





जन्माष्टमी के दिन कृष्ण पूजन सामान्य विधि से तो सभी करते है, लेकिन मांत्रोक्त विशेष साधना करने से कार्य में विशेष सफलता प्राप्त होती है। साधकों को चाहिये की वे पूरे परिवार के साथ कृष्ण पूजन तो अवश्य करें लेकिन उसके साथ ही साथ मांत्रोक्त साधना भी करें। अलग-अलग कार्यो के लिये अलग-अलग प्रकार की साधनायें आवश्यक है। उन साधनाओं में पूजाविधि और अन्य सामग्री समान है।
जन्माष्टमी के रात्रि को अथवा उस रात्रि को संकल्प लेकर किसी भी शुक्रवार को यह साधनायें सम्पन्न की जा सकती है। कृष्ण साधना का मूल मंत्र ‘ह्रीं श्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपी-जन-वल्लभाय स्वाहा’ है। इस मंत्र का जप करने से पहले मांत्रोक्त विधि से संकल्प, न्यास, इत्यादि आवश्यक है।
सबसे पहले अपने दाहिने हाथ में जल लेकर कृष्ण पूजन में दिया गया संकल्प करें। गुरूपूजन-गणपति पूजन करें और उसके पश्चात् ऋषिन्यास, अंगन्यास, मंत्रन्यास सम्पन्न करें। कृष्ण की सभी साधनाओं में यह न्यास विधि समान रहेगी।
मांत्रोक्त पूजन विधान
ऋषिन्यास
शिरसि ब्रह्मणे ऋषये नमः मुखे गायत्रीछन्दसे नमः।
हृदि श्रीकृष्णाय देवतायै नमः।
गुह्ये क्लीं बीजाय नमः।
पादयोः स्वाहाशक्ते नमः
करन्यास
ह्रीं श्रीं क्लीं अंगुष्ठभ्यां नमः। कृष्णाय
तर्जनीभ्यां स्वाहा। गोविन्दाय
मध्यमाभ्यां वषट्। गोपी-जन
अनामिकाभ्यां हुं। वल्लभाय कनिष्ठाभ्यां
वौषट्। स्वाहा करतल-कर पृष्ठाभ्यां फट्।
अंगन्यास
ह्रीं श्रीं क्लीं हृदयाय नमः। कृष्णाय
शिरसे स्वाहा। गोविन्दाय शिखायैं
वषट्। गोपी-जन कवचाय हुं।
वल्लभाय नेत्रत्रयाय वौषट्। स्वाहा
अस्त्राय फट्।
मन्त्र न्यास
मूर्ध्नि ह्रीं नमः। ललाटे श्रीं नमः। भ्रू मध्ये क्लीं
नमः। नेत्रयोः कृंनमः। कर्णयोः ष्णां नमः। न सो य नमः।
वदने गो नमः। चिबुके वि नमः। कण्ठे न्दा नमः।
दोमू ले यं नमः। हृदि गों नमः। उदरे पीं नमः।
नाभौ जं नमः। लिंगे नं नमः। आधारे रं नमः।
कटयां ल्लं नमः। जान्वोः भां नमः।
जघ्डयोः यं नमः। गुल्फयोः स्वां नमः। नाभौ क्लीं नमः।
लिग्डें कृं नमः। आधारे ष्णां नमः। कटयां यं नमः।
जान्वोः गों नमः। जन्द्ययोः विं नमः। गुल्फयोः न्दां नमः।
पादयोः यं नमः। मूध्नि गों नमः। कपाले पीं नमः।
भू्र-मध्ये जं नमः। नेत्रयोः नं नमः। कर्णयोः वं नमः।
नसोः ल्लं नमः। वदने भां नमः। चिबुके यं नमः।
कण्ठे स्वां नमः दोर्मूले हां नमः।
संहार न्यास
पादयोः ह्रीं नमः। गुल्फयोः श्रीं नमः। जघ्डयोः क्लीं नमः।
जान्वोः कृं नमः। कटयां ष्णां नमः। आधारे यं नमः।
लिग्डे़ गों नमः। नाभौ विं नमः। उदरे न्दां नमः।
हृदि यं नमः। वदने नं नमः। नसोः वं नमः।
कर्णयोः ल्लं नमः। नेत्रयोः भां नमः। भ्रू-मध्ये यं नमः।
ललाटे स्वां नमः। मस्तके हां नमः।
इस प्रकार मंत्र न्यास सम्पन्न करने के पश्चात् विभिन्न कार्यो के लिये विभिन्न प्रकार की साधनायें सम्पन्न की जा सकती है।
यह साधना प्रातः काल ब्रह्म मुहुर्त में ही सम्पन्न की जाती है, स्नान इत्यादि कर उपर दिये गये न्यास विधि से न्यास सम्पन्न करें। पूर्व दिशा की ओर मुँह कर अपने सामने ‘कृष्ण विद्यासिद्ध यंत्र’ स्थापित कर दें। अक्षत, कुमकुम, गुलाल इत्यादि से षोडषोपचार पूजन करें। तदन्तर निम्न ध्यान मंत्र ‘कृष्ण का विग्रह अथवा चित्र’ अपने सामने रख कर करें।
ध्यान
वामोध्व्र-हस्ते दधतं, विद्या-सर्वस्व-पुस्तकम्। अक्ष मालां च दक्षोर्ध्वे, स्फटिकी मातृका मयीम्।।
शब्द ब्रह्म मयं वेणुमधः पाणि द्वयेरितम्। गायन्तं पीत वसनं, श्यामलं कोमलच्छविम्।।
वहिवर्ह कृतोत्तंसे, सर्वज्ञां सर्व वेदिभिः।
उपसितं मुनि गणैरूप तिष्ठेद्वरिं सदा।।
अर्थ-चतुर्भुज हर अपने बाँए ऊपरी हाथ में ‘विद्या-सर्वस्व-पुस्तक’, दाएं ऊपरी हाथ में मातृका वर्ण मयी और स्फटिक की बनी ‘अक्षमाला’ नीचे के दोनों हाथों में शब्द-ब्रह्म मयी ‘वंशी’ लिये है। वे पीताम्बर धारी, श्याम वर्ण और कोमल शरीर तथा सिर पर मोर पंख से विभूषित हैं। सभी वेदों के जानने वाले सर्व ज्ञाता मुनियों द्वारा उनकी उपासना की जाती है। ऐसी मनोहर मूर्ति श्रीकृष्ण को मैं नमन करता हूँ।
इसके पश्चात् ‘स्फटिक माला’ से निम्न मंत्र का जप ग्यारह माला करें और नित्य एक माला मंत्र जप अवश्य करें।
इस प्रकार इक्कीस दिन तक साधना करने से साधक को ज्ञानबुद्धि, बुद्धिवृद्धि, मेधावृद्धि और दूरदृष्टि प्राप्त होती है। ऐसे साधक का वचन कभी मिथ्या नहीं जाता है।
इस साधना में भी न्यास इत्यादि ऊपर दी गई विधि से सम्पन्न करें। अपने सामने कृष्ण चित्र, ‘कृष्ण मनोकामना पूर्ति यंत्र’ स्थापित कर उसका पूजन करें, और निम्न ध्यान मंत्र से दोनों हाथ जोड़कर कृष्ण वंदन करें।
ध्यान
कलाय कुसुम श्यां, वृन्दावन गतं हरिम।
गोप गोपी गवावीतं, पीत वस्त्र युगावृतम्।।
नानालंकार सुभगं, कौस्तुभाद्भसि वक्षसम।
सनकादि मुनि श्रेष्ठः, संस्तुतं परया मुदा।।
शंख चक्र लसद् बाहुं, वेणु हस्त द्वयेरितम।
अर्थ -कलाये पुष्प जैसे सुन्दर श्याम वर्ण, वृन्दावन धाम में विराजमान, गोप-गोपीयों और गौ इत्यादि से वेष्ठित पीताम्बरधारी भगवान श्रीकृष्ण जो विभिन्न आभूषणों से शोभायमान है, जिनका वक्षस्थल कौस्तुभ मणि से प्रकाशित है, सनकादि श्रेष्ठ मुनि उनकी स्तुति कर रहे है, श्रीकृष्ण के एक हाथ में शंख और दूसरे में चक्र है और अन्य दो हाथों से बंसी वादन कर रहें है, ऐसे मनोहररूप भगवान श्रीकृष्ण का मैं नमन करता हूं।
उसके पश्चात् ‘मणिमाला’ से निम्न दो मंत्रों का जप करें। दोनों मंत्रो की पांच-पांच मंत्र जप आवश्यक हैं-
इस साधना के प्रारम्भ में अपनी तीन मनोकामनाएं मन ही मन बोल दें अथवा कागज पर लिख कर ‘मनोकामना पूर्ति कृष्ण यंत्र’ के नीचे रख दें और ग्यारह दिन तक रोज दोनों मंत्र की एक माला का जप अवश्य करें। चालीस दिन बीतते-बीतते एक मनोकामना अवश्य ही पूर्ण हो जाती है।
यदि प्रेम में सफलता प्राप्त नहीं हो रही हो, विवाह में विलम्ब हो रहा हो, गृहस्थ जीवन में तनाव रहता हो तो इन सभी स्थितियों में यह साधना अवश्य सम्पन्न करनी चाहिये।
यह आवश्यक नहीं है कि यह साधना जन्माष्टमी के दिन ही प्रारम्भ की जाय। किसी भी शुक्रवार को यह साधना प्रारम्भ की जा सकती है। अपने सामने ‘श्रीकृष्ण वशीकरण यंत्र’ स्थापित करें, यदि कृष्ण और रूकमणी का चित्र प्राप्त हो सके तो उसे भी स्थापित करें। और ऊपर दिये गये न्यास इत्यादि को सम्पन्न कर निम्न ध्यान मंत्र बोले-
ध्यान मंत्र
वदभाभ्य हस्ताभ्यां, श्लिष्यन्तं स्वांगे प्रिये।
पह्मोत्पल करे ताभ्यां, श्लिष्टं चक्र गदोज्जवलम्।।
वर और अभय मुद्रा युक्त और अपने हाथों में चक्र गदाधारी भगवान श्रीकृष्ण प्रिया रूकमणी के साथ बिराजमान है, उन भगवान श्रीकृष्ण और रूकमणी का ध्यान करते हुये मैं प्रार्थना करता हूं कि मेरे जीवन में भी ऐसी ही प्रेम वर्षा हो फिर ‘आकर्षण माला’ से निम्न मंत्र का जप सम्पन्न करें। यह मंत्र ग्यारह माला चार शुक्रवार तक करना अनिवार्य है।
इस प्रकार चार शुक्रवार को यह साधना सम्पन्न कर यंत्र को अपने पास ही रखे और माला स्वयं धारण कर लें, विवाह संबंधित बाधाये तो यह साधना से दूर होती हैं उसके अलावा सम्मोहन एवं आकर्षण भी प्राप्त अवश्य होता है।
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