





जगन्नाथ मंदिर भगवान विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। पुराणों में इसे धरती का वैकुंठ कहा गया है। इसे श्रीक्षेत्र, श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि और श्री जगन्नाथ पुरी भी कहते हैं। यहाँ लक्ष्मीपति विष्णु ने तरह-तरह की लीलाएं की थीं। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार यहां भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित हुये और सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गये। सबर जनजाति के देवता होने के कारण यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है। पहले कबीले के लोग अपने देवताओं की मूर्तियों को काष्ठ से बनाते थे।
पुराण के अनुसार नीलगिरि में पुरुषोत्तम हरि की पूजा की जाती है। पुरुषोत्तम हरि को यहां भगवान राम का रूप माना गया है। सबसे प्राचीन मत्स्य पुराण में लिखा है कि पुरुषोत्तम क्षेत्र की देवी विमला है और यहां उनकी पूजा होती है। रामायण के उत्तराखंड के अनुसार भगवान राम ने रावण के भाई विभीषण को अपने इक्ष्वाकु वंश के कुल देवता भगवान जगन्नाथ की आराधना करने को कहा। आज भी पुरी के श्री मंदिर में विभीषण वंदापना की परंपरा कायम है।
स्कंद पुराण में पुरी धाम का भौगोलिक वर्णन मिलता है। जिसके अनुसार पुरी एक दक्षिणवर्ती शंख की तरह है और यह 5 कोस यानी 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। माना जाता है कि इसका लगभग 2 कोस क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में डूब चुका है। इसका उदर है समुद्र की सुनहरी रेत जिसे महोदधी का पवित्र जल धोता रहता है। सिर वाला क्षेत्र पश्चिम दिशा में है जिसकी रक्षा महादेव करते हैं। शंख के दूसरे घेरे में शिव का दूसरा रूप ब्रह्म कपाल मोचन विराजमान है। माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा का एक सिर महादेव की हथेली से चिपक गया था और वह यहीं आकर गिरा था, तभी से यहां पर महादेव की ब्रह्म रूप में पूजा करते हैं। शंख के तीसरे वृत्त में मां विमला और नाभि स्थल में भगवान जगन्नाथ रथ सिंहासन पर विराजमान है।
मंदिर का इतिहास
इस मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। कहा जाता है कि सबसे पहले सबर आदिवासी विश्ववसु ने नीलमाधव के रूप में इनकी पूजा की थी। आज भी पुरी के मंदिरों में कई सेवक हैं जिन्हें दैतापति के नाम से जाना जाता है।
राजा इंद्रदयुम्न मालवा का राजा था जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति था। राजा इंद्रदयुम्न को सपने में हुए थे जगन्नाथ के दर्शन। उन्होंने यहाँ कई विशाल यज्ञ किये और एक सरोवर बनवाया। एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिये और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो। राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा। उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति।
विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है। चतुर विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया। आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुँचने में सफल हो गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी।
विश्ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गये। भगवान गुफा में लौट गये, लेकिन साथ ही राजा इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिये विशाल मंदिर बनवा दे। राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिये कहा। भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिये समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाये। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गये, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आये।
अब बारी थी लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आये। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुये नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई। लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुये राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया। जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी मूर्तियां पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाये ही नहीं गये थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।
महाराजा इंद्रद्युम्न ने जगन्नाथ जी का भव्य मंदिर सतयुग के प्रथम मन्वंतर में निर्माण कराया। वह मंदिर 1500 फीट ऊंचा था। जिस स्थान पर भगवान का आविर्भाव हुआ है, वह इस समय का गुंडिचा मंदिर है। उस समय यह मंदिर नहीं था। भगवान का आविर्भाव एक मंडप में हुआ था। उस मंडप से लेकर जो आदि मंदिर महाराज इंद्रद्युम्न ने निर्माण किया था, वहां तक पहुँचने के लिये प्रथम रथ यात्रा की सूचना हमें स्कंद पुराण से मिलती है।
यह रथ यात्रा गुंडिचा मंदिर से उस वक्त के श्रीमंदिर तक हुई थी। उसी पुराण में भगवान ने स्वयं कहा है कि साल में एक बार वह अपने श्रीमंदिर से अपने जन्म स्थान जाना चाहते हैं, क्योंकि जन्म स्थान उन्हें बहुत प्रिय है और यहां सात दिन रहना चाहते हैं। सात दिन बाद वापस आते हैं, जिसे हम बाहुड़ा यात्रा कहते हैं। फिर भगवान अपने श्रीमंदिर में पुनः विराजमान होते हैं। यह सनातन वैदिक धर्म की बहुत ही अलग-सी परंपरा है। इसलिये वैदिक परंपरा में जब हमारे मूल विग्रह जब मंदिर में, गर्भगृह में अपने सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो जाते हैं, तब उनको वहाँ से हटाया नहीं जाता है। यहां जगन्नाथ जी सबके नाथ हैं। सबके नाथ का मतलब केवल पृथ्वी के लोगों के ही नाथ नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड के नाथ हैं। जगत के नाथ हैं। ऐसे में सबका अधिकार है, उनके दर्शन व उनकी कृपा प्राप्त करने की, ऐसे में यह असंभव है कि मूल विग्रह मंदिर के अंदर रहे। परंपरा को भंग करते हुये भगवान कहते हैं कि मैं स्वयं घर से निकलूंगा, ताकि ब्रह्मांड के जितने भी प्राणी हैं, यहां तक कि देवी-देवता भी मेरा दर्शन कर सकें। यह रथ यात्रा का मूल उद्देश्य है। सभी धर्म-संप्रदाय के लोग समान रूप से इसमें भाग लेते हैं। जगन्नाथ महाप्रभु ही परमात्मा, परमेश्वर, परमब्रह्म हैं।
अब उन तीन रथों की बात करें जिस पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा सवार होकर बाहर निकलते हैं। तो नीम की पवित्र काष्ठ से निर्मित इन रथों में किसी भी प्रकार के कील, कांटे या अन्य धातु का प्रयोग नहीं होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिये होते हैं, और इसके निर्माण में कुल 832 लकड़ी के टुकड़ों का प्रयोग होता है। इसका रंग लाल-पीला और ऊंचाई 13 मीटर तक होती है। गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष ये भगवान जगन्नाथ के रथ के नाम हैं। रथ के ध्वज को त्रिलोक्यवाहिनी कहते हैं। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, उसका नाम शंखचूड़ है। भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ भगवान जगन्नाथ के रथ के रक्षक हैं। देवी सुभद्रा के रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक होता है। इनके रथ का नाम देवदलन है। लाल और काले रंग का ये रथ 12.9 मीटर ऊंचा होता है। रथ के रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचूड़ा नाम से जाना जाता है। भगवान बलभद्र को महादेव का प्रतीक माना गया है। इनके रथ का नाम तालध्वज है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। लाल और हरे रंग के इस रथ में 14 पहिये होते हैं। और यह रथ 13.2 मीटर ऊंचा होता है।
सामाजिक जीवन जीने के लिये जिन शक्तियों, गुणों की आवश्यकता है, उसके प्रदाता भगवान श्रीकृष्ण ही हैं। जीवन में कदम-कदम पर दुःख, संताप, रोग, कष्ट, पीड़ा, दरिद्रता, शत्रु अंधकारमय स्थितियां निर्मित करते है जिससे जीवन निरन्तर कष्टमय बना रहता है। सही रूप में तो जीवन का भाव चिन्तन योग-भोग की सुस्थितियों से निरन्तर क्रियाशील रहना है।
जीवन का सारभूत तथ्य यही है कि जीवन में निरन्तर आनन्द, प्रसन्नता, सुख, भोग-विलास, अटूट धन लक्ष्मी के साधन प्रचुर मात्रा में प्राप्त हो। अतः रथ यात्रा के विशिष्ट पर्व की आध्यात्मिक चेतना को अपने जीवन की सुवृद्धि हेतु आत्मसात करने के लिये श्री जगन्नाथ योग-भोग सहस्त्र लक्ष्मी वृद्धि दीक्षा ग्रहण कर साधक अपनी मनोकामनायें सरलता से पूर्ण करने में समर्थ होते हैं। साथ ही जीवन की कालिमा को समाप्त कर प्रकाश से ओत-प्रोत हुआ जा सकता हैं।
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