





भारतीय दर्शन ने स्थूल जगत को नकारा नहीं, इसके साथ ही इन्द्रिय ग्राहय जगत को अधिक महत्त्व भी नहीं दिया। भारतीय दर्शन समदृष्टि दर्शन है। जाग्रत स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीयावस्था-प्रत्येक की सार्थकता इस दर्शन में स्वीकृत है। अस्तु, तांत्रिकता एवं अव्यय भाव तांत्रिकता दोनों ही इस दर्शन के आलोच्य विषय है। दार्शनिक दृष्टि से केवल वस्तु निर्भर या प्रत्यक्ष इन्द्रिय ग्राहय ही नहीं, अतीन्द्रिय जगत को भी भारतीय दर्शन में स्थान मिला है। अतीन्द्रिय दिव्य ज्ञान हम वेद से भी प्राप्त करते हैं।
विषय के संग इन्द्रिय का सन्निकर्ष घटने से हमें प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है, किन्तु अलौकिक ज्ञान बाह्य इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त नहीं किया जाता है। वहां अलौकिक सन्निकर्ष का प्रयोजन पड़ता है। अलौकिक अनुभूति सम्पन्न पुरूषों की अभिव्यक्ति से भारतीय दर्शन के प्रति श्रद्धा और बढ़ जाती है। दक्षिणेश्वर (पश्चिम बंगाल) के रामकृष्ण ने अतीन्द्रिय चेतना की सहायता से दर्शन के अनेक जटिल तत्वों का सहज समाधान किया था। आचार्य शंकर के गुरू गोविंदपादाचार्य के बारे में प्रसिद्ध है, कि वे रसायन प्रक्रिया के बल से स्थूल शरीर के रूप में इस जगत में बहुत समय तक थे तथा उनको कभी भी किसी भी प्रकार का शारीरिक विकार नहीं हुआ था। वे हमेशा षोडश वर्षीय रूप् दिखते थे। हठयोग में ऐसी प्रक्रिया है, जिससे शरीर को दीर्घ काल तक स्थायी रखा जा सकता है।
‘योगाग्निभय’ शरीर के बावन उपनिषद में भी वर्णन है। पातंजल दर्शन में योगबल से ‘जात्यन्तर परिणाम’ के बारे में उल्लेख है।
‘काय सम्पद लाभ’ पातंजल दर्शन में है। सुन्दर रूप, लावण्य, अतिशय बल एवं शरीर में वज्र के समान दृढ़ता इसे काय सम्पद कहा जाता है। समस्त भारतीय दर्शन का चरम लक्ष्य ‘श्रेयो’ प्राप्त करना है।
इस वैज्ञानिक युग में धर्म का महत्त्व धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। विज्ञान का चतुर्मुख विकास हो रहा है, इसका कारण है, मनुष्य नास्तिक होते जा रहे है। किन्तु दो वर्षो पूर्व मनुष्य की धारणा थी, कि विज्ञान ही नास्तिकता को बढ़ावा देता है किन्तु विज्ञान व धर्म दोनों ही मनुष्य के लिये आवश्यक है। विज्ञान मनुष्य को भौतिक सुख प्रदान करता है तथा धर्म आत्मिक। धर्म हमारे हृदय को स्वच्छ करता है तथा विज्ञान हमारी बुद्धि की धार को तेज करता है, किन्तु मनुष्य को भौतिक सुख से अधिक मानसिक शांति की आवश्यकता रहती है। धर्म मानवीय गुणों को जाग्रत करता है।
आज जिस तरह धर्म की विश्वसनीयता समाप्त होती जा रही है, उसी तरह संहारक-मारक, अस्त्रों का निर्माण कर विज्ञान भी आलोचित हो रहा है।
जब कोई जाति अपनी संस्कृति को अस्वीकार कर दूसरे की संस्कृति को स्वीकार करती है, तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होता है। अंग्रेजों के चले जाने के बाद हमारे नेताओं ने पश्चिमी भोगवाद को लेकर औद्योगीकरण को अपनाया। एक कृषि निर्भर देश को रातोंरात औद्योगीकरण करने से तथा साथ ही पूर्ण राष्ट्रीयकरण की तैयारी में एक ऐसे तंत्र को जन्म दे दिया, जिसमें अफसरशाही एवं अकुशलता को ही प्रश्रय मिला। फलस्वरूप देश न पूंजीवादी हुआ और न समाजवादी, किन्तु इसके मध्य हमारा खुद का जो तंत्र था, वह बिखर गया। हमने अपने समृद्ध सांस्कृतिक व आध्यात्मिक सम्पदा को विस्मृत कर अपनी जातिय संहिति को नष्ट कर दिया। धर्म को समाप्त कर, सम्पूर्ण मनुष्य के बदले हम धनी मनुष्य तैयार करने लगे, किन्तु मनुष्य को संस्कृति और आध्यात्मिक सम्पदा को बाद में पुनः दे देने से उस की कोई पहचान नहीं रह जाती है।
जातिवाद, पुरोहितवाद, कुसंस्कार व विसंगतियां हिन्दू धर्म और समाज दोनों का नुकसान कर रहे है। धर्म की राजनीति हिन्दुओं के एक बड़े तबके को संदिग्ध कर चुकी है।
देश की प्रगति की कुंजी शिक्षा है, अगर ज्ञान का प्रयोग सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक उन्नति के लिये किया जाये, तो यह सबसे प्रभावशाली शस्त्र है।
शिक्षा आयोग के अनुसार हमारे देश की शिक्षा का मुख्य कार्य समान नागरिकता व संस्कृति तथा राष्ट्रीय एकता की भावना उत्पन्न करना, देश की उत्पादकता में वृद्धि करना तथा विश्व में ज्ञान व तकनीकी ज्ञान में वृद्धिकरण करना है।
किसी भी कार्य की मौलिक शक्ति उसके नैतिक व आध्यात्मिक गुण में निहित है। हमें नवीन ज्ञान, नवीन दृष्टि तथा विकास व उन्नति के लिये नवीन तकनीक प्राप्त करने का निरन्तर प्रचार करना चाहिये, परन्तु हमें नैतिक शक्ति व आत्मा को नहीं भूलना चाहिये।
शिक्षा आयोग तथा हमारे संविधान निर्माताओं ने नैतिक शिक्षा देने तथा सामाजिक दायित्व का ज्ञान कराने की भी सलाह दी है।
भारतीय संस्कृति का वैशिष्टय उसकी आध्यात्मिक दृष्टि में है। संस्कृति का अर्थ है, संस्कार या विशुद्धिकरण, विभक्त के मध्य अविभक्त को, अनेक के मध्य एक को देखना ही भारतीय संस्कृति का मूल लक्ष्य है।
सर्वभुतेषू येनेकं भावतय मीअते।
अविभक्तं विभक्तेषू तज ज्ञानं सिद्धि सात्विकम्।।
-18/20 श्लोक. गीतोपनिषद्
सभी के मध्य एक सत्, चित्त, एवं आनंद विराजमान है। यह बोध या ज्ञान भारतीय संस्कृति का लक्ष्य है। पृथक के मध्य एकत्व की उपलब्धि ही भारतीय संस्कृति का वैशिष्टय है।
यो देवो आग्नो यो अप्सू यो विश्वं भुवनमाविवेश।
य औषधिषू यो वनस्पतिषू तस्मे देवाय नमो नमः।।
श्वेताश्वेतरोपनिषद की यह उदार वाणी ही, भारतीय संस्कृति का व सभ्यता का मूल आदर्श है। सत्य, शिव एवं सुंदर की उपासना ही भारतीय संस्कृति का मूल लक्ष्य रहा है।
व्यक्ति का चारित्रिक व आत्मिक उत्कर्ष ही मूल लक्ष्य होना चाहिये। वर्तमान भारतीय समाज के अधःपतन के कारण अश्रद्धा है। श्रद्धा के अभाव में दाता के द्वारा प्रदत्त द्रव्य उपयोग नहीं किया जा सकता। भारतवासी इसी अश्रद्धा के कारण सब कुछ गवां बैठे है। अध्यात्म की शक्ति ही उन्हें पुनः धर्म में प्रतिष्ठित कर सकती है और तभी हम अपने ऋषियों द्वारा प्रदत्त फल का भोग कर सकेंगे।
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