





प्रत्येक व्यक्ति की कामना यही होती है कि उसका जीवन खुशहाली, समृद्धि, स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि से परिपूर्ण हो सके। साथ ही उसके जीवन में सौन्दर्य तथा तेजस्विता का स्पष्ट प्रतिबिंब बना रहे। इसके अलावा उसके भीतर में जो भी भय का तत्व है, उससे निवृत्ति प्राप्ति के लिए वह निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। इतने प्रयत्नों के बावजूद भी वह अपने जीवन में चल रही कुस्थितियों का निवारण करने में असफल सा महसूस करता है।
यदि हम अपने शास्त्रों को खोलकर देखें तो हमारे पूर्वजों ने, ऋषियों और देवताओं ने सौन्दर्य को अपने जीवन में एक विशिष्ट स्थान दिया और उन षोड़श शक्ति पूर्ण शक्ति स्वरुपा योगिनी-अप्सराओं की साधनायें प्रारम्भ की, जिनके द्वारा वे पूर्ण सौन्दर्यमय, तेजस्वीतापूर्ण, यौवन तथा सम्मोहन युक्त बने रहें। एक श्रेष्ठ मनुष्य के लिए उसके आध्यात्मिक जीवन का मूल उद्देश्य केवल धन, यश, कीर्ति कमाना ही नहीं हो सकता; यदि ऐसा होता, तो प्रत्येक धनी व्यक्ति सुख से परिपूर्ण होता।
शक्ति, नाद का प्रतीक है, शिवत्व का प्रतीक है। योगिनी, शक्ति स्वरुपा भगवती महाकाली का ही अवतार हैं। जो केवल शारीरिक सुंदरता का प्रतीक नहीं हैं अपितु वे अत्यंत शक्ति सम्पन्न, सुंदर, मोहक, यौवन, मादकता, और आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम भी हैं तथा स्त्री तत्व को पूर्णत: धारण किये हुए होती हैं। इनके माध्यम से ही व्यक्ति के अन्दर भावनाओं का उदात्तीकरण होता है तथा उसे सौन्दर्य का बोध होता है।
‘योगिनी एकादशी’ वर्ष भर की श्रेष्ठतम एकादशीयों में से एक है। अतः यदि साधक इस दिन पूज्य सद्गुरुदेव द्वारा कृपा-प्रसाद स्वरुप प्रदत्त ‘पूर्ण तेजस्विता प्रदायक महायोगिनी गुटिका’ धारण करें तो निश्चित ही उसके जीवन से उपरोक्त वर्णित कुस्थितियों का नाश होता है तथा उसका जीवन उक्त सौन्दर्य-आनंद-तेजस्विता आदि सुयोगों से परिपूर्ण होता है।
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