





जल में चन्द्रमा प्रतिबिम्ब पड़ता है। जल की हलचल के कारण वह प्रतिबिम्ब भी हलचल करता है, कम्पित होता है, किंतु वास्तविक चन्द्रमा पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। इसी तरह देहादि के धर्म, स्वयं में न होते हुये भी जीवात्मा उन्हें अपने में कल्पित कर लेता है, अन्यथा जीवात्मा तो निर्लेप है। जीवात्मा में देखे जाते हुऐ देहादि के धर्म-निष्काम भागवत-धर्म के अनुसरण से, भगवान की कृपा से और परम भक्ति योग से धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। जो भक्तिनिष्ठ है, वह समस्त लोक में व्याप्त परमात्मा को देख सकेगा।
संसार के विषयों में सभी प्रकार से हटा हुआ मन ईश्वर में लीन होता है। जब मन निर्विषय होता है तभी वह आनन्दरूप होता है। जीव-जैसा कपटी और ईश्वर जैसा भोला और कोई नहीं है।
दूसरों के लिये कुछ करना पड़े तो तकलीफ-सी होती है, परंतु अपनों के लिये करना हो तो आनन्द होता है। यह सब मन का खेल है। मन बड़ा कपटी हैं। ‘मेरा और तेरा’ का खेल इस मन में ही रचा है। सचमुच मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है।
श्रीकपिलज कहते हैं-हे माता, मन को ही इस जीवन के बन्धन और मोक्ष का कारण माना गया है। यदि मन विषयों में आसक्त हो जाय तो वह बन्धन का कारण बनता है और यही मन यदि परमात्मा में आसक्त हो तो मोक्ष का कारण बन जाता है-
चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम्।
गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये।।
भगवान मनुष्य का शरीर या घर नहीं, बल्कि हृदय देखते हैं। मन विशाल हो तो भगवान आते हैं। मन में छिपी हुई अहंता-ममता, अपने पराये की भावना ही मन को दुःखी करती है। मन के ये धर्म आत्मस्वरूप में भारसमान होने के कारण आत्मा स्वयं को सुखी-दुःखी मानती है, परंतु वास्तव में वह आनन्द रूप है।
मन के सुधरने पर सब कुछ सुधरता है और मन के बिगड़ने पर सब कुछ बिगड़ता है। सुख-दुःख के दाता हैं- अहंता और ममता। उसे छोड़ देने पर ही आनन्दरूप मिलता है।
पाप करने के लिये किसी को प्रेरणा देने की जरूरत नहीं पड़ती, किंतु पुण्य करने के लिये प्रेरणा देनी पड़ती है।
मन अधोगामी है। मनुष्य का मन पानी की भाँति गड्ढे की ओर ही बहता है। जल की तरह मन भी अधोगामी है। जल की भाँति मन का स्वभाव भी ऊपर नहीं, नीचे की ओर जाने का है। इस मन को ऊपर चढ़ाना है। उसे परमात्मा के चरणों तक ले जाना है। यन्त्र के संग में आने से पानी ऊपर चढ़ता है, उसी तरह मन्त्र के संग में आने पर मन ऊपर चढ़ता है। मन को मन्त्र का संग दो। मन्त्र का संग होगा तो अधोगामी मन ऊर्ध्वगामी बनेगा। जिसने अपना मन सुधारा है वह दूसरों को भी सुधार सकेगा। मन को सुधारने का और कोई साधन नहीं है। मन शब्द के अक्षरों को उलट दोगे तो शब्द बनेगा ‘नम’। नम और नाम ही मन को सुधारेंगे।
मन को स्थिर करने के लिये नाम जप की आवश्यकता है। जप से मन की मलिनता और चंचलता दूर होती है। अतः किसी भी मन्त्र का जप करो। सांसारिक विषयों के संग से बिगड़ा हुआ मन ईश्वर ध्यान करने से सुधरता है। सभी के अन्तर में परमात्मा हैं फिर भी वे सभी का दुःख दूर नहीं करते हैं। अंदर बिराजे हुये चैतन्यरूप परमात्मा मन बुद्धि को प्रकाश देते हैं। भगवान का स्वरूप ऐसा तेजोमय है कि हम-जैसे साधारण जीव उन्हें देख नहीं पाते।
भगवान का निर्गुण स्वरूप सूक्ष्म होने के कारण दिखायी नहीं देता और भगवान का सगुण स्वरूप तेजोमय है, अतः वह भी नहीं दिखता। इस कारण से हम जैसों के लिये तो भगवान का नाम स्वरूप, मन्त्रस्वरूप ही इष्ट है। भगवान चाहे स्वयं को छुपा लें, किंतु अपने नाम को छुपा नहीं सकते। नामस्वरूप प्रकट है अतः परमात्मा के किसी नामस्वरूप का दृढ़ मन से आश्रय ले लो।
मन्त्र के बिना मन की शुद्धि नहीं हो सकती। बिगड़ा हुआ मन ध्यान के साथ तप करने से सुधरेगा। लौकिक वासना से मन बिगड़ता है और अलौकिक वासना के जागने पर वह सुधरेगा। वासना का नाश वासना से ही करना पड़ता है। असद् वासना का विनाश सद् वासना से होगा।
जब मनुष्य सोचेगा कि मुझे जन्म-मरण के फेरों से मुक्त होना है, मुझे गोलोक धाम में जाना है, मुझे किसी माता के गर्भ में नहीं जाना है, मुझे इसी जन्म में परमात्मा के दर्शन करने है, ऐसी भावना रखने से मन सुधरेगा। जिस तरह काँटा काँटे से निकलता है, उसी तरह वासना ही वासना को निकाल बाहर करती है। फिल्म देखने की वासना दूर करनी है तो परीक्षा में पहला नम्बर आने की वासना रखो। ऐसी वासना से अध्ययन में रूचि पैदा होगी और अध्ययन की रूचि से फिल्म देखने की वासना छूट जायेगी।
किसी राजा के पास एक बकरा था। राजा ने एक बार एलान किया कि इस बकरे को जंगल में चराकर जो उसे तृप्त करके लायेगा, उसे मैं आधा राज्य दूँगा। किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं-इसकी परीक्षा में खुद करूँगा।
इस एलान को सुनकर एक मनुष्य ने राजा के पास आकर कहा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है और वह बकरे को लेकर जंगल में गया। वहाँ सारा दिन उसने कोमल हरी घास बकरे को खिलायी। शाम होने पर उसने सोचा कि अब तो बकरे का पेट भर गया होगा, क्योंकि सारा दिन उसे चराता फिरा हूं। बकरे के साथ वह राजा के पास आया। राजा ने थोड़ी-सी हरी घास बकरे के आगे रखी तो बकरा उसे खाने लगा। इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा कि तूने इसे पेटभर खिलाया ही नहीं है वरना यह घास क्यों खाने लग जाता?
बहुतों ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया, परंतु ज्योंही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती कि वह खाने लगता।
एक सत्संगी ने सोचा कि राजा के इस एलान में कोई रहस्य है, तत्व है। मैं युक्ति से काम लूँगा। वह बकरे को चराने के लिये ले गया। जब भी बकरा घास खाने जाता तो वह उसे लकड़ी से मार देता। सारे दिन में कई बार ऐसा हुआ। अन्त में बकरे ने सोचा कि यदि मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी।
शाम को वह सत्संगी बकरे को लेकर राजदरबार में लौटा। बकरे को घास बिल्कुल खिलायी नहीं थी फिर भी उसने राजा से कहा- मैंने इसे भरपेट खिलाया है, अतः यह अब बिलकुल घास नहीं खायेगा, कर लीजिये परीक्षा।
राजा ने घास डाली, लेकिन, उस बकरे ने खाया तो क्या, उसे देखा सूँघा तक नहीं।
बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी कि घास खाऊँगा तो मार पड़ेगी। अतः उसने घास नहीं खायी।
यह बकरा हमार मन ही है। बकरे को घास चराने ले जानेवाला ‘जीवात्मा’ है और राजा ‘परमात्मा’ है। मन को मारो, मन पर अंकुश रखो। मन सुधरेगा तो जीवन सुधरेगा। मन को विवेकरूपी लकड़ी से रोज पीटो। भोग से जीव तृप्त नहीं हो सकता। त्याग में तृप्ति समायी हुई है।
मन अहंता और ममता से भरा हुआ है। मन जब कुछ माँगे तब उसे विवेक रूपी लकड़ी से मारोगे तो वह वश में हो जायेगा।
दृढ़ वैराग्य, तीव्र भक्ति और यम-नियमादि के अभ्यास से चित्त वश में होता है और स्थिर होता है फिर अन्त में धीरे-धीरे प्रकृति भी अदृश्य होती जाती है।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,