही उनको भी लग रहा था, कि कोई महिमा प्रगट हुई है, आभा बदल गई है, आंखों में ज्योति किसी और लोक की है। चेहरे पर भाव इस संसार का नहीं है, यह शरीर ही किसी और महिमा से मंडित है, जैसे भीतर कोई दीया जल रहा है, और शरीर से उसकी रोशनी बाहर आ रही है। उन्होंने कहा, वह तो हमें भी लग रहा है, लेकिन तुम ऊपर मंदिर तक पहुंचे ही नहीं? उसने कहा मैं असहाय था, चढ़ना मुश्किल था, दूसरे के कधों पर जाना उचित न था। मैं यहीं बैठा रहा, और कहा मैं तो चढ़ नही सकूंगा तेरे मंदिर तक लेकिन अगर मेरी प्यास सच है तो तू मेरी असहाय अवस्था समझना, ओर अगर तेरी मर्जी हो तो यहां आ जाना। और यह भी है, कि मैं तेरे मंदिर तक भी पहुंच जाऊं, लाखों लोगो को में रोज आते -जाते देखता हूं, लेकिन अगर तेरी मर्जी न हो तो वे खाली लौट आते है। तेरे मंदिर तक पहुंचकर लोगों को खाली लौटते देखता हूं। तो यह भी हो सकता है, कि मैं यहीं बैठा रहूं और भार अब तुझ पर ही छोड़ देता हूं।
और लिंची ने न तो प्रार्थना की न पूजा की न ही कोई विधि-विधान किया। वहीं नीचे पहाड़ के बैठे-बैठे बुद्धत्व को प्राप्त हुआ। जब वह बुद्धत्व को प्राप्त हो गया तो वह लोगों से कहने लगा, कुछ करना जरूरी नहीं है, सिर्फ छोड़ देना जरूरी है, उस छोड़ देने का नाम समर्पण है। लेकिन छोड़ोगे कब? जब अहंकार सच में ही समझ लेता है कि बिलकुल असहाय हूं। छोड़ते ही घटना घट जाती है, इधर तुम मिटे नहीं उधर परमात्मा आया नहीं। इस द्वार से तुम बाहर निकलो, उस द्वार से परमात्मा भीतर आ जाता है। तुम जरा जगह खाली करों। बस, तुम्हीं अटके हो बीच में। तुम्हारे अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है।
भक्त भाव से भरा होता है, लेकिन भाव और विचार में कैसे सही फर्क कर सकते है। विचार एक आंशिक घटना है, जो तुम्हारे मस्तिष्क में चलती है। भाव एक सर्वाग घटना है, जो तुम्हारे पूरे अस्तित्व में गूंज जाती है, यही फर्क है। विचार तो तुम्हारी खोपड़ी में चलता है। वह तुम्हारे समग्र व्यक्तित्व को ओतप्रोत नहीं करता। तुम्हारे मन में एक विचार चल रहा है, भगवान का तो तुम्हारा रोआ-रोआ उस भगवान को विचार से स्नान नहीं कर पाएगा। विचार मन में चलता रहेगा। हृदय की धड़कन में नहीं गूंजेगा। तुम विचार भगवान का करते रहोगे, लेकिन तुम्हारे पैरों को उसकी कोई खबर नह मिलेगी। तुम्हारे हड्डी मांस, मज्जा को उसकी कोई खबर नहीं है। वह विचार ऊपर-ऊपर से चला जाएगा। वह ऐसे ही होगा जैसे सागर पर तुम एक कागज की नाव तैरा दो। वह ऊपर-ऊपर लहरों पर डगमगाती रहेगी। सागर की गहराइयों को पता नहीं चलेगा, कि ऊपर कोई कागज की नाव भी डांवाडेाल हो रही है।
विचार कागज की नावें है, वे तुम्हारे मस्तिष्क की सतह पर डोलते रहते है, वहीं आते है, वहीं से तिरोहित हो जाते हैं। तुम्हारे भीतर तुम्हारी गहराई को उनकी कोई भी खबर नहीं मिल पाती। वे कब आये ओर कब चले गये इसका पता ही नहीं चलता।
भाव सर्वांग अवस्था है। जब तुम परमात्मा के भाव से भरते हो तो तुम्हारा मस्तिष्क ही नहीं भरते मस्तिष्क भरते ही तुम्हारा रोआं-रोआं, तन-मन प्राण सब भर जाता है। परमात्मा के भाव से भरे हुए व्यक्ति को कहना नहीं पडे़गा कि वह परमात्मा का विचार कर रहा है। तुम देखोगे, तुम पाओगे कि वह परमात्मा को जी रहा है।
विचार और जीवन में जितना फर्क है, उतना ही पफ़र्क विचार और भाव में है, भाव यानी सर्वांगीणता, भाव यानी सतग्रता। जब तुम कभी किसी के प्रेम में पड़ जाते हो, तब खोपड़ी में ही थोड़ी प्रेम रहता है। वह तुम्हारे हृदय में भी धड़कने लगता है, तुम्हारे रोएं-रोएं में भी पुलक आ जाती है, तुम्हारी चाल बदल जाती है, कल भी तुम चलते थे।
ऐसे चलते थे जैसे पैरों को घसीटते हो। आज भी तुम चलते हो पैर वही है, जमीन वहीं है, कुछ भी नही बदला लेकिन आज तुम्हारे पैरों में एक नाच है, तुम किसी के प्रेम में पड़ गये हो। हालैंड में एक बहुत बड़ा चित्रकार हुआ, विन्सेंट वान गाग। इस सदी में जैसी वान गाग की ख्याति है, वैसी किसी दूसरे चित्रकार की नही थी। वान गाग बहुत कुरूप था। और कोई स्त्री कभी उसके प्रेम में नहीं पड़ी। कुरूप ही नहीं था, विकर्शक भी था, रिपल्सिव्ह था, कि उसके पास जाकर दूर हटने का मन पैदा होने लगे, कि दोबारा इससे मिलना न हो। लेकिन बड़ा अद्भुत चित्रकार था। सौंदर्य का बड़ा पारखी था। शरीर बड़ा कुरूप था। किसी तरह जी रहा था, काम करता था एक चित्रशाला में रोज काम करने जाता था। काम भी कर देता था, चित्र भी बना देता था, चित्र बिक भी जाते थे। लेकिन चलता था घसीटता हुआ। जिसके जीवन में प्रेम की वीणा न बजी हो—–। प्रार्थना तो बहुत दूर है, परमात्मा तो बहुत दूर है, प्रेम तो बड़ी फीकी ध्वनि है प्रार्थना की, बड़ी फीकी। जैसे
हजार-हजार पर्दो के पार से तुमने परमात्मा को देखा हो। बस एक झलक, एक छाया सरक गई हो, बस, ऐसा प्रेम है, लेकिन फिर भी प्रेम बड़ा महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिनके जीवन में प्रेम प्रार्थना नहीं, परमात्मा नहीं, उनके जीवन में तो प्रेम ही तो एकमात्र घड़ी है, जब वे समग्रता को जानते है। अन्यथा सभी चीजें खण्ड-खण्ड है। वह घसीटता हुआ चलता था, जैसे पैर अलग चलते, हाथ अलग, सिर अलग चलता। जैसे कोई चीज जोड़ने वाली न थी भीतर। जैसे कोई केंद्र न था। जैसे वह कोई एक एकता था। यंत्र सब ढीला हो गया था और अस्थिपंजर-किसी तरह लटके चल रहे थे। एक दिन अचानक चित्रशाला के मालिक ने देखा, वान गाग की चाल बदल गई है। उसमें थोड़ी गति है और गति ही नहीं है, एक पुलक है, न केवल पुलक है, बल्कि उसके चेहरे पर एक ताजगी है। जैसे उसने आज कई वर्षों के बाद स्नान किया है, स्नान तो वह रोज करता था, लेकिन आज कोई भीतरी स्नान हो गया है, एक नाच है।
उसके मालिक ने कहा, वान गाग तुम्हें वर्षों से देख रहा हूं। तुमसे ज्यादा उदास, हताश, हारा हुआ, आदमी नहीं देखा। आज क्या हो गया है, सीढि़यां चढ़ते तुम सीटी बजा रहे थे। क्या मामला है? क्या किसी के प्रेम में पड़ गये? वान गाग ने कहा, हां, एक स्त्री ने मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखा है। एक स्त्री जब तुम्हारी तरफ मुस्कुरा कर देख लेती है तो इतनी बड़ी घटना घट जाती है, और जब परमात्मा तुम्हारी तरफ मुस्कुरा कर देखेगा हजार-हजार आंखों से हजार-हजार रूप में वृक्षों से चांद-तारों से, झरनों से, पहाड़ों से सब तरफ से तुम पर झुक आयेगा, जैसे आषाढ़ में मेघ घिर गए हों, ऐसा सब तरफ से झुक आयेगा और वर्षा करने लगेगा प्रेम की, तब क्या तुम्हारी खोपड़ी में ही ऐसा भाव उठेगा, कि परमात्मा देख रहा है।
तब तुम नाच उठोगे मीरा कहती है, पग घुंघरू बांध मीरा नाची। उस घड़ी में सोचने से काम नहीं चलेगा। नाचना भी कम पड़ जाएगा। नाचने का अर्थ ही यह है, कि तुम्हारी समग्रता से ओतप्रोत हो गई तुम्हारा रोआं- रोआं सम्मिलित हो गया, तुम्हारी एक-एक धड़कन डूब गई है, तुम्हारी श्वास-श्वास ने स्पर्श किया उसका।
भाव-दशा का अर्थ है, अखण्ड, पूरे तुम उसमें हो, इसलिए प्रेम विचार नहीं है, प्रेम भाव है। प्रार्थना भी विचार नहीं है, प्रार्थना भाव है, ध्यान भी विचार नही है, ध्यान भाव है और भाव को अगर तुम ठीक से समझ लो, तो वह विचार नहीं है, उतने ही विचार शांत हो जाते हैं, तरंगें खो जाती है। तुम इतनी गहरी अनुभूति से भरे होते हो, कि विचार करने की सुविधा कहां? जगह कहां? जरूरत कहां हैं?
प्रेम कभी विचार तो नही करता है, जिसने प्रेम का भाव नहीं जाना। भोजन का विचार वही करता है, जो भूखा है, और जिसने भोजन नहीं जाना। भरा-पेट आदमी कहीं भोजन का विचार नहीं करता है। तो परमात्मा का विचार तो तभी आयेगा, जब तक परमात्मा की भूख है। अभी तृप्ति नही हुई। प्यास ही है, कंठ पर जल की धारा नहीं गिरी। अभी मिलन नहीं हुआ, एक हलकी सी फुहार भी नहीं पड़ीं भाव है तुम्हारा पूरा-पूरा संयुक्त किसी अवस्था में हो जाना। इसलिए सारा जोर समस्त साधनाओं का एक ही कि तुम विचार से भाव की तरफ हटो। मन में कई प्रश्न उठते है, किंतु जी चाहता है, कुछ न पूछूं केवल चरण-कमलों के पास बैठा रहुं। मन में प्रश्न ऐसे ही लगते है, जैसे वृक्षों में पत्ते लगते है, वे लगते ही चले जाएंगे। तुम कितना ही पूछो और मैं कितना ही जवाब दूं। मैं इस आशा में जवाब नहीं देता हूं कि मेरे जवाबों से तुम्हारें प्रश्न उठने बंद हो जाएंगे। मुझे भलीभांति पता है कि मेरा हर जवाब तुम्हारे भीतर और नए दस सवाल उठाएगा।
इसलिए अगर मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर देता हूं, तो इस खयाल से नहीं कि तुम्हारे प्रश्न हल हो जाएंगें सिर्फ इसी खयाल से कि धीरे-धीरे तुम्हें दिखाई पडे़ कि इतने प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं। फिर भी प्रश्नों की भीड़ तो उतनी की उतनी बनी है, उसमें तो रत्ती भर कमी नहीं हुई। शायद थोड़ी बढ़ गई हो नए प्रश्न उठ आए हों, क्योंकि नए उत्तर मिले, जो तुम ने कभी सुने न थे। मन से नए प्रश्न उठा दिये।
तो इस मार्ग से हल होनेवाला नहीं है, पूछ-पूछ कर कभी कोई ज्ञान उपलब्ध नहीं हुआ है। जानकारी को उपलब्ध हो जाए भला खूब जान ले, लेकिन खूब जानने से कुछ ज्ञान का संबंध नहीं है। जागेगा नहीं, अनुभव नहीं होगा। शब्दों से चित्त भर जाएगा। और हर शब्द बीज की तरह नए शब्द पैदा करेगा। और इसकी कोई श्रृंखला का अंत नहीं है। सभी शास्त्रों में सभी प्रश्नों के उत्तर भरे पडे़ हैं। तुम खरीद ला सकतें हो सब शास्त्र, पढ़ भी ले सकते हो, कुछ हल न होगा। लेकिन अगर तुम्हें यह समझ आ जाए, कि उठने दो प्रश्नों को, हम प्रश्नों में पड़ते ही नहीं। हम तो बैठेंगे सत्संग में हम को तो शांत, चुप-अगर किसी ने जाना है तो उसकी मौजूदगी का रस लेंगे। हम बुद्धि के संवाद में न पडेंगे, हम तो अस्तित्व को अस्तित्व से जोडे़ंगे। जब तुम मुझसे कुछ पूछते हो, मैं कुछ उत्तर देता हूं, तब दो बुद्धियों का संवाद होता है। संवाद भी कठिन है। सौ में
निन्यानबे मौके पर तो विवाद होता है। इधर मैं कह रहा हूं, उधर तुम सोच रहे हो, ठीक नहीं, पता नहीं ठीक है या नहीं, या उत्तर दे रहे हो, जवाब खोज रहे हो, तुम्हारी मान्यता के अनुकूल नहीं है। तुम्हारे शास्त्र के विरोध में है, हजार-हजार तरह का विवाद चल रहा है। अगर तुम बहुत शांत चित्त के व्यक्ति हो, शास्त्रीय नहीं हो, और शास्त्रों का बोझ नहीं ढो रहे हो अपने सिर पर, तो शायद संवाद हो जाए तुम अगर प्रेमी हो तुम्हारा मेरे पास होना एक प्रेमी का सान्निध्य है, तो शायद संवाद हो जाए। तो शायद तुम वही सुन लो, जो मैं करने की कोशिश कर रहा हूं। तो शायद मेरे शब्द में तुम्हें निःशब्द की थोड़ी झनकार आ जाए। तो शायद मेरे शब्दों के पार तुम मुझे देखने में थोड़े से सफल हो जाओं। तो शायद शब्दों के बीच जो खाली जगह है, वह तुम्हें सुनाई पड़ सके। वही ज्यादा मूल्यवान है।
जब मै रूक जाता हूं क्षण भर को और तुम्हारी तरफ देखता हूं, वही असली उत्तर है। यह अगर दिखाई पड़ जाए तो स्वाभाविक फिर तुम पूछना नहीं चाहोगें प्रश्न तो उठते ही रहेंगे। जब तक मन है, मन का स्वभाव ही ऐसा है। जैसे सड़क पर लोग चलते रहेंगे। नदियां बहती रहेंगी, आकाश पर बादल सरकते रहेंगे। ऐसे ही तुम्हारें मन में विचार आते ही रहेंगे। इससे कुछ अड़चन नहीं है। अगर तुम मेरे पास होने की उत्सुकता से भर जाओं तो उसी उत्सुकता में तुम अपने मन से दूर होने लगोगे। और या तो तुम मेरे पास हो सकते हो, या अपने मन के पास हो सकते हो, दोनों के पास तुम नहीं हो सकते।
मत पूछों अगर समझ आ गई है तो मत पूछों। चुप रहो। उठने दो, उपेक्षा करो। समझों कि जन्मों-जन्मों का उपद्रव है जो चला आ रहा है, थोडे़ दिन चलेगा। उसमें तुम बहुत रस भी मत लो, ध्यान मत दो तो तुम थोडे़ दूर हटने लगोगे। मेरे पास होने लगोगे। शिविर का यही अर्थ है गुरू के पास होना, अपने से दूर होना, गुरू के पास आना, क्योंकि दो में से एक ही बात हो सकती है। या तो तुम अपने पास हो सकते हो। या गुरू के पास हो सकते हो।
परम पूज्य सद्गुरूदेव
कैलाश श्रीमाली जी
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