





संसार का गौरव स्थल है-सिद्धाश्रम। एक ऐसा पावन पवित्र, दिव्य भूखण्ड जो अपने आप में अद्वितीय और अन्यतम है, जहाँ उच्चकोटि के योगी विद्यमान हैं और आध्यात्म के जिन ऊँचाईयों पर पहुंचे हुए हैं, उसकी समानता और तुलना हो ही नहीं सकती। प्रत्येक प्रकार की साधना और सिद्धियों का यह आधार स्थल रहा है। आज भी यहाँ सैकड़ों-हजारों वर्षों के आयु प्राप्त योगी विचरण करते हुए दिखाई दे जाते हैं। सादा वातावरण सौरभमय, दिव्य, मनोहर है, जहाँ की माटी चन्दन की तरह ललाट पर लगाने योग्य है।
जब मनुष्य स्वयं के अस्तित्व, अपने अन्दर चल रहे विचारों, भावनाओं के प्रति जागरुक नहीं हो पाता है। उसके जीवन में नकारात्मक ऊर्जा, बुरी दृष्टि मानसिक अशांति और अकाल मृत्यु जैसे संकटों से रक्षा प्राप्त करने के लिए कोई विकल्प नहीं रहता है। कार्यों में विध्न बाधायें आती हैं, तथा ईच्छाओं की पूर्ति पूर्ण रुप से नहीं हो पाती है। ऐसे में साधक पूर्ण रुपेण संकुचित, मानसिक तनाव एवं कमजोर आत्मविश्वास से युक्त हो जाता है तथा उसके अन्दर अकारण क्रोध, उन्मादमय स्थितियों का विस्तार होने लगता है। जिससे संघर्ष, गलत फैसले और व्यक्तिगत विकास में रुकावट आने लगती है।
इन्हीं सब कुस्थितियों तथा विषमताओं के निवारण हेतु अत्यन्त आवश्यक है, सिद्धाश्रम के दिव्य तथा चैतन्य तपोभूमि की चेतना से संस्पर्शित तथा पूर्णतः मंत्रसिद्ध ‘सिद्धाश्रम शक्ति युक्त आत्म चेतना प्राप्ति कवच’ जिसको धारण करने से स्वतः ही समस्त प्रकार के रोग-कष्ट समाप्त हो जाते हैं, व्यक्ति जरा-मरण के भय से मुक्त हो जाता है, परिवार में निरन्तर प्रसन्नता बनी रहती है तथा नकारात्मक ऊर्जा, मानसिक अशान्ति जैसी दुर्गतियाँ नष्ट होकर उसके जीवन में सकारात्मकता, आत्मविश्वास और मानसिक शान्ति बनी रहती है।
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