





इसीलिए तो कहा गया है कि हर दिन नया उपहार लेकर आता है। वह हमारा द्वार खटखटाता है। अगर कोई जवाब मिलता है, तो ठीक, अन्यथा वह ठहरता नहीं है, अगर तुम उसके स्वागत के लिए तैयार हो, तो वह उपहार प्रदान करता है, नहीं तो साथ लाए बहुमूल्य उपहार वापस लेकर चला जाता है। जिस आदमी ने यह मान ही लिया कि जीवन में दुःख ही दुःख है, तो उपहारों से भरा दिन भी उसकी दशा में सुधार कैसे कर सकता है? वह आदमी तो सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि उसे तो निराशा ने घेरा हुआ है।
अगर हम कहें जीवन में बड़ा सुख है, तो हमारी आँखों को यह व्यक्त कर देना चाहिए कि सुख कहाँ है? अगर हम कहें, जीवन में बड़ा आनंद है, तो हमारे पैरों को बता देना चाहिए कि सुख रूपी नृत्य कहाँ है?
जन्म निसंदेह एक महत्त्वपूर्ण घटना है। ब्र्रह्मांड का जन्म, चाँद, सितारों और इस पृथ्वी का जन्म, वनस्पतियों और फिर जीवधारियों का जन्म-सभी का अपना महत्त्व है। ये चीजें हैं, तभी तो जीवन का सतत बना हुआ है। जन्म निश्चित ही खुशी की बात है, पर क्या इतनी महत्त्वपूर्ण है कि इस मौके पर उत्सव मनाया जाए? आखिर जन्मदिन को हम उत्सव क्यों बना लेते हैं? उत्सव बना लेते हैं, शायद इसलिए कि जीवन का तो हमें कोई पता नहीं। अगर जीवन का हमें पता होता, तो प्रतिपल हम उत्सव मनाते। महोत्सव तो जीवन का है। अगर उसका यानी जीवन का हमें पता चल जाए तो मैं समझता हूँ कि जन्म का उत्सव हम फिर न मनाएं।
जन्म तो सिर्फ एक शुरुआत है और जिस जीवन में हम जी रहे हैं, अगर उसमें आनंद नहीं है, तो उस जीवन की शुरुआत कैसे आनंद हो सकती है? गंगोत्री आनंद हो सकती है, पर काशी के घाट पर बहती हुई गंगा में कोई आनंद नहीं है। काशी की गंगा अगर आनंदित नहीं है, तो गंगोत्री पर कौन सा आनंद होगा?
जिसको हम जन्म कहते हैं, वह है क्या? वह है हमारा यही जीवन, बिलकुल प्राथमिक अवस्था में। इस जीवन में जबकी गंगा गंगोत्री से निकलकर काशी में पूरी तरह फैल गई है, कोई आनंद नहीं है, तो जन्म में क्या आनंद हो सकता है? सिर्फ जन्म लेने में कोई आनंद हो सकता है? नहीं, पर हम झुठलाने में कुशल हैं। जीवन में दुःख है, तो हम झूठे सुख को कल्पित करते हैं। कहते हैं कि जन्म में बड़ा सुख है, जन्मदिन में बड़ा सुख है। अगर हम कहें जीवन में बड़ा सुख है, तो हमारी आँखों को यह व्यक्त कर देना चाहिए कि सुख कहां है? अगर हम कहें, जीवन में बड़ा आनंद है, तो हमारे पैरों को बता देना चाहिए कि सुख रूपी नृत्य कहाँ है? अगर हम कहें, जीवन ही सुखी है, तो हमारे हृदय की धड़कनों को कह देना चाहिए कि खुशी कहाँ है? तो क्या हम अब भी कह सकते हैं कि जन्मदिवस खुशी का दिन है।
किसी कवि ने कहा है कि दुःख दुःखी है क्योंकि उसको कोई नहीं चाहता जबकी सुख सुखी है क्योंकि उसको कोई नहीं त्यागता। हम सभी लोग सुख चाहते हैं लेकिन अपनी झूठी महत्त्वाकांक्षाओं के पूर्ण न होने पर दुःखी हो जाते हैं। कुछ और पा लें या कुछ और कर लें-इसी को लेकर हम सुख से दूर होते जाते हैं। इससे मन अशांत रहने लगता है। आत्मा के प्रति हमारा कर्त्तव्य सर्वोपरि है। आत्मा की पवित्रता ही हमारे जीवन का निर्माण करती है। यदि हमारा जीवन विशुद्ध नहीं है तो हम दूसरों की सहायता कदापि नहीं कर सकते। हमारी मानसिक शांति ही दूसरों के सुख का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इसके अलावा मनुष्य के प्रति मनुष्य के विश्वास में ही सुख निहित है। यही विश्वास शांति का जन्मदाता होता है। इसे प्राप्त करने के लिए निश्चय, इच्छा शक्ति, शक्ति और श्रम की आवश्यकता होती है। जो व्यक्ति आगे बढ़कर इन गुणों को अपने जीवन में उतार लेते हैं, उनमें एक स्वाभाविक आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। ऐसे व्यक्तित्व को पूरा संसार प्रणाम करता है।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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