





सूर्य के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती, सूर्य ही वह परम तत्व हैं, जो संसार के समस्त तेज, दीप्ति और कान्ति के निर्माता तथा इस जगत की आत्मा कहे गये हैं। सूर्य ही वह विराट पुरूष, आदि देव हैं, जिनकी साधना-उपासना से समस्त रोग, नेत्र-दोष और ग्रह बाधा दूर होती है क्योंकि सूर्य ही अपनी शक्ति, न केवल पृथ्वी को अपितु चन्द्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि आदि को उचित मात्रा में प्रदान कर इस सृष्टि का संचालन करते हैं।
मुझे अच्छी तरह याद हैं वे दिन, जब मैं किशोर वय बालक ही था। धीरे-धीरे युवावस्था की ओर बढ़ते कदम, पर किशोरवस्था में यौवन के आने के प्रति जो उत्साह होता है, उमंग होता है, कुछ कर दिखाने की ललक और जोश होता है, ऐसा कुछ भी नहीं था मेरे अन्दर। बस माता-पिता हैं, इनकी इच्छा है कि अन्य युवकों की तरह मैं भी कुछ करूं पर वह सम्भव नहीं हो पा रहा था।
अकेला, गम्भीर या यों कहूं कुछ न कर पाने के कारण हताश, नैराश्य भावना से पीड़ित बस निःश्वास ही था। कभी स्वयं पर झुंझलाहट भी आती, एक प्रकार से निरर्थक जीवन ही जी रहा था। कुछ भी करने से पहले सोचता, कि मैं यह कार्य करने में समर्थ भी हूं या नहीं?
निरन्तर अविश्वास के घेरे में झूलता रहता। आये दिन किसी न किसी बीमारी से, चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक, ग्रसित ही रहता। मेरे माता-पिता मेरे इस नैराश्य पूर्ण स्वभाव के कारण परेशान रहते तथा मेरे निरन्तर गिरते हुये स्वास्थ्य को देखकर दुःखी भी रहते।
मेरे माता-पिता ने सोचा, कि सम्भव है जलवायु बदलने से स्वास्थ्य में कुछ सुधार आये, इसलिये उन्होंने बद्रीनाथ तथा केदारनाथ जाने का निश्चय किया। यात्रा का कार्यक्रम बना, यात्रा से सम्बन्धित संसाधनों से युक्त हो हम चले पड़े। वहां के शांत और रमणीय वातावरण से मन आह्लादित हो उठा।
प्रकृति का समग्र रूप सजा-संवरा हुआ था, विचार हुआ कि जीवन के शेष दिन यहीं व्यतीत कर दें। साधु-संन्यासी कई गुफाओं में साधनारत दिखाई दिये। मेरे माता-पिता में धर्म के प्रति अत्यधिक आस्था है, इसलिये प्रत्येक गुफा के सामने खड़े होते और श्रद्धा भाव से सिर झुकाते।
ऐसे ही एक गुफा के समक्ष जब हम गये, तो उसमें रहने वाले संन्यासी बाहर निकले। मैंने अपने जीवन में ऐसा अद्वितीय व्यक्तित्व पहले कभी नहीं देखा था। बाहर आने पर हमने उन्हें प्रणाम किया, उन्होंने मुझे बुलाया और एक फल दे दिया और स्नेह से बोले, कि तुझे भूख लगी है, इसे खा ले। यद्यपि ऐसा कुछ भी नहीं था, पर जैसे ही उन्होंने फल दिया, मेरी इच्छा हुई कि मैं इसे पूरा खा लूं।
उन्होंने मेरे माता-पिता को भी आशीर्वाद दिया और फिर तेज डग भरते हुये, वे देखते-देखते दूर निकल गये। संयोग से अगले दिन वे पुनः दिखाई दिये और उन्होंने मेरे पिताजी को ऐसे पुकारा, जैसे वे जानते हों और संयोग कुछ ऐसा ही था, कि वे किसी समय मेरे पिताजी के साथ ही कॉलेज में पढ़ते थे, पर अचानक एक दिन कॉलेज से गायब हो गये। पिताजी उनके मित्रों में से एक थे और यका-एक सोलह-सत्रह वर्ष बाद पुनः मिलना आश्चर्यजनक होता है।
जब मेरे पिताजी ने उनसे मेरे विषय में बताया, तो वे बोले, कि इसे मेरे पास छोड़ कर जाओ और शाम को मैं स्वयं तुम्हारे पास पहुंचा दूंगा।
उन लोगों के जाने के बाद उन्होंने मुझसे बाते करनी आरम्भ की। मैंने इतनी तेजस्विता और ओजस्विता को देख कर बहुत धीरे से कहा, कि आप मुझे साधनाओं के बारे में बताइये।
उन्होंने मुझे देखा और बताने लगे, कि साधना करने के लिये भी शक्ति की आवश्यकता होती है। साधक में यह प्रमुख गुण होना आवश्यक है, कि उसका व्यक्तित्व प्रखर हो तथा वह दृढ़ विश्वास और दृढ़ निश्चय से युक्त हो, कि जो कुछ सोच लिया, फिर उसे कर ही देना है, संकल्प के साथ फिर विजय प्राप्त कर ही लेनी है।
मैंने अनायास ही पूछ लिया, कि क्या किसी साधना के माध्यम से इसे प्राप्त किया जा सकता है? उन्होंने उत्तर दिया कि हां! अवश्य और इस प्रकार की शक्ति, तेजस्विता और प्रखरता की प्राप्ति मात्र सूर्य गायत्री साधना से ही सम्भव है।
उन्होंने मुझे देखा और बताने लगे, कि साधना करने के लिये भी तो शक्ति की आवश्यकता होती है। साधक में यह प्रमुख गुण होना आवश्यक है, कि उसका व्यक्तित्व प्रखर हो तथा वह दृढ़ विश्वास और दृढ़ निश्चय से युक्त हो, कि जो कुछ सोच लिया, फिर उसे कर ही देना है, संकल्प के साथ फिर विजय प्राप्त कर ही लेनी है।
मैंने अनायास ही पूछ लिया, कि क्या किसी साधना के माध्यम से इसे प्राप्त किया जा सकता है? उन्होंने उत्तर दिया कि हां! अवश्य ही और इस प्रकार की शक्ति, तेजस्विता और प्रखरता की प्राप्ति मात्र सूर्य गायत्री साधना से ही सम्भव है।
जब भी प्रखरता और तेजस्विता की बात होती है, तो एकमात्र सूर्य ही ऐसे देव है, जिनके समक्ष सभी नतमस्तक हैं। सूर्य ही समस्त चराचर जगत में प्राणों का संचार करते हैं। सूर्य की साधना सम्पन्न करने से साधक के व्यक्तित्व में स्वतः ही परिवर्तन आने लगता है और अन्दर एक अडिगता तथा दृढ़ संकल्प जैसे गुणों का समावेश होने लगता है, वह रोगों से मुक्त हो जाता है और एक अद्वितीय तेजस्विता साधक की देह में समाहित होकर समस्त विषम परिस्थितियों को समाप्त कर देती है।
भगवती गायत्री तो उस परम शक्ति का ही एक स्वरूप हैं, अतः भगवती गायत्री की साधना से साधक बलशाली हो जाता है। साधक के जीवन में शक्ति साधना की अनिवार्यता से कौन असहमत हो सकता है? बिना शक्ति के न तो आध्यातिमक क्षेत्र में उच्चता प्राप्त की जा सकती है और न ही भौतिक क्षेत्र में व्यक्ति कुछ करने में समर्थ हो सकता है।
यही इस साधना का विशेष पक्ष है, जिसके माध्यम से वह सब कुछ पाया जा सकता है जिसे जीवन कहते हैं।
साधनाओं को यदि समय, शुभ मुहुर्त, योग, तिथि, करण तथा दिवस के अनुसार किया जाये, तो फिर सफलता में संशयात्मक स्थिति आ ही नहीं सकती, क्योंकि ये सभी मिलकर एक विशेष अनुकूलता प्रदान करते हैं और साधक यदि ऐसे क्षणों में चूके बिना साधना सम्पन्न करता है तो फिर वह असफल हो ही नहीं सकता।
और यही वह साधना है जो उन्होंने मुझे सम्पन्न कराई थी और जिसके माध्यम से मेरे व्यक्तित्व तथा मेरे जीवन में जो परिवर्तन आया, उसे देख कर मैं स्वयं आश्चर्यचकित रह गया।
साधना विधान
इस साधना में आवश्यक सामग्री ‘सूर्य गायत्री यंत्र’ ‘भास्कर सिद्धि गुटिका तथा ‘संक्राति शक्ति माला’ है।
यह साधना गायत्री जयन्ती के अवसर पर सम्पन्न करें, ऐसा सम्भव न होने पर इसे किसी भी संक्राति पर सम्पन्न किया जा सकता है।
यह एक दिवसीय साधना है तथा इसे 25 जून 2026 गायत्री जयन्ती के दिन प्रातः 05 बजे से 08 बजे के मध्य ही सम्पन्न करें।
लकड़ी के बाजोट पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर केसर से सूर्य की आकृति बनायें तथा उस पर सूर्य गायत्री यंत्र का स्थापन करें। यदि आपके पास वेद हों, तो उनको भी स्थापित कर दें। यंत्र की दाहिनी ओर लाल रंग से रंगे चावल के दानों पर भास्कर सिद्धि गुटिका स्थापित कर दें।
यंत्र का पूजन केसर, पुष्प तथा अक्षत से करें इसी प्रकार गुटिका का भी पूजन कर घी का दीपक एवं सुगन्धित अगरबत्ती लगायें।
दोनों हाथ जोड़ कर सूर्य भगवान का ध्यान करें।
ऊँ ह्रीं घृणिः भास्कराये सूर्याय शक्तिं ह्रीं नमः।।
Om Hreem Ghrinih Bhaskaraye Suryaay
Shaktim Hreem Namah
फिर उसी माला से गायत्री मंत्र की एक माला मंत्र जप करें।
मंत्र
।। ऊँ भू भुर्ववः स्वः तत्स वितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् ।।
Om Bhoor Bhuvah Swaha Tatsavitur Varenyam
Bhargo Devasya Dheemahi Dhiyo Yonah Prachodayat
पुनः एक माला सूर्य मंत्र और गायत्री मंत्र की जप करें।
उसी दिन शाम को ही समस्त सामग्री नदी या तालाब में प्रवाहित कर दें। निश्चय ही यह साधना साधक के जीवन में अद्वितीय तेजस्विता के लिये उपादेय है, जिसे वह स्वयं ही साधना के अनन्तर अनुभव कर सकेगा। यदि साधक किसी भी साधक को दत्तचित्त से सम्पन्न करें, तो सद्यः प्रतिफल की अनुभूति सम्भव होती ही है।
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