





यः गुरू सः शिव प्रोक्तः या शिवः सः गुरूः स्मृतः तस्या भेदेन भावेन स यापि नरकां गतिम्
शिष्य को चाहिये कि गुरू को शिव ही समझे, तथा उसी भावना से उसका चिंतन, पूजन करे।
ऐसा व्यक्ति शिष्य नहीं बन सकता और सफलता नहीं प्राप्त कर सकता जो शिव और गुरू में भेद करता हो, या जो गुरू में श्रद्धा को खो दे। श्रद्धा चूकी वहीं शिष्य का सारा ज्ञान चूका।
जहां गुरू के बारे में कठोर नियम बनाये गये हैं कि वह अवश्य ही अपना ज्ञान शिष्य को पूरी तरह से दे वहीं शिष्य के लिये भी नियम बनाये गये है कि वह पूर्ण श्रद्धा और सम्मान, समर्पण और श्रेष्ठता के साथ निरन्तर, जीवन पर्यन्त गुरू कार्य में संलग्न रहे।
अणु से विराट बनाने की क्रिया केवल गुरू जानता है, मनुष्य से देवता की क्रिया केवल गुरू जानता है, मूलाधार से सहस्त्रार तक पहुंचाने की विद्या केवल गुरू जानता है। इसीलिये जीवन का आधार केवल गुरू है।
प्रेम भगवान और भक्त का आंतरिक सम्बन्ध है, एक पूर्ण हृदय का हृदय से सम्बन्ध है, प्राणों का, प्राणों से सम्बन्ध है, उसमें वासना नहीं है। गुरू या ईश्वर से एकाकार होने के लिये मन में प्रेम का बीज बोना पड़ता है।
ध्यान लगाने से आत्मा परमात्मा में लीन नहीं हो सकती, मंत्र जप से भी ऐसा संभव नहीं, क्योंकि आत्मा का परमात्मा तक पहुंचने का जो रास्ता है वह वेदना का है, प्रेम के सागर में डूब जाने का है, तो ही जीवन में सब कुछ प्राप्त हो सकता है।
ज्ञान, चेतना, सुख, सौभाग्य, आनन्द, मस्ती, भौतिक सफलता, मगर तब भी यह जरूरी नहीं है कि प्रेम प्राप्त हो।
शिष्य यदि सच्चे हृदय से पुकार करे तो ऐसा होता ही नहीं कि उसका स्वर सद्गुरू तक न पहुंचे। उसकी आवाज गुरू तक पहुंचती ही है, इसमें कभी संदेह नहीं होना चाहिये।
मैं तुम्हें समुद्र में छलांग लगाने की क्रिया सिखा रहा हूं। मैं तुम्हें वह क्रिया सिखा रहा हूं कि तुम आत्म साक्षात्कार कर सको, यही प्रेम की पूर्णता है।
जिस क्षण गुरू यह निश्चय कर लेता है कि अब मुझे इस शिष्य को उठाकर परम अवस्था तक पहुँचा देना है तो फिर भले ही शिष्य में कितने ही विकार हों, गुरू सीधे उसे ध्यान के महासागर में उतार देता है, परन्तु इसके लिये आवश्यक है कि गुरू से पूर्ण प्रेम हो।
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