





प्रत्येक स्त्री के जीवन की यही कामना होती है कि उसे एक ऐसा योग्य उच्च कुल का जीवनसाथी मिले जो समझदार, प्यार करने वाला और संस्कारी हो। विवाह केवल दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन होता है।
सनातन धर्म में विवाह स्त्री-पुरुष दोनों के लिए शास्त्रीय कर्म है। जीवन के इस पड़ाव पर गृहस्थ जीवन प्रारम्भ होता है। सनातन धर्म के चार आश्रमों में गृहस्थ आश्रम को ही सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। हमारी संस्कृति में गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना सामाजिक जिम्मेदारियों की शुरुआत मानी जाती है।
वर्तमान युग में विवाह प्रत्येक परिवार की प्रमुख समस्या के रुप में सामने आई है। प्रत्येक माता-पिता चाहते हैं कि उनकी पुत्री पढ़े-लिखे और उसके उपरांत उसे एक योग्य जीवन साथी मिले जिससे उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय हो सके। परन्तु कितने लोगों के सपने साकार होते हैं अथवा उनके पुत्र-पुत्री को योग्य जीवन साथी मिल पाता है? यह तो काफी हद तक प्रारब्ध पर ही निर्भर करता है। इस युग के व्यापक ढ़ाचे में आये व्यापक परिवर्तन के फलस्वरुप कन्याओं के लिए योग्य वर ढूंढना कठिन हो गया है। ऐसे अनेक कारण हैं, जिसके रहते ये समस्यायें और भी जटिल हो जाती हैं। योग्य जीवन साथी न मिलने से जीवन नीरस हो जाता है। जीवन की सम्पूर्ण आशायें धूमिल सी प्रतित होने लगती हैं और जीवन बोझ सा लगने लगता है।
संयोगवश यदि विवाह की स्थितियाँ बनती भी हैं तो उसमें भी तमाम प्रकार की दिक्कतें व समस्यायें आ जाती हैं। कभी-कभी किसी स्त्री को उसके उम्मीदों के अनुरूप योग्य वर नहीं मिल पाता है। तो कभी-कभी बात बनते-बनते बिगड़ जाती है और कभी-कभी तो आखिरी मौके पर रिश्ता टूटने वाली स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। उसके अलावा भी कभी अच्छी नौकरी या आर्थिक स्थिरता न होने के कारण भी उच्च वर प्राप्ति में बाधायें आने लगती हैं।
इस तरह की बाधायें स्त्री को हर रुप में कमजोर और हताश-निराश कर देती हैं और उनका जीवन असमान्य बन कर रह जाता है। गृहस्थ में रहते हुए एक-दूसरे के लिये त्याग, अनुचित व्यवहार में भी क्षमा, अत्यंत कष्ट में भी धैर्य आदि गुणों का प्रयोग करना अनिवार्य हो जाता है। ऐसा ही सुंदर, सुसंस्कारों से युक्त वैवाहिक जीवन का निर्माण सद्गुरु के आशीर्वाद से ही संभव है। भावी जीवन के सुखद निर्माण के लिये इस अतिविशिष्ट शक्तिपात दीक्षा को ग्रहण करना अत्यंत आवश्यक है। जिससे स्त्री को एक सुयोग्य और श्रेष्ठ वर की प्राप्ति हो सके तथा विवाह के पश्चात भी पति-पत्नी आजीवन मित्रवत, एक-दूसरे के सहयोगी बने रहें, सुख-दुःख में साथ खड़े रहें तथा प्रसन्नता पूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें।
अतः उच्च वर की प्राप्ति हेतु प्रत्येक विवाह योग्य कन्याओं को यह दीक्षा अवश्य ही ग्रहण करनी चाहिये।
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