





जीवन का मूलभूत तात्पर्य ही विरह है… और विरह के माध्यम से ही एक शिष्य पूर्ण रूप से अपने गुरू में आत्मसात हो सकता है। गुरू तक पहुंचने के लिये शिष्य के अन्दर एक वेग, एक तीव्रता होनी चाहिये, मन में एक ज्वार होना चाहिये कि उठूं और मिल जाऊं।
जीवन तो फना होने की ललक है, दीवाना बन जाने का जुनून है… और जो ऐसा नहीं कर सकता वह तो जमा हुआ बर्फ है, ऐसा जीवन बहती हुई नदी नहीं बन सकता, जो अपने आप में सिमट कर रह गया उसके जीवन का कोई अस्तित्व नहीं है।
और शिष्य वह है जो जिसमें एक तड़फ हो, एक बेचैनी होनी चाहिये, वह अपने आप को कितना ही काबू करे, मगर हर क्षण उसके मन में एक भावना, एक चिन्तन विचार बना रहे कि मुझे अपने जीवन में वह प्राप्त करना ही है, जो मेरा लक्ष्य है। क्योंकि मैं पगडण्डी के प्रारम्भ से गुरू हुआ हूं और मुझे पगडण्डी के अंत तक पहुंचना है और पगडण्डी के अंत तक पहुंचने में ही मेरे जीवन की पूर्णता है। ऐसा चिन्तन शिष्य का हो सकता है।
एक सामान्य मनुष्य का ब्रह्म में लीन हो जाना, अपने आप की परिपूर्णता है, हवा एक जर्रे को आफताब बना देने की क्रिया है, गुरूता है, श्रेष्ठता है, दिव्यता है। और जब शिष्य के जीवन में ऐसा हो जाता है, तब वह चैतन्य हो जाता है, तब वह सड़कों पर उतर जाता है और झूमता हुआ आगे बढ़ता है। लोग उसे पागल कहते हैं, पत्थर फेंकते हैं, गालियां देते हैं, जहर देते है, झकझोरते हैं, मगर वह इस बात की परवाह नहीं करता।
जब तक वह अपने इष्ट से गुरू से साक्षात नहीं कर लेता, तब तक उसके अन्दर विरह की एक आग धधकती रही है, और उसका इलाज फिर किसी वैद्य के पास नहीं होता, उसका इलाज तो इष्ट के पास ही होता है, प्रिय के पास ही होता है, कि जब वे आयेंगे तब मैं उसमें अपने आप को समाहित कर दूंगा, कर दूंगी। जब प्रियतमा का यह भाव साधक में आ जाता है, तब उसमें कोमलता आ जाती है।
भावनाओं की खुमारी में वह केवल एक बात कहती है, कहता है कि यदि मैं जीवन में उस ब्रह्म को प्राप्त नहीं कर सका, तो फिर जीवन का मकसद ही क्या रह जायेगा, जीवन का उद्देश्य ही कुछ नहीं रह जायेगा। और मैं उसे प्राप्त करने के लिये सब कुछ खोने को तैयार हूं, अपने आप को फना कर देने के लिये तैयार हूं, अपने आप को विसर्जित कर देने को तैयार हूं। मैं तो तैयार हूं, वह मुझे मिले, क्योंकि उनका मिलना ही मेरे जीवन की पूर्णता है।
गुरू को प्राप्त करने की क्रिया है- वह है गुरू के अन्दर उतरने की क्रिया और उतरने के लिये कौन सा रास्ता है, कौन सी पगडण्डी है- वह पगडण्डी है प्रेम की, वह पगडण्डी है प्यार की, वह पगडण्डी है फना होने की, वह पगडण्डी है अपने आप को मिटा देने की।
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