





वर्तमान में मानव अपना जीवन यापन कठिन परिस्थितियों में रहकर कर रहा है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से जुड़ा हो, हर क्षेत्र में वह कठिनाईयों, समस्याओं और अनेक-अनेक रूपों में शत्रुओं से घिरा हुआ है, उसके जीवन की अनेक बाधायें, इस तरह से उसको जकड़े रखती हैं, कि वह स्वयं में उलझा व एक ही स्थान पर अटका रहता है। वर्तमान समय में प्रतिस्पर्धाओं के फलस्वरूप अनजाने ही अनेको शत्रु प्रतिदिन उत्पन्न होते रहते हैं। व्यक्ति का जिससे कोई लेना-देना ना हो, ये शत्रु जीवन की प्रगति में अनेक अवरोध उत्पन्न करते हैं।
आज के इस प्रतिस्पर्धावादी युग में यह कहां सम्भव हो पाता है, कि व्यक्ति कुछ क्षण सुख से, आनन्द से व्यतीत कर सके, उसे तो आये दिन कोई न कोई समस्या घेरे ही रहती है, और उन्हीं से जूझते हुये उसकी शक्ति समाप्त होती जाती है, ऐसी परिस्थिति में उसे शारीरिक शक्ति के साथ-साथ दैविक बल की भी आवश्यकता पड़ती है। यह मानव मात्र का स्वभाव है, कि जब चारों ओर परेशानियां, बाधाओं, अड़चनों के बादल मंडरा रहे होते हैं, तभी व्यक्ति ईश्वर की अभ्यर्थना करने के लिये समय निकालने के लिये विवश होता है।
परन्तु यदि पूर्व में ऐसी साधनात्मक ऊर्जा का संचय कर लिया जाये, तो आने वाली परिस्थितियों को अपने नियंत्रण में किया जा सकता है। इसके साथ ही यदि स्थितियां बहुत ही भयावह हो गयी हों, तो साधना के माध्यम से उसे अनुकूल बनाया जा सकता है और धीरे-धीरे विषमताओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिये आज के इस युग में साधक के लिये दैवीय संरक्षण आवश्यक है, जो उसके प्रगति मार्ग को निष्कंटक बनाये और उसे संरक्षण प्रदान करे।
सांसारिक सुख भी अनायास ही प्राप्त नहीं होते, उसके लिये भी साधना का बल और मंत्र शक्ति आवश्यक है, शारीरिक शक्ति अच्छे खान पान और योग द्वारा प्राप्त की जा सकती है, किन्तु दैविक शक्ति को साधना के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। दैविक बल के बिना जीवन की विसंगतियों पर विजय प्राप्त करना असंभव सा है।
जीवन में चाहे भौतिक पक्ष में उन्नति की बात हो अथवा आध्यात्मिक उन्नति एवं पूर्णता प्राप्त करने की बात हो, उसमें महाविद्या साधना का महत्त्व सर्वोपरि है। अलग-अलग कार्यो हेतु आद्या शक्ति से इन दस महाविद्या की उत्पत्ति मानी गयी है, जिनकी साधना साधक अपनी समस्या के निवारण के लिये श्रेष्ठ मुहूर्त में सम्पन्न कर सफल व्यक्ति बन सकता है।
धूमावती दस महाविद्याओं में सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनका एक स्वरूप धूम्र वाराही भी है, जिनकी साधना स्थायी प्रचण्ड शत्रु नाश, विपत्ति निवारक, संतान पक्ष, सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये मुख्य रूप से की जाती है। इस साधना की मुख्य विशेषता यह है कि विघ्नों व धन अभाव रूपी अनेक शत्रुओं का ये समूल रूप से नाश करती हैं और भौतिक दृष्टि से व्यक्ति के अभावों का निवारण करती हैं। भगवती धूमावती अपने आराधक को अप्रतिम बल प्रदान करने वाली देवी हैं, जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सहायक सिद्ध होती हैं।
मां धूमावती के स्वरूप में विभिन्न तरह की बाते की जाती है, परन्तु मां का स्वरूप तो केवल वरदायिनी ही होता है, वह अपनी संतान स्वरूप साधक के जीवन की कष्टपूर्ण स्थितियों का वरण करती ही है, केवल साधक को पुत्रवत् भाव से मां को मनाने की कला आनी चाहिये।
धूम्र वाराही साधना मूल रूप से तांत्रिक साधना है। भूत-प्रेत, पिशाच तो धूम्र वाराही साधना से इस प्रकार गायब होते है, जैसे अग्नि पर जल डालने से जल वाष्प रूप में विलीन हो जाता है। सांसारिक जीवन में ऐसी दिव्यतम ऊर्जा आत्मसात करना आज के युग की आवश्यकता है।
किसी भी साधना की विशिष्ट ऊर्जा को आत्मसात करने का एक चेतनावान मुहुर्त होता है, जिसका उपयोग यदि सही रूप में कर लिया जाये, तो सफलता निश्चय ही प्राप्त होती है। पत्रिका परिवार समय-समय पर ऐसे चेतनावान दिवसों पर साधक-साधिकाओं को जागृति प्रदान करने का प्रयास करता है। जिससे उन दिवसों की विशिष्टता को साधक आत्मसात कर अपने जीवन को साधनात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत कर सकें। ऐसा ही दिव्यतम दिवस 22 जून धूमावती सिद्धि दिवस पर धूम्र वाराही की विशिष्ट साधना को सम्पन्न करने से निश्चय ही संकटों का नाश होगा और जीवन हर स्वरूप में मंगलमय चेतना से आप्लावित होने की ओर अग्रसर हो सकेगा।
‘‘धूमावती देवी जिन्हें ज्येष्ठा लक्ष्मी भी कहा जाता है, जो शूप और मूसल से शत्रुओं का संहार और महाप्रलय करती हैं। परन्तु भगवती धूमावती को केवल शत्रुहन्ता के रूप में प्रचारित करना अल्प ज्ञान ही होगा, धूमावती प्रचण्ड दरिद्रता निवारणी, रोग, क्लेश, दोष नाशिनी भी है। धूमावती साधक के समस्त शत्रु नाश तो होते ही है, साथ ही उसके जीवन में जो भी अभाव, विसंगतिया, रोग-शोक, दोष, क्लेश मलिन पूर्ण स्थितियां, बाधा आदि का शमन धूम्र वाराही तंत्र के माध्यम से होता है। धूमावती के साधक को यह भावना रखनी चाहिये कि भगवती धूमावती मेरे जीवन के सभी अभावों का शमन कर, दुःख, दरिद्रता, कष्ट, पीड़ा को अपने सूप में समेट रही है और मेरे शत्रुओं का मूसल से शमन कर मुझे सुख-समृद्धि, धन, लक्ष्मी, सौभाग्य, पराक्रम प्रदान कर मुझे इन शक्तियों से युक्त कर रही है। ’’
साधना विधान
22 जून को रात्रि 8 बजे के पश्चात् या किसी भी दुर्गाष्टमी को स्नानादि से निवृत होकर पीले आसन पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठ जायें। अपने सामने बाजोट पर काला कपड़ा बिछाकर उस पर स्टील की थाली रख दें। धूमावती यंत्र को स्नान कराने के पश्चात् थाली में रखें, यंत्र के सम्मुख धूम्र वाराही माला स्थापित करें, अब यंत्र का पूजन सिन्दूर से करके धूप एवं तेल का दीपक प्रज्जवलित कर दें एवं ध्यान करें-
विवर्णा चंचला दुष्टा दीर्घा च मलिनाम्बरा।
विपुला कुन्तला रूक्षा विधवा विरलद्विजा।।
काक ध्वजरथारूढ़ा विलम्बित पयोधरा।
सूर्य हस्ताति रक्ताक्षी वृतहस्ता परान्धिता।।
वृद्ध धोणा तु श्रृशं कुटिला कुटिलेक्षणा।।
क्षुत्पिपासार्दिता नित्यं भयदा कलहास्पदा।।
इसके बाद साधक हाथ में जल लेकर संकल्प ले, कि मैं (अमुक) गोत्र का (अमुख) पिता का पुत्र अमुक नाम का साधक पूर्ण क्षमता व श्रद्धा के साथ धूम्र वाराही साधना सम्पन्न कर रहा हूं, मेरे समस्त विघ्नों, अभावों का नाश हो और सुख-समृद्धि, लक्ष्मी, धन, सौभाग्य की प्राप्ति हो, ऐसा कहकर जल भूमि पर छोड़ दे।
इसके पश्चात् जल हाथ में लेकर विनियोग करें-
अस्य धूमावती मंत्रस्य पिप्पलाद ऋषिः निवृच्छन्दः ज्येष्ठा देवी धूम्र बीजं, स्वाहा शक्तिः धूमावती कीलकम् ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।।
पश्चात् निम्न अंगों का स्पर्श करते हुये न्यास करें-
धूं शिरसे स्वाहा।। (सिर का स्पर्श करें)
मां शिखायै वषट्।। (शिखा का स्पर्श करें)
तीं नेत्रत्रयाय वौषट्।।(नेत्रों का स्पर्श करें)
धूं धूं हृदयाय नमः।। (हृदय का स्पर्श करें)
स्वाहा अस्त्राय फट्।। (उदर (पेट) स्पर्श करें)
वं कवचाय हुं।। (पूरा शरीर स्पर्श करें)
इसके पश्चात कर न्यास सम्पन्न करें-
धूं धूं अंगुष्ठाभ्यां नमः।। (अंगूठे का स्पर्श)
धूं तर्जनीभ्यां नमः।। (तर्जनी का स्पर्श)
मां मध्याम्यां नमः।। (मध्यमा का स्पर्श)
वं अनामिकाम्यां नमः।। (अनामिका का स्पर्श)
तीं कनिष्ठिकाम्यां नमः।। (कनिष्ठा का स्पर्श)
स्वाहा करतल कर पृष्ठाभ्यां नमः।।
(दोनों हाथ के मध्य भाग को स्पर्श करें)
फिर इस मंत्र की 5 माला पूजा स्थान में ही खड़े रहकर जप करें-
मंत्र
।। ऊँ धूं धूं धूं धुरू धुरू धूम्र वाराही क्रों फट्।।
।। Om Dhoom Dhoom Dhoom Dhuru Dhuru Dhoomra Vaaraahi Krom Phat ।।
साधना सम्पन्न होने के पश्चात् यंत्र तथा माला नदी में विसर्जित कर दें अथवा गुरू चरणों में अर्पित करें। धूम्र वाराही की यह साधना अत्यन्त विलक्षण एवं विशिष्ट फल प्रदायक है, बाधाओं के साथ ही यह साधना जीवन के अन्य अभावों का भी पूर्णता से शमन करती है।
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