





जीवन का श्रेष्ठ तत्व ‘शिष्य’ होता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में यदि सबसे उच्च कोटि का कोई शब्द है तो वह शब्द ‘शिष्य’ है।
जब सद्गुरु के अन्तःकरण से कोई वाक्य प्रस्फुटित होता है तो वह महज़ शरीर से निकला हुआ एक साधारण सा वाक्य नहीं होता अपितु वह गुरु तत्व के 82 लाख से अधिक रोमकूपों तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व अपने प्रत्येक मानस पुत्र-पुत्री रुपी शिष्यों का प्रतिनिधित्व करता है।
मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी पुंजी सकारात्मकता की पुंजी है, जिसके आगे ऊँचा हिमालय भी बौना सा प्रतीत होता है। इस अंक में आप पढ़ेंगे कि किस प्रकार सद्गुरु के प्रहार से शिष्य का शक्ति जागरण सम्भव हो पाता है जिससे उसका जीवन खिलखिलाहट से भरपूर हो सके तथा वह ‘स्वान्तः सुखाय’ जैसे दिव्य और आनंद के क्षणों में डुब सके। वह स्वयं शिष्य और सद्गुरु के बीच सामिप्यता को स्थापित कर सामाजिक, पारंपरिक रुढ़ियों का निर्मूल विच्छेदन कर सके।
परमपूज्य सद्गुरुदेव द्वारा ऊर्जा रुपांतरण जैसे क्लिष्ट विषयों का वर्णन एकदम सहज शब्दों में तथा आगामी ‘शिष्यत्व पूर्णिमा’ पर शिष्य को पूर्ण रुप से पूर्णत्व प्रदान करने हेतु यह प्रवचन उनके ही ओजस्वी तथा प्रखर शैली में-
हमारे जीवन में कष्ट हैं, दुःख हैं, पीड़ाये हैं, फिर भी हम पूर्ण समर्पण भाव से, अपने सद्गुरु की, अपने ईष्ट की, अभ्यर्थना-अराधना करते हैं। प्रत्येक सांसारिक मनुष्य के भीतर में यह चिन्तन रहता है कि परिवार में कष्ट न हो, तनाव न हो, परन्तु चिढ़चिढ़ापन आ जाता है, गुस्सा भी आ जाता है, हर समय मैं दुःखी रहता हूँ, ऐसे भाव-विचार अक्सर परिवार में, पति-पत्नी में होता रहता है और वास्तव में होता भी ऐसा ही है।
ऐसा ही चिन्तन एक व्यक्ति कर रहा था कि जीवन का क्या मतलब है? हर समय दुःखी रहना, हर समय परेशान और भयभीत सा रहना और जीवन में कोई आनन्द नहीं हैं, थोड़ी भी प्रसन्नता नहीं है, हर समय वह चिल्लाता रहता था। बच्चे ने कहा कि पापाजी मेरा होमवर्क है, उसमें कुछ निबंध लिखना है, वह थोड़ा लिखवा दीजिये। निबंध में कम से कम तीस-चालीस लाईनें लिखनी पड़ती हैं, टॉपिक अच्छी लेनी पड़ती है और समझ नहीं होता है कि पच्चीस-तीस लाईनें किस तरह से लिखें। इसीलिये उसने पिताजी से कहा और पिताजी गुस्से में ही थे। तो उसने पीछे से मुक्का मार दिया और बच्चा जाकर सो गया। 3-4 घण्टे बाद पिताजी उसके पास गये और देखा कि बच्चा सो रहा है और पीछे में कॉपी भरी हुई है। जिस विषय में निबन्ध लिखना था उस विषय पर बच्चे नें खुद सोच-सोच कर लिखा।
उसने लिखा कि-“जब परीक्षा का समय आता है, तब मैं बहुत तनाव में रहता हूँ और परेशान सा हो जाता हूँ। याद करने कि क्षमता नहीं रहती, परन्तु उस परीक्षा के बाद जब छुट्टियाँ होती हैं तो एक आनन्द की प्राप्ति होती है।” उसके आगे उसने लिखा कि-“जब मैं बीमार होता हूँ तो मेरे मम्मी-पापा मुझे कड़वी दबाई पिलाते हैं, शुरुआत में तो वह बहुत ही कड़वी लगती है परन्तु बाद में मुझे उस बीमारी से, रोग से निवृत्ति की प्राप्ति हो जाती है।” फिर उसने लिखा कि- “माता-पिता मुझे अक्सर डाँटते भी हैं और मुझे थोड़ा गुस्सा भी आता है, परन्तु उस डाट के बाद में मुझे ज्ञान की प्राप्ति होती है। हर समय मैं महसूस करता हूँ कि माता-पिता नें मुझे सही मार्ग पर लाने के लिये डाटा था।” इस प्रकार का वाक्य जब उसने बच्चे के पुस्तक में पढ़ा तो पिता भी एक प्रकार से सठिया गया कि वास्तव में मैं दिन भर चिल्लाता रहता हूँ, नाटक-गुस्सा करता रहता हूँ। परिवार में कोई न कोई आता-जाता रहता है, जब भी उन लोगों को देखता हूँ, हाय-हेल्लो करते रहते हैं। मैं परेशान रहूँ या नहीं, कभी Good Morning कहते हैं, कभी Good Evening कहते हैं। “कैसे हो’’, और सब ठीक चल रहा है।
ऑफिस में भी जब जाता हूँ तो मेरे साथ के जितने भी सहयोगी हैं, कार्यकर्ता हैं, वह कुछ न कुछ बात करने की कोशिश करते रहते हैं, परन्तु मैं तनाव में ही रहता हूँ। फिर उसने चिन्तन किया कि-मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं तो निश्चित रुप से मैं बहुत ही अहोभाग्यशाली हूँ; मेरे पास संन्तान भी हैं, अच्छा गृहस्थ चलाने वाली पत्नी भी है और जिनके पास तो संतान ही नहीं है, संतानहिन परिवार है तो उन पर क्या बीतती होगी। जिनके घर में पत्नी ही नहीं है, उनका परिवार कैसे चलता होगा..?, बिना माँ के बच्चे कैसे रहते होंगे ….? उससे ज्यादा सौभाग्यशाली मैं हूँ।
मैं कार्य-व्यापार, नौकरी करता हूँ और उसके लिये मुझे अत्यधिक मेहनत करनी पड़ती है, एक अच्छा भाव-चिन्तन होने से कार्य-व्यापार में लाभ प्राप्त होता है जिससे मैं अपने परिवार का भरण-पोषण करता हूँ। कईयों का तो व्यापार भी नहीं चलता है, नौकरी भी नहीं मिल पाती है, किस तरह से वे अपने परिवार का भरण-पोषण करते होंगे। उनके तुलना में तो मैं बहुत ही सौभाग्यशाली हूँ। आपके घर में मेहमान आते-जाते रहते हैं तो निश्चिंत रुप से ही आपका परिवार, आपके कुल-गोत्र में वर्चस्व है। मेरे प्रति वे कुछ अच्छी भावना लेकर आते हैं,मैं बहुत ही शान्त हूँ तभी तो लोग कई बार मुझसे मिलने आते हैं, मेरे बच्चों से, मेरी पत्नी से मिलने आते हैं, मेरे मित्र मुझसे बराबर बातचीत करते रहते हैं, तो वास्तव में मेरे अन्दर कुछ न कुछ सुश्रेष्ठता है जिस वजह से वे वार्तालाप करना चाहते हैं, बातचीत करना चाहते हैं। मैं बहुत ही खुशनसीब हूँ कि इतने अच्छे-अच्छे मेरे मित्र हैं, सहयोगी हैं।
इसका तात्पर्य यह है कि सांसारिक जीवन में, प्रारम्भ में हम नकारात्मक स्वरुप में जब सोचते हैं, तो हम तनाव, प्रमाद, चिन्ताओं से ग्रसित हो जाते हैं। प्रत्येक को यह समस्या होती है कि दिन भर काम करना, नौकरी करना, कमाना, दुकान में जाना और शरीर टुटता सा रहता है, शरीर के अन्दर कमजोरी सी आ जाती है परन्तु बाद में हमें लाभ की प्राप्ति होती है। पूरे महिने भर हम अच्छी नौकरी कर रहे हैं तो हमें उसके परिणाम स्वरुप Salary प्राप्त होती है। इसीलिये जीवन में जितना हम नकारात्मक भावों के बारे में चिन्तन करते हैं, विचार करते हैं उतनी ही हमारे जीवन में दुःख, संताप, कष्ट, पीड़ायें बढ़ती हैं।
बहुत परेशान हूँ गुरुजी, बहुत व्यथित हूँ, बहुत दुःखी हूँ। इस तरह की बातें जब हमारे मानस-चिन्तन में सदैव चलती रहती हैं तो हमारे जीवन में दुःखों का विस्तार होता है। ‘ये तो जीवन का हिस्सा है, बराबर चलता रहेगा। कुछ साल बाद तक चलेगा या एक-दो साल पहले तक चलेगा।’ इस प्रकार से हम चिन्तन करके, सकारात्मक (Positive) सोच से हम जीवन में कार्य करते हैं कि ये तो मेरा कर्तव्य है। मेरा परिवार है, मेरा संतान है, मेरे माता-पिता हैं, मेरे भाई-बहन हैं, पति-पत्नी, मित्र हैं, एक अच्छा सा घर बना हुआ है तो वस्ताव में ये सद्गुरु का कृपा-प्रसाद है, बहुत से लोगों के पास तो अच्छा घर भी नहीं है फिर भी वे किसी तरह से अपने जीवन को चला रहे हैं; जो लोग किसी टूटे-फूटे स्थान में रहते हैं, उनसे ज्यादा मैं सौभाग्यशाली हूँ।
जीवन में सकारात्मक सोच-विचार रखना है, सकारात्मक सोच से हमारे सारे काम अच्छी तरह से, सकारात्मक रुप में सम्पन्न होते हैं और जब नकारात्मक सोचेंगे कि जीवन में शांति नहीं है, घर में और अन्तस: भाव, आत्म भाव में जो प्रसन्नता होनी चाहिये वह प्रसन्नता नहीं है; ये सब चीजें हमें बाहर से प्राप्त नहीं होती हैं। दुःख-कष्ट-पीड़ा हो या आनन्द, प्रसन्नता हो, सौभाग्य हो या दुर्भाग्य हो यह बाहर से प्राप्त नहीं होता है; ये सब हम अपने भीतर से उद्धृत करते हैं, हमें जैसे-जैसे विचार-भाव आते हैं, तैसे-तैसे हमारे जीवन की क्रियाएं सम्पन्न होती हैं। जब निरन्तर हम प्रकाश पुंज बनाते हैं तो उससे हमारे नकारात्मक स्थितियों का ही नाश होगा।
बहुत दुःख है, बहुत पीड़ा है, बहुत रोग है, पत्नी बीमार रहती है, माता ठीक नहीं है, बच्चा बीमार रहता है तो जिस तरह से ईश्वर ने हमारा चिन्तन-भाव रखा है, वैसे ही उन अर्नगल क्रियाओं का जीवन से निस्तारण भी करता है। आप ये सोचिये कि ये तो हमारा कर्तव्य है उनका पालन-पोषण करना, उनके दवाई का, सही तरह से ईलाज करवाना, उनका ध्यान देना, अपने संतान के प्रति मेरा दायित्व है, Duty है, कर्तव्य है, ऐसी सकारात्मक सोच रखते हैं तो जीवन में सकारात्मक स्थितियों का विस्तार होता है।
यह “शिष्यत्व पूर्णिमा” अर्थात् किस तरह से सांसारिक मनुष्य, साधक और शिष्य, भक्त जीवन में हर रुप में, जो उसके मन में नकारात्मक सोच की वजह से अपूर्णता भरी हुई है, कैसे वह पूर्णता से युक्त हो सके। मैंने कई बार बताया है कि ज्ञान के रुप में, शक्ति के रुप में, धन लक्ष्मी के रुप में ज्ञान-चेतना की प्राप्ति हो, चिन्तन तो हमारे मन में है ही; भले ही हम बराबर न्यूनतम रुप से क्रियाशील हैं, और वह क्रियाशीलता नकारात्मक रुप में भी जा रही है और सकारात्मक रुप से भी जा रही है। ज्ञान को किस तरह से हम अपने जीवन में और अधिक उज्ज्वलता की ओर, श्रेष्ठता की ओर क्रियाशील कर सकें, किस प्रकार हम अपने बुद्धि का, अपने दिमाग का, शक्ति का उपयोग करते हैं, उसी तरह की हमारे जीवन में स्थितियाँ बनती हैं और साथ ही साथ हमारे भीतर में जो शक्ति है; चाहे वह मानसिक शक्ति हो, आध्यात्मिक शक्ति हो, आर्थिक शक्ति हो या शारीरिक शक्ति हो, हम उस शक्ति को किस तरह से और अधिक नियोजित कर करते हैं, क्रियाशील कर सकते हैं, हमें सबसे अधिक इसका चिन्तन करना चाहिये।
शक्ति का तात्पर्य है “कर्म करने की शक्ति, स्वंय के ज्ञान-बुद्धि को और चैतन्य बनाने की शक्ति।” “शक्ति कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे अर्जित किया जाता है। शक्ति वह चीज है जिसे जागृत किया जाता है।” किस तरह से मैं अपने-आप में बराबर चेतनावान बना रह सकूँ, शक्ति बराबर हमें ऊर्जा प्रदान करती है-कर्म करने की ऊर्जा प्रदान करती है और जब भी हम शक्ति के होते हुये भी उसका नियमित रुप से सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। तो निश्चित ही हमारे जीवन की जो ऊर्जा होती है, वह हताशा, निराशा के रुप में तब्दील हो जाती है, बदल जाती है और हम स्वस्थ होकर भी हताश, निराश होकर हर समय परेशान रहते हैं।
हम मन्दिर में प्रार्थना करते हैं ताकि हम जाग सकें। हमारे मस्तिष्क में जागृति का विचार रहे कि मुझे अमुक समय में अमुक कार्य को सम्पन्न करना है। कोई भी कार्य करें तो अपने ईष्ट को, अपने भगवान को मन ही मन स्मरण करते हुए करें। चाहे भोजन ग्रहण कर रहे हों, ऑफिस में बैठें हों, काम कर रहे हों, मन ही मन अपने ईष्ट का, अपने सद्गुरु का चिन्तन करते रहें तो ये अनर्गल भाव-चिन्तन नहीं आयेगा। गुरु मंत्र करते हुए यदि हम भोजन बनाएं न तो बराबर हमारा ध्यान केवल गुरुमंत्र और भोजन के तरफ ही रहेगा और यदि हम घर में चिल्लाएंगे, चिड़चिड़ाहट करेंगे, पति-पत्नी, बच्चों पर गुस्सा करेंगे तो भोजन चाहे जितना भी अच्छा बना लेंगे परन्तु वह सुस्वादु नहीं बन पायेगा, हमारे लिये पाचन योग्य नहीं बन पायेगा। दुनिया भर के कामों में व्यस्त, उलझे हुए रहकर भी अपने ईष्ट का, अपने सद्गुरु का स्मरण करते रहेंगे तो निश्चित रुप से हमारे ऊपर किसी तरह से बॉस का प्रेशर नहीं रहेगा, तनाव नहीं रहेगा; ये काम नहीं किया, वो काम नहीं किया, झनझनाहट नहीं रहेगी तो उस समय भी हमें आनन्द की प्राप्ति होगी। उस समय भी पूर्ण रुप से 8-10 घण्टे आराम से ऑफिस में कार्य करेंगे, फिर भी फ्रेश (Fresh) रहेंगे, गुस्से में झल्लायेंगे नहीं।
कोई भी कार्य हो। यदि पढ़ रहे हैं, कोई भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं तो मन ही मन में अपने ईष्ट का, अपने गुरु का ध्यान-चिन्तन करें, जिससे एकदम एकाग्र भावना बनी रहती है। पूजा में भी बैठें, जब भी साधना कक्ष में बैठें, मंत्र जाप करें बराबर ध्यान-चिन्तन चलता रहे। मन में विचार आ रहा है तो भी माला फेरते समय आँखें बन्द करके बैठें, अपने ईष्ट का, अपने सद्गुरु का, ध्यान-चिन्तन भी करते रहें। जब उनसे एकरुपता हो जायेगी, योग वाली स्थितियाँ बन जायेगी। तब मनुष्य के जीवन में एक सकारात्मक स्थितियों का विस्तार होने लगता है।
नहीं तो होता क्या है – आप काम तो कर रहे हैं Kitchen में, रसोई में और ध्यान कहीं और लगा हुआ है। किसी का गुस्सा किसी और पर निकाला जा रहा है। सुबह-सुबह अपने शरीर को नियोजित करके तैयार तो हो गये कि मैं बाहर जाउं तो थोड़ा अच्छा दिखुं और अपने पत्नी पर, बच्चों पर, परिवार के सदस्यों पर गुस्सा किये जा रहे हैं तो हमारे शरीर के अन्दर ही प्रसन्नता का भाव नहीं आ पायेगा। छोटी-छोटी बातें हैं, परन्तु उन छोटी-छोटी बातों का जीवन में पालन करने से ऊर्जा की वृद्धि होती है। आप भोजन कर रहे हैं, खाना खा रहे हैं और आपका ध्यान मोबाईल और टी. वी. पर है तो वह भोजन सुपाच्य नहीं बनेगा। चाहे जितना भी सुपाच्य, ऊर्जा युक्त बना होगा किन्तु आपके लिये पाचन योग्य बनेगा ही नहीं। भले ही उसे आपके माता-पिता, भाई-बहन ने बनाया है। भोजन भी करना है तो ध्यान-चिन्तन से कि मेरे सद्गुरु की कृपा से, ईष्ट की कृपा से, माँ अन्नपूर्णा की कृपा से अपनें जीवन में ऊर्जा की वृद्धि के लिए, आत्मचित्त भाव से, मैं नहीं ग्रहण कर रहा हूँ; इसे मेरे सद्गुरु ग्रहण कर रहे हैं।
मैं कोई पूजा कर रहा हूँ, कोई मंत्र कर रहा हूँ, ताकि मेरे ईष्ट से तादात्म्य वाला सम्बन्ध बना रहे। तब जाकर कोई भी पूजा हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ बन पाती है, तब हम सार्थक हो पाते हैं और हमें साधनाओं में उच्चताओं की प्राप्ति होती है।
साधना में सिद्धि प्राप्त नहीं हो रही है, मेरा ध्यान नहीं लग रहा है, मन नहीं लग रहा है, मैं जब-जब पूजा स्थान में बैठ रहा हूँ तो उबासी सी आती है, अनावश्यक विचार आने लगते हैं। यदि पहले से ही इस प्रकार का चिन्तन करेंगे तो निश्चित रुप से तादात्म्य वाले भाव आते हैं।
एक बार वृन्दावन में मीरा भगवान श्रीकृष्ण के लिये रात्रि में भोग बना रही थी और साथ ही मन ही मन में गुनगुना रही थी- भगवान श्रीकृष्ण के बारे में-
हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दरद न जाने कोय,
सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय।
दरद की मारी बन बन डोलूँ वैद मिल्यो नहीं कोय,
मीरां की प्रभु पीर मिटै जब वैद सांवलया होय।।
पुरोहित आया पीछे से – “ये क्या कर रही है, शुद्धि भी नहीं किया, तुझे कुछ सुध-बुध भी नहीं है, मैले-मैले तेरे कपड़े हैं, स्नान भी नहीं किया और इसी तरह से भगवान को भोग लगाने जा रही हो।”
उदास सी हो गयी मीरा। क्योंकि जितने भी दिन वह भोजन बनाती थी बराबर आनन्द भाव से, प्रसन्न भाव से मन ही मन में भगवान श्रीकृष्ण की भजन-गीत गुनगुनाती रहती थी और प्रसन्तापूर्वक वह प्रसाद बना देती थी।
पुरोहित द्वारा डाट दिये जाने के कारण दूसरे दिन वह थोड़ा अच्छे से आई; थोड़े साफ़-सुथरे व शुद्ध कपड़े पहनकर और बराबर उसे यही चिन्तन रहा कि मेरे कपड़ों के ऊपर किसी तरह के छींटे, प्रसाद के छींटे या सब्जी के छींटे न लगे। नित्य तीन-चार दिन ऐसा किया।
बाद में भगवान श्रीकृष्ण नें पुरोहित को स्वप्न में दर्शन दिया और बोले – “तीन-चार दिन से मैनें प्रसाद ग्रहण नहीं किया है। शायद प्रसाद जिसने बनाया है उनसे आत्मीय रुप से, प्रसन्नता पूर्वक नहीं बनाया। इसलिये मैं प्रसाद ग्रहण नहीं कर पाया।”
ध्यान रहे! प्रसाद बनाने के लिए आवश्यक नहीं है कि शुद्ध वस्त्र ही हो, स्नान किया हुआ ही हो। केवल और केवल भीतर में शुद्ध चिन्तन होना चाहिये। हम निरन्तर जो भी कार्य करें, अपना ध्यान-चिंतन अपने ईष्ट की ओर, अपने गुरु की ओर, अपने परमेश्वर, अपने कुल देवता की ओर ही बनाये रखें। केवल बाहरी आँखों से शुद्धता नहीं चाहिये, भीतर के आँख से भी हमें शुद्धता का भाव-चिन्तन आना चाहिये, एक चेतना आना चाहिये। भीतर से शुद्धता का भाव ही नहीं है-फटे हुए कपड़े पहन लिये, पुरानी धोती पहन लिया, गंदे वस्त्रों को लपेट लिया तो उससे हमें तनिक भी चेतना की प्राप्ति नहीं हो पाती है और जब भीतर से मन शुद्ध है तो लोग क्या कहेंगे, हमारे आस-पास वाले क्या कहेंगे; यह सब चिन्तन करने की हमें आवश्यकता ही नहीं पड़ती; वह स्वतः हमारे चेहरे पर झलक जाता है।
हम सबके चेहरे पर आधी-आधी मुस्कुराहट होती है। प्रसन्नमय भाव बनाकर थोड़ा सा फोटो खिंचवा लिया, स्टेटस लगा लिया, थोड़ा सा मुस्कुरा दिया। सबसे हँसकर बात कर लिया, बस हो गया। अगर उनसे पूछो भी कि और सब ठीक चल रहा है?
तो सदा एक ही उत्तर – हाँ-हाँ सब ठीक चल रहा है…
वास्तव में होना क्या चाहिए?
हमारे विशुद्ध अन्तःकरण से स्वतः ही छलछलाहट, खिलखिलाहट आनी चाहिए। वही हमें सद्गुरु प्रदान करते हैं कि किस तरह से अपने आप को आनन्द से युक्त रखना है। इसलिये हमेशा साधक और शिष्य को अपने सद्गुरु को आत्मसात करने के लिये, अपने सद्गुरु में समाहित होने के लिये, उनसे मिलने के लिये स्वयं ही प्रवृत्त होना है।
गुरु तो आपके साथ हैं ही। परन्तु आपका भी भावना-चिन्तन होना चाहिये कि मेरा साकार रुप में उनसे एकाकार हो सके, मैं एकरुप हो सकूं। एकाकार होने से ही योग की स्थितियां उत्पन्न होती हैं।
और जहाँ योग का भाव होगा वहाँ आपको कभी ऐसा नहीं प्रतीत होगा कि गुरुजी तो जोधपुर में हैं, दिल्ली में हैं और मैं तो यहाँ रायपुर में या वाराणसी में बैठा हूँ। बल्कि मेरे साथ हर समय मेरे गुरु हैं, मेरे ईष्ट हैं; हर समय ऐसी ही भावना बनी रहती है तो वास्तव में गुरु से हमारी दूरी चाहे चार सौ किलोमीटर की हो या आठ सौ किलोमीटर की; वह दूरी, दूरी नहीं रह जाती। और हम बहुत पास में होते हुए भी साकार रुप में गुरु को आत्मसात नहीं कर सके, हम गुरु के और गुरु हमारे भीतर में समाहित न हो सके तो हमारा गुरु मंत्र करना, चेतना मंत्र करना, पूजा-साधना करना सब कुछ व्यर्थ है।
हमारे जीवन में जो भी अपूर्णता है- अपूर्णता किस बात की है? मेरा शरीर कुछ और कर रहा है, मन में कुछ और विचार आ रहा है। सोचता हूँ कुछ और, करता हूँ कुछ और; चेतना कुछ और बना है, क्रियाएं कुछ और हो रही हैं।
क्यों हो रही हैं ऐसी क्रियाएं…?
मुझसे लोग अक्सर कहते हैं – “गुरुजी! मैं तो चिन्तन करता हूँ, विचार करता हूँ, परन्तु वो कार्य पूर्ण नहीं हो रहे हैं…?”
क्योंकि आप चिन्तन तो कर रहे हैं, विचार तो कर रहे हैं, परन्तु उन विचारों के साथ परस्पर ताल-मेल नहीं बैठा रहे हैं। इसीलिए आपका कार्य पूर्ण नहीं हो पाता है। इच्छाएं तो मैं बहुत करता हूँ परन्तु इच्छाएं मेरी पूर्ण नहीं हो पाती हैं।
इच्छाओं के साथ योग वाली स्थितियों का जुड़ाव नहीं है। जिसके कारण हमारी कामनाएं पूर्ण नहीं हो पाती हैं। क्योंकि विचार अलग चीज है, चिन्तन अलग चीज है, इच्छाएं-भावनायें अलग चीज हैं परन्तु उसे हम एक रुप में नहीं बैठा पाते हैं। बस हमने सोच लिया कि ये होना चाहिए।
परन्तु हम क्रिया क्या कर रहे हैं…?
क्रिया तो कुछ कर ही नहीं रहे हैं।
मैनें तो अपनी प्रार्थना अपने सद्गुरु को प्रदान कर दिया, उनके श्री चरणों में डाल दिया। परन्तु गुरु के श्री चरणों से हृदय के भीतर में कैसे स्थापित होगा? ये विचार भी तो करना चाहिये न…, भीतर में उतारने का क्रिया करना पड़ेगा न।
मैनें तो गुरुजी से प्रार्थना कर लिया, धूप भी जला लिया, चरणस्पर्श भी कर लिया और अपनी अभिलाषा, ईच्छा भी प्रदान कर दिया, ये सब प्रदान करने के बाद हम ये भी कहते है कि मेरी इच्छाएं पूर्ण नहीं हुई। क्यों नहीं पूर्ण हुई? क्योंकि आपने उनके श्री चरणों में अर्पण तो अवश्य किया परन्तु अपने हृदय भाव में अपने सद्गुरु को, अपने ईष्ट को धारण नहीं किया। उन्होंनें जो चेतना प्रदान किया, ज्ञान प्रदान किया उसको अपने भीतर में समाहित करने का प्रयास नहीं किया।
समुद्र मंथन में सबसे पहले क्या निकला… विष निकला। उसका पानी भी खारा होता है और अंत में क्या निकला…? अमृत निकला। हमारा जीवन भी ऐसा ही है। ज्यों-ज्यों हम जीवन का बन्धन करेंगे, ज्यों-ज्यों जीवन में हम क्रियाशीलता रखेंगे, त्यों-त्यों हमारे जीवन का विष निकलता रहेगा और अंत में हमें अमृत चेतना की, आनन्द चेतना की प्राप्ति होगी। इसलिये पहले हमें सुकृत कर्म करते हुए कुकर्म को दूर करना ही होगा। तब हमें उस सुकृत कर्म का फल सुश्रेष्ठता के रुप में प्राप्त हो पायेगा। पहले से ही फल की कामना करते हो; गुरुजी! मेरी ये ईच्छा है, ये कामना है; गुरुजी! ये कर दो, मेरी ईच्छा पूर्ण कर दो, तो साधना सफल नहीं हो पाती।
गुरुजी! मुझे संतान की प्राप्ति हो जाय। परन्तु उसके लिये तो क्रिया करनी पड़ती है ना। माता-पिता की अभिलाषा रहती है कि उनके पुत्र-पुत्रियों की शादी हो जाय। जिससे की उनका कुल-वंश बढ़े, तो उसके लिये कुछ श्रेष्ठ कर्म भी करने पड़ते हैं। जीवन के जो दुर्भाग्य हैं, उनको समाप्त करने की क्रिया भी करनी पड़ती है।
मैनें अच्छी नौकरी प्राप्त कर लिया है, नौकरी के लिए कुछ न कुछ तो अच्छा कर्म भाव चाहिये। मेरा व्यापार अच्छा चल जाये, व्यापार अच्छा चलाने के लिए, शक्ति होना चाहिये, ज्ञान होना चाहिये कि किस तरह से अपने व्यापार को नियोजित करना है। तब हमें फल की प्राप्ति होगी, हमें अमरत्व और आनन्द तत्व की प्राप्ति होगी। आनन्द तत्व को प्राप्त करने के लिये, प्रसन्नता को प्राप्त करने के लिए, पहले भीतर के ज्वर का मर्दन करना जरुरी है और वह ज्वर का मर्दन आपके ईष्ट की कृपा से…. ऐसा नहीं है कि चौबिसों घण्टे दृष्टिपात ही लेते रहें। कर्म करते हुए, कोई भी कार्य कर रहे हैं आप; बस मन ही मन में हमारे सद्गुरु का स्मरण बराबर बना रहे।
ऐसा नहीं है कि बस गुरु पूर्णिमा पर… मैनें तो लिखा भी है-“हमारा जन्म किस कुल-समाज में हुआ, कौन हमारे माता-पिता, सगे-सम्बन्धी, रिश्तेदार, या पड़ोसी हैं। उनके बारे में व्यर्थ चिन्तन करने से जीवन में श्रेष्ठता व अनुकूलता नहीं आती है। अपनी वर्तमान परिस्थितियों को अनुकूल व लाभकारी बनाने के लिये ज्ञानी, विद्वानों, संतजनों व सद्गुरू द्वारा प्राप्त ज्ञान को जीवन में क्रियान्वित करते हुये व सफल लोगों की संगत में रहने से ही संतमय उच्चता युक्त श्रेष्ठ जीवन निर्मित होता है।” नित्य प्रतिदिन स्मरण रखने का भाव-चिन्तन रखिये। आप चार माला मत कीजिए, बस चौबीसों घण्टे मन निरन्तर सद्गुरु को जपता रहेगा तो आपके कार्य अवश्य सफल होंगे। रात को सपनें आते हैं, डर बना रहता है; “ऊँ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः”, “ऊँ नारायणाय नमः-ऊँ नारायणाय नमः” जपते रहेंगे तो सारा भय निकल जायेगा और अगर रात्रि में अपने सद्गुरु का स्मरण करेंगे तो दिन भी अच्छा जायेगा।
मैंने क्या बताया था-घर में बीमारी है, पैसे की तंगी रहती है, तनाव बना रहता है, छोटा सा मेरा परिवार उनमें भी आनन्द वेग नहीं है, एक दूसरे से कट-कट कर रहे हैं। मन में कई सारी ईच्छाएं रहती हैं और हम दिमाग खराब करेंगे, हर बात पर गुस्सा करेंगे, कुछ भी हुआ तो बातों-बातों में गालीयां बोलेंगे। जहाँ इस प्रकार का वातावरण बन रहा है वहाँ पर सही तरीके से सद्गुरु की, या ईष्ट की उपासना नहीं हो रही है, सकारात्मक चिन्तन नहीं है, Positive सोच नहीं है जिसके कारण से इस तरह की अनर्गल स्थितियाँ विस्तार ले रही हैं और इस कारण से रोग, कष्ट, पीड़ा अकाल मृत्यु जैसी घटनाएं हो रही है। फिर हम दोष देते हैं दूसरों को कि मेरे ऊपर तंत्र प्रयोग है, मेरे ऊपर पिशाच दोष है, पित्रों का दोष है। वास्तव में पितृ तो बहुत अच्छे हैं, हमें इतना अच्छा, सुन्दर शरीर प्रदान किया पूरे समाज में एक जागरण अवस्था प्रदान किया, पितरों की तो कोई गलती नहीं थी; अगर पितृ ही नहीं होते तो हम आते कहाँ से…?
भीतर के दोषों को ढूँढने की कोशिश करनी चाहिये। उद्भव-विकास किसका करना है? स्वंय का करना है। तो मेरे उद्भव विकास में अड़चनें क्या आ रही हैं। अगर रोग है तो उस रोग-कष्ट का उपचार होगा तभी तो समाप्त होगा न। ठीक इसी प्रकार से जीवन में कड़वाहट है, जीवन में विष रुपी स्थितियाँ हैं उन्हें समाप्त करने के लिये पहले हमें कुछ परहेज़ करना पड़ेगा। तब जाकर हमारे जीवन में प्रमाद, दुःखपूर्ण स्थितियाँ समाप्त हो पायेंगी।
दसों दिशाओं में यश, कीर्ति, वर्चस्व, चेतना और ज्ञान सें आपको आनन्दमय स्थितियों की प्राप्ति हो। आपसे लोग बात कर रहे हैं इसका मतलब कुछ न कुछ आपके अन्दर अच्छे गुण हैं जिसके माध्यम से आप लोगों को सम्मोहित करते हैं, आप के अन्दर वाक्-चातुर्यता है जिसके माध्यम से आप चतुर्दिक् अपने यश, कीर्ति, वर्चस्व का विस्तार करते हैं। पत्नी अगर आपसे प्रेम से बात कर रही है तो वास्तव में आपके अन्दर प्रेम भावना है, अगर आप पत्नी से प्रेम से बात कर रहे हैं तो आपके अन्दर भी तो उसके प्रति स्नेह-आदर-सत्कार वाली भावना है। संतान से हम प्रेममय होकर बात करते हैं क्योंकि हमारा उससे खून का, आत्मीयता का संबंध है और इसके विपरित क्या होता है…? इसके विपरित होने पर संतान के भीतर एक आक्रमण का भाव आता है, उसके भीतर एक शक्ति का, विनाश का विचार आता है। इसलिये बच्चों को गले लगाया जाता है। और अगर महिनों तक दूर-दूर रहते हैं तो धीरे-धीरे बच्चों में प्रेम का विस्तार नहीं होगा। आप अच्छे माता-पिता का फर्ज नहीं निभा पाये। आशय यही है कि हम जैसी-जैसी क्रियाएं करते हैं अपने जीवन में, उसी का परिणाम हम प्राप्त कर रहे होंगे।
गुरु पूर्णिमा का दिवस कोई सामान्य सा पर्व मात्र नहीं होता है, अपितु यह संकल्प शक्ति का पर्व है। जो भी मेरे जीवन का धारणा-चिन्तन, लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प है वह किस प्रकार से परिपूर्ण हो सके। संकल्प का मतलब मैनें क्या बताया कि संकल्प का अर्थ है, ‘हृदय भाव’। हमारे हृदय भाव में वह शक्ति जागृत हो। हमारे जीवन की जो भी ईच्छा-कामनाए हैं वह शक्ति भाव से पूर्ण हो सके, यह संकल्प का वास्तविक भाव है। केवल हाथ में जल लेने से, विष्णु भगवान को अर्पित करने से और आरोग्यता की प्राप्ति हो, धन-सम्पत्ति, शतायु जीवन की प्राप्ति हो… उससे आरोग्यता नहीं आती, शतायु जीवन प्राप्त नहीं होता। अपितु उसका अर्थ तो यह है कि मैनें अपने-आप से एक वचन लिया है, अपने जीवन को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने का, ध्वंस से पुननिर्माण की तरफ जाने का…. उन वचनों को निरन्तर अपने अस्तित्व में क्रियान्वित कर सकूँ, उसके फलस्वरुप ही मेरे संकल्प परिपूर्ण हो सकेंगे। वास्तव में शिष्य पूर्णिमा-गुरु पूर्णिमा, संकल्प का पर्व है, कि किस तरह से मेरे जीवन में शक्तियों का उदय हो। शक्तियाँ तो हमारे अन्दर सुप्त अवस्था में है ही। प्रत्येक साधक के भीतर असीम शक्तियाँ हैं। अगर हम दोस्तों के साथ जोर-जोर से चिल्लाकर गालियाँ बोल सकते हैं तो स्वभाविक है कि हमारे अन्दर शक्तियाँ तो हैं। यदि हम जोर-जोर से चिल्लाकर गालीयाँ दे सकते हैं तो क्यों नहीं हम उस तेजस्विता को, उस शक्ति को सकारात्मक राह की तरफ मोड़े ?
मोड़ सकते हैं, निश्चित रुप से मोड़ सकते हैं। क्योंकि ऊर्जा निरन्तर बढ़ती है, बढ़ते हुए आगे निकल जाती है। फिर हमें जोर-जोर से शक्ति लगाना पड़ता है और वही शक्ति यदि हम अपने भक्ति की ओर, अपने सद्गुरु की ओर, अपने ईष्ट की ओर, सकारात्मक सोच की ओर लगायेंगे तो निश्चित रुप से हमारे कार्य सिद्ध होकर पूर्णता से युक्त हो जायेंगे। ऐसा तो नहीं है कि वह धीरे-धीरे बोलते हुए गाली देते हैं, खूब जोर से बोलते हुए गाली देते हैं। क्रोध में है अर्थात् उसके भीतर में शक्ति तो है। बस उस क्रोध भाव को… क्रोध होना चाहिये कि मैं जीवन में सफल क्यों नहीं हो रहा हूँ…? मुझे किस तरह से जीवन में उच्चतम से उच्चतम स्थिति को प्राप्त करना है… इस बात के लिये क्रोध होना चाहिए।
फिर आपका यह क्रोध जीवन में जोश के रुप में परिवर्तित हो जायेगा और जोश हमें भीतर से उत्पन्न करना होगा।
मैं क्यों नहीं स्वस्थ हो पा रहा हूँ? मैं क्यों नहीं आरोग्य से युक्त हो पा रहा हूँ?
भीतर में एक जोश होना चाहिये कि निश्चित रुप से मैं स्वस्थ हो सकता हूँ और होकर ही रहूँगा। उसके लिये मुझे क्या करना है, मैं वह कार्य करुँगा। इस प्रकार का संकल्प होना चाहिये साथ ही इतना जोश भी कि वह संकल्प हमारे द्वारा ही परिपूर्ण हो सके। तब हम जीवन में पूर्णिमा अर्थात् पूर्णता से युक्त हो पायेंगे।
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल को मैं लिखता मिटाता हूं…
इसीलिए मैं बार-बार बोलता हूँ कि ‘शिष्यत्व पूर्णिमा’, अर्थात् शिष्य किस तरह से गुरुतत्व से परिपूर्ण हो सके, शिष्य किस तरह से श्रेष्ठता और पूर्णता से युक्त हो सके, “पूर्णमदः पूर्णमिदं” स्वरुप बन सके । जीवन में कोई भी अधूरापन, खालीपन नहीं रह सके, अभाव नहीं रहे।
अपने असीम ऊर्जा से हम अनंत रुपों में कार्यरत हो सकते हैं तो क्यों नहीं अपने गुरु, अपने ईश्वर का भजन-ध्यान-चिन्तन करें। कोई मेहनत वाला काम नहीं बोल रहा हूँ, गालियाँ देने के लिये भी नही बोल रहा हूँ, बस भजन-ध्यान-चिन्तन करने के लिये ही तो बोल रहा हूँ। यदि हम अपने माता-पिता को, अपने सास-ससुर को, अपने पति-पत्नी को गालियां देते रहेंगे, तो उनके प्रति सद्भावना भी तो प्रकट कर सकते हैं। हमें इस प्रकार का परिवर्तन करना है, हमें इस बात का संकल्प भाव रखना है।
हर बात पर गुस्सा आ जाता है गुरुजी!
क्यों गुस्सा आ जाता है…? गुस्सा आता है तो उसे साधनें का भी तो प्रयास करना चाहिए न।
हमारे भीतर में उस समय बल वाली भावना आ जाती है, वह आत्मीय बल कहलाता है अर्थात् हम किस प्रकार विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहें, हम सही फैसले लेने और कठिन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो सकें; कब हमें क्रोध करना है, कब हमें सफल होना है, हमें इसका ज्ञान हो।
स्वस्थ भी स्वयं ही होना है, सफल भी स्वयं ही होना है, उन्नति भी स्वयं ही प्राप्त करनी है, तो कर्म भी स्वयं ही करना पड़ेगा। संकल्प भी स्वयं को ही लेना पड़ेगा और संकल्प की पूर्णता स्वयं को ही करनी पड़ेगी। हमेशा, सदैव, निरन्तर गतिशील अवस्था में बने रहना है, चलायमान अवस्था में बने रहना है।
उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में यही अकेला ओछा तिनका।
ऊषा जाग उठी प्राची में-कैसी बाट, भरोसा किन का।।
और जहाँ भी संकल्प में थोड़ा भी टूटने वाली स्थितियाँ आ जाती हैं तो हम धीरे-धीरे बिखर से जाते हैं, रुक से जाते हैं। ऐसा कैसे हो गया…? संकल्प तो लिया था न कि बहुत अच्छे से काम करेंगे। थोड़े देर बाद क्या विचार आता है… ये तो मैं नहीं कर पाउंगा, मुझसे नहीं होगा, मेरे अन्दर उतनी शक्ति नहीं है, मैं समर्थ नहीं हो पाऊंगा; ये एक ही बात हम लगातर बोलते रहते हैं। जब-जब मुझसे मिलने आते हैं तो गुरुजी! अमुक-अमुक कामनाएं हमारी पूर्ण होनी चाहिये। परन्तु चिन्तन मुख्य रुप से क्या आ गया कि यह मेरे लिए संभव नहीं है, मुझसे सारे जीवन में नहीं हो पायेगा अर्थात् हमनें क्षण भर में पूरे जीवन का सार निकाल दिया। आगे जो भी बीस साल, चालीस साल बचे हुए हैं उन चालीस सालों में पुरुषार्थ को प्राप्त नहीं कर पाऊंगा।
ये कार्य मुझसे नहीं होगा गुरुजी!, मेरे जीवन में कोई शक्ति ही नहीं है, अर्थात् हमने असंभव को असंभव ही मान लिया है; असंभव को संभव करने का कोई चेतना-प्रयास या युक्ति ही नहीं है।
कैसे होगा गुरुजी! मतलब किस तरह से होगा उसका भी Idea नहीं है क्योंकि शुरुआत ही नहीं कर रहे हैं हम। जब हम प्रारम्भ ही नहीं कर रहे तो पूर्णता तक पहुँचेंगे कैसे…?
जब जोर से भूख लगती है तो क्या करते हैं, एक कौर, दो कौर करके खातें हैं ना। इससे हमारे पेट की सुरक्षा होती है। तो ठीक उसी तरह से भूख और स्वाद तो बहुत जोरों से पुकार रही थी; मन में बहुत घबराहट और परेशानी सी हो रही थी। थोड़े देर बाद भोजन खाते ही भूख शांत हो गयी। ठीक उसी प्रकार जब हम शुरुआत कर देते हैं किसी भी कार्य को करने की तो हमारे भीतर से ऊर्जा भाव धीरे-धीरे क्रियाशील होते हैं और निश्चित ही उस संकल्प को हम पूर्ण कर ही पाते हैं।
इसीलिये भगवान श्रीराम जब अयोध्या में पुरुषत्व की तरह उत्पन्न हुए तो राजगुरु और प्रधान ज्योतिषी महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि यह बहुत उच्चकोटि का सम्राट बनेगा और आर्य संस्कृति के अन्दर जितनी भी अनर्गल, राक्षसीमय और दुःखमय स्थितियाँ हैं, उनको समाप्त करेगा। परन्तु उन्हें भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरुकुल में महर्षि विश्वामित्र और वशिष्ठ के पास जाना पड़ा। विश्वामित्र खुद चलकर अयोध्या में नहीं आए, राम को स्वयं वहाँ जाना पड़ा ज्ञान प्राप्त करने के लिये।
गुरु गृह गये पढ़न रघुराई, अलप काल बिद्या सब आई।
नीति का ज्ञान हो, कलाओं का ज्ञान, अध्यात्म का ज्ञान या गुरु सेवा के माध्यम से जीवन के समस्त चक्रों को जागृत करना हो, गुरु की शरण उन्हें भी लेनी पड़ी।
कंस का अत्याचार बहुत बढ़ रहा था, वह अपने अपार शक्ति का उपयोग कर सबको मारने लगा। जब देवकी की आठवीं कन्या को पत्थर पर पटककर मारना चाहा, तब वे उसके हाथों से छूटकर आकाश में योगमाया के रुप में प्रकट हो गई। योगमाया ने भविष्यवाणी किया कि एक समय ऐसा आयेगा जब तुम्हारा वध श्रीकृष्ण के हाथों होगा। चिंतीत-भयभीत हो गया वह।
कहाँ उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण…? कारागार में उत्पन्न हुये। आकाशवाणी हो गई कि कंस का सर्वनाश होगा, सारे असुरों का सर्वनाश होगा। कृष्ण को भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए कहाँ जाना पड़ा…? अपने घर से लगभग सात सौ किलोमीटर दूर ‘सांदीपनि ऋषि’ के पास जाना पड़ा और सर्वशक्तियों से युक्त हुए। इसलिए “ज्ञान प्राप्त करने के लिए आपको सदैव अपने हृदय में अपने ईष्ट, अपने सद्गुरु को स्थान देना ही पड़ेगा।”
और निरन्तर-निरन्तर उस ज्ञान के माध्यम से जीवन में प्रकाश वाले स्थितियों का विस्तार करना है। जैसे की कोई बच्चा शिक्षा प्राप्त कर लेता है ना तो बराबर उसको नियोजित करता रहता है, Computer की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह सॉफ्टवेयर (Software) कम्पनी में कार्य करता है और नये -नये प्रोजेक्ट बनाता है। Teacher भी बच्चों को पढ़ाता रहता है तो उनसे घुल-मिलकर हमेशा अपने-आप को नियोजित करते रहता है। ऐसा नहीं कि मैनें एक बार M.A कर लिया, LLB कर लिया तो मैं ज्ञान से परिपूर्ण हो गया, मेरी शिक्षा परिपूर्ण हो गई, वह ज्ञान नहीं है। वास्तविक ज्ञान सही रुप से हमें लगातार कर्म करने की शक्ति प्रदान करता है, चेतना प्रदान करता है, जिससे कि अनर्गल कार्य नहीं हो जाय और अनर्गल कार्य करने का परिणाम हमें जीवन भर भोगना पड़ता है। कोई भी घटना-दुर्घटना तो कुछ क्षणों में ही हो जाती है, परन्तु उसका परिणाम हमें लम्बे समय तक भोगना पड़ता है। तीन घण्टे की परीक्षा में हमनें अच्छे से उत्तरों को लिख दिया तो पूरा साल हमारा श्रेष्ठमय बन जाता है और अगर अच्छे से नहीं लिख पाये तो हमारा जीवन एक साल और पीछे चला जाता है। थोड़ा सा अपने आप को व्यवस्थित रखते हैं अच्छे ढंग से गाड़ी चलाते हैं तो सही रुप से घर पहुँच जाते हैं और गलती से कुछ भी हो जाय तो जीवन भर के लिए हादसा बन जाता है। क्षण में कोई भी चीज परिवर्तित हो सकता है। इसलिये अपने आप को जीवन में अधिक से अधिक सुस्थितियों से युक्त करना है।
हमारे अन्दर कितना चैतन्य भाव है, भक्ति का भाव है, आस्था का भाव है, आस्तिकता का भाव है, और किन भावों की वृद्धि हो, जिससे हमारा और सद्गुरु का, गुरु और शिष्य का, शिष्य और गुरु के बीच और अधिक सामिप्यता आ सके। जितनी सामिप्यता आ सकेगी उतना ही हमारे जीवन में उल्लास आ सकेगा, उतना ही हमारे जीवन के कामनाओं, ईच्छाओं की परिपूर्णता का विस्तार होगा। ये सारे विचार कहाँ से आयेंगे…? हमारे ईष्ट के ज्ञान से, सद्गुरु के ज्ञान से, सद्गुरु के चिन्तन-भाव से।
बार-बार मैं बोलता हूँ; कि कोई काम करते हुए भी आपको निरन्तर अपने सद्गुरु को स्मरण करते रहना है, मन ही मन गुरु मंत्र, चेतना मंत्र, गायत्री मंत्र “ऊँ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः”, “ऊँ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः”, करते रहना है, जिससे अनर्गल भाव-चिन्तन, नकारात्मक विचार नहीं आएं, दिमाग में उट-पटांग कार्यों के विचार नहीं आएं। मेरे मन में तो कोई बुरी भावना जा ही नहीं रही है, जब मेरे मन में कोई बुरी भावना नहीं है तो मेरा सब कुछ अच्छा ही होगा। केवल आपका ही नहीं, आपके संतान का, माता-पिता का, पति-पत्नी का, परिवार के सभी सदस्यों के चिन्तन में वृद्धि होती है। जीवन में विष तो आते रहेंगे परन्तु आप अपने सद्गुरु की कृपा से अपने जीवन के विष को निकाल सकें, समाप्त कर सकें और जीवन में अमरता, आनन्द वाले क्षणों से युक्त हो सकें। आप कामना करने और कामना को पूर्ण करने के लिए संसार में आये हैं, मैं नहीं कर पाउंगा, मुझसे कुछ हो नहीं पायेगा, इस प्रकार का मृत्यु रुपी जीवन जीने के लिये नहीं। आप स्वयं को इस मृत्यु से युक्त तो करते ही हैं साथ में परिवार को भी सम्मिलित कर देते हैं।
हमें देव-दुर्लभ शरीर प्राप्त हुआ है और हमारे शरीर में सद्गुरु विराजमान हैं, हमारे ईष्ट विराजमान हैं, फिर भी हमारे भीतर में नकारात्मक भावना आती हैं। आएंगी स्वयं ही परन्तु उसे निकालना भी स्वयं ही है। आपको प्रार्थना करना है-“ हे सद्गुरुदेव! मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करो, मेरा संकल्प ऐसा हो कि ये नकारात्मक भावनाएं मेरे मन-विचार, जीवन में नहीं आएं।” अगर दुर्भावना ही नहीं आयेगा तो मेरा स्वयं ही उद्भव-विकास होने लगेगा, सुख-सौभाग्य, अरोग्यता, संतान-सुख, कार्य-व्यापार में वृद्धि होने लगेगा। उसके साथ मैं ‘कर्म-योगी’ बन सकूँ। कर्म करते हुए अपने जीवन को योग-भोग की स्थितियों से युक्त बना सकूँ।
परन्तु हम सोचने लगते हैं कि अब तो मैं रिटायर्ड हो गया, अब मुझे कुछ नहीं करना है, बस Rest करना है, आराम करना है। ये सब मृत्यु की स्थितियां हैं। 60-65 साल हो गये, हम कर्मशील क्यों नहीं बने रहे। रवि कपूर जी 72 साल के हो गये फिर भी बराबर अपने घर में काम करते रहते हैं और बहुत ही शांत-शांत भाव से। मैनें कभी उनके चेहरे पर क्रोध नहीं देखा। 72 के होने के बाद भी आनंद भाव से सब कार्य करते हैं। अपनें घर में पोछा-झाडू लगा दिया तो क्या गलत किया…? अगर मैनें कपड़ा धो दिया, किचन में मदद कर दिया तो क्या नुकसान हो गया? हर काम पत्नी और बहु ही क्यों करेगी? मेरे हाथ टुट गयें हैं क्या? हमें छोटे-छोटे कार्य करने में भी आनंद भाव आना चाहिये। कोई भी कार्य हो, बच्चों के साथ रहें तो एक आनन्द भाव से रहें। बच्चों को अपने दादा-नाना के साथ रहने की ईच्छा होती है। जब हम उन बच्चों के साथ रहकर बच्चे बन जाते हैं तो उनके साथ एकरुपता बन जाता है, भले ही मैं 70 साल का हो गया परन्तु मैं भी उस 5 साल के बच्चे के ही तरह हूँ। हर दिन कुछ नये विचार की प्राप्ति होती है। पत्नी भले ही साठ वर्ष की हो गई, उसे भी सती भाव रखना चाहिए, किस प्रकार से चालीस साल-पचास साल मैनें परिवार का वृद्धि किया है, सकारात्म सोच रखना चाहिये। अब खा-पी नहीं रही है, बीमार चल रही है, बुढ़ीया सुख गई है, अच्छी नहीं लग रही है…। पत्नी मेरी है, मुझे इस तरह की ही क्यों रखनी है…? मैं हर सुख-दुःख में उसके साथ हूँ। इन छोटी-छोटी बातों को हम ध्यान में रखते हैं न, तो परिवार में आयु-आरोग्यता की वृद्धि होती है और सदैव कर्म करने की भावना बनी रहती है, शरीर में कोई चंचलता नहीं आती, शरीर में कुछ रोग हो जायेंगे; ठीक है शरीर में थोड़ी दुर्बलता व्याप्त हो जाती है, उस स्थिति में भी भीतर की शक्ति ही काम आती है हमेशा; बाहर की शक्ति काम नहीं आती है, शारीरिक शक्ति काम नहीं आती है, जितनी कि आत्मिक शक्ति-मानसिक शक्ति काम आती है।
साल के श्रेष्ठतम भगवान सदाशिव महादेव के दिवस पर, उस परम् सौभाग्य के दिवस, आने वाले गुरु पूर्णिमा पर्व पर पूर्ण समर्पण से आत्मसात कर सकें, अपने जीवन को, अपने शिष्यत्व को परिपूर्ण करने की शक्ति को हमें आत्मसात करना है। हमारे जीवन में जितनी भी विषपूर्ण स्थितियाँ हैं, पिशाचपूर्ण स्थितियाँ हैं वे समाप्त हो सकें, तथा हम अमरतत्व की पूर्णरुपेण प्राप्ति कर सकें।
पहले भी बताया है मैनें की “चिन्ता, प्रेम और कर्ज किसी के कहने से प्राप्त नहीं होता है, हम स्वयं ही उत्पन्न करते हैं।”
बहुत दुःखी-बीमार चल रहा हूँ, पैसे की बहुत कमी है, बहुत तंगी है। किसी नें कहा था क्या कि बैठकर चिन्ता करो! चिन्ता करने से समस्या का समाधान नहीं निकल सकता। “चिन्ता, चिता के समान होती है।” पैसे की कमी है तो चिन्तन करो, सोच-विचार करो। अपने बच्चों के पढ़ाई-लिखाई का चिन्तन करो। उनकी पढ़ाई, शिक्षा और पाठ्यक्रम भी चिन्तन की बात करते हैं, चिन्ता की बात नहीं करते। और कर्जा भी, हम किसी के कहने से कर्जा नहीं लेते, बल्कि कुबुद्धि के फलस्वरुप ये नौबत लाते हैं। तीसरा था ‘प्रेम’। किसी के कहने से प्रेम नहीं होता है। तुम मुझे प्रेम करो, तुम मुझे प्यार करो, बदले में मैं तुम्हे प्यार करुंगा; ऐसा नहीं होता है। प्रेम तो स्वतः ही भीतर से जागृत होता है। स्वतः ही सत्तर साल की औरत से प्यार हो जाता है, 20 साल की लड़की से प्यार हो जाए या 18 साल के लड़के या किसी विवाहित से प्रेम हो जाय। वह प्रेम है, आनन्द का प्रेम है, आत्मियता का प्रेम है, वह किसी के कहने से नहीं होता है कि नहीं तुम मुझसे प्यार करो मैं तुमसे प्यार करुंगा, उससे आनन्द नहीं आ सकता। ये सब स्थितियाँ जीवन में स्व ही जागृत होती हैं, किसी के कहने से नहीं।
इस प्रेम के माध्यम से आनन्द की वृद्धि होती है। एक लड़का है वह लड़की से प्यार कर रहा है तो एक आनन्द भाव का विस्तार हो रहा है। उसमें नफ़रत वाली स्थिति या कोई गलत बात-चित नहीं होता है। मैं यदि सत्तर वर्ष की आयु में किसी से प्यार कर रहा हूँ तो इसका मतलब मेरे अन्दर प्रेम का भाव-चिन्तन है, आत्मीयता का भाव-चिन्तन है, जब मिश्राजी से बात करता हूँ, मुकेशजी से बात करता हूँ या और किसी शिष्य से बात करता हूँ तो उनसे एक आत्मीयता आत्मियता का प्रेम है।
विचार करना चाहिए। विचार मतलब जैसा मैं चिन्तन कर रहा हूँ, वैसा ही मेरे सामने वाला भी चिन्तन करना चाहिये। वो वह चिन्तन मन में और उत्साह प्रदान करता है। बहुधा लोग हमें गलत नज़र से देखते रहते हैं क्योंकि दृष्टि ही ऐसी है। ये कुदृष्टि बुद्धि से आती है और बुद्धि में तो निरन्तर कुबुद्धि का भाव भरा हुआ है।
इसलिये प्रत्येक साधक को आनन्द से युक्त होना ही चाहिये, प्रसन्नता से आप्लावित होना चाहिये। प्रत्येक साधक-साधिका, मानस पुत्र-पुत्रीयों को यही आशीर्वाद प्रदान कर रहा हूँ-
आयुर्बलं विपुलमस्तु सुखित्वमस्तु कल्याणमस्तु विपुला तव कीर्तिरस्तु।
श्रीरस्तु धर्ममतिरस्तु रिपुक्षयोऽस्तु संतानवृद्धि अभिवांछित सिद्धिरस्तु।।
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