





धन की इच्छा, आकांक्षा किसे नहीं होती, चाहे वह गृहस्थ हो अथवा योगी। सभी का जीवन धन से ही संचालित होता है। धन का मूल स्वरूप ऋद्धि-सिद्धि तो गणपति की भार्यायें है और शुभ-लाभ उनके पुत्र है, प्रत्येक मनुष्य यही चाहता है कि वह विष्णु के समान अपने जीवन का पालनकर्त्ता स्वयं हो, उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े, वह किसी के अधीन ना हो तथा लक्ष्मी रूपी शक्ति सदैव उसके साथ रहे, जिससे वह भगवान विष्णु के समान सभी कलाओं से पूर्ण हो सकें।
गणपति प्रमुख देवताओं में माने जाते हैं। सांसारिक जीवन के प्रत्येक कार्य में रिद्धि-सिद्धि सफलता प्रदान करना व विघ्नों का नाश करने की शक्ति केवल गणपति में ही है। वह बुद्धि के विशेष प्रतिनिधि हैं। महादेव के पुत्र होने के नाते उनका महत्त्व और भी बढ़ गया है। कोई कार्य आरम्भ करने से पूर्व उनकी ही पूजा की जाती है। गणेश का सिर हाथी का है जो बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। उनके सिर पर सुशोभित होता चन्द्रमा शांति का प्रतीक है, विशाल नेत्र दिव्यता का स्वरूप है, बड़े-बड़े कान श्रवण शक्ति के प्रतीक हैं। पेट पर उत्कीर्ण सर्प एवं ऊँ का चिन्ह पुष्टि का प्रतीक है।
गणेश को विघ्न विनाशक कहा जाता है। मनुष्य जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिये जिन गुणों की आवश्यकता होती है, उन्हें भगवान गणेश की चेतना को आत्मसात करने से ही प्राप्त किया जा सकता है। गणेश भक्त ऐसे ही गुणों का स्वरूप अपने अन्तः करण में बनाये, अपने इष्टदेव के रहस्यों को समझ कर उनको अपने व्यावहारिक जीवन में स्थान दें तभी वह ऋद्धि-सिद्धि एवं शुभ-लाभ के दाता सिद्ध हो सकते हैं। वास्तविक गणेश भक्त बनेंगे तभी इस लक्ष्य की प्राप्ति संभव हो सकेगी।
प्रतिज्ञा और ज्ञान की भी एक सीमा अवश्य होती है, व्यक्ति अपने प्रयत्नों से किसी भी कार्य को श्रेष्ठतम रूप से पूर्ण करते हुये उज्जवल पक्ष की ओर विचार करता है, लेकिन उसकी बुद्धि एक सीमा से आगे नहीं दौड़ पाती। बाधायें उसकी बुद्धि एवं कार्य के विकास को रोक देती है, और यही मूल कारण है कि हमारे शास्त्रों में पूजा, साधना, उपासना को विशेष महत्त्व दिया गया। गणेश का स्वरूप शक्ति और शिवत्व का साकार स्वरूप है, और इन दोनों तत्वों का सुखद स्वरूप ही किसी कार्य में पूर्णता ला सकता है, वहीं इस साधना में भगवान विष्णु का अनन्त तत्व होने से इसकी महत्ता और बढ़ गई है।
इस साधना से जीवन में सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है जिसे हम प्राप्त करना चाहते हैं। जो भी मन में अभीसिप्त हो वह अनन्त साधना के माध्यम से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यह साधना तब भी पूर्ण सफलतादायक मानी गई है जब आपसे लक्ष्मी रूठने लगी हो, आप का व्यापार या कारोबार बन्द होने लगा हो, रोगों से आप त्रस्त होकर जीवन से आप निराश होने लग गये हों, या कर्ज के बोझ से दबते चले जा रहे हों, जीवन के किसी भी क्षेत्र में असफल होने लगे हों तो भगवान गणपति अनन्त साधना रामबाण के समान है। भगवान गणपति को एक ओर जहां ज्ञान में श्रेष्ठ माना गया है तो वहीं वो ऋद्धि-सिद्धि के प्रदाता भी हैं।
संसार में कौन ऐसा है जो आगे नहीं बढ़ना चाहता? कौन अनन्त सिद्धियां प्राप्त नहीं करना चाहता, परन्तु इसके लिये अनन्त तत्व का होना आवश्यक है। जिस प्रकार विष्णु को अनन्त कहा गया है, उसी प्रकार गणपति का भी कोई विकल्प नहीं है। यह साधना उसी अनन्त की साधना है, जो साधक के शरीर में ही नहीं, जीवन में आये दोषों का भी निराकरण कर उसमें तेज, कर्मशीलता का उद्भव कर, साधक को विशालता की ओर, श्रेष्ठता की ओर ले जाती है, सूक्ष्म से विराट की ओर, धरती से आकाश की ओर उद्भव होने की क्रिया है।
इस साधना द्वारा साधक में नेतृत्व क्षमता के गुण आ जाते हैं, उसमें हीन भावना समाप्त हो जाती है, साधक जहां भी जाता है, उसे यश, मान, पद, प्रतिष्ठा, सम्मान प्राप्त होता है। उसकी वाणी में ओजस्विता आ जाती है, जिससे लोग उसका कहना मानने लगते हैं, जिस कार्य में वह हाथ डालता है, उसमें हर कोई सहयोग देने की भावना रखते हैं, और यही तो सफल नेतृत्व के लक्षण हैं।
जहां गणपति और अनन्त स्वरूप में विष्णु हों, वहां लक्ष्मी स्वतः ही चली आती है। क्योंकि जहां गणपति रिद्धि-सिद्धि के प्रदाता हैं वहीं विष्णु की शक्ति योगमाया भगवती लक्ष्मी हैं। इसीलिये इस साधना से जीवन में अर्थ का अभाव तो रह ही नहीं सकता है। उसे पूर्ण वैभव युक्त जीवन प्राप्त होता है, जहां किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होती, धन-धान्य, वाहन, भवन, कीर्ति, आयु, पुत्र, पौत्र से जीवन पूर्ण होता है।
इस साधना को करने से साधक में सात्विक विचारों और सात्विक वातावरण का निर्माण होता है, पुत्र-पुत्रियों में सदाचार से युक्त होकर श्रेष्ठ कार्यो में संलग्न होते हैं। जिससे अभिभावकों की यशवृद्धि होती है। पति पतिव्रत्य और कुटुम्ब धर्म के प्रति चेतना प्रबल होती है, उसमें संतान के कल्याण के प्रति जागरूकता बढ़ती है। ऐसे घर में देवताओं का वास होने लगता है।
जीवन का अर्थ यह नहीं है, कि समस्यायें ना आये, बाधायें न आयें, अड़चने न आयें। बाधायें तो आयेंगी, विपत्तियां भी आयेंगी, जो विधि का लेख है उन पर साधनाओं के माध्यम से जीत सकें उनका प्रभाव हम पर न पड़े। साधक जीवन में पग-पग पर बाधायें आती हैं परन्तु श्री गणपति हर समस्या पर विजय प्राप्त करने का मार्ग साधक के लिये पहले से ही प्रशस्त कर देते हैं। इस साधना को सम्पन्न करने से साधक ऋद्धि-सिद्धि को अनन्त स्वरूप में ग्रहण करने में पूर्णतः समर्थ होता है। जिससे जीवन अनन्त स्वरूपों में शुभ-लाभ, सुख समृद्धि, धन, ऐश्वर्य से युक्त होता है।
साधना विधान
भगवान शिव के जीवन में गणपति के अवतरण दिवस गणेश चतुर्थी के दिन अथवा उनके पूर्ण आनन्द उत्सव गणेश चतुर्थी के दिन स्नान आदि से निवृत होकर पीला आसन बिछाकर पूर्व की ओर मुंह कर बैठ जाये और सामने अनन्त सिद्धि प्रदायक गणपति यंत्र को स्थापित कर दें। ऊँ श्रीं गणेशाय नमः बोलते हुये यंत्र का संक्षिप्त पूजन करें। संक्षिप्त पूजा में यंत्र को पहले जल से स्नान करा लें, फिर दूध से, दही, घृत से, शहद से शक्कर से व पुनः शुद्ध जल से स्नान करायें। यंत्र को पौंछ कर दूसरे पात्र में चन्दन से ‘गं’ बीज मंत्र लिखकर उस पर यंत्र को स्थापित करें। यंत्र पर चंदन का तिलक लगायें और एक सफेद पुष्प अर्पित करें। इसके बाद घी का दीपक व अगरबत्ती लगायें।
पश्चात् साधक को चाहिये, कि वह पहले से ही मंगा कर रखे हुये ‘ब्रह्मवर्चस्वपूज यज्ञोपवीत’ को यंत्र के सामने रख दें। (यज्ञोपवीत साधना सामग्री के साथ प्राप्त होगा) इस यज्ञोपवीत को यंत्र के सामने स्थापित कर दें और आवाहन करें कि यज्ञोपवीत के प्रत्येक धागे में त्रिशक्ति युक्त भगवान विष्णु अनन्त स्वरूप में स्थापित हों।
इसके बाद यज्ञोपवीत को खोलकर दोनों हाथ में लेकर उसे आकाश की ओर उठाये और ‘ऊँ सूर्याय नमः’ मंत्र द्वारा उस यज्ञोपवीत में सूर्य की तेजस्विता का आवाहन करें, और मन में यह चिन्तन करें कि इस यज्ञोपवीत के प्रत्येक धागे में अनन्त देव सूर्य की पूर्ण तेजस्विता के साथ स्थापित हो रहे हैं। देवाधिदेव गणपति मुझे पूर्ण तेजस्विता प्रदान करने में समर्थ हैं, मेरा हर प्रकार से लालन-पालन करने में सक्षम हैं। अपने कोटि-कोटि सूर्य मण्डलों की रश्मियों द्वारा मेरे इस जीवन के व पूर्व जीवन के पापों के साथ जो भी दोष व्याप्त हुये हैं, उनको खण्ड-खण्ड कर रहें हैं और मुझे पूर्ण चैतन्य एवं ओजस्वी बना रहे हैं।
ऐसी भावना मन में रखते हुये यज्ञोपवीत को नीचे उतार लें और उसे समेट कर यंत्र के सामने स्थापित कर दें। उस यज्ञोपवीत को अनन्त देव का प्रतीक मानकर उसकी संक्षिप्त पूजा करें, उन्हें नैवेद्य अर्पित करें और हाथ जो जोड़कर आजीवन कृपा बनाये रखने की प्रार्थना करें। यदि कोई विशेष इच्छा हो, तो उसका भी उच्चारण करें। इसके उपरान्त हाथ जोड़कर ध्यान करें-
ध्येयः सदा मंगल मूर्तिरूपः नारायणः सरसिजासन
सन्निविष्टः केयूरवान् कनककुण्डलवान किरीटहारी हिरण्यमय वपुधृत शंख चक्र।।
फिर गोमती चक्र को यंत्र के ऊपर रखे तथा उसका पंचोपचार पूजन करें। इसके बाद साधक निम्न मंत्र की ‘अनन्त सिद्धि माला’ से 5 माला मंत्र सम्पन्न करें-
।। ऊँ नमो गं गणपतये अनन्तायै धनदायै श्रीं ह्रीं ऊँ नमः।।
(Om Namo Gam Ganpatayi Anantayai
Dhandayai Shreem Hreem Om Namah)
मंत्र जप के पश्चात् विष्णु आरती सम्पन्न करें और यज्ञोपवीत को गले में धारण कर लें। जिस जल से यंत्र का स्नान सम्पन्न किया गया था, उसे पंचामृत में ग्रहण करें। यह साधना अत्यन्त प्रभावयुक्त है, इससे साधक की भौतिक जीवन की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती हैं। साधना समाप्ति पर यंत्र, चक्र व माला नदी में विसर्जित करें।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,