





इस काया में इतनी अधिक क्षमता और शक्ति है कि यदि हम चाहे तो असंभव कार्य को भी संभव कर सकते है प्रश्न इतना ही है कि हम उन सम्भावनाओं को पहचाने और अपने में निहित उन विशेषताओं को जगाने का प्रयत्न करें जिससे हम पूर्णतः तक पहुँच सके।
तुम्हें उज्जवल भविष्य के लिये निरन्तर प्रयत्नशील होना पड़ेगा इसके लिये प्रबल पुरूषार्थ की आवश्यकता है।
मेरा स्वप्न यह भी है कि मेरे शिष्य सिद्धाश्रम की पवित्र भूमि का स्पर्श कर, अपने जीवन को धन्य कर सकें तथा उसकी चेतना से ओतप्रोत होकर, वहाँ की सिन्नग्धता में तरल होकर, वहाँ पावनता में पवित्र होकर, वहाँ की ज्योत्सना से शुभ्र होकर इस समाज को यह बता सके कि बिना भौतिकता को छोड़े हुये भी कैसे जीवन के उस तरोज लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
गुरू तो शिष्य को माया में इसलिये ग्रस्त करता है कि वह सोचता है इसको धक्के देकर देख लूं एक बार, दो बार, चार बार। क्या यह जीवन भर शिष्य बन सकता है या केवल श्रोता ही रहेगा क्योंकि श्रोता कभी शिष्य नहीं बन सकता।
शिष्य तभी बना जा सकता है जब मन के विकारों को धीरे-धीरे धकेलता हुआ गुरू की ओर बढ़ सके। काम, क्रोध, मद, लोभ ये विकार होते हैं जो शिष्य को गुरू में समर्पित नहीं होने देते।
जब शिष्य विगलित होने लगता है, अपने आप में पश्चाताप करने लगता है, तो उसके आंसुओं से संचारी भाव धुलने लगते हैं तब गुरू अपने पैर के अंगुष्ठ से उसको स्पर्श कर अपने आप में पूर्णता प्राप्त करते हैं तब वह जीवन का आनन्द ले पाता है।
शिष्य की कोई पहचान नहीं होती, वह केवल शिष्य होता है, न तो उसकी जाति होती है और न ही उसका धर्म होता है, न कोई बंधन होता है, न मां होती है, न बाप होता है, जब तुम मेरे पास हो तो दूसरा कोई बंधन नहीं हो सकता।
अंधकार का अर्थ है ‘अज्ञानता’। अज्ञानता का अर्थ है -‘ज्ञान की न्यूनता’। केवल जीना कोई कला नहीं है। आप सांस ले रहे हैं, जिन्दा हैं या चल रहे हैं यह कोई कला नहीं है। कला है कि आप जीवन को किस तरह से गतिशील करते हैं और जीवन को गतिशील करने की क्रिया है वह अपने आप में पूर्ण ज्ञान है, चेतना है और फिर वह नहीं तो फिर अंधकार है।
जिसमें ज्ञान है वही जीवन में पूर्ण है। जिसमें ज्ञान है, विवेक है वह जानता है कि मुझे क्या करना है और मैं क्या कर रहा हूं। मैं प्रेम फैला रहा हूं, घृणा फैला रहा हूं या आनन्द फैला रहा हूं, चेतना फैला रहा हूं या दूसरों को सुमार्ग पर गतिशील कर रहा हूं या कुमार्ग पर गतिशील कर रहा हूं-यही विवेक है।
जब अन्दर से चेतना आती है, अंदर एक आलोकन प्रकाश होता है तो धीरे-धीरे उस स्थिति पर पहुंचते है जहां कुण्डलिनी जाग्रत होने लगती है तब चेहरे पर एक आभा एक विद्वता झलकने लगती है और सरस्वती कंठ में स्थापित हो जाती हैं।
तन से कोई किसी का नहीं होता है। वह तो मन से ही हो सकता है क्योंकि मन तो अपने आप में पूर्ण पवित्र होता है मन से ही मन का सम्बन्ध हो सकता है मेरा मन शुद्ध है तो सामने वाले का मन भी शुद्ध है।
सेवा के माध्यम से ही चेतना एवं सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। यह सबसे कठिन सेवा है क्योंकि इसमें आज्ञा पालन ही है। लेना कुछ नहीं है सब देना ही है। आज्ञा पालन ही करना है और उसके माध्यम से ही सब कुछ प्राप्त कर लेना है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,