





तुम्हारी क्रिया केवल जन्म से मृत्यु के रास्ते पर जाने की क्रिया है। इसलिये यह क्रिया पशुओं में भी है, पक्षियों में भी है। मगर तुम में और पशु-पक्षियों में अन्तर है। अन्तर यह है कि तुम इस चेतना को ज्ञात कर सकते हो, क्यों प्रभु ने तुम्हें जीवन दिया? जीवन का उद्देश्य क्या है? जीवन का लक्ष्य क्या है और इस जीवन का लक्ष्य उस सूक्ष्मता से पूर्णता की ओर अग्रसर होना है। यह लक्ष्य आदि से अंत होने की क्रिया है। यह जीवन का लक्ष्य प्रारम्भ से अंतिम बिन्दु तक पहुँचने की क्रिया है। इसीलिये ईशावास्योपनिषद् में ऋषियों ने लिखा है-
ब्रह्म पारमपूर्ण सर्वे पूर्णम् ।
जो अपने जीवन में पूर्णता की ओर अग्रसर होने की क्रिया करता है, सोचता है, चिंतन करता है वह मनुष्य है। वही शिष्य, वही साधक है।
यदि जिसके जीवन में चिंतन ही नहीं है कि प्रभु ने उसको जन्म क्यों दिया, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है मेरे जीवन की गति क्या है। यदि यह चिन्तन नहीं करता, यदि यह विचार नहीं करता, यदि यह धारणा नहीं है, यदि उसके मन में यह एक बिन्दु स्पष्ट होता ही नहीं है तो उसमें और पशु में कोई अन्तर नहीं है। क्योंकि पशु ऐसा चिन्तन नहीं कर सकता। पशु इस प्रकार का विचार नहीं कर सकता। पशु के जीवन में ईश्वर का कोई स्थान नहीं है। पशु के जीवन में इस बात का भी स्थान नहीं है कि हमारे जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य क्या है, और जिसको जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य ही ज्ञात नहीं वह जीवन की पूर्णता तक पहुँच नहीं सकता। इसलिये मनुष्य जीवन को केवल एक पशु जीवन कहा गया है और तुम सब का जीवन एक पशु जीवन है और जिस रास्ते पर, जिस पगडंडी के बारे में तैत्तरीय उपनिषद में बहुत स्पष्ट रूप से श्रेष्ठतम बात कही गई है और उस बात में यह कहा गया है कि जीवन का मूल उद्देश्य, मूल लक्ष्य, मूल चिन्तन इस बात का है कि वह निरन्तर गतिशील होता रहे और मनुष्य गतिशील होता ही है। फिर इस तैत्तरीय उपनिषद् में विशेष क्या है। उसमें सूत्र है और उस सूत्र का भाव यह है
संपूर्णवे परिक्राम, परिवे मरिदम, सर्वे सताम कुरूतम्
र्दिग्म युद्धम् मदाम्, परेरे
मैं सोचता हूँ कि इस श्लोक में पूरे उपनिषद् का सार है जीवन के लक्ष्य का पाठ यह है हमारे जीवन की उलझी राहों का स्पष्ट संकेत है। उसमें बताया गया है कि हम मनुष्य के रूप में जन्म लेकर के गतिशील होते हैं। परन्तु यह हमारी गति काल की गति है। यह हमारी गति मृत्यु की ओर बढ़ने की गति है। यह हमारी गति जीवन को समाप्त करने की गति है। यदि जीवन में ऐसा कोई क्षण आये, यदि जीवन के पुण्यों का उदय हो, यदि जीवन में कोई श्रेष्ठतम स्थिति बनती है तो उस पगडंडी पर जहां कहीं बीच में गुरू मिल जाये और यदि हम उसको पहिचान लें। क्योंकि उसमें भी कर्मो का चिन्तन है और ऐसा भी हो सकता है कि आप गुरू के पास में से निकल जाये। गुरू शब्द इसलिये बना कि तुम्हारे मनुष्य जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य अगर है तो क्या है इसको सामान्य मनुष्य नहीं समझा सकता। इसको देवता भी नहीं समझा सकते। क्योंकि देवताओं ने जन्म लिया ही नहीं। इसलिये उनकी ज्ञान चेतना हो ही नहीं सकती कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य क्या है। इसको राक्षस, गन्धर्व, किन्नर, प्रेत, यक्ष ये भी नहीं समझा सकते क्योंकि जिन्होंने जन्म लिया ही नहीं वे समझा नहीं सकते। पर गुरू ने जन्म लिया है और जन्म लेकर के पूर्णता तक पहुँचा है। गुरू को जन्म लेना एक निमित्त है, शिष्य को प्रमाणित करने के लिये।
पूर्णमदः, पूर्णमिदं पूर्णतः पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाव शिष्यते।।
बड़ी सुन्दर व्याख्या है उसने कहा कि जीवन का उद्देश्य मार्ग में रूकना नहीं है। जीवन का उद्देश्य मार्ग में विश्राम करना भी नहीं है। जीवन का उद्देश्य जिस रास्ते पर गतिशील है उस रास्ते पर से ही सही रास्ता पकड़ने की क्रिया है, सही जगह पहुँचने की क्रिया है, सही स्थिति में पहुँचने की क्रिया है और क्रिया वहां पर जहां मनुष्य गतिशील होता है वहां पर कई रास्ते है। एक रास्ता संतान पैदा करने का है जहां पर हम दो-तीन-चार बच्चों को पैदा कर देते हैं और जिस प्रकार से हम मृत्यु की ओर गतिशील हैं, उसी प्रकार उन पुत्रों को भी मृत्यु की ओर गतिशील कर देते है। जिस प्रकार हम झूठ, छल, कपट में डूबे हुये हैं ठीक उसी प्रकार उनको भी उसी क्रिया में ढकेल देते हैं। क्योंकि जब हमें खुद को ही ज्ञात नहीं है तो हम अपने संतान को भी ज्ञान नहीं दे सकते और यह जन्म और मरण के बीच में झूलने की क्रिया है। जन्म से मृत्यु की ओर समाप्त होने की क्रिया है। जन्म और मृत्यु के बीच में निरन्तर भटकने की क्रिया है। पर इस बीच में यदि गुरू मिलते हैं और यदि हमारे जीवन के पुण्य उदय होते हैं, जीवन में चेतना प्राप्त होती है, यदि हमारे जीवन का लक्ष्य स्पष्ट है तो जहां भी गुरू मिल जाये, वहां कस कर पकड़ लेना चाहिये। क्योंकि तुमको यदि गुरू नहीं मिले तो तुम्हारे जीवन का रास्ता मरघट की ओर, तुम्हारा रास्ता मृत्यु की ओर है और वेदों में शास्त्रों में उपनिषदों में एक ही बात कहीं है।
त्वम् ब्रह्म, त्वम् ब्रह्मासि। तुम ब्रह्म हो तुम्हें ब्रह्म में लीन होने की क्रिया करना है, क्योंकि चौरासी लाख योनियों का अर्थ है इस जीवन के जन्म से लगाकर के मृत्यु तक तुम विभिन्न योनियों में भटकते हो। कहीं तुम पिता बनते हो, कहीं तुम बेटे बनते हो, कहीं तुम माँ बनते हो, कहीं तुम बहन बनते हो, किसी के तुम भाई बनते हो, कभी किसी के तुम सम्बन्धी बनते हो, यह सब योनियां है। अलग-अलग योनियां है। अलग-अलग योनियों में भटकते-भटकते मृत्यु की ओर अग्रसर होते हो। मगर वो कह रहा है कि
त्वम् पूर्णम देहि
तुम पूर्ण हो सकते हो, मगर पूर्ण तुम कैसे हो सकते हो। तुम्हें पूर्णता का ज्ञान है ही नहीं पूर्ण क्या है? पूर्णता का अर्थ क्या है? पूर्णता का चिन्तन क्या है और यह पूर्णता का चिन्तन जो कराता है उसको गुरू कहते हैं और यह गुरू किसी घर में नहीं मिल सकता, यह गुरू किसी आश्रम में नहीं मिल सकता, यह गुरू किसी नदी किनारे नहीं मिल सकता, यह लम्बी जटा बढ़ाने वाले गुरू नहीं बन सकते। लम्बी जटा और भगवे कपड़े पहनने वाले भी गुरू नहीं बन सकते। गुरू बन सकते है जिसमें ज्ञान और चेतना है, जिसमें जाग्रत चेतना है, जो इस ब्रह्म से साक्षात्कार कर चुका है। जिसको यह ज्ञात है कि जीवन की पूर्णता क्या है। जीवन का ध्येय क्या है, जीवन का लक्ष्य क्या है, हमें जीवन में कहां पहुँचना है, कैसे पहुँचना है, और उन सारे जटिल प्रश्नों के उत्तर केवल गुरू दे सकता है। क्योंकि गुरू स्वयं
गुरू र्ब्रह्मा, गुरू र्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरू साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः।।
मैं गुरू को इसलिये प्रणाम नहीं करता हूं कि वह शरीरधारी है, इसलिये भी नहीं कि वह मुझे रास्ता बताता है। गुरू मुझे नवीन प्रकार से पैदा करेगा, नवीन प्रकार की क्रिया करेगा, मैंने जो जन्म लिया है वह तो एक सहज स्वभाविक क्रिया है। उसमें कोई बहुत बड़ा विस्फोट नहीं हुआ। उसमें कोई बहुत बड़ी चेतना नहीं हुई। मेरे माँ-बाप ने मुझे जन्म दिया तो कोई अनन्य घटना नहीं घटी। मुझे वापिस नये शरीर से ब्रह्म स्वरूप बना कर जन्म दे। ब्रह्मा का तात्पर्य यह है कि वह एक नवीन जन्म दे और गुरू ब्रह्मा है, मुझे नवीन प्रकार से जन्म दे क्योंकि मैंने जो कुछ जन्म लिया है, वह मेरे वश में नहीं है। उसका मेरा कोई लक्ष्य नहीं था। उसके पीछे मेरा कोई हाथ नहीं था। मैं चाहते हुए भी उस गर्भ को धारण कर, सकता या नहीं कर सकता। यह मेरे हाथ में नहीं था। इसलिये वह ब्रह्मा स्वरूप बन करके मुझे वापिस नया जन्म दें।
गुरूर्विष्णु और जन्म ही नहीं दे मुझे पुष्ट करें तालिम दें, ज्ञान चेतना दें, प्राणश्च चेतना दें, मुझे आगे बढ़ने की क्रिया दें मुझे समझायें मेरे जीवन का उद्देश्य, मेरे जीवन का लक्ष्य, मेरे जीवन के प्राण, मेरे जीवन की गति क्या है? मैं किस पगडंडी पर गतिशील होऊं।
और गुरूर्देवोमहेश्वरः वह साक्षात् शिव स्वरूप है क्योंकि शिव कल्याणमय है और मैं जो कुछ कर रहा हूँ, छल में कर रहा हूँ, मैं झूठ कर रहा हूँ, पाप कर रहा हूं, झूठ बोल रहा हूं, कपट कर रहा हूं, असत्य कर रहा हूं, संतान पैदा कर रहा हूं और मर रहा हूं। मेरे जीवन में कोई चेतना नहीं है, मेरे जीवन में कोई ज्ञान नहीं है क्योंकि मुझे यह ज्ञात ही नहीं है कि मैं शिवमय कैसे बन सकूंगा, कल्याणमय कैसे बन सकूंगा। इसलिये गुरू जहां ब्रह्मा है, जहां गुरू विष्णु है, वह गुरू शिवमय भी है और मैं शिवमय बनकर के किस प्रकार से अपने जीवन को पूर्णता की ओर अग्रसर करता हूँ और अग्रसर कर सकूंगा इसका चिन्तन, इसका ज्ञान केवल गुरू ही दे सकता है। इसीलिये गुरू को केवल ब्रह्म ही नही कहा गया, गुरू को केवल विष्णु ही नहीं कहा गया और गुरू को केवल शिव ही नहीं कहा गया, गुरू साक्षात परब्रह्म है। इन तीनों से ऊपर जो ब्रह्म की स्थिति है, जहां पर जीवन की पूर्णता प्राप्त होती है। जहां ईशावास्योपनिषद् में कहा गया है
पूर्णमदः पूर्णमिदं
जहां प्रारम्भ मेरा एक सामान्य घटना बनकर रह गया। वहां मेरा जीवन का लक्ष्य ब्रह्ममय बन करके पूरे ब्रह्माण्ड में फैले जाने की क्रिया है और यह पूरे जीवन में फैल जाने की क्रिया बहुत विरले लोगों को प्राप्त होती है, बहुत उच्च कोटि का जिनका चिन्तन, जिनका विचार होता है, उनको प्राप्त होती है। जब तुम पगडंडी पर गतिशील होते हो। पांच साल बाद -बीस साल बाद कहीं पर भी तुम्हें गुरू मिल सकता है और जहां तुम्हें गुरू मिले वह जीवन का एक विशिष्ट, स्वर्णिम क्षण है। जीवन का एक श्रेष्ठतम क्षण है। जीवन का यह सौभाग्य दायक क्षण है। क्योंकि उसी क्षण तुम पैदा होते हो। उस क्षण तुम एहसास करते हो, कि मेरे जीवन को कोई गति देने वाला है। मेरे जीवन को कोई चेतना देने वाला है। उन क्षणों में गुरू तुम्हें दीक्षा देता है। गुरू तुम्हें अपना लेता है, गुरू तुम्हें अपने मुंह से शिष्य कहता है। ठीक वही क्षण तुम्हारे जन्म का क्षण होता है। वही क्षण वह ब्रह्म बन करके तुम्हारी उत्पति करता है। वही क्षण तुम्हारे जीवन का स्वर्णिम प्रभात होता है।
क्योंकि तुम्हारा वास्तविक जीवन वहीं से प्रारम्भ होता है। अभी तक जो तुम्हारा जीवन था, हाड़ मांस का बना हुआ सामान्य जीवन था। अभी तक जो तुम्हारा जीवन था मल मूत्र में लिप्त जीवन था, अभी तक तुम्हारे जीवन में वासनायें थी, स्वार्थ था, लालच था, तुम्हारे जीवन में घृणा थी और तुम्हारे जीवन में ऐसा कुछ नहीं था जिस पर गर्व किया जा सके। क्योंकि तुम्हें कोई रास्ता ज्ञात ही नहीं था। तुम तो केवल अपने जीवन को एक पगडंडी पर चाहते हुए, ना चाहते हुए ढकेले जा रहे थे। परिस्थितियां तुम्हें ढकेल रही थी। तुम माया में उलझे हुये थे। तुम धन के पीछे पागल, दीवाने थे, तुम किसी स्त्री के पीछे, विषय-वासना के पीछे लिप्त थे। वह तुम्हें एक क्षण रोक कर के सोचने के लिये बाध्य करता है कि तुम मेरे शिष्य हो, मैं तुम्हें जन्म दे रहा हूं और वह स्मरण दिला रहा हूं, वह चिन्तन दे रहा हूं, विचार दे रहा हूं कि तुम्हारा जन्म एक विशेष गति है, ईश्वर ने तुम्हें एक विशेष उद्देश्य के लिये पैदा किया है। क्योंकि प्रभु की यह विशेष स्थिति है कि वह घास का एक तिनका भी व्यर्थ में पैदा नहीं करता और तुम्हारे जैसे पांच फुट और छः फुट के किसी व्यक्ति को जन्म दिया है प्रभु ने, तो जरूर कोई हेतु है कोई कारण है, कोई चिन्तन है और उस चिन्तन को समझने के लिये, उस चिन्तन को पूर्णता देने के लिये। गुरू तुम्हें रूक करके समझाता है, तुम्हारे जीवन का उद्देश्य, तुम्हारे जीवन का लक्ष्य, तुम्हारे जीवन की विचार धारा, तुम्हारे जीवन की श्रेष्ठता क्या है? और उस श्रेष्ठता को पूर्णता देने की क्रिया गुरू के माध्यम से पूर्ण हो सकती है।
फिर ये जीवन एक नवीन श्रृंगार से आभूषित होता है। जो तुम्हारा नाम है वह समाप्त कर गुरू तुम्हें एक नया नाम देता है, गुरू तुम्हें केवल शिष्यता नहीं देता, गुरू तुम्हें केवल दीक्षा नहीं देता वह तुम्हारे रक्त को शुद्ध करता है। क्योंकि तुम्हारे रक्त में छल है, झूठ है, तुम्हारे रक्त में तुम्हारे पिता का दिया हुआ वह सब कुछ है जिस छल-कपट-असत्य-व्याभिचार से तुम्हारे पिता ने जीवन को पार किया और हो सकता है कि तुम्हारे पिता को कोई गुरू नहीं मिला हो। ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे पिता के जीवन का भाग्योदय नहीं हुआ हो। ऐसा हो सकता है कि उन्होंने जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा की हो और जीवन में उन्हें कुछ भी नहीं मिला हो इसलिये नहीं मिला कि उन्होंने जन्म लिया, बढ़े और मरघट में जाकर सो गये। यह स्थिति तुम्हारे पिता के साथ हुई, यह स्थिति तुम्हारे दादा के साथ हुई, यह स्थिति तुम्हारे पूर्वजों के साथ हुई। इसलिये हुई कि उन्होंने क्षण मात्र भी रूक कर सोचा नहीं कि मेरे जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य क्या है? और यदि सोचा भी तो उनको गति और लक्ष्य का रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं मिला। इसलिये मैंने तुम्हें कहा कि जब कभी तुम्हारे जीवन में सौभाग्य उदय हो, जब कभी गुरू आकर के खड़े हो जायें इस पगडंडी पर कहीं मिल जाये। जीवन के किसी भी भाग में मिल जाये उस समय एक विस्फोट सा होगा, जब तुम उनके चरणों को पकड़ सको, वह एक क्रांतिकारी कदम होगा। जब तुम उनसे मिल सकोगे। वह जीवन की एक चिंगारी होगी। जब उनकी भावनाओं से तुम्हारे हृदय में एक रोशनी पैदा हो सकेगी और जब ऐसा हो सकेगा तो जीवन का एक अर्थ बनेगा, जीवन का एक चिंतन बनेगा। जीवन की एक विचारधारा बनेगी और इसीलिये उस दिन से तुम्हारा एक नया रास्ता बनेगा। उस दिन से तुम्हारा जीवन एक नई दिशा की ओर बढ़ेगा। उसी दिन से तुम्हारे जीवन का एक नवीन स्वर्णिम अध्याय शुरू होता है, प्रारम्भ होता है और वह जीवन मृत्यु की ओर नहीं हो सकता।
मृत्योर्मा अमृतं गमय
मृत्यु से अमृत्यु की ओर जाने की क्रिया गुरू सिखाता है। मृत्यु का रास्ता तो तुम अपने आप ही सीखे हुए हो। मरघट में सोने की क्रिया तो तुम्हें स्वतः ही ज्ञात है। उस चिता पर कफन ओढ़ कर सोने की क्रिया तुम चाहो, नहीं चाहो लोग तुम्हें सुला ही देंगे। मगर मृत्यु से अमृत्यु की ओर जाने की क्रिया बिरले लोग ही सिखा सकते है। ऐसे लोग जो स्वयं ब्रह्म से साक्षात्कार कर चुके हों जो ब्रह्म से हट कर के आगे बढ़ते हुए पूर्ण अमृत्यु की ओर बढ़े हुए होते है। मृत्यु उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती, मृत्यु उनके सामने खड़ी नहीं हो सकती, मृत्यु के पंजे उनके ऊपर झपट्टा नहीं मार सकते, काल उनका अहित नहीं कर सकता। वह जीवन में अजेय बन सकता है। क्योंकि उनको उस तपस्वी के प्राणों से चिंतन मिलता है। उनका संबंध उस चेतना से बनता है, उस प्राणश्चचेतना से बनता है, उस सूर्य से बनता जो हजार-हजार गुना प्रकाशवान है। जो केवल मनुष्य नहीं है वह ब्रह्म है, वह विष्णु है, वह साक्षात शिव है। वह अपने आप में पूर्ण ब्रह्म है और पूर्ण ब्रह्म का अंश बनने की क्रिया जीवन की विशिष्टतम क्रिया है और विशिष्टतम क्रिया के तुम अंग बन जाते हो और अंग बनना जीवन का एक श्रृंगार है। इसीलिये मैंने कहा कि तुम्हारे जीवन में एक स्टेज, एक स्थिति ऐसी आती है प्रत्येक के जीवन में आती है मगर अधिकतर लोग भूल जाते है मुझे यह व्यक्ति मिला, क्या यह गुरू बन सकता है? है कि नहीं है? और अधिकतर लोग पांखडियों के चक्कर में पड़ जाते हैं उन भगवे कपड़ों के चक्कर में पड़ जाते हैं। उन लम्बी जटाओं और दाढ़ियों के बीच में फंस जाते हैं। वे गुरू नहीं बन सकते हैं वे ढोंगी है पांखडी है, साधु नहीं हैं, संन्यासी नहीं है। उनके पास कुछ देने के लिये है ही नहीं, वे तो खुद भिक्षुक है, तुम से मांग रहे हैं। तुम से पैसे मांगेगे, कपड़ा मांगेगे, तुम से गुरू दक्षिणा मांगेगे। ऐसे लोगों के पास कुछ देने के लिये नहीं होता। जिनके पास देने के लिये होता है वह अपने आप में अभीष्ट, अपनी स्थिति में होता है। क्योंकि वह जीवन का पाथेय, अपनी स्थिति में होता है। क्योंकि वह जीवन का पाथेय होता है। हिमालय खुद पहुंच कर के किसी से प्रार्थना नहीं करता, हिमालय अपनी जगह पर अडिग है, हिमालय अपनी ऊँचाई पर अडिग है, अपने जीवन की पूर्णता पर अडिग है। क्योंकि वह जीवन का श्रृंगार है, पृथ्वी का एक श्रृंगार है। पृथ्वी का नहीं देवताओं काश्रृंगार है और देवताओं के श्रृंगार पर पहुँचने से एक अपूर्व और अद्वितीय शांति प्राप्त होती है। एक अहसास होता है कि हम हिमालय के गर्भ में पवित्रता का बोध पैदा होता है इसीलिये की वो हिमालय है और ठीक यह स्थिति मनुष्य की बनती है। जब मनुष्य उस गुरू से मिलता है, उस गुरू से साक्षात्कार करता है। उस गुरू के पास पहुँचने की क्रिया करता है और सबसे बड़ी बात यह होती है कि उस गुरू के चरणों को पकड़ लेता है। जिसको पकड़ने से जीवन में उच्चता का रास्ता मिलता है और जब यह रास्ता मिलता है तब वह एक नवीन पगडंडी पर बढ़ जाता है। उस पगडंडी में जीवन के सारे क्रियाकलाप तो है और जीवन का लक्ष्य और चिन्तन भी स्पष्ट है। उनको मालूम है कि इस पगडंडी पर चलने से मरघट प्राप्त नहीं होगा। इस पगडंडी पर चलने से श्मशान प्राप्त नहीं होगा। इस पगडंडी पर मृत्यु झपट्टा नहीं मार सकेगी। इस पगडंडी पर काल की काली छाया नहीं पड़ सकेगी। यह पगडंडी उस स्वर्णिम प्रभात की ओर जाती है। जहां एकदम ज्ञान का प्रकाश फैलता है, वह पगडंडी वहां जाती है, जहां आत्मा में ब्रह्म चैतन्य पैदा होता है। यह पगडंडी वहा जाती है जहां जीवन की पूर्णता, जीवन का अभीष्ट, जीवन का लक्ष्य होता है। यह पगडंडी वहा जाती है जहां आत्मा का परमात्मा से संबंध होता है और यह पगडंडी उस जगह पर जाती है जहां उपनिषद्कारों ने कहा हैं
पूर्णमद: पूर्णमिदं
हम शून्य हैं हमारे जीवन में कोई क्रिया नहीं है, हमारे जीवन में अभीष्ट और कोई लक्ष्य नहीं है। मैं तो एक मिट्टी का लोदा हूं। मुझे यह भी ज्ञात नहीं है कि मेरे जीवन का चिन्तन क्या है? और वह गुरू उस पगड़डी पर गतिशील करके यह समझा देता है कि इस पगडंडी पर तुम्हें गतिशील होना है, इस पगडंडी पर तुम्हें बढ़ना है। मगर ऐसी स्थिति में तुम भूल मत जाना कि तुम उनके पीछे रह सको ऐसा नहीं हो कि गुरू आगे बढ़ जाये तुम पीछे रह जाओं, ऐसा नहीं हो तुम उनके पांवों को छोड़ दो। क्योंकि मौत बार-बार तुम्हारे मनुष्य जीवन को बदलने की कोशिश करेगी। बार-बार काल चक्र तुम्हारे विचारों को गतिशील करने की कोशिश करेगा। बार-बार समय तुम्हें इस रास्ते से भटकाने की कोशिश करेगा और वे शत्रु जो मृत्यु रूपी शत्रु है जो मृत्यु के पथ पर अग्रसर है, जो काल के ग्रास में खड़े हुए है। वे तुम्हारे मां-बाप के रूप में भी हो सकते है। भाई और बहन के रूप में भी हो सकते है, सगे और साथी के रूप में भी हो सकते हैं। वो सब बार-बार यहीं कहेंगे कि कहां जा रहे हो, क्या कर रहे हो? ये कौन सा रास्ता है? तुम्हें कमाना चाहिये, व्यापार करना चाहिये, अपने जीवन में लक्ष्य प्राप्त करना चाहिये। चार संतान पैदा करना चाहिये। तुम्हारे मरने के बाद तुम्हें पानी कौन देगा और मैं पूछता हूं कि सूरदास को मरने के बाद पानी किसने दिया, कबीर के मरने के बाद पानी किसने दिया? वशिष्ठ के मरने के बाद पानी किसने दिया? विश्वामित्र को मरने के बाद उसको पानी उसके पुत्र ने नहीं दिया उनकी चेतनाओं ने दिया। उनको दिया उनके शिष्यों ने, उनको दिया उनके जीवन की पूर्णताओं ने और जो पूर्णता प्राप्त कर सकता है और जो जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है वह अपने आप में ही पूर्ण होता है। वह श्राद्ध करने की क्रिया का चिन्तन नहीं करता, वह मृत्यु के स्थिति में नहीं है। उसके जीवन में मृत्यु आ ही नहीं सकती और वह जीवन की पूर्णता है और जहां जीवन की पूर्णता है वह अपने आप में जीवन की उच्चतम स्थिति है।
इसीलिये तो मैं कहता हूँ कि तुम्हारे जीवन में ऐसे क्रांतिकारी क्षण आयेंगे, आते हैं। मगर उस समय तुम्हारे शत्रु भी तुम्हारे सामने खड़े होते हैं। वह शत्रु तुम्हारी पत्नी के रूप में आकर के खड़े होते हैं, वह शत्रु तुम्हारे पति के रूप में भी आकर खड़े हो सकते हैं, वह मां और बाप के रूप में आ सकते है। किसी सामाजिक स्वरूप में आ सकते हैं, आपके अभाव के रूप में आ सकते हैं, किसी भी रूप में शत्रु तो आकर खड़े होंगे ही। मनुष्य एक है पांच सौ शत्रु तुम्हारे बीच में खड़े हैं। मगर जो मर्द हैं, जो हिम्मतवान है, जो क्षमतावान है, जो साहसवान है, जो ताकतवान है वह उस पगडंडी पर मजबूती से पांव बढ़ाता है। उसके पांव रूकते नहीं है। क्योंकि उसके साथ एक चेतना है, एक प्राण है, एक विचारधारा है। अपने आप में एक अडिग क्षण है जिस क्षण की अंगुली पकड़ कर उस मनुष्य की अंगुली पकड़ कर, उस गुरू की अंगुली पकड़ कर एक नई पगडंडी पर चलता है, उस पगडंडी को साधना कहा गया है। उस नई पगडंडी को स्वर्णिम प्रभात कहा जाता है। उस नई पगडंडी को जीवन की चेतना कहा जाता है और उस पगडंडी पर हम जिसकी अंगुली पकड़ कर आगे चलते है। वह एक सामान्य मनुष्य नहीं है। वह जीवन की एक उच्चतम स्थिति क्रिया है। वह जीवन का एक ऐसा रास्ता है, वह जीवन की ऐसी पूर्णता है जिसको शास्त्रों ने ‘पूर्णमदः’ कहा है। जिसे शास्त्रों ने गुरू कहा है, जिसे शास्त्रों ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश और शिवमय कहा है। जो वास्तव में ही समस्त शास्त्रों का सारभूत सत्य है। क्योंकि शास्त्रों ने न ब्रह्म की पूजा की, न विष्णु की, न रूद्र की, न शंकर की, न देवताओं की पूजा की। शास्त्र, जहां शास्त्र है, जहां उपनिषद् है उन्होंने केवल गुरू की ही पूजा की और यदि गुरू की पूजा की तो वे जरूर ज्यादा चिन्तनशील थे। वे ज्यादा ज्ञानवान थे, वे समझ सकते थे इस मनुष्य को पूर्णता की ओर अग्रसर करने में कोई देवता साथ नहीं हो सकता। न वायु, न अग्नि, न देवता, न इन्द्र, न वरूण, न यम, न कुबेर और कुछ नहीं केवल एक मात्र गुरू ही जीवन को पूर्णता दे सकता है और बिना पूर्णता के इस जीवन का कोई अर्थ भी नहीं है, जीवन का कोई लक्ष्य भी नहीं है। इसीलिये मैं कहता हूं जहा अगर पूर्णता दिखाई दें, जहां तुम्हें गुरू दिखाई दें, जहां तुम उससे भेंट कर सको। तुम्हारा उद्देश्य केवल एक ही हो कि सब कुछ छोड़ कर तुम्हें उनके चरण पकड़ लेना है, उसमें लिपट जाना है। अपने आपको उसमें प्रतिबद्ध करना है। जिस प्रकार से बेल एक पेड़ को लिपट कर के एकाकार हो जाती है, जिस प्रकार सुगन्ध वायु के साथ एकाकार हो जाती है। ठीक उसी प्रकार से उस गुरू के प्राणों के साथ स्वर्णिम प्रभात प्राप्त कर सकोगे। जीवन का एक उद्देश्य प्राप्त कर सकोंगे, एक नई पगडंडी पर बढ़ सकोगे और वह पगडंडी अमृत्यु की ओर जाती है। वह पगडंडी अमृत की ओर जाती है, वह पगडंडी पूर्णता की ओर जाती है, वह पगडंडी वहां पहुंचती है जहां जीवन का अपने आप में अपूर्व अखण्ड आनन्द है।
ब्रह्मानन्दं परम सुखदम् केवलं ज्ञान मूर्तिं
द्वन्द्वातीवं गगन सदृषं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सव्रधी साक्षिभूतं,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरू तन्नमामि।।
वह अपने आप में समाधि की क्रिया है, जीवन की पूर्णता की क्रिया है, कल्याणमय क्रिया है। जिसके माध्यम से तुम हजारों लोगों को रास्ता दिखा सकते हो, हजारों-हजारों लोगों को आगे बढ़ा सकते हो। एक नया चिन्तन दे सकते हो, आगे बढ़ने वाले व्यक्तियों का मार्गदर्शन कर सकते हो। वास्तव में यह जीवन की पूर्णता है। इसीलिये मैं कहता हूं कि यह क्षण और ऐसा क्षण तुम्हारे जीवन में जब भी आये तुम उस क्षण को चूकना मत क्योंकि क्षण को चूकना जीवन को चूकना है। क्षण को चूकना मृत्यु का ग्रास बनना है, क्षण को चूकना काल की छाया में लिप्त हो जाना है और क्षण को चूकना अपने आप को जीवन भर के लिये चूकना है। इसीलिये मैं कह रहा हूं कि वह क्षण तुम्हारे जीवन का स्वर्णिम प्रभात है, वह क्षण जीवन का पाथेय है, वह क्षण तुम्हारे जीवन की श्रेष्ठता है। जिस क्षण को गुरू और शिष्य का पार्श्वमिलन कहा जाता है और यहीं जीवन की तुम्हारे जीवन की, और तुम्हारे इस नारकीय जीवन की और तुम्हारे इस देहम्य जीवन की एक अद्भूत आश्चर्यजनक क्षण की स्थिति है। यह विस्फोट है तुम्हारी जिन्दगी का, तुम्हारे प्राणों का विस्फोट है, तुम्हारे चेतना का विस्फोट है और विस्फोट तुम्हारे जीवन में हो और इसलिये हो कि इस विस्फोट का आनन्द तुम्हारे पिता नहीं ले पाये, तुम्हारे दादा नहीं ले पायें, तुम्हारे परदादा नहीं ले पाये, तुम्हारे पूर्वज इस विस्फोट का आनन्द नहीं ले पाये और बिना विस्फोट के जीवन में पूर्णता नहीं आ सकती। बिना विस्फोट के जीवन का आनन्द और क्षण की स्थिति प्राप्त नहीं हो सकती। जीवन का आनन्द तो शिष्य बनने में है, जीवन का आनन्द तो गुरू के चरणों को पकड़ने में है, जीवन का आनन्द तो उस छायादार पेड़ की तरह है जहां पेड़ के नीचे बैठकर एक अद्भूत आश्चर्यजनक अद्वितीय शांति मिलती है। उस शांति को उस आनन्द को बिरले ही प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये ‘शिष्य को भी बिरला ही कहा गया है।’ शिष्य को श्रेष्ठतम स्थिति कहा गया है और वह शिष्य तब बन सकता है जब उसमें एक चेतना पैदा हो यह शिष्य की उस समय की स्थिति बनती है जब उसके सामने गुरू उपस्थित होते हो और वह समझ जाता हो, पहचान लेता हो और तुम्हारे जीवन में ऐसे गुरू प्राप्त होते है, ऐसे क्षण आते हैं इसीलिये मैंने कहा कि ‘जीवन को क्षण कहा गया है’ और वह जीवन का क्षण तुम्हारे जिन्दगी में कभी भी आ सकता है। हो सकता है पन्द्रह साल बाद आये या हो सकता है तुम्हारे बाल उम्र में आये। पर जब भी एक क्षण आये वह क्षण तुम्हारा है। वहीं जीवन का प्रारम्भ है उसी समय से तुम अपने आप में ‘पुर्नजन्म’ लेते हो। इसीलिये कहा गया है
जन्मना जाते शूद्रः संस्काराद्विज उच्चते
जन्म से तो तुम शूद्र हो ही, शास्त्र कह रहे है जन्मना जाति शूद्र। जन्म तो शूद्र है ही क्योंकि शूद्र को उच्चता का कोई ज्ञान नहीं होता। मल-मूत्र का कोई ज्ञान नहीं होता, पवित्रता-अपवित्रता का कोई ज्ञान नहीं होता। तुम्हें भी ज्ञान नहीं है। मगर तुम्हें जब संस्कारित किया जाता है, जब तुम्हें दीक्षा दी जाती है, जब तुम गुरू के पास बैठते हो, जब गुरू तुम्हारे सिर पर हाथ रखता है, जब गुरू अहसास करता है कि यह मेरा शिष्य है और जब गुरू इस बात को स्वीकार करता है कि तुम मेरे शिष्य हो।
द्विज उच्चते
तब तुम्हारा दूसरी बार जन्म होता है। द्विज दूसरी बार जन्म होना है। वह जन्म तुम्हारे जीवन की सार्थकता है। पहला जन्म मृत्यु की ओर अग्रसर होता है, दूसरा जन्म अमृत्यु की ओर अग्रसर होता है। पहला जन्म विषय वस्तुओं की ओर अग्रसर होता है, दूसरा जन्म अपने जीवन की पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। पहला जन्म छल, झूठ, असत्य, व्याभिचार को जन्म देता है। दूसरा जन्म जीवन के आनन्द और पूर्णता की ओर, श्रेष्ठता की ओर, अद्वितीयता की ओर उस स्टेज को प्राप्त करने के लिये उच्चकोटि के संन्यासी और योगी, उच्चकोटि के साधु और चिन्तक, विचारक उस श्रेष्ठतम उस क्षण का इन्तजार करते रहते हैं। ऐसा जीवन में क्षण हो, ऐसा विस्फोट हो, ऐसे प्राणों में चेतना हो और जीवन में ऐसे प्राणों की चेतना जीवन का आनन्द और जीवन की श्रेष्ठतम स्थिति गुरू और शिष्य के पार्श्व मिलन में है। जब गुरू अपने आप को पूर्ण रूप से शिष्य के जीवन में, प्राणों में उतार देता है और शिष्य के प्राणों को पूर्ण रूप से अपने आप में आत्मसात् कर लेता है और आत्मसात् करने की क्रिया जीवन की श्रेष्ठतम क्रिया है और वह क्रिया तुम्हारे जीवन में बने, वह क्षण तुम्हारे जीवन में आये उस क्षण को, उस विशिष्ट स्थिति को, उस जीवन के चिन्तन को तुम्हारे सामने साकार रूप में उपस्थित हो सकें। ऐसा क्षण जीवन का मधुरतम, आनन्ददायक, अद्वितीय, श्रेष्ठतम क्षण होता है और मैं सोचता हूं कि ऐसा क्षण तुम्हारे जीवन में जिस समय भी आयेगा, जिस समय भी तुम अपने मां-बाप, भाई-बहन, अपने पुत्र-पौत्र, बंधु-बांधव, उस व्याभिचार, उस चिन्तन को छोड़ करके एक क्षण सोचोगे कि मुझे किस रास्ते पर बढ़ना है और उस पगडंडी पर वह क्षण जिस समय भी तुम्हें गतिशील कर सकेगा। उस समय जीवन की पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकोगे और यह जीवन की ओर पूर्णतः अग्रसर होने की क्रिया ठीक वैसी ही है जैसे नदी का अपने आप में समुद्र के अन्दर विलय हो जाने की क्रिया नदी जब पहाड़ से निकलती है उसमें एक ही विचार एक ही चिन्तन, एक ही धारणा, एक ही ध्यान होता है कि मुझे तीव्रता के साथ उस समुद्र में विसर्जित हो जाना है और विसर्जित हो जाने की क्रिया में पहाड़ों की ओर से निकलती हुई बहुत तेजी से साथ गतिशील होती है और वह अपने आप में जाकर समुद्र में विलीन हो जाती है। अपूर्व अद्वितीय शांति प्राप्त हो जाती है। ऐसी शांति सिर्फ गुरू से ही मिलती है।
अब मैं छठे शरीर के सम्बन्ध में कुछ कहूंगा और छठे शरीर के बारे में जिन लोगों ने और शास्त्रों ने जो कुछ कहा उन शास्त्रकारों के पास उनका खुद का ज्ञान नहीं था। अभी-अभी तुम्हें कहा कि तुम नदी और मैं समुंद्र हूँ क्योंकि मैं तुम्हारा गुरू हूँ, क्योंकि मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैंने तुम्हें शिष्यता दी है क्योंकि मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैंने तुम्हें शिष्यता दी है क्योंकि मैं इस बात को स्वीकार करता हूं, मैंने तुम्हें दीक्षा दी है। यह भी मैं स्वीकार करता हूं, मैंने तुम्हें जन्म दिया है, अपना शिष्य बनाया है, तुम्हारे प्राणों में चेतना दी है, तुम्हें गुरू मंत्र दिया है, तुम्हें जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य समझाया है इसीलिये तुम्हें मैंने नये सिरे से जन्म दिया है और अगर जन्म दिया है तो जीवन का एक और उद्देश्य है कि तुम्हारा शरीर पूर्णतः विषैला है, तुम्हारे खून में कोई चेतना नहीं है, तुम्हारे खून में कोई शुद्धता नहीं है, तुम्हारे खून में पवित्रता है नहीं क्योंकि वह खून मेरा खून नहीं है। वह तुम्हारे पिता का खून है। वह तुम्हारे पिता का भी खून नहीं है, वह पिछली पच्चीस पीढ़ीयों का खून है, वह रक्त वैसा है तुम्हारी धमनियों में वैसा खून बह रहा है जिसमें झूठ, छल, कपट और असत्य के अलावा कुछ है ही नहीं और जब तक वह खून अपने आप में शुद्ध नहीं हो सकेगा। जब तक उस खून को शुद्ध नहीं कर सकेंगे तो उस जीवन का आनन्द ले नहीं सकोगे और इसलिये दीक्षाओं के द्वारा तुम्हारे जीवन के उस खून को, उस रक्त को, उस जीवन के अन्दर के मल-मूत्र, छल, झूठ और कपट को दूर करना चाहता हूं और वह दूर हो सकता है, ‘केवल गुरू मंत्र के द्वारा’।
क्योंकि उस गुरू मंत्र को जीवन की श्रेष्ठता कहा गया है। कठोपनिषद में कहा गया है।
पूर्णत्वां पूर्ण मदेव रूपं
गुरू मंत्र रूपं, परमेष्व देवं।
जीवन के सारे मंत्र-तंत्र योग सब व्यर्थ है। उससे कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता। अगर कुछ प्राप्त हो सकता है तो जीवन की पवित्रता प्राप्त हो सकती है और वह जीवन की पवित्रता, वह जीवन की दिव्यता, वह जीवन की आत्मा का प्रकाश और आत्मा का विस्फोट ‘केवल गुरू मंत्र के द्वारा ही हो सकता है।’ इसलिये जब तुम्हें गुरू मंत्र दें, जब तुम्हें गुरूमुखी नाम दे। तब तुम्हें सतत् और निरन्तर गुरू मंत्र जाप करना है। गुरू मंत्र जाप करना कोई क्रिया नहीं है, गुरू मंत्र जाप करना तुम्हारे पूर्ण नस-नाड़ियों को संवेदनशील बनाना है, गुरू मंत्र जाप तुम्हारे अन्दर के छल, झूठ, कपट को निकालने की क्रिया है, गुरू मंत्र जाप तुम्हारे रक्त को शुद्धता देने की क्रिया है और सही अर्थो में कहा जाये तो गुरू मंत्र जाप उस पगडंडी पर गतिशील होने की क्रिया है। जिस पगड़डी पर चल कर के तुम मृत्यु से अमृत्यु की ओर गतिशील हो सकते हो और इसलिये मैंने कहा कि मैं अपनी बाहें फैलाते हुए तुम्हारे पास खड़ा हूं। जिस तरह से समुंद्र अपने पूर्ण वक्षस्थल को फैलाये हुये उन नदियों का स्वागत करने के लिये खड़ा है और नदी, पहाड़ों से नीचे उतरती है टकराती हुई, ठोकरें खाती हुई, पछाड़ खाती हुई, ऊपर से गिरती हुई, घसटती हुई, गांव को उजाड़ती हुई क्योंकि उसमें आग है, एक चेतना है, एक विस्फोट है, उसकी एक भावना है, एक चिन्तन है और तेजी के साथ बढ़ती है और वहीं बढ़ती है जहां से प्रारम्भ हुई है। क्योंकि समुंद्र में जब गर्मी पैदा होती है, सूर्य की प्रखर किरणें पड़ती है जब उसमें से भाप बनती है और भाप ऊपर उठती हुई बादल बनते हैं। मगर वह बादल बनने के बावजूद भी, वह बादल जानता है, बादल में वह जो बूंद है उसे यह स्मृति है कि मैं समुद्र की बूंद हूं। मेरा कोई चारा नहीं हैं, क्योंकि उसको चारों तरफ से हवा घेरे हुये है और वह निरन्तर डांवा-डोल सी हवाओं के साथ भटकती रहती है। भटकती हुई पछाड़ खाती हुई, चलती हुई दौड़ती हुई उसका कोई रास्ता नहीं है। उसका कोई लक्ष्य नहीं है, उसको पता ही नहीं वो कहां है और ठीक बीच में उनको मिल जाते गुरू, एक पहाड़, एक हिमालय और उससे टकराती है टकराती है तो विस्फोट हो जाता है और वह बादल अपने आप में वापिस बूंद के रूप में बदल जाता है। परिवर्तन हो जाती है, वापिस अपने मूल स्वरूप में आ जाती है। जिस मूल स्वरूप से निकली थी और मूल स्वरूप मे आने के बावजूद भी वह भूलती नहीं है कि मैं, मेरा जन्म, मेरा अंश, मेरा मूल स्वरूप कहा है। मैं कहां से प्रारम्भ हुई हूं और वह आगे की ओर गतिशील होती है।
मगर उसके बीच में सैकड़ों बाधाऐं, सैकड़ों अड़चनें है, सैकड़ों कठिनाइयां है, सैकड़ों बीच में रोड़े है, पत्थर है, नदियां है, नालें है, उसके बीच में खड़े है, उसके बीच में सैकड़ों रूकावटे है, बाधाएं है, अड़चने है, परेशानियां है मगर वो रूक नहीं सकती क्योंकि उसको अपना अभीष्ट लक्ष्य याद है और निरन्तर दौड़ती हुई, बूंद से बूंद मिलती हुई अपने जीवन को चेतना देती हुई बराबर आगे बढ़ती रहती है। उसके बीच में पशु भी आ जाये तो परवाह नहीं है, उसके बीच में मनुष्य आ जाये तो भी परवाह नहीं है, गांव के गांव बहा देती है और बहुत तेजी के साथ बढ़ती हुई, निरन्तर बढ़ती रहती है और जिस क्षण वह समुद्र में मिल जाती है। उसको अपूर्व शांति मिल जाती है। अद्वितीय आनन्द अनुभूति होने लग जाती है, एहसास होने लग जाता है कि जहां से मैं निकली हूं, वहां वापस आकर मिल गई हूँ और जहां मिल गई वहां मैं अपने आप में पूर्ण बन गई।
तुम मेरे शिष्य हो, तुम मेरे प्राणों का अंश हो, तुम मेरे प्राणों की चेतना हो। तुम्हारा जन्म पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी, पिछले जन्म में भी तुम मेरे शिष्य थे और उसके पहले जन्म में भी तुम मेरे शिष्य ही थे। मैं तुमसे बहुत अच्छी तरह से परिचित हूं, तुम शायद मुझसे परिचित नहीं हो, तुम शायद मुझे नहीं जानते हो, तुम शायद मेरे जीवन को नहीं पहचान सकते हो। मगर मैं तुम्हारे पुराने पच्चीस जन्मों का साक्षी हूँ। क्योंकि बुद्ध के बाद में मैं अपने आपको पच्चीसों वर्षो का साक्षीभूत स्वरूप रहा हूं। इन पच्चीस में तुम कम से कम पच्चीस बार मेरे सामने आये हो, पच्चीस बार मैंने तुम्हें पहिचाना है, पच्चीस बार मैंने तुम्हें ललकारा है, आवास दी है, चेतना दी है। तुम जिस पथ पर गतिशील थे, पगडंडी पर चल रहे थे, मैंने तुम्हें रोका है। क्योंकि मेरा उद्देश्य, मेरा लक्ष्य था तुम भटक रहे हो, उस बादल की तरह, जिसका कोई आधार नहीं है, तुम्हें उस हिमालय से टकराना है। मैं खड़ा हूं हिमालय की तरह , तुम मुझसे टकराओंगे तो एक बूंद बन सकोगे। मगर बीच में सैकड़ों हवाएं, मां-बाप, भाई-बहन, पत्नी, पुत्रों के रूप में ये हवायें तुम्हें फिर उस हिमालय से टकराने के पहले, दूसरी और भटका देती है। एक ऐसी जगह भटका देती है जहां रेगिस्तान हो और जब रेगिस्तान में बूंद गिर जाती है तो उस रेत में वह बूंद गिर के अपने आप को समाप्त कर देती है। काल के ग्रास में समा जाती है और तुम्हें मैं यह कह रहा हूं कि यह रास्ता तुम्हारा नहीं है, तुम मेरी तरफ आओ। तुम्हें मेरे से टकराना है। जब तुम मेरे से टकराओंगे, तब मैं तुम्हें बूंद बना सकूंगा।
इसलिये मैंने तुम्हें कहा कि मैं तुम्हारे पिछले पच्चीस जीवन का साक्षी हूँ। बुद्ध के बाद पहली बार तुम्हें वापिस नहीं देखा। बुद्ध के बाद तो पच्चीस जन्म बीत चुके है, पच्चीस सौ वर्ष बीत चुके है। और पच्चीस सौ वर्ष में तुम्हारा पच्चीस जीवन का इतिहास मेरे सामने साकार खड़ा है और तुमने जिस बार, जितनी बार भी जन्म लिया है। हर बार तुम्हें ललकारा है, हर बार तुम्हें आवाज दी है, हर बार तुम्हें चेतना दी है, हर बार तुम्हें ज्ञान और प्राणश्चचेतना दी है, हर बार तुम्हें शिष्य बनाया है, हर बार तुम्हें समझाया है कि तुम्हें मनुष्य बनकर के समाप्त नहीं होना है। हर बार तुम्हें समझाया है कि तुम्हें उस ओर गतिशील होना है जिस तरफ हिमालय है और तुम रेगिस्तान में जाकर गिर जाते हो। कभी तुम पत्नी के मोह में गिर जाते हो, कभी तुम पुत्र के मोह में गिर जाते हो, कभी तुम जैसलमेर के रेगिस्तान में जाकर गिर जाते हो, कभी तुम अफ्रिका के जंगलों में जाकर गिर जाते हो और वह गिर जाना मृत्यु के ग्रास में जाना है। वह गिर जाना कुछ भी प्राप्त नहीं हो जाना है, वह गिर जाना जीवन की श्रेष्ठता नहीं है। टकराना और उस हिमालय से टकराना ही जीवन की पूर्णता है इसलिये जब मैं तुम्हें आवाज देता हूँ तब मुझे मालूम है तुम्हारे जीवन का लक्ष्य और पगडंडी कौनसी है। उस पगडंडी में तुम्हें गतिशील करता हूँ और इसलिये मैं कह रहा हूं कि तुम्हें अपने जीवन में रूकना नहीं है, तुम्हें अपने जीवन में एक क्षण भी विचार नहीं करना है। क्योंकि जीवन बहुत छोटा-सा बच गया है और पगडंडी बहुत लम्बी है। हिमालय से पूरे समुद्र तक की यात्रा, उस गंगोत्री से समुद्र तक मिल जाने की क्रिया, हजारों मील लम्बी हैं। उस हजारों मील लम्बी यात्रा में धीरे-धीरे चलने से समुद्र नहीं मिल सकता। क्योंकि तुम अगर धीरे-धीरे चलोगे तो बीच में कहीं छूट जाओगे और अगर वह नदी बीच में कही छूट गई तो उस नदी का, उस जीवन का कोई महत्त्व नहीं है। नदी के जीवन की पूर्णता तो समुद्र में विसर्जित हो जाने की क्रिया है। तभी तो वह पूर्णता प्राप्त कर सकेगी और इसलिये मैं कह रहा हूं कि तुम्हें धीरे-धीरे नहीं चलना है। तुम्हें बहुत तेजी के साथ बढ़ना है और उस तेजी के साथ बीच में जितने भी कंकड़ आयें, पत्थर आये, धोखे हों, पहाड़ हो, छोटी-छोटी पगडण्डियां हों, झरनें हों जो कुछ भी हैं वें बाधाएं आज भी तुम्हारे सामने हैं। उन बाधाओं को पार करते हुए तुम जब गतिशील बनोगे, उन बाधाओं को पार करते हुए नदी जब समुद्र की ओर गतिशील होगी और जब तुम बढ़ोगे और जिससे तुम अपने आप मुझमें विसर्जित हो जाओंगे, लीन हो जाओंगे। अपने प्राणों को मेरे प्राणों में समर्पित कर सकोंगे। अपने आप में आत्मसात् कर सकोगे। तब तुम वापिस मेरे अंश से पैदा हो करके, वापिस मेरे अंश में पूर्णता प्राप्त कर सकोगे और यह जीवन का लक्ष्य, जीवन का आनन्द, जीवन की चेतना है।
इसलिये मैं उस प्रकार का गुरू नहीं हूं जो केवल तुम्हें उपदेश देना चाहता है। मैं उस प्रकार का गुरू भी नहीं हूं जो भगवे कपड़े पहिन कर घूमना चाहता हूं। मै उस प्रकार का गुरू भी बनना नहीं चाहता कि मेरे पीछे हजारों- हजारों शिष्य भटके। मैं तो खुद भटके हुओं को बिल्कुल सही रास्ता दिखाने के लिये तटस्थ खड़ा हूं। इसीलिये मैं कह रहा हूं कि तुम भटक रहे हो। इसलिये बता रहा हूं कि तुम्हारे मेरे संबंध प्रेम के संबंध है, आत्मा के संबंध है, प्राणों के संबंध हैं। क्योंकि तुम मेरे भाई नहीं हो, तुम्हारा मेरा शारीरिक संबंध तो है ही नहीं। ना तुम मेरे बेटे हो, ना तुम मेरे पिता हो, ना तुम मेरे भाई, ना तुम मेरी बहन हो, मेरा तुम्हारा संबंध तो है ही नहीं। तुम मेरे प्राणों के एक अंश हो, तुम मेरे प्राणों के अंशीभूत स्वरूप हो और जब तुम प्राणों के अंशीभूत स्वरूप हो और जब तुम्हें मैं भटकते हुए देखता हूं, और जब मैं देखता हूं कि तुम रेगिस्तान की ओर जाती हुई एक बूंद हो तब मुझे तुम्हें आवाज देनी पड़ती है। तब तुम्हें याद और स्मरण कराना पड़ता है और तुम एक क्षण रूक कर के सुनते भी हो, हर बार तुमने सुना है, हर बार तुमने एहसास किया है मगर फिर तुम उस हवा के साथ बहकर के उस रेगिस्तान में जाकर मिल जाते हो और सूख जाते हो, समाप्त हो जाते हो और एक बार फिर मैं सोचने लग जाता हूं कि यह बूंद क्यों नहीं समझ रही है कि हिमालय से टकराने में ही जीवन का आनन्द है। पूर्णता की ओर अग्रसर होने में ही आनन्द है। मगर हर बार यह बूंद रेगिस्तान में गिरी है। हर बार यह बूंद मृत्यु की ग्रास बनी है। इस बार मैं ऐसा नहीं होनें दूंगा, इस बार यह क्रिया वापिस नहीं होगी, इस बार तुम मृत्यु की ओर अग्रसर नहीं हो सकोंगें। इस बार तुम्हें काल नहीं छीन सकेगा, इस बार मृत्यु तुम्हें झपटा नहीं मार सकेगी। क्योंकि इस बार तुम मेरी अंगुली नहीं पकड़ रहे हो, मैं तुम्हारा हाथ पकडूंगा। इस बार मैं तुम्हें इस पगडंड़ी पर घसीट कर लेके चलूंगा। इस बार मैं तुम्हें बता सकूंगा कि तुम्हारे जीवन का रास्ता यह है और इस बीच में जो भी अड़चन, जो भी बाधाएं, जो भी कांटे, जो भी पथरीला रास्ता या जो भी कठिनायां आयेगी, मैं उसका सामना करते हुये, घसीटते हुए तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा। क्योंकि ये बार-बार का पैदा होना, बार-बार का मरना तुम्हारे जीवन का आनन्द और चेतना नहीं है और अगर ऐसा बार-बार हो रहा है तो मुझे बार-बार समझाने की क्रिया करनी पड़ती है और समय कम है।
इसलिये मैं पहली बार तुम्हें एक नवीन चेतना दे रहा हूं, पहली बार एक नवीन ज्ञान दे रहा हूं, पहली बार एक नवीन भावना दे रहा हूं कि तुम्हें इस बार रूकना नहीं है, इस बार मोह में पड़ना नहीं है, इस बार जीवन में अपने आप को पहिचानना है, इस बार तुम्हें रेगिस्तान की और भटकना नहीं है, इस बार पहाड़ से टकराना है, पहाड़ से नहीं टकराना है हिमालय से टकराना है और इस बार मैं तुम्हें उस रास्ते पर बढ़ने ही नहीं दूंगा। बढ़ने देना ही नहीं चाहूंगा क्योंकि इस बार मैं खुद तुम्हारे पूर्ण रक्त को अपने आप में शुद्ध करने की क्रिया करना चाहता हूं और करूंगा और कर रहा हूं। इसलिये की पहली बार मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा है, पहली बार मैंने तुम्हें अपनी ओर खींचा है, पहली बार तुम्हें अपने जीवन की ओर अग्रसर करने की पूर्ण कोशिश की है क्योंकि पच्चीस जीवन तुम्हारे मेरे सामने बिखरे हुए पड़े है। पच्चीस बार मैंने तुम्हें, तुम्हारे ऊपर मृत्यु को झपट्टा मारते हुये देखा है। पच्चीस बार तुम्हें काल के अन्दर समाप्त होते हुये देखा है और पच्चीस जन्मों में मैने तुम्हें पांच सौ बार आवाज दी है और मैं समझ रहा हूं कि तुम बहरे हो, तुम मेरी आवाज सुन नहीं पा रहे हो। तुम सुन कर के अनसुनी कर देते हो। क्योंकि चारों तरफ की हवायें, चारों तरफ की बाधाएं, चारों तरफ की अड़चने, चारों तरफ की कठिनाइयां तुम्हें जीवन में आनन्द प्रदान करने की ओर अग्रसर नहीं कर रही है।
इसलिये अब बार-बार यह क्रिया नहीं होगी आज मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि गलती सुधारी जा सकती है और उस गलती को सुधारना मेरा कर्त्तव्य हैं क्योंकि तुम मेरे प्राणों के अंश हो, तुम जैसे भी हो पच्चीस जन्मों से संभाल रहा हूं, आगे भी संभालता रहूंगा, मैं तुम सब को पूर्ण आशीर्वाद देता हूं जीवन में पूर्णता की ओर अग्रसर होने वाली नदी बनो और मुझमें समा जाओ।
परम् पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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