





इस संसार में सभी व्यक्ति सुख चाहते हैं। सभी सुख के लिये ही भाग-दौड़ करते हैं। फिर भी उन्हें सुख नहीं मिलता। अतः प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है? इसका मुख्य कारण है- जीवन में संयम का अभाव। संयम शब्द सुनते ही लोग कहने लगते हैं कि संयम तो साधु-सन्तों, महात्माओं, त्यागी और वैरागियों की वस्तु है, किंतु यह कथन सर्वथा भ्रामक और मिथ्यापूर्ण है। संयम की आवश्यकता तो हर गृहस्थ, विद्यार्थी, युवक, स्त्री, पुरूष और बालक को है।
आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की समस्यायें मुंहबाये खड़ी हैं, जिनका समाधान करने में मनुष्य बेबस और लाचार है। इन समस्याओं का प्रमुख कारण है जीवन में संयम के अनुपालन की कमी। किंतु यदि मनुष्य खान-पान, बात-चीत तथा काम-काज में संयम को अपना ले तो उसकी सारी समस्याओं का समाधान हो जाय और वह सुखपूर्वक जीवन-यापन करने लगे।
सन्त-महात्माओं के मतानुसार शाश्वत सुख संयम में ही निहित है। मनुष्य विभिन्न पदार्थों के संग्रह में तथा विषय-भोग में सुख की तलाश करता है, लेकिन वहाँ भी उसे सुख नहीं मिलता। विभिन्न पदार्थों का संग्रह तथा विषय-भोग यद्यपि देखने में अमृत के समान सुखदायी प्रतीत होते हैं, किंतु परिणाम में वे विष से भी बढ़कर दुःखदायी हैं। विषयानन्द तो एक प्रकार से मीठा जहर है, जो मनुष्य को असमय ही मृत्यु के मुख में ढकेल देता है।
संयम को जीवन की आधारशिला बताते हुये संत कबीर ने कहा है-
संतो सुख संतोष है, रहहु तो हृदय जुड़ाय।
जब लग दिल पर दिल नहीं, तब लग सब सुख नाहिं।।
जो तू चाहे मूझको, छाँड़ सकल की आस।
मुझ ही ऐसा हो रहो, सब सुख तेरे पास।।
अर्थात् हे सन्तो! सन्तोष और संयम में ही सच्चा सुख है। यदि मनुष्य सन्तुष्ट हो जाय तो कामनाओं से जलता हुआ उसका तन-मन शीतल हो जायेगा। जब तक मन संयमित नहीं होगा, तब तक सच्चा सुख नहीं मिल सकता। अतः अपने मन को वश में करो। सारे सुखों की प्राप्ति तुम्हें स्वतः हो जायेगी।
यही नहीं, संयम और सन्तोष में परम सुख का वास भी है, जो मनुष्य आत्मशांति, परमानन्द और शाश्वत सुख चाहता है, उसे संयमी और विष्कामी बनना ही होगा। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।
अर्थात् इस संसार में जो व्यक्ति योगपूर्वक यानी संयम से जीता है, वह दुःखों को नष्ट कर देता है।
इसी प्रकार धर्मशास्त्र में भी बहुत कुछ इसी प्रकार की बातें कही गयी हैं-
जयं चरे जयं चिट्ठे जयं मासे जयं सये।
जयं भुज्तो भासन्तो पापकम्मं व बन्धई।।
अर्थात् जो यत्नपूर्वक यानी संयम से तथा विवेक और अत्यन्त सावधानी के साथ उठता-बैठता है, सोता-जागता है तथा आहार-विहार करता है, वह पाप कर्मों में कभी भी नहीं बँधता।
आध्यात्मिक उन्नति के लिये जहां संयम की आवश्यकता है, वहीं व्यावहारिक जीवन को सरस, मधुर और सुखी बनाये रखने के लिये तथा पारस्परिक प्रेम, सहयोग और सद्भाव की भावना के लिये संयम की महत्ता अविवादित है।
महापुरूषों के मतानुसार जीवन का प्रयोजन पारमार्थिक प्रगति है, परन्तु प्रश्न उठता है कि जिसके जीवन का व्यावहारिक पक्ष अव्यवस्थित एवं असन्तुलित हो, वह पारमार्थिक प्रगति कैसे करे? इस प्रश्न के उत्तर में हम कह सकते हैं कि पारिवारिक और सामाजिक मर्यादाओं का पालन कर तथा संयमित जीवन यापन करके ही हम पारमार्थिक प्रगति कर सकते हैं।
अब हम जीवन के किन महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर संयम को प्राथमिकता देते हुये अपने जीवन को निखार सकते हैं? वे बिन्दु निम्नलिखित हैं-
वाणी में संयम- वाणी प्रकृति का एक अनुपम वरदान है। असत्य, कटु तथा असामयिक बातें न कर सत्य, प्रिय और सामयिक बातें करना ही वाणी का संयम है। तभी तो सन्त कबीर ने कहा है-
ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन कौं सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
स्वार्थ में संयम- मनुष्य स्वभाव से ही स्वार्थी है। वह सबसे पहले सबसे अच्छी वस्तु चाहता है और इसी से पारस्परिक कलह, द्वेष तथा असन्तोष को बढ़ावा मिलता है। अतः आपस में एकता, प्रेम और सहयोग बनाये रखने के लिये संयमित स्वार्थ को अपनाना और त्याग की भावना रखना अति आवश्यक है।
खान-पान में संयम- भोजन मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता है, जिसके बिना जीवन चल नहीं सकता। लेकिन उलटा-सीधा तथा अनाप-शनाप खाना खाकर लोग स्वयं को अनेक रोगों का शिकार बना लेते हैं। खान-पान में संयम का अर्थ है- उचित समय पर, उचित मात्रा में तथा उचित ढंग से सात्त्विक और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना।
काम में संयम- आज के युग में काम में भी संयम की आवश्यकता है। वह काम किस काम का, जिससे जीवन का सुख-चैन ही नष्ट हो जाये तथा प्राप्त धन का उपभोग न किया जा सके। रात-दिन दौड़-धूप कर खूब धन-दौलत बटोर लेने से मनुष्य सुखी नहीं हो जाता। मनुष्य सुखी होता है अपने सत्कार्यों से तथा सन्तुलित आचरण और व्यवहार से। अतः सदाचरण, सद् व्यवहार और सत्कार्य ही काम में संयम के द्योतक हैं।
कामना में संयम- मानव मन कामनाओं का घर है। अतः घर-परिवार के वातावरण को सरस और सुखी बनाये रखने के लिये कामनाओं पर संयम अति आवश्यक है। कामनाओं पर संयम अनावश्यक इच्छाओं के दमन से ही सम्भव है।
व्यवहार में संयम- इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिये कि हमारा व्यवहार सबके साथ सरस और मधुर हो। यद्यपि सभी के विचार, स्वभाव और संस्कार तथा काम करने की शैली एक-जैसी नहीं होती। फिर भी एक-दूसरे के मध्य प्रेम, सहिष्णुता और क्षमा की भावना का विकास करना ही व्यवहार में संयम के लक्षण हैं। ध्यान रहे कि हमारा व्यवहार सहिष्णुता, सहनशीलता एवं विश्वसनीयता पर आधारित होना चाहिये।
मैत्री में संयम- संसार में प्रत्येक व्यक्ति का कोई-न-कोई मित्र अवश्य होता है, जिसके साथ वह उठता-बैठता है तथा अपने मन की बातें करता है। मैत्री में संयम का अर्थ है- मैत्री सम्बन्ध का स्वार्थ से रहित होना। अन्य शब्दों में हमारी मैत्री स्वार्थ पर आधारित कदापि न हो, क्योंकि स्वार्थ पर आधारित मैत्री कभी भी मन को सन्तुष्ट, सुखी और प्रसन्न नहीं रखती। इसलिये मित्रता हमें सोच-विचार कर तथा समान संस्कार और समान रूचि वाले व्यक्तियों से ही करनी चाहिये। इससे मित्रता में स्थायित्व आता है।
संयम कोई स्वतः प्रसूत प्रक्रिया नहीं है। इसे धारण करना पड़ता है। संयम से असम्भव प्रतीत होने वाले अनेक कार्य सम्भव हो जाते हैं। दुर्गम मार्ग को सुगम बनाने का संयम ही एकमात्र साधन है।
जीवन में संयम का वही स्थान है, जो किसी सेना में अनुशासन का होता है। संयम और अनुशासन व्यक्ति में कार्य करने की क्षमता उत्पन्न करते हैं, जो रचनात्मक कार्यों के सृजन में सहायक सिद्ध होती है। यदि संघर्षमय जीवन में दुर्लभ वस्तु पाने की इच्छा बलवती हो जाय तो हमें संयम और साधना का सहारा लेना चाहिये। यही सफलता का सिद्धयोग है।
संयम भारतवर्ष का आदर्श है। यह आदर्श भोग के मार्ग पर चल कर नहीं, अपितु त्याग के मार्ग पर चलकर प्राप्त हुआ है। चूंकि भारतवर्ष में सदैव संयम की रक्षा हुई है, इसलिये वर्तमान में संयमित जीवन-यापन करते हुये हमें भविष्य के लिये भी संयम की रक्षा का संकल्प लेना चाहिये तथा भारत देश को एक आदर्श एवं गौरवशाली देश बनाने का यथाशक्ति प्रयास करना चाहिये। इसी में जीवन की सार्थकता तथा हम सबका कल्याण निहित है।
सस्नेह आपकी मॉं
शोभा श्रीमाली
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