





हिन्दू इस अत्याचार से प्रताडि़त होकर इस्लाम-धर्म को स्वीकार कर रहे थे । आर्यकुमारियाँ तथा सुन्दरी कुल- ललनाएँ बलपूर्वक बादशाह तथा उनके कर्मचारियों के हरम में लाकर उनकी आनन्द-सामग्री बनायी जा रही थीं और अत्याचार प्रताडित आर्य महिलाएँ ठण्डी साँसे भर-भर सिसक रही थीं ।
गोभक्त हिन्दुओं के सम्मुख गौऔं की हत्या कर उनके हृदय को व्यथित किया जा रहा था, हिन्दुओं के धर्मग्रन्थों का अग्निसंस्कार हो रहा था (हिन्दू-जाति अन्याय और अत्याचार की चक्की में पीस रही थी (वह सर्वधा निःसहाय और निरुपाय होकर घृणित जीवन व्यतीत कर रही थी। उसी समय महाराष्ट्र कुल केसरी प्रबल प्रतापी, पराक्रमशाली, महावीर शिवाजी का उदय महाराष्ट्र में हुआ ।
इस उदय से यवनों का अत्याचार धीरे-धीरे विलीन होने लगा । अत्याचार की प्रचन्ड गति शिथिल हो गयी । सम्राट औंरंगजेब की आशाओ पर पानी फिर गया (बार-बार पराजित होकर शान्ति के स्थान पर अशान्ति का साम्राज्य भोगने लगा । अर्धमृत और हताश हिन्दू-जाति में जीवन की एक नई रोशनी का उदय हुआ । यदि शिवाजी का उदय नहीं हुआ होता तो आज आशा नहीं थी, कि यह भारत हिन्दुओं का भारत कहलाता । यहाँ एक सम्पूर्णं इस्लामी-राज्य स्थापित हो गया होता ।
शिवाजी का जन्म बम्बई प्रान्त में, शिवेनेरी नामक किले में सन् 1627 में हुआ । शिवाजी के पिता का नाम शाहजी तथा शिवाजी के माता का नाम जीजा बाई था । जब शिवाजी 6 वर्ष के हुये तो इनके पिता ने इन्हें एक विश्वासी ब्राम्हण दादाजी कोनदेव के संरक्षता में छोड़, तंजोर चले गये।
दादाजी कोनदेव पक्के धर्मात्मा, राजनीतिज्ञ तथा शिष्टाचारी ब्राह्मण थे। अस्त्र शस्त्र चलाने तथा घोड़े की सवारी करने में भी वह बड़े निपुण थे । इसलिये शिवाजी इन विद्याओं में खूब प्रवीण निकले । इसके अतिरिक्त समर्थ गुरु रामदास तथा तुकाराम के ग्रन्थों का असर इनके आचार-विचार पर बहुत पड़ा। शिवाजी एक कट्र हिन्दू हो गये और गौ, ब्राम्हणो तथा धर्म के लिये प्राण तक समर्पण करने को तैयार हो गये। इनकी माता का प्रभाव भी इन पर कम नहीं पड़ा । जीजाबाई उच्च कुल की एक कटर क्षत्रणी थी और सभी क्षत्रणियो के समान ही उनमें धैर्य, साहस यथा सचरित्रता कूट-कूट कर भरी थी । पूजा-पाठ तथा धार्मिक कृत्यों में भी वे यथेष्ट समय लगाती थी । शिवाजी पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा । जीजाबाई ने उनकी शिक्षा दीक्षा के ऊपर भी कड़ी दृष्टि रखी। वे उन्हें पूर्वजों की शौर्यता और पूर्वकाल के वैभव की कहानियाँ सुनाया करती थी, जिससे बालकपन में ही शिवाजी के हृदय में साहस, वीरता और महत्त्वकांक्षाये उत्पन्न हो गयी थी। वे सदैव रामायण और महाभारत की वींरतापूर्ण कथायें, धार्मिक चरित्र और राजनीतिक बातों की चर्चा किया करती थी। अतएव माता से आदर्श धर्म-शिक्षा पाकर शिवाजी एक धर्मनिष्ठ बालक हो गये । इस प्रकार सर्वंगुण सम्पन्न हो, शिवाजी यवनों का उपद्रव तथा हिन्दुओं की निर्बलता देख कर बहुत विचलित हुये और उन्होंने हिन्दुओं को सुसंगठित कर आर्यधर्म की रक्षा करने की दृढ़ प्रतिज्ञा की ।
शिवाजी की राजनीतिक स्थिति सन् 1640 में याने चौदह वर्ष की अवस्था में शिवाजी का विवाह निम्बालकर घराने की कन्या सोयराबाई के साथ बड़ी धूम-धाम से हुआ । इसके बाद इनका पहला कार्य – तोरण के किले को चातुरी से दखल करना हुआ । परमात्मा की कृपा से इस गढ़ की मरम्मत करते समय इनको गड़ा हुआ धन भी मिल गया। इससे उन्होंने गोला, बारुद आदि लड़ाई का सामान खरीद लिया और साथ के लोगों को किले की रक्षा के लिये लगाया ! बस, यहीं से जगत-प्रसिद्ध शिवाजी का राजनीतिक जीवन आरम्भ होता है इसके बाद तोरण किले से छः मील की दूरी पर उन्होंने एक और नया किला बनवाया, जिसका नाम ‘‘राजगढ़‘‘ था।
इसी किले में अन्त तक इनके राज्य की राजधानी रही। कुछ काल पश्चात् जब दादाजी कोनदेव जब मत्यु की अवस्था में थे तो उन्होंने इन्हें बुला भेजा और ये शब्द उसे बहुत धीमे स्वर में कहा,-‘‘हे पुत्र ! मेरी यह अन्तिम इच्छा है, कि तुम स्वतन्त्रता हेतु अपने इन कार्यों को जारी रखो। ब्राम्हण, कृषक तथा गौ की सदा रक्षा करना और हिन्दुओं तथा मन्दिरों को कभी पद दलित न होने देना।’’
संरक्षक की मृत्यु हो जाने तथा पिता के दूर देश में युद्ध करने चले जाने के कारण वे स्वतन्त्रता पूर्ण कार्य करने लगे । वे अब जंगली लोगों को एकत्र करने लगे और अल्प काल में ही उन्होंने उन लोगों का एक बलवान दल बना लिया । जिसकी सहायता से मुसलमान शासकों पर आक्रमण करना और धन-संग्रह करना शुरू कर दिया ।
जब इसकी खबर बीजापुर पहुँची, तो बादशाह ने शिवाजी को ऐसा करने से रोका । उनके पिता शाहजी को एक पत्र लिख कर पुत्र को समझा देने को कहा । शाहजी ने शिवाजी को वैसे ही एक पत्र लिखा । शिवाजी अब बड़े असमंजस में पड़ गये । एक ओर पिता की आज्ञा, दूसरी ओर स्वतन्त्र हिन्दू राज्य स्थापित करने की प्रबल इच्छा । वे बड़ी चिन्ता में पड़ गये । ऐसे समय में उनकी विदुषी स्त्री ने इनकी सहायता की । उन्होंने गौ, ब्राह्मणों को दुष्टों से बचाने एवं धर्म तथा देश की रक्षा करने को, पिता की आज्ञा उलंघन करने से श्रेष्ठ बताया । यह बात शिवाजी को भी जच गयी ।
शिवाजी केवल वीर, साहसी योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वह धर्मात्मा भी थे । उनकी धार्मिक नीति बड़ी ही उदार थी । हिन्दू, मुसलमान या कोई भी हो, उनके पूज्य स्थानों के लिये उनके हृदय में आदर तथा श्रद्धा थी। उन्होंने नियम बना दिया था, कि जहाँ भी उनके सैनिक लूट मार करें, वहाँ मस्जिद न तोड़ी जायें, कुरान न नष्ट किये जायें तथा यात्रियों को कोई कष्ट न पहुँचाया जाये । 1664 ई- में जब कल्याण लूटा गया, तब आवाजी सोनदेव ने वहाँ के गर्वनर मौलाना अहमद की साली को जो एक परम सुन्दरी थी, शिवाजी के सम्मुख उपस्थित किया । उस युवती को देखकर वीर हृदय शिवाजी ने कहा -‘‘यदि मेरी माता भी इतनी सुन्दरी होती, तो सम्भव था, इतना कुरूप न होता और उसको सम्मान-पूर्वक उसके सम्बन्धियों के पास भेज दिया।’
शिवाजी को विद्या से भी बड़ा प्रेम था । वे कविता भी करते थे और विद्वानों की बढ़ी इज्ज़त करते थे । मुसलमान फकीरों का भी वे उचित सत्कार करते थे । शिवाजी में अलौकिक प्रतिभा थी । राज-काज में प्रजापालन में, सैन्य-संचालन तथा संगठन में, महामदान्ध शत्रुओं का दमन करने में उन्होंने अपनी जो प्रतिभा दिखायी है, उसकी तुलना नहीं की जा सकती ।
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