





जिसे अनिर्वचनीय का बोध हो वह क्या करे? कैसे कहे? अकथ्य को कैसे कथन बनाए?
जो निकटतम संभावना है, वह है कि गाए, नाचे, गुनगुनाए। इकतारा बजाए, कि ढोलक पर थाप दे, कि पैरों में घुंघरू बांधे, कि बांसुरी पर अनिर्वचनीय को उठाने की असफल चेष्टा करे।
इसलिये संतों ने गीतों में अभिव्यक्ति की है। नहीं कि वे कवि थे, बल्कि इसलिये कि कविता करीब मालूम पड़ती है। शायद जो गद्य में न कहा जा सके, पद्य में उसकी झलक आ जाये। जो व्याकरण में न बंधता हो, वह शायद संगीत में थोड़ा सा आभास दे जाये।
इसे स्मरण रखना। संतों को कवि ही समझ लिया तो भूल हो जायेगी। संतों ने काव्य में कुछ कहा है, जो काव्य के भी अतीत है- जिसे कहा ही नहीं जा सकता। निश्चित ही, गद्य की बजाय पद्य को संतों ने चुना, क्योंकि गद्य और भी दूर पड़ जाता है, गणित और भी दूर पड़ जाता है। काव्य चुना, क्योंकि काव्य मध्य में है। एक तरफ व्याख्य विज्ञान का लोक है, दूसरी तरफ अव्याख्य धर्म का जगत है, और काव्य दोनों के मध्य की कड़ी है। शायद इस मध्य की कड़ी से किसी के हृदय की वीणा बज उठे, इसलिये संतों ने गीत गाए। गीत गाने को नहीं गाए, तुम्हारे भीतर सोये गीत को जगाने को गाये। उनकी भाषा पर मत जाना, उनके भाव पर जाना। भाषा तो उनकी अटपटी होगी। जरूरी भी नहीं कि संत सभी पढ़े-लिखे थे। बहुत तो उनमें गैर-पढ़े-लिखे थे।
लेकिन पढ़े-लिखे होने से सत्य का कोई संबंध भी नहीं है, गैर-पढ़े-लिखे होने से कोई बाधा भी नहीं है। परमात्मा दोनों को समान रूप से उपलब्ध है। सच तो यह है, पढ़े-लिखे को शायद थोड़ी बाधा हो, उसका पढ़ा-लिखापन ही अवरोध बन जाये। गैर-पढ़ा-लिखा थोड़ा ज्यादा भोला,थोड़ा ज्यादा निर्दोष। उसके निर्दोष चित्त में, उसके भोले हृदय में सरलता से प्रतिबिंब बन सकता है। कम होगा विकृत प्रतिबिंब, क्योंकि विकृत करने वाला तर्क मौजूद न होगा। झलक ज्यादा अनुकूल होगी सत्य के, क्योंकि विचारों का जाल न होगा जो झलक को अस्तव्यस्त करें। सीधा-सीधा सत्य झलकेगा, क्योंकि दर्पण पर कोई शिक्षा की धूल नहीं होगी।
तो भाषा की चिंता मत करना, व्याकरण का हिसाब मत बिठाना। छंद भी उनके ठीक हैं या नहीं, इस विवेचना में भी न पड़ना। क्योंकि यह तो चूकना हो जायेगा। यह तो व्यर्थ में उलझना हो जायेगा। यह तो गये फूल को देखने- और फूल के रंग, और फूल के रसायन, और फूल किस जाति का है और किस देश से आया है- इस सारे इतिहास में उलझ गये, और भूल ही गये कि फूल तो उसके सौंदर्य में है।
गुलाब कहां से आया, क्या फर्क पड़ता? ऐतिहासिक चित्त इसी चिंता में पड़ जाता है- कि गुलाब कहां से आया? आया तो बाहर से है, उसका नाम ही कह रहा है। नाम संस्कृत का नहीं है, हिंदी का नहीं है। गुल का अर्थ होता है, फूल, आब का अर्थ होता हैः शान। फूल की शान! आया तो ईरान से है, बहुत लंबी यात्रा की है। लेकिन यह भी पता हो कि ईरान से आया है गुलाब, तो गुलाब के सौंदर्य का थोड़े ही इससे कुछ अनुभव होगा! गुलाब शब्द की व्याख्या भी हो गई तो भी गुलाब से तो वंचित ही रह जाओगे। गुलाब की पंखुड़ियां तोड़ ली, पंखुड़ियां गिन ली, वजन नाप लिया, तोड़-फोड़ करके सारे रसायन खोज लिये-किन-किन से मिल कर बना है, कितनी मिट्टी, कितना पानी, कितना सूरज- तो भी तो गुलाब के सौंदर्य से वंचित रह जाओगे। ये गुलाब को जानने के ढंग नही हैं।
गुलाब की पहचान तो उन आंखों में होती है, जो गुलाब के इतिहास में नहीं उलझतीं, गुलाब की भाषा में नहीं उलझती, गुलाब के विज्ञान में नहीं उलझतीं-जो सीधे-सीधे, नाचते हुये गुलाब के साथ नाच सकता है, जो सूरज में उठे गुलाब के साथ उसके सौंदर्य को पी सकता है, जो भूल ही सकता है अपने को गुलाब में, डुबा सकता है अपने को गुलाब में और गुलाब को अपने में डूब जाने दे सकता है- वहीं जानेगा।
संतों के वचन गुलाब के फूल हैं। विज्ञान, गणित, तर्क और भाषा की कसौटी पर उन्हें मत कसना, नहीं तो अन्याय होगा। वे तो वंदनायें है, अर्चनाएं है, प्रार्थनाएं हैं। वे तो आकाश की तरफ उठी हुई आंखे हैं वे तो पृथ्वी की आकांक्षायें हैं- चांद-तारों को छू लेने के लिये। उस अभीप्सा को पहचाना। वह अभीप्सा समझ में आने लगे तो संतों का हृदय तुम्हारे सामने खुलेगा।
और संतो के हृदय में द्वार है परमात्मा का। तुम्हारे सब मंदिर, तुम्हारे गुरूद्वारे, तुम्हारे गिरजे परमात्मा के द्वार नहीं है। लेकिन संतो के हृदय में निश्चित द्वार है।
ऐसे ही एक अद्भूत संत के वचनों में हम आज उतरते हैं। फूलों की तरह लेना। संभाल कर! नाजुक बात है। खयाल रखना, फूलों को, सोना जिस पत्थर पर कसते हैं, उस पर नहीं कसा जाता है। फूलों को सोने की कसने की कसौटी पर कस-कस कर मत देखना, नहीं तो सभी फूल गलत हो जायेंगे।
संत के साथ अन्याय मत करना, यह मेरी पहली प्रार्थना है। ये सीधे-सादे शब्द है, पर बड़े गहरे है। जितने सीधे-साधे है, उतने गहरे हैं।
जीवन भर भी तुम्हारी गायत्री हो जाये तो भी उस अनिर्वचनीय की व्याख्या नहीं होती! और सूरज भी तुम्हारी आरती का दीया बन जाये तो भी पूजा पूरी नहीं होती!
न उसे कभी कहा गया, न कभी उसे कभी कहा जा सकेगा, फिर भी बड़ी करूणा है संतों की कि अकथ्य को कथ्य बनाने की चेष्टा की है। जानते हुए, भलीभांति जानते हुए कि नहीं यह हुआ है, नहीं यह हो सकेगा, लेकिर फिर भी शायद कोई आतुर प्राण प्यास से भर उठे, शायद कोई सोई आत्मा पुकार से जग जाये। जानते हैं भलीभांति….
कौन बना पाया है परमात्मा के उस को? कौन बांध पाया है रंगों में, शब्दों में? कोई रेखाकृति आज तक बन नहीं पाई है।
भक्त जानता है अपनी असमर्थता को। संत पहचानता है अपनी दीनता को।
और परमात्मा ही पहचनता है भक्त की असमर्थता। और परमात्मा ही पहचानता है भक्त की अथक चेष्टा- नहीं जो कहा जा सकता है, उसे कहने की, नहीं जो बताया जा सकता है, उसे जताने की, नहीं जो बताया जा सकता, उसे बताने की।
इसलिये बड़ी सूक्ष्म प्रीति-भरी आंखे चाहिये। बड़ी सरल, निर्दोष, श्रद्धा-भरी बांहे चाहिये, तो ही आलिंगन हो सकेगा।
संत कहते हैः पहला नमन गुरू को। और गुरू को हरि कहते हैं।
यह दोनों अर्थो में सही है। पहला अर्थ कि गुरू भगवान है और दूसरा अर्थ कि भगवान ही गुरू हैं। गुरू से जो बोल जाता है, वह वही है जिसे तुम खोजने चले हो। वह तुम्हारे भीतर भी बैठा है उतना ही जितना गुरू के भीतर। लेकिन तुम्हें अभी बोध नहीं, तुम्हें अभी उसकी पहचान नहीं, गुरू के दर्पण में अपनी छवि को देख कर पहचान हो जायेगी। गुरू तुमसे वही कहता है जो तुम्हारे भीतर बैठा हरि भी तुमसे कहना चाहता है। मगर तुम सुनते नहीं। भीतर की नहीं सुनते तो शायद बाहर की सुन लो, बाहर की तुम्हारी आदत है। तुम्हारे कान बाहर की सुनने से परिचित है। तुम्हारी आंखे बाहर को देखने में निष्णात है। भीतर तो क्या देखोगे? भीतर तो आंख कैसे मोड़े, यह कला ही नहीं आती। और भीतर तो कैसे सुनोगे? इतना शोरगुल है सिर का, मस्तिष्क का कि वह धीमी-धीमी आवाज न मालूम कहां खो जायेगी!
बोलता तो तुम्हारे भीतर भी हरि है, लेकिन पहले तुम्हें बाहर के हरि को सुनना पड़े। थोड़ी पहचान होने लगे, थोड़ा संग-साथ होने लगे, लेकिन रस उभरने लगे, तो जो बाहर तुमने सुना है, एक दिन वही भीतर तुम्हें सुनाई पड़ जायेगा। चूंकि गुरू केवल वही कहता है जो तुम्हारे भीतर की अंतरात्मा कहना चाहती है, इसीलिये गुरू को हरि कहा और इसलिये हरि को गुरू कहा है।
संत कहते हैः नमन करता हूं, बार-बार नमन करता हूं।
नमन का अर्थ इतना ही नहीं होता कि किसी के चरणों में सिर झुका देना। नमन का अर्थ होता हैः किसी के चरणों में अपने को चढ़ा देना। यह सिर झुकाने की बात नहीं है, यह अहंकार विसर्जित कर देने की बात है।
….नमो नमो सब संत।
और जिस दिन समझ में आ जाती है बात, उस दिन बड़ी हैरानी होती है कि सभी संत यही कहते थे! कितने भेद-भाव माने थे, कितने विवाद थे, कितने वितंडा, कितने शास्त्रार्थ! पंडित जूझ रह हैं, मल्लयुद्ध में लगे हैं।
रत्ती भर भेद नहीं हैं। भेद हो नहीं सकता। सत्य एक है। उस सत्य को जान लेने वाले को ही हम संत कहते है। जो उस सत्य से एक हो गया, उसी को संत कहते है।
तो जिस दिन तुम्हें समझ में आ जायेगी बात तो तुम बाहर के गुरू में भगवान को देख सकोगे, भीतर के भगवान में गुरू को देख सकोगे- और सारे संतों में, बेशर्त! फिर यह भेद न करोगे कि कौन अपना, कौन पराया। सारे संतो में भी उसी एक अनुगूंज को सुन सकोगे।
कितनी ही हो वीणायें, संगीत एक है। और कितने ही हो दीप, प्रकाश एक है। और कितने ही हो फूल, सौंदर्य एक है। गुलाब में भी वहीं और जुही में भी वही, चंपा में भी वही और चमेली में भी वही। सौंदर्य एक है, अभिव्यक्तियां भिन्न हैं।
जिस दिन ऐसा दिखाई पड़ा कि बाहर भी वही, भीतर भी वही, और सारे संतों में भी वही- फिर अंततः यह भी दिखाई पड़ा कि जो संत नहीं है, उनमें भी वही। पहचान बढ़ती गई, गहरी होती चली गई।
…..नमो नमो भगवंत।
अब यह भी फिकर नहीं करता कि संत है कोई असंत है कोई, अच्छा है कि बुरा है कोई। पहले दिखाई पड़ा था कि फूलों में वही है, अब कांटों में भी वहीं दिखाई पड़ता है। हीरों में दिखाई पड़ा था, अब कंकड़-पत्थरों में भी वही दिखाई पड़ता है। अब कौन चिंता करे! अब कौन फिकर ले! अब तो सिर्फ वंदन करता हूँ- सभी दिशाओं में वंदन करता हूँ। अच्छी की तो बात ही छोड़ दो, बुरों में भी वहीं है। उसके अतिरिक्त कोई और है ही नहीं। इसलिये अब तो वंदन ही बचा। अब तो झुक-झुक पड़ता हूँ। अब तो वृक्ष हो तो, पत्थर हो तो, उसकी छवि हर जगह पहचान आ जाती है।
बड़ी खींचातानी में रहा हूं कि कौन गलत, कौन शुभ, कौन अशुभ, किस मंदिर जाऊं, किस मूर्ति की पूजा करू, किस शास्त्र को पकड़ूं, कौन सी नाव पर सवार होऊं, कैसे भवसागर पार होगा- बड़ी खींचतान थी!
लेकिन एक बार सद्गुरू का शब्द सुन लिया कि-
कि सारी खींचातान ही मिट गई, क्योंकि उस गुरू के एक शब्द में ही सारे गुरूओं के शब्द समाए हुए हैं। एक गुरू में सारे गुरू मौजूद हैं- जो हुए, जो है, जो होंगे। एक गुरू में सारे गुरू मौजूद हैं।
एक शब्द भी कान में पड़ जाये सत्य का, एक रोशनी की किरण प्रविष्ट हो जाये तुम्हारे अंधकारपूर्ण गृह में, तुम्हारे हृदय में एक चोट पड़ जाये, तुम्हारा हृदय झंकार उठे- एक बार सिर्फ, बस काफी है।
उसी क्षण मिट जाता है सारा अंधकार-भ्रम का, माया का, मोह का।
उसी क्षण उस महत पद का छूना हो जाता है, हाथ में आ जाता है, स्पर्श हो जाता है निर्वाण का।
सद्गुरू के शब्द तो वे ही हैं जो आज समाज के शब्द हैं। और कहना है उसे कुछ, जिसका समाज को कोई पता नहीं। भाषा तो उसकी वही है, जो सदियों-सदियों से चली आई है-जराजीर्ण, धूल, धूसरित। लेकिन कहना है उसे कुछ ऐसा नित-नूतन, जैसे सुबह की अभी ताजी-ताजी ओस, कि सुबह की सूरज की पहली-पहली किरण! पुराने शब्द बासे, सड़े-गले, सदियों-सदियों चले, थके-मांदे, उनमें उसे डालना है प्राण। उनमें उसे भरना है उस सत्य को जो अभी-अभी उसने जाना है- और जो सदा नया है और जो कभी पुराना नहीं पड़ता।
कुछ और नहीं किया गुरू ने-सोए को जगा दिया, सोए को झकझोर दिया। छिपा तो सबके भीतर वही है, चाहिये कि कोई तुम्हें झकझोर दे।
लेकिन तुम तो जाते भी हो मंदिर, तो सांत्वना की तलाश करते जाते हो, सत्य की तलाश करने नहीं, तुम तो जाते भी हो संतों के पास तो चाहते हो थोड़ी सी मीठी-मीठी बातें, कि तुम और सफलता से सपने देख सको। तुम जाते भी हो तो आशीष मांगने जाते हो कि तुम्हारे सपने पूरे हो जायें। और जो तुम्हें आशीष दे देते होंगे, वे तुम्हें प्रीतिकर भी लगते होंगे। और जो तुम्हारी पीठ ठोंक देते होंगे और कहते होंगेः तुम बड़े पुण्यात्मा हो! और कहते होंगे कि तुमने मंदिर बनाया, और धर्मशाला बनाई, और तुम कुंभ भी हो आये, अब और क्या करने को शेष है? परमात्मा तुमसे प्रसन्न है। तुम्हारा स्वर्ग निश्चित है।
जो तुमसे ऐसी झूठी बातें और व्यर्थ की बातें कह देते हो, वे तुम्हें प्रीतिकर भी लगते होंगे। झूठ अक्सर मीठे होते हैं। एक तो झूठ हैं, तो अगर कड़वे हो तो कौन स्वीकार करेगा? झूठ पर मिठास चढ़ानी पड़ती है। सांत्वना की मिठास। सत्य कड़वे होते हैं, क्योंकि सत्य तुम्हें सांत्वना नहीं देते, बल्कि तुम्हें जगाते हैं। और हो सकता है कि तुम अपनी नींद में बड़े प्यारे सपने देख रहे होओ, तो जगाने वाला दुश्मन मालूम पड़े।
सद्गुरू सदा ही कठोर मालूम पड़ेगा। सद्गुरू सदा ही तुम्हारी धारणाओं को तोड़ता मालूम पडे़गा। सद्गुरू सदा ही तुम्हारे मन को अस्तव्यस्त करता मालूम पड़ेगा, तुम्हारी अपेक्षाओं को छिन्न-भिन्न करता मालूम पड़ेगा। उसे करना ही होगा। उसकी अनुकंपा है कि करता है, क्योंकि तभी तुम जागोगे। भंग हो तुम्हारे स्वरूप, तो ही तुम जागोगे। नींद प्यारी लगती है, विश्राम मालूम होता है। जो भी जगायेगा वह दुश्मन मालूम होगा। पर बिना जगाए तुम्हें पता भी न चलेगा कि तुम कौन हो और कैसी अपूर्व तुम्हारी संपदा है!
हर हृदय में अपूर्व सुगंध भरी है, जरा संबंध जोड़ने की बात है। तुम कस्तूरी मृग हो-कस्तूरा हो। भागते फिरते, खोजते दूर-दूर। और जिस गंध की तलाश कर रहे हो, वह गंध तुम्हारे भीतर से ही उठ रही है। उस कस्तूरी के तुम मालिक हो। कस्तूरी कुंडल बसै! तुम्हारे भीतर बसी है। काई जगाए, कोई हिलाए, कोई तुम्हें सचेत करे। और जो भी तुम्हें सचेत करेगा वह तुम्हें नाराज करेगा। इतना स्मरण रहे तो सद्गुरू मिल जायेगा। इतना बोध रहे कि जो तुम्हें जगायेगा वह तुम्हें जरूर नाराज करेगा, तो सद्गुरू को खोजना कठिन नहीं होगा।
जो तुम्हें सांत्वना देते हो और तुम्हारे घावों को मलहम-पट्टी करते हों और तुम्हारे अंधेरे को छिपाते हों और तुम्होरे ऊपर रंग पोत देते हों, उनसे सावधान रहना। सांत्वना जहां से मिलती हो, समझ लेना कि वहां सद्गुरू नहीं है। सद्गुरू तो झकझोरेगा, उखाड़ देगा वहां से जहां तुम हो, क्योंकि नई तुम्हें भूमि देनी है और नया तुम्हें आकाश देना है।
और संत कहते हैः मैं चमत्कृत हूँ कि जागते ही सारे दुःख विलीन हो गये! मैं तो सोचता था कि एक-एक दुःख का इलाज करना होगा। क्रोध है तो इलाज करना होगा। लोभ है तो इलाज करना होगा। मोह है तो इलाज करना होगा। अहंकार है, यह है, वह है…. हजार रोग हैं, व्याधियां ही व्याधियां हैं। इतनी व्याधियों के लिये इतनी ही औषधियां खोजनी होंगी। लेकिन बस एक औषधि, और सारी व्याधियां मिट गई! क्योंकि जितने रोग है, वे सिर्फ हमारे स्वरूप है, उनकी कोई सचाई नहीं है।
पापी पाप का स्वप्न देख रहा है, पुण्यात्मा पुण्य का स्वप्न देख रहा है। जागा हुआ न तो पापी होता है, न पुण्यात्मा होता है। जागा हुआ तो सिर्फ जागा हुआ होता है, उसका कोई स्वप्न नहीं होता। चोर-चोर होने का स्वप्न देख रहा है और तुम्हारे तथाकथित साधु साधु होने का सपना देख रहे हैं। जागा हुआ न तो असाधु होता, न साधु होता, बस जागा हुआ होता है। और जागते ही सारे रोग मिट जाते हैं। एक समाधि सारी व्याधियों को ले जाती है।
हम वही हो सकते हैं जो हम हैं। हम वही हो सकते हैं जो हमारा स्वभाव है। पर हमें पता ही नहीं। अपना स्वभाव ही भूल गया, अपना स्परूप ही भूल गया- कि हमारी बड़ी क्षमता है, कि हमारे भीतर स्त्रष्टा का आवास है, कि परमात्मा ने हमें अपने रहने के लिये आवास चुना है।
कोरे आकाश को बैठे हुए मत देखते रहो, आकाश कुछ भी न करेगा। हाथ जोड़े हुए मंदिरों में प्रार्थनाएं मत करते रहो, इससे कुछ भी न होगा।
आकाश तो शून्य है, इसमें तुम्हें जागना होगा, निर्माण करना होगा, स्वयं को निखारना होगा, स्वयं की धूल झाड़नी होगी।
कौन होगा जो ऐसा तुमसे कहे? वही-जिसने फैलायें हो अपने पंख और जिसने आकाश की ऊंचाइयां जानी हो। वही-जिसने डुबकी मारी हो प्रशांतों में और गहराइयां पहचानी हों। वही- जिसके भीतर फूल खिले हो, जिसके भीतर मौन जगा हो। जिसने अपने भीतर परमात्मा को आलिंगन किया हो वहीं तुम्हें भी जगा सकता है।
तुम किनके पास भटक रहे हो? कृष्ण जिन्हें मिला नहीं,कृष्ण जिनके भीतर अभी जागा नहीं।
सद्गुरू सिद्धांत नहीं देता, सद्गुरू जागरण देता है। सद्गुरू शास्त्र नहीं देता, स्वबोध देता है। सद्गुरू क्रियाकांड नहीं देता, स्वानुभूति देता है, समाधि देता है।
ऐसे ही व्यर्थ के कामों में मत उलझे रहना। कोई धन इकट्ठा कर रहा है, कोई बड़े पद पर चढ़ा जा रहा है। सब व्यर्थ हो जायेगा। मौत आती ही होगी। मौत आयेगी, सब पानी फेर देगी तुम्हारे किये पर जिस काम पर मौत पानी फेद रे, उसको असली काज मत समझना।
यह मनुष्य का अद्भूत जीवन मिला है। असली काम कर लो। असली काम क्या है?
प्रभु का स्मरण कर लो। प्रभु के स्मरण की नाव पर सवार हो जाओ। इसके पहले कि मौत तुम्हें ले जाये, प्रभु की नाव पर सवार हो जाओं।
इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हें छहों दर्शन कंठस्थ हैं, कि तुम चारों वेद के पाठी हो। मौत इन सब बातों की चिंता नहीं करेगी।
सिर्फ एक चीज पर मौत का वश नहीं चलता-वह कृष्ण का तुम्हारे भीतर जग जाना, कृष्ण की सुरति पैदा हो जाना।
सब पर मौत का कब्जा है। सिर्फ कृष्ण अमृत है, बाकी सब मरणधर्मा है।
और कितना ही धन मिल जाये, कहां होती पूरी वासना! लगता है और-और। और कितना ही बड़ा पद हो, सीढ़ियों पर आगे और सोपान होते हैं। और कहीं भी पहुँच जाओं, दौड़ जारी रहती है, आपाधापी मिटती ही नहीं।
आदमी डरा-डरा रहता है, क्योंकि सभी तो अधूरा-अधूरा है। इस संसार में कभी कुछ पकता ही नहीं और मौत आ जाती है, कभी कुछ पूरा नहीं होता और मौत आ जाती है। इसलिये सब आपाधापी व्यर्थ है, सारा श्रम निरर्थक है। करना हो कुछ तो असली काज, असली काम कर लो।
जो संसारी में भी कृष्ण को ही देखता है, गृही में भी कृष्ण को ही देखता है, अगृही में भी, संन्यासी और संसारी में जिसे भेद ही नहीं है, जिसे दोनों में एक ही कृष्ण दिखाई पड़ता है, जिसे बस कृष्ण ही दिखाई पड़ता है।
बस मैं उसके ही चरणों की धूल हो जाऊं, इतना ही काफी है। बस इतनी आकांक्षा काफी है। जिसने कृष्ण को जाना हो, उसके चरण तुम्हारे हाथ में आ जायें तो कृष्ण तुम्हारे हाथ आ गये। जिसने कृष्ण को जाना हो, उसकी बात तुम्हारे कान में पड़ जाये तो कृष्ण की बात तुम्हारे कान में पड़ गई।
बस एक कृष्ण की स्मृति, और सारा अंधकार मिट जाता है- ऐसे जैसे कोई दीया जलाये और अंधकार मिट जाये!
इस बात को खूब ध्यान में रख लेना। तुम्हें बार-बार उलटी ही बात समझाई जाती रही है। तुम्हें निरंतर नीति की शिक्षा दी गई और धर्म से तुम्हें वंचित रखा गया है। नीति की इतनी शिक्षा दी गई कि धीरे-धीरे तुम नीति को ही धर्म समझने लगे हो।
नीति और धर्म बड़े विपरीत आयाम है। नीति का अर्थ होता हैः एक – एक बीमारी से लड़ो। नीति का अर्थ होता हैः क्रोध है तो अक्रोध साधो, और लोभ है तो अलोभ साधो, और आसक्ति है तो अनासक्ति साधो। हर बीमारी का इलाज अलग-अलग। और धर्म का अर्थ होता हैः सारी बीमारियों की जड़ को काट दो। जड़ है तुम्हारी सोई अवस्था, तुम्हारी मूर्च्छित अवस्था। उस जड़ को काट दो, जाग जाओ- और सारी बीमारियां तिरोहित हो जाती हैं।
नीति है अंधेरे से लड़ना। इधर से धकाओ, उधर से धकाओ। लेकिन अंधेरा कहीं धकाने से मिटता है? दीये को जलाओ! धर्म का अर्थ हैः दीये को जलाओ! अंधेरे की बात ही छोड़ो।
मुझसे लोग आकर पूछते हैः क्रोध कैसे मिटे? लोभ कैसे मिटे? कामवासना का क्या करें? और मैं उन सभी को एक ही उत्तर देता हूं, ध्यान करो।
एक दिन एक व्यक्ति ने पूछाः क्रोध कैसे मिटे?
मैनें कहाः ध्यान करो।
वह बैठा ही था, तभी दूसरे ने पूछा कि लोभ कैसे मिटे?
मैनें कहाः ध्यान करो।
पहला वाला बोला कि रूकें! यही तो आपने मुझे भी कहा है। और मेरी बीमारी क्रोध है और इसकी बीमारी लोभ है। इलाज एक कैसे हो सकता है?
नीति कितनी ही तर्कयुक्त मालूम हो, व्यर्थ है। नीति को साध कर कोई कभी नैतिक नहीं हो पाता। हां धर्म को जान कर लोग नैतिक हो जाते है। नैतिक व्यक्ति धार्मिक नहीं होता, धार्मिक व्यक्ति अनिवार्य रूप से नैतिक हो जाता है, स्वाभाविक रूप से नैतिक हो जाता है।
एक ही चीज करनी है-जागना है।
नींद क्या है? और जागना क्या है?
यह मैं-भाव, बस यह मैं-भाव हमारी निद्रा है, हमारी तंद्रा है, हमारी मुर्च्छा है। जिसने मैं-भाव छोड़ा वह जागा। इस मैं के कारण दो हो गयें जगत-प्रकृति और परमात्मा भिन्न मालूम हो रहे है, क्योंकि मैं बीच में खड़ा हूं।
मिट्टी के घड़े को ले जाओ और नदी में डूबा दो। मिट्टी के घड़े में पानी भर जायेगा। बाहर भी वही पानी है, भीतर भी वही पानी है, बीच में एक मिट्टी की दीवार खड़ी हो गई। अब घड़े का पानी अलग मालूम होता है, नदी का पानी अलग मालूम होता है। अभी-अभी एक थे, अब भी एक है, बस जरा सी घड़े की दीवार, पतली सी मिट्टी की दीवार।
बस ऐसी ही क्षीण सी अहंकार का एक भाव-दशा है जो हमें परमात्मा से अलग किये है। और हम बीच में खड़े है, इसलिये प्रकृति और परमात्मा अलग मालूम हो रहे हैं। जहां मैं गया वहां प्रकृति और परमात्मा भी एक ही हो जाते हैं।
याद आने लगे परमात्मा की ….अहंकार खोये तो ही याद आये। या तो मैं या तू, याद रखना। दोनों साथ नहीं रह सकते।
जो व्यक्ति सद्गुरू के संग न उठा-बैठा, जिस व्यक्ति ने सद्गुरू को न खोजा, जो व्यक्ति सद्गुरू की हवा में श्वास न लिया और जिसके हृदय में कृष्ण का नाम न जगा, कृष्ण का भाव न उठा, कृष्ण का संगीत न गूंजा-वह मरघट की भांति है।
वह जिंदा नहीं है, मरा ही हुआ है। उसके पास जिंदगी जैसा क्या है? बस चलती-फिरती एक लाश है।
उसके भीतर आत्मा नहीं बसती, , सिर्फ भूत समझो।
भूत बड़ा प्यारा शब्द है। इसका अर्थ होता हैः अतीत। इसीलिये तो कहते हैः भूतपर्व मंत्री! इस देश में बहुत भूत हैं- कोई भूतपर्व मंत्री है, कोई भूतपूर्व प्रधानमंत्री है, कोई भूतपर्व कुछ है, कोई कुछ है! भूतपर्व राष्ट्रपति! भूत ही भूत!
भूत का अर्थ होता हैः अतीत। जो बीत गया। जिस मनुष्य के भीतर सिर्फ अतीत ही अतीत और वर्तमान का कोई संस्पर्श नहीं है, वह भूत है। बस वह लग रहा है कि जी रहा है। उससे जरा दूर-दूर रहना और सावधान! कहीं लग-लगा न जाये।
और मन का ढंग ही एक है-अतीत। मन जीता ही अतीत में है। जो बीत गया, उसी को इकट्ठा करता रहता है। सारे कल जो बीत गए है, उनको इकट्ठा करता रहता है। मन है ही क्या सिवाय स्मृति के? और स्मृति यानी भूत।
अतीत से छोड़ो नाता, वर्तमान से जोड़ो। काश, एक क्षण को भी तुम्हारे भीतर भूत न रह जाये। भूत नहीं रहेगा तो उसकी छाया जो पड़ती है, भविष्य, वह भी नहीं रहेगी। भविष्य भूत की छाया है। भूत गया, भविष्य गया। तब रह जाता है शुद्ध वर्तमान। हीरे जैसा दमकता और चमकता यह क्षण! और इसी क्षण में से द्वार है परमात्मा का।
सत्संग का और कोई अर्थ नहीं होता है। सदगुरू के पास बैठने का और कोई अर्थ नहीं होता है। सद्गुरू के भीतर अब न भूत है, न भविष्य। सद्गुरू अब सिर्फ अभी और यही है। सद्गुरू शुद्ध वर्तमान है, न पीछे की तरफ देखता है, न आगे की तरफ, बस यहीं ठहरा हुआ है। इस क्षण के अतिरिक्त उसकी कोई और चिंता नहीं है।
और तुम जानते हो, अगर यही क्षण हो तो विचार नहीं हो सकते। विचार या तो अतीत के होते हैं या भविष्य के होते हैं। वर्तमान का कोई विचार ही नहीं होता। इस महत्त्वपूर्ण बात को कुंजी की तरह संभाल कर रखना। वर्तमान का कोई विचार नहीं होता। वर्तमान में कोई विचार नहीं होता। विचार ही बनता है, जब कोई चीज बीत जाती है। विचार बीते का होता है, व्यतीत का होता है, अतीत का होता है, जा चुका, उसकी रेखा छूट जाती है, लीक छूट जाती है, पद-चिन्ह छूट जाते हैं। या विचार भविष्य का होता है- जो होना चाहिये, जिसकी आकांक्षा है, अभीप्सा है, जिसकी वासना है। लेकिन वर्तमान का क्या विचार? वर्तमान निर्विचार होता है। और निर्विचार हो जाना ही सत्संग है। ऐसे किसी व्यक्ति के पास अगर बैठते रहे, बैठते रहे-जो निर्विचार है, जिसके भीतर सन्नाटा है और शून्य है-तो शून्य संक्रामक है। उसके पास बैठते-बैठते शून्य की बीमारी लग जायेगी। तुम्हारे भीतर भी सन्नाटा छाने लगेगा। तुम्हारे भीतर भी धीरे-धीरे शून्य की तरंगे उतरने लगेगी। जिसके साथ रहोगे वैसे हो जाओगे।
बगीचे से गुजरोगे, फूल न भी छुए, तो भी वस्त्रों में फूलों की गंध आ जायेगी। मेंहदी पीसोगे, मेंहदी हाथ में लगानी भी न थी, तो भी हाथ रंग जायेंगे।
सत्संग में बैठना, जहां फूल खिले वहां बैठना है। थोड़ी-बहुत गंध पकड़ ही जायेगी। तुम्हारे बावजूद पकड़ जायेगी। और वही गंध तुम्हें अपने भीतर की गंध के मूलस्त्रोत की स्मृति दिलायगी।
कैसे-कैसे खेल चल रहे है! किसी तरह प्रसिद्ध हो जाऊं, लोग मुझे जान लें, लोगों में नाम हो, प्रतिष्ठा हो- सब खेल हैं! तुम ही न रहोगे, तुम्हारा नाम रहा न रहा, क्या फर्क पड़ता है? तुम न रहोगे, दस-पांच जो तुम्हें याद करते थे, कल वे भी न रहेंगे। पहले तुम मिट जाओगे, फिर उन दस-पांच के मिटने के साथ तुम्हारी स्मृति भी मिट जायेगी।
कितने लोग इस जमीन पर रह चुके हैं तुमसे पहले, जरा उनकी याद करो। वैज्ञानिक कहते हैंः जिस जगह तुम बैठे हो वहां कम से कम दस आदमियों की लाशें गड़ी है। इतने लोग जमीन पर रह चुके हैं कि अब तो हर जगह मरघट है! बस्तियां कई बार बस चुकीं और उजड़ चुकी। कई बार मरघट बस्तियां बन गये और बस्तियां मरघट बन गई। मोहनजोदड़ो की खुदाई में सात पर्तें मिली। मोहनजोदड़ो सात बार बसा और सात बार उजड़ा। हजारों साल में ऐसा होता होगा। मगर कितनी बार मरघट बन गया और कितनी बार फिर बस गया! तुम मरघट जाने से डरते हो, डरने की कोई जरूरत नहीं, जहां तुम रह रहे हो वहां कई दफा मरघट रह चुका है। छोड़ो भय।
सारी पृथ्वी लाशों से भरी है। फिर भी खेल नहीं छूटते । खेल छूटेंगे भी नहीं, जब तक कि कृष्ण नाम का स्मरण न आ जाये। जब तक प्रभु की तलाश तुम्हारे प्राणों को न पकड़ ले, जब तक उसकी प्यास ही एकमात्र प्यास न हो जाये, तब तक खेल छूटेंगे भी नहीं। हां, उसकी प्यास पकड़े कि खेल अपने आप छूट जाते हैं।
कृष्ण याद कर लो, खेल अपने से छूट जाते है। छूट जाये ठीक, न छूटें ठीक। मगर इतना पक्का हो जाता है कि खेल खेल है, इतना मालूम हो जाता है। इतना मालूम हो गया, बात खत्म हो गई।
रामलीला में तुम राम बने हो तो कोई ऐसा थोड़े ही कि घर जाकर रोओगे कि अब सीता का क्या हो रहा होगा अशोक-वाटिका में! रामलीला में रोते फिरोगे, झाड़-झाड़ से पूछोगे कि ये झाड़, मेरी सीता कहां है? और जैसे ही पर्दा गिरा कि भागे घर की तरफ, क्योंकि वहां दूसरी सीता प्रतीक्षा कर रही है। और रात जब नींद लग जायेगी तो दूसरी सीता को भी भूल जाओगे, क्योंकि नींद में और हजार सीताएं हैं, जिनसे मिलना है। पर्दे पर पर्दे है, खेल पर खेल हैं।
नाटक में एक अभिनय कर लेते हो, ऐसा ही सारे जीवन को समझता है संन्यासी। जो अभिनय परमात्मा दे दे, कर लेता है। अगर उसने कहा कि चलो दुकानदार बनो, तो दुकानदार बन गये। और उसने कहा कि शिक्षक बनो, तो शिक्षक बन गये। उसने कहा कि स्टेशन मास्टर बन जाओ, तो स्टेशन मास्टर बन गये, ले ली झंडी और बताने लगे। मगर अगर एक बात याद बनी रहे कि खेल उसका, हम सिर्फ खेल खेल रहे हैं। जब उसका बुलावा आ जायेगा कि अब लौट आओ घर, पर्दा गिर जायेगा, घंटी बज जायेगी, घर वापस लौट जायेंगे।
खेल छोड़ने की ही बात नहीं है, खेल को खेल जानने में ही उसका छूट जाना है। जानना मुक्ति है। इसलिये मै तुमसे यह नहीं कहता कि तुम जहां हो वहां से भाग जाओ। क्योंकि अगर तुम भाग गये वहां से तो तुम भागने का खेल खेलोगे। तुम्हारे साथ बड़ी मुसीबत है। कुछ लोग गृहस्थी का खेल खेल रहे है, कुछ लोग संन्यास का खेल खेलने लगते हैं। अब जो पत्नी को छोड़ कर भागा है, उसे एक बात तो पक्की है कि वह यह नहीं मानता कि पत्नी के पास रहना खेल था। खेल था तो भागना क्या था? खेल होता तो भागना क्या था? खेल ही है तो जाना कहां है? तो बच्चे थे, पत्नी थी, द्वार, घर, सब ठीक था, खेल था, चुपचाप खेलता रहता। छोड़ कर भागा, तो एक बात तो पक्की है कि वह यह नहीं मानता कि पत्नी के पास रहना खेल था। खेल था तो भागना क्या था? खेल होता तो भागना क्या था? खेल ही है तो जाना कहां है? तो बच्चे थे, पत्नी थी, द्वार, घर, सब ठीक था, खेल था, चुपचाप खेलता रहता। छोड़ कर भागा, तो एक बात तो पक्की है कि उसने खेल को खेल न माना, बहुत असली मान लिया। अब यह भाग कर जायेगा कहां? वह जो असली मानने वाली बुद्धि है, वह तो साथ ही जायेगी न! मन तो छूट नहीं जायेगा। घर छूट जायेगा, पत्नी छूट जायेगी, मगर पत्नी और घर को असली मानने वाला मन-यह कहीं जाकर आश्रम बना लेगा तो आश्रम का खेल खेलेगा।
एक गांव में रामलीला हुई। लक्ष्मण जी बेहोश पड़े हैं, हनुमान जी गये है संजीवनी बूटी लेने। मिली नहीं तो पूरा पहाड़ लेकर आये। रामलीला का पहाड़! एक रस्सी पर सारा खेल बनाया गया था, क्योंकि उड़ते हुये आना है। तो रस्सी पर एक नकली पहाड़ लिये हनुमान जी आये। गांव की रामलीला! जिस चरखी पर रस्सी घूम रही थी, रस्सी और चरखी उलझ गई। गांठ न खुले। जनता अलग बेचैन। लक्ष्मण जी भी बीच-बीच में आंख खोल कर देख लें कि बड़ी देर हुई जा रही है। रामचन्द्र जी भी ऊपर की तरफ आंख उठा कर देखें और कहें कि हे हनुमान जी, कहां हो? जल्दी आओ, लक्ष्मण जी के प्राण संकट में पड़े है। हनुमान जी सब सुन रहे हैं, मगर बोलें तो क्या बोलें, क्योंकि व अटके हैं। किसी को कुछ न सूझा, मैनेजर घबड़ाहट में आ गया, उसने रस्सी काट दी। रस्सी काट दी तो हनुमान जी धड़ाम से पहाड़ सहित नीचे गिरे। गिरे तो भूल ही गये।
रामचन्द्र जी ने पूछा कि जड़ी-बूटी ले आये? लक्ष्मण जी मर रहे हैं।
हनुमान जी ने कहा भाड़ में गई जड़ी-बूटी। पहले यह बताओं रस्सी किसनी काटी?
ऊपर-ऊपर हो तो यही हालत होगी। ऊपर-ऊपर नहीं, रोम-रोम भिद जाये। नहीं तो जरा सा खरोंच दिया किसी ने कि फिर जाओगे। यह अंतर्तम में बैठ जाये बात कि यह जगत एक नाटक, एक लीला, एक खेल। फिर होशपूर्वक खेलते रहो खेल।
और जिन्होंने इस तरह राम के साथ अपने मन को एक कर लिया है कि अब अपना भेद ही नहीं मानते, उसका खेल है, खिलवाता है तो खेलते है, बुला लेगा तो चले जायेंगे, न अपना कुछ यहां है, न लाये, न कुछ ले जाना है-धन्य हैं वे लोग।
एक बार राम के साथ मन का मेल हो जाये, फिर अपना क्या है, फिर छोड़ना भी नहीं, फिर पकड़ना भी नहीं। फिर न कुछ त्याग है, न कुछ भोग है।
और जैसे ही यह पता चल जाता है कि मन राम में रम गया, कि सारे चोर भाग जाते हैं। भीतर के नगर में डुंडी पिट जाती है- कि अब भाग जाओ! अब यहां रहने में सार नहीं, मालिक आ गया! रोशनी आ गई। अंधेरा भाग जाता है।
फिर क्रोध करूणा हो जाती है, वासना प्रार्थना हो जाती है, काम राम हो जाता है, जो शत्रु थे वे मित्र हो जाते हैं। खूब प्यारी परिभाषा की है राम-राज्य की! इससे बाहर का कोई संबंध नहीं है।
भीतर मन राम के साथ एक हो गया….. एक तो है ही, बस जान लिया, प्रत्यभिज्ञा हो गई कि एक ही है- कि राम-राज्य हो गया! कि जीवन में फिर आनंद ही आनंद की वर्षा है! कि आ गया वसंत!
परम पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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