





साधना के पथ पर न तो कोई पुरूष होता है और न कोई स्त्री, वह तो सम्पूर्ण साधक होता है।
जब शिष्य गुरू के पास आता है, तो बिल्कुल एक मिट्टी के लौदे की तरह होता है। वे उसको शीतलता युक्त घड़े में परिवर्तित कर देते हैं। इस क्रिया को करने के लिये गुरू को बाहृ रूप से आघात करना पड़ता है, लेकिन आंतरिक रूप से वे अपनी कृपा ही प्रदान करते हैं।
एक जलती मशाल को तेजी से गोल घेरे में घुमाया जाये, तो उससे बना रोशनी का वृत्त न वास्तविक होता है न अवास्तविक दीप। उसी प्रकार से यह जीवन श्रृंखला भी अकथनीय है। जीवन की सत्यता भी यही है, लेकिन सांसारिक चिंतन से छुटकारा हो भी तो कैसे? मिथ्या देहाभिमान छूटे भी तो कैसे? व्यर्थ के प्रपंच विनष्ट हों भी तो कैसे? इन सबका बोध बिना गुरू संभव नहीं है।
साधक की यात्रा शून्य से प्रारम्भ होकर ब्रह्म तक पहुंचती है और गुरू के माध्यम से ही ब्रहृ की यात्रा संभव होती है। जिसने ब्रह्म को जान लिया उसने गुरू को जान लिया। जो गुरू से एकाकार हो गया, वह ब्रह्म से एकाकार हो गया।
मैंने जिन्दगी भर से मेहनत कर ऊसर रेगिस्तान में गुलाब का…. और इस गुण से सम्पन्न वह तभी हो सकता है जब अपने आपको गुरू की शरण में अर्पित कर दे।
प्रेम जीवन का अद्वितीय वरदान है और मैंने तुम्हारे होठों को गुनगुनाहट देकर तुम्हारे जीवन में वसन्त का प्रस्फुटन किया है।
क्योंकि तुम्हारे पास एक दिव्य पथ है जाग्रत चैतन्य गुरू एवं दिशा दृष्टि स्पष्ट है।
परन्तु गुरू के प्रेम का रास्ता इतना आसान नहीं है, यह तो तलवार की एक धार है जिस पर चलने से पैर लहुलुहान हो जाते हैं। यह ऐसी पगडण्डी नहीं है जिसके नीचे पुष्प बिछे हों, प्रेम करना तो बहुत कठिन है, तकलीफदायक है। पूर्ण हृदय से प्रेम करने की क्रिया बिरले को ही आ पाती है।
प्रेम का तात्पर्य है ईश्वर,और जब तक प्रेम के रस में भीगेंगे नहीं, ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती, गुरूदेव से साक्षात्कार नहीं हो सकता…. और यह अंदर उतर कर प्रभु से साक्षात् करने की क्रिया ही तो प्रेम है।
यदि कोई शिष्य चाहे कि मैं गुरू को हृदय में समेट लूं, गुरू को अपने जीवन में पा लूं, गुरू को अपने में आत्मसात् कर लूं, और यदि उसके हृदय में प्रेम की सरिता नहीं है, यदि उसके हृदय में प्रेम रस नहीं है, तो वह अपने जीवन में, अपने हृदय में गुरू को उतार भी नहीं सकता।
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