





इसी सब का नाम है ‘अहम् ब्रह्मास्मि चैतन्यता’, अर्थात सृष्टि में मेरे समान कोई भी व्यक्ति नहीं हैं, परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को नूतन रूप में सृष्टि में भेजा है। अतः मेरे समान इस संसार में देह के रूप में, आभा के रूप में अन्य कोई नहीं है।
इस परमात्मा स्वरूप को कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों से, पूर्ण चेतनावान बनाने के लिये और ज्ञान, बुद्धि, भौतिक, आध्यात्मिक चेतना से युक्त करने अर्थात इस संसार में जो कुछ भी निर्मित है और जो भी नूतनता संसार में निर्मित करनी है वह केवल मुझसे ही संभव है, अर्थात मैं ही पर बह्म स्वरूप हूं। जिस तरह से ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, वैसा ही निर्माण मेरे स्वयं के द्वारा निश्चित रूप से संभव है। इस अहम् ब्रह्मास्मि का भाव चिंतन प्राप्त करने के लिये वह क्रिया, वह दिव्यता केवल और केवल श्रेष्ठ मार्गदर्शन से और गुरु के आशीर्वाद से ही पूर्ण रूपेण संभव है।
अहम् ब्रह्मास्मि के आत्म चिंतन को देह, मन, विचार, भाव और क्रिया के इन पंचभूत तत्वों के युक्त होने से जीवन की मलीनता, जीवन का संड़ाध, जीवन की दुर्बलता, बोझिलता और दुर्भिक्षता निश्चित रूप से समाप्त होती ही है और जीवन मे हर रूप मे आनन्द, प्रसन्नता, उल्लास, चैतन्यता और निरंतरता का भाव स्थायी रूप से आता ही है। इन्हीं आयामों को पूर्णता से प्राप्त करने के लिए बुद्ध पूर्णिमा पर्व पर ‘अहम् ब्रह्मास्मि चैतन्य दीक्षा’ प्रदान की जायेगी। अतः जीवन में सुचेतनाओं की निरन्तर वृद्धि के लिए उक्त दीक्षा अवश्य ही ग्रहण करें।
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