





जन्म के साथ ही नर और नारायण का ध्यान धर्म, साधना और भक्ति में बढता ही गया। इसके बाद अपनी माता से आज्ञा लेकर वे उत्तराखंड के पवित्र स्थल बदरीवन और केदारवन में तपस्या करने चले गए। उसी बदरीवन से वर्तमान में बद्रीकाश्रम बना है, जिसे बद्रीनाथ भी कहा जाता है। भगवान विष्णु ने धर्म की महिमा बढाने के लिए अनेक लीलाएं की हैं। इन्हीं में से एक लीला में इन्होंने नर-नारायण रूप लिया। इस रूप में वे अपने सिर पर जटा धारण किए हुए थे। इनके हाथों में हंस, चरणों में चक्र और वक्षस्थल में श्रीवत्स चिन्ह था। इस अवतार को लेकर भगवान विष्णु तपस्या, साधना के मार्ग पर ईश्वर के प्रतिरूप को भक्तों के लिए धरती पर जीवंत कर गये।
शिव पुराण के अनुसार नर एवं नारायण ने आठ हजार ईसा पूर्व में कई हजार वर्षों तक महान, अद्भुत तपस्या की जिससे भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न हो गए थे और उनसे वरदान मांगने को कहा। परन्तु जन लोक कल्याण के लिए नर नारायण ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा और शिवजी से उन्होंने इसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में रहने की विनती की। इस पर भगवान शिव ने उनकी विनती स्वीकार कर ली और आज जिस केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते है, वहाँ आज भी स्वयं महादेव वास करते है। इसके पश्चात दोनों भाईयों ने बदरीवन में जाकर भगवान विष्णु के मंदिर बद्र्रीनाथ में प्रतिमा की स्थापना की। देवभूमि उत्तराखण्ड के चार धाम की यात्रा में बद्रीनाथ धाम अलकनंदा नदी के किनारे पर स्थित है। और आज भी इस स्थान पर नर नारायण नाम के दो पर्वत हैं, जहाँ आज भी नर नारायण परमात्मा की तपस्या में लीन हैं।
द्वापर युग में महाभारत काल में श्री कृष्ण को पांडवों में सबसे प्रिय अर्जुन थे क्योंकि पांडवों के यहाँ नर ने ही दंबोद्भव असुर का अंत करने के लिए अर्जुन के रूप में जन्म लिया था जबकी श्री कृष्ण तो स्वयं नारायण के ही अवतार थे। इसी कारण कृष्ण के परम सखा, शिष्य एवं भाई अर्जुन ही थे।
ऐसा भी पुराणों में वर्णित है कि भगवान विष्णु के नर-नारायण नाम के जुड़वा भाई के रूप में अवतार लेने का मंतव्य दंबोद्भव नाम के भयानक असुर का अंत करना था। यही कथा इस प्रकार है – असुर दंबोद्भव ने सूर्य देव की कई वर्षों तक कड़ी तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर जब सूर्य देव प्रकट हुए तो असुर ने ‘‘अमरत्व’’ का वरदान मांगा। वह असुर था, सूर्यदेव ने कहा यह संभव नहीं है। तब उसने मांगा कि उसे एक हजार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले। इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हजार वर्ष तपस्या की हो और जैसे ही कोई एक भी कवच तोड़े, वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो। सूर्य देवता बड़े चिंतित हुए। उन्हें ज्ञात था कि यह असुर इस वरदान का दुरूपयोग करेगा। किन्तु उसने कड़ी तपस्या की थी तो उन्हें उसे यह वरदान देना ही पड़ा। इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को भय था। दंबोद्भव अपने सहस्र कवचों की शक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा। वह ‘‘सहस्र कवच’’ नाम से जाना जाने लगा।
उधर सती जी के पिता ‘दक्ष प्रजापति’ ने अपनी पुत्री ‘मूर्ति’ का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र ‘धर्म’ से किया। मूर्ति ने सहस्र कवच के बारे में सुना हुआ था और उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि इसे खत्म करने के लिए वे आयें। विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा करेंगे। समयक्रम में मूर्ति ने दो जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम हुए नर और नारायण। दोनों दो शरीर में होते हुए भी एक थे – दो शरीर में एक आत्मा। विष्णु जी ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप अवतरण लिया था। दोनों भाई बड़े हुए। एक बार दंबोद्भव एक वन पर चढ़ आया। तब उसने एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव किया। उस व्यक्ति ने कहा कि मैं ‘नर’ हूँ, और तुम से युद्ध करने आया हूँ। भय होते हुए भी दंबोद्भव ने हंस कर कहा तुम मेरे बारे में जानते ही क्या हो ? मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हजार वर्षों तक तप किया हो। नर ने हंस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं – वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ। युद्ध शुरू हुआ और सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी। जैसे ही हज़ार वर्ष का समय पूर्ण हुआ, नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया। लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर गिर पड़े। सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया ही सही किन्तु यह तो मर गया। तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है और वह चकित हो गया। अभी ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ही यही जीवित हो मेरी और कैसे दौड़ा आ रहा है ? लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, यह तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे। जो दंबोद्भव की तरफ नहीं, बल्कि अपने भाई नर की तरफ दौड़ रहे थे। दंबोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था, इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए।
नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए। उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मंत्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे। तब दंबोद्भव की समझ में आया कि हजार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मंत्र की सिद्धि हुई है। जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते हैं। अब इस बार नारायण ने दंबोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठे। हजार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी। फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर चलता रहा। इस तरह 999 बार युद्ध हुआ। एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या। हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता। जब 999 कवच टूट गए तो सहस्रकवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जाएगी। तब वह युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरणागत हुआ। नर और नारायण उसका पीछा करते वहाँ आये और सूर्यदेव से उसे सौंपने को कहा। किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए। तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं। जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए। इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ हुआ। समय अन्तराल में कुंती जी ने अपने वरदान को जाँचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ। लेकिन यह आम तौर पर ज्ञात नहीं है, कि कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दंबोद्भव दोनों हैं।
जैसे नर नारायण में दो शरीर में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है, सूर्य और सहस्रकवच। दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये। कर्ण के भीतर जो सूर्य का अंश है, वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है। जबकी उसके भीतर दंबोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है। यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो जाती। इसीलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे।
और इस प्रकार द्वापर युग में अर्जुन के हाथों कर्ण अर्थात् दंबोद्भव का वध होता है जो पहले से ही निश्चित था।
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