





ऋग्वेद के नवम मंडल का यह मंत्र है, यत्र ज्योति रजश्रम अर्थात जहां अखण्ड ज्योति बसती है, जहां ज्योति क्षीण नहीं होती। यस्मिन् लोके स्वरहितं अर्थात जिस लोक में, जिस दुनिया में आनन्द बसता है, जहां अमृत है, जहां आनन्द ही आनन्द है। तिस्मन् मा देहि पवमानः अर्थात पवित्र करने वाले परमेश्वर मुझे उस लोक में लेकर चल। अमृते लोके अक्षिते अर्थात उस अमृत के लोक में ले जा, वहां ले जाकर मुझे बैठा देना। जिस लोक में तेरे अमृतकोष का कभी क्षय नहीं होता।
इन्द्रा, इन्द्रो परिश्रवः अर्थात मेरे मन को अपनी तरंग से जोड़कर आनन्दित कर दे, मेरे आत्मस्वरूप को अपनी तरंग से जोड़कर आनन्दित कर दे। हम उस लोक के वासी हैं जहां हर क्षण ज्योति जगमग है, प्रकाश जग रहा है, आनन्द ही आनन्द है। एक ऐसी पक्षी की तरह हैं जो भटककर हरियाली से रेगिस्तान की तरफ आ गिरा कि फिर से हमें वहीं ले चल जहां आनन्द है, जहां प्रकाश है। जिसे संतों ने कहा है कि ‘ज्योति जले आगम की’, ईश्वर की ज्योति जहां लगातार जल रही है। एक ऐसी ज्योति जो बुझती नहीं, हवा नहीं बुझा सकती, आंधियाँ जिसको मिटा नहीं सकती, वक्त का प्रभाव जिस पर नहीं आता। जिसकी ऊर्जा कभी कम नहीं होती, उस प्रकाश के लोक में, हे ईश्वर! तुम मुझे लेकर चलो।
याद रखना कितना भी बुद्धिमान व्यक्ति हो, हर समय उसकी बुद्धि काम नहीं करती। हर जगह हमारी मति हमारा साथ नहीं दे पाती। हर समय ही हमारा मन सही निर्णय नहीं ले पाता। बहुत-बहुत बार जीवन में ऐसी स्थितियां आती हैं, जब हम कुछ सोचने-समझने में असमर्थ हो जाते हैं। बड़े-से-बड़ा बुद्धिमान इस तरह का कार्य कर बैठता है कि वह सदा के लिये चोट खा जाता है। अवसर चूका किसान और डाल चूका वानर और समय को खो देने वाला विद्यार्थी और संसार में रमा हुआ भक्त, बाद में बहुत पछताता है। चोट जरूर खा जाता है। विद्यार्थी का अपना एक समय है जिसमें उसे पढ़ना है और आगे बढ़ना है, बोने का किसान के लिये भी एक समय है, वानर के लिये भी छलांग लगाते समय सावधानी की जरूरत है। ऐसे ही संसार भर के आकर्षण, साधक को आकर्षित करते हैं और अगर उसको व्यक्ति भूल जाये या ध्यान न दे, संसार के आकर्षणों के प्रलोभन में फंसता चला जाये, यह ध्यान न दे कि हम बंधन में आ रहे हैं तो कहते हैं कि एक दिन जीवन में जरूर रोना पड़ता है कि जिसके लिये जीवन धारण किया था, वह लक्ष्य हाथ से निकल गया। यह महत्वपूर्ण है। जीवन में दो चीजें सदैव बनी रहें। जब शिष्य की श्रद्धा और गुरू की कृपा, गुरू का अनुग्रह हो तो तब आगम की ज्योति हृदय के अन्दर जगती है, तब परमात्मा हृदय में प्रकट होते हैं। गुरू कृपा करता जाये और शिष्य श्रद्धा से भरपूर होता जाये। दोनों का मेल आकर एक नई धारा को जन्म दे दे।
परमात्मा हृदय के अन्दर से प्रकट होते हैं। अपने आत्मस्वरूप का ज्ञान हो और अपने आत्मस्वरूप में ही, इस परमात्मास्वरूप का दर्शन हो जाये। जरूरी है अपने आपको, अपनी श्रद्धा को, इस दौलत को घटने ना दें। याद रखना की जैसा चिन्तन वैसा चित्त। जैसा मन, जैसा मनन, वैसा मनुष्य और यह भी याद रखना की मनुष्य का मन, उसकी आँख और उसके मुख से झांकता रहता है कि वह कैसा मनवाला है। आंखों से झांकेगा, मुख से झांकेगा, कैसे मनवाले हो, कैसे विचार अन्दर चल रहे हैं। कूड़ा-करकट बाहर निकाला है मुख से, वाणी से कुछ गन्दगी निकाली है, गन्दे शब्द बोलें हैं तो इसका मतलब वाणी से मन झांका है, आंखों में विकार है तो इसका मतलब है मन में कुछ था, वह बाहर झलकने लग गया है, क्योंकि ये तो खिड़कियां है, तरल पदार्थ तो अन्दर भरा हुआ है। जो कुछ है आपके अन्दर वह बाहर प्रकट होगा। इसलिये ध्यान देना कि आपका चित्तरूपी सरोवर गन्दा हो गया है तो इसका मतलब, चिन्तन गन्दा हो गया है और चिन्तन गन्दा हुआ है तो इसका मतलब है विचार पवित्र नहीं रहे। बड़ा सुन्दर जल था, समय के साथ धूल गिरती रही, काई-कबाड़ जमता रहा, झील में प्रतिबिम्ब देखना चाहें तो आसमान का तो दिखाई नहीं देता, अपना चेहरा देखना चाहें तो नहीं दिखाई देगा, अपने आत्मस्वरूप को अगर देखना चाहें तो जरूरी है कि मन निर्मल हो।
इसलिये सदैव सद्विचारों को आश्रय दो, सद्विचारों को आमन्त्रण दो, जैसा बनना चाहते हो, वैसा चिन्तन करना शुरू कर दो। जो आप बनना चाहते है, जो आप होना चाहते हैं, वैसे विचारों का मन में स्थान ग्रहण करो और वैसा ही चिन्तन शुरू कर दो। जिस संगति में आप बैठने लगे हैं उसकी परछाई आपके ऊपर पड़ेगी आप वैसे हो जाओगे। गन्दे लोगों के साथ बैठकर गन्दे होना चाहते हो तो जरूर बैठना। गन्दी बाते सुनकर अगर अपने आपको गन्दा करना चाहते हो तो जरूर फिर गन्दगी के साथ सम्बन्ध जोड़ना और अगर अच्छा होना है और अच्छाई पर जाना है और अच्छे विचारों को अपने जीवन का आधार बनाना है, तो फिर अच्छों की संगति करना शुरू कर दो। जैसा चिन्तन करेंगे वैसा बन जायेंगे। इसलिये याद रखना शरीर से सेवाश्रम करना है, यह जो शरीर मिला है, इसे पवित्र करने का एक ही तरीका है कि इसे सेवाश्रम किया जाये। परिश्रम, सेवा का परिश्रम, सेवा करते-करते शरीर को थका दो।
इन्द्रियों में संयम रहे, क्योंकि ये बेलगाम घोड़े हैं, जिन्हें अपना-अपना स्वाद, अपना-अपना भोजन चाहिये। कान अच्छे-से-अच्छे मोहक रसों को, शब्दों को सुनने के लिये सदैव उत्सुक रहते हैं, तृप्त नहीं होते, इनके लिये रस चाहिये। अगर सांसारिक निन्दा चुगली का रस इनको लग जाये तो फिर ये उसके लिये उत्सुक रहेंगे। कान क्या सुनने लग गये हैं, किसमें रूचि रखने लग गये हैं- यह जरा ध्यान देना।
यह ध्यान देने वाली बात है कि जो परमात्मा का प्यारा है, उसे परमात्मा के भक्तों की ही बातें अच्छी लगेंगी। उन्हीं में बैठेगा, उसी को सुनना चाहेगा, उसी के लिये उत्सुक होगा कि वे संगीत भी क्या संगीत है, जिसमें तेरा नाम न हो, वह शब्द भी क्या सुनने जो तुझसे दूर ले जाये, वह आवाज भी क्या आवाज है, जिस आवाज में तेरी आवाज न हो, इसलिये इन कानों को अगर कुछ देना है तो परमात्मा के घट का ही भोजन देना। उसी ध्वनि को देना जिसे सुनकर यह आनन्दित हो, जिससे आत्मा तृप्त हो जाये। आँखों को वह रूप दो, परमात्मा का दर्शन करे हर रूप में। तीन शब्द- सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् अर्थात हर सुन्दर में तू ही शिव है, और हर सत्य में तू ही बैठा है, क्योंकि तू ही शिव है और हर सत्य में तू ही बैठा है, क्योंकि तू ही शिव है, तू ही सत्य है, तू ही सुन्दर है। हर स्थान में कहीं कुछ भी अच्छा लगता है तो अपने परमात्मा की झलक महसूस करना और धन्यवाद देना उसको कि तुझसे हटकर कुछ भी नहीं संसार में, प्रार्थना करना उस परमात्मा से मुझे यह विश्वास है कि तू मेरे आसपास है। क्योंकि इन्सानों के हृदय में प्यार का संगीत तूने ही भरा है, तूने ही व्यक्ति को भावनाये और संवेदनाये दीं, बड़े के प्रति आदर सिखाया और जन्म देने वाली मां के माध्यम से तूने मुझे मां की ममता के रूप में स्नेह-वात्सल्य दिया।
इसलिये कि उसी प्रेम को मैं हृदय में रखकर सारे संसार में उस प्रेम को बांट सकूं। बड़ों का हाथ, पिता का हाथ, जो कभी पकड़कर रोकता है, कभी दुलार करता है, कभी डांट देता है, तेरे यहां वह कृपा है कि मैं गड्ढ़े में गिरने से बच सकूं। इसलिये मैं भी संसार में लोगों से प्यार करने वाला तो बनूं, लेकिन जहां लोग गड्ढ़े में गिरने के लिये जा रहे हैं, वहां चोट खाने के लिये गलत रास्ते पर जा रहे हों, उनको चलते हुये गलत रास्ते पर रोक सकूं। उनको शिक्षा दे सकूं, इसलिये मुझे धर्म का संदेश देने के लिये तू शक्ति देना और संसार से प्यार करने के लिये सहारा देना, शक्ति देना और जैसे प्रभु ‘गुरू’ का माध्यम देकर तूने अक्षर ज्ञान कराया, ऐसे ही मैं भी संसार का वास्तविक ज्ञान दुनिया को दे सकूं, तू उनके ऊपर कृपा कर, जो गुमराह हो रहे हैं।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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