





श्रीमद्भागवत में अपने अंतरंग मित्र उद्धव को समझाते हुये भगवान श्रीकृष्ण ने तीनों योगों का वर्णन करते हुये कहा है कि ज्ञान, भक्ति, कर्म ही मानव कल्याण के साधन हैं। अन्य कोई और साधन नहीं है। माया से उत्पन्न हुये सम्पूर्ण गुण ही गुण होते हैं ऐसा मानकर मन, इंद्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्ता के अभिमान से रहित होकर सर्वव्यापी सच्चिदानंद में एकाकार स्थिर रहने का नाम ज्ञान योग है। कर्म योग-फल और आसक्ति को त्यागकर, भगवान- आज्ञानुसार केवल समर्थ बुद्धि से कर्म करने का नाम निष्काम कर्मयोग है। कर्मफल के प्रति आसक्ति दूर करने के लिये श्रीकृष्ण का उपदेश है कि हे अर्जुन! तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने तक ही सीमित है। फल सर्वथा तुम्हारे सामर्थ्य से परे की वस्तु है। गीता के इस दिव्य उपदेश में अनासक्ति का श्रेष्ठतम ज्ञान निहित है। कर्ता का संबंध केवल कर्म से ही है। कर्मफल के प्रति आसक्ति एक तरह से लोभ का ही दूसरा रूप है, जो कदापि उचित नहीं है।
कृषक का अधिकार अपने क्षेत्र में परिश्रम करने तथा मनोनुकूल बीज बोने तक सीमित है। इच्छानुकूल फल प्राप्ति का भाव अपने मन में न आने दें, क्योंकि फल प्राप्ति केवल हमारे श्रम पर ही निर्भर न होकर दैनिक तथा भौतिक शक्तियों से संचालित होती है। फल प्राप्ति का इच्छुक व्यक्ति अपने अभीष्ट की सिद्धि में विलंब या विफलता देखकर कार्य विमुख हो सकता है। अनेक साधक अपने कर्तव्य कर्म को दुःख समझकर उसका त्याग करने को तत्पर हो जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुम्हें कर्मफल का लोभ नहीं करना है, अपितु निष्काम भाव से कर्मठ बने रहना है।
श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में वे अर्जुन को कर्मयोग की दीक्षा देते हैं कि मानव स्वभावतः दो प्रकार की स्थिति का होता है, अतंर्मुखी और बहिर्मुखी। अंतर्मुखी प्रतिभा के व्यक्ति बाह्य संसार से तथा भौतिक सुखों से विरक्त रहते हुये अपनी अंतरात्मा के सम्यक विकास के लिये प्रयत्नशील रहते हैं। इसी को ज्ञान योग निवृत्ति मार्ग या संन्यास निवृत्ति मार्ग कहते हैं। बहिर्मुखी प्रतिभा का व्यक्ति भौतिकता में आसक्त होकर विविध सांसारिक कार्यों में लिप्त रहता है, इसी को प्रवृत्ति मार्गी या कर्मयोगी कहते हैं। यथार्थ में ये दोनों मार्ग एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि कोई भी मनुष्य न पूर्णतया अंतर्मुखी हो सकता है और न ही पूर्णतया बहिर्मुखी।
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार निष्काम कर्म ज्ञान की अपेक्षा श्रेयस्कर होने के साथ सरल भी है, क्योंकि कर्म त्याग कहने में जितना सरल है, व्यवहार में उतना ही विकट और असंभव सा प्रतीत होता है। कोई व्यक्ति क्षणभर के लिये भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के स्वाभाविक गुणों से विवश होकर प्रत्येक को कुछ न कुछ कर्म करना ही पड़ता है। जीवन के रहते हुये कर्म से बचना असंभव है।
हमारे उपनिषदों की विद्या ‘सत्य’ की प्राप्ति के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान का भी उपयोगी कोष है। ये हमें जीवन को प्रतिपल जीना सिखाते हैं। उदाहरण के लिये ईशोपनिषद के इस मंत्र को लें-
अर्थात कर्म करते हुये ही सौ वर्ष के जीवन की कामना करनी चाहिये। बिना कर्म के एक दिन भी जीना वांछनीय नहीं है। मनुष्य जब अपने कर्तव्य को निःस्वार्थ भाव से करता है तब उसे कोई दोष नहीं होता और न कर्म के शुभ या अशुभ फल उसे बंधन में डालते हैं। जो क्षण बीत जाता है वह वापस नहीं आता। अतः प्रत्येक क्षण को बहुमूल्य मानकर श्रेष्ठ कर्म से उसका सदुपयोग करना चाहिये।
कर्म से ही परिवार, समाज एवं राष्ट्र बनते हैं, समृद्ध होते हैं। कर्म से मनुष्य स्वस्थ, समृद्ध एवं लोकप्रिय बनता है और सम्मान पाता है। अकर्मण्य का अपना परिवार ही अनादर करता है। कर्म करता हुआ मनुष्य औरों को भी कर्म करने की प्रेरणा देता है। मनुष्य ईश्वर की प्रति-कृति कहा गया है जिसकी क्षमताये बड़ी विलक्षण हैं, पर जब वह कर्म करेगा तब ही क्षमताये बाहर आयेगी। कर्म करने से ही मस्तिष्क में रचनात्मक विचार आते हैं। विश्व की जो भी प्रगति हुई है कर्म करने से ही हुई है, पर कर्म न करने वाले अपने जीवन की बहुमूल्य क्षमता को व्यर्थ जाने देते हैं और भाग्यवादी होकर अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र को उस उपलब्धि से वंचित कर देते हैं, जो वे दे सकते थे।
तुलसीदास ने उचित ही कहा है कि ‘कायर पुरूष भाग्य के सहारे बैठे रहते हैं जबकि पुरूषार्थी दुनिया बदल देते हैं।’ भगवान बुद्ध कहते हैं, ‘‘पर अकर्मण्य व्यक्ति जो करता है वह बिना किये ही रहता है। वह न नया कुछ कर सकता है और जो पहले से प्राप्त होता है वह भी नष्ट हो जाता है।’’ अकर्मण्य के पास काम न करने के कई बहाने होते हैं, जैसे मेरे लिये हर काम बहुत बड़ा है या छोटा है। अभी बहुत जल्दी है या अब बहुत देर हो गई है आदि। उसे चाहिये कि तत्काल आलस्य और हीन भावना त्याग दे। अपना ज्ञान और सामर्थ्य बढ़ाते हुये निःस्वार्थ भाव से जीवनपर्यंत कर्म करते रहना चाहिये। इसी में जीवन की सफलता है।
एक बार एक वृद्ध पेड़ लगा रहा था। राजा के यह कहने पर कि इसमें फल निकलने तक तो तुम जीवित ही नहीं रहोगे, वृद्ध ने कहा कि ”मेरा काम कर्म करते रहना है फल किसी न किसी को अवश्य खाने को मिलेंगे।” निरन्तर कर्म करने वाला सूर्य के समान है, जो बिना मांगे सबको प्रकाश देता है। जब मनुष्य समय पर अपने कर्तव्य करते रहते हैं तब समाज की व्यवस्था सुचारू रूप से चलती है। सभी की उन्नति होती है। सभी सम्पन्न होते हैं एवं राष्ट्र समृद्ध होता है। गीता के आदेशानुसार, अकर्मण्यता से दूर रहते हुये कर्म रूपी प्राप्त अधिकार का प्रयोग करते हुये अपना एवं समाज का कल्याण करते रहना चाहिये।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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