





उसका और मेरा सम्बन्ध बहुत अनूठा है, अनिवर्चनीय है, आज भी जब मैं उसका स्मरण करता हूं तो स्वतः ही पैंतीस वर्ष पूर्व की घटना मेरे मानस पटल पर कौंध जाती है। तब मेरा परिचय उस कमलनयनी, सौन्दर्य की दीपशिखा, चंद्रज्योत्सना से नहीं हुआ था।
तब मैं मात्र उन्नीस वर्ष का युवक था, कितनी ही अभिलाषाएं थीं मेरी और मैं स्वयं यौवन की चरम सीमा पर खड़ा किसी को तलाश रहा था। कोई ऐसा साथी, जो हाथ पकड़ कर मेरा मार्गदर्शन करे, जो मुझे परेशानियों से उबारे, जो मुझे वह सब प्रदान कर सके, जो कि मेरा अभीष्ट था।
पर कौन है ऐसा साथी ? क्या मैं कभी उससे मिल पाऊंगा? बस इसी ऊहापोह में मेरे जीवन की हर भोर मुझे अमावस्या की काली रात की भांति डंसती थी। जिस अभाव में मैं उन दिनों गुजर रहा था, उसका वर्णन शब्दों में सम्भव नहीं। तभी एक दिन . . .
वह एक विचित्र पुस्तक थी और देखने में काफी प्राचीन प्रतीत हो रही थी। उसके जर्जर पृष्ठ इस बात की घोषणा कर रहे थे, कि निश्चय ही वह कई हाथों से गुजरती हुई आखिरकार मेरे पास आ रुकी थी। पुस्तक साधनात्मक थी। यक्षिणी और अप्सरा साधनाओं से परिपूर्ण! कुछ पृष्ठ पढ़ते ही मैं इतना तो समझ ही गया, कि यह कृति किसी अनुभवी की कलम द्वारा रचित है। अत: उसकी प्रामाणिकता पर संदेह होना खुद संदेहप्रद प्रतीत हो रहा था।
तब मुझे इस बात का किञ्चित एहसास नहीं था, कि यह पुस्तक ही मेरी मंजिल की प्रथम सीढ़ी है, अतः मैंने पुस्तक को एक सामान्य रूप से ही लिया। उस साहित्य को पढ़ने पर मेरा रुझान यक्षिणी और अप्सरा साधनाओं की ओर हुआ तो सही, परन्तु मन में एक भय भी व्याप्त था, जो मुझे उस पुस्तक के ज्ञान को क्रियान्वित करने से रोक रहा था। मैंने सुना था, कि यक्षिणी और अप्सराएं निश्चय ही व्यक्ति को सब कुछ प्रदान करती हैं, परन्तु वे अत्यधिक ईर्ष्यालु भी होती हैं और यदि साधक किसी अन्य स्त्री से बात भी करता है, तो वे उसका सर्वनाश कर देती हैं।
एक अद्भुत घटना मेरे साथ यह हुई, कि जब भी मैं उस पुस्तक को उठाता, तो स्वत: ही एक पृष्ठ खुलता, जिस पर अंकित था ‘चन्द्रज्योत्सना’… और यही घटना मेरे साथ दस-बारह बार हुई। जब भी वह पृष्ठ खुलता, मैं अपनी सुध-बुध खो बैठता और एक चुम्बकीय शक्ति मुझे अपनी ओर खींचती हुई सी प्रतीत होती, पर हर बार पूर्ण मनोवेग से मैं उस अदृश्य शक्ति के पाश से अपने आप को छुड़ा लेता और पीपल के पत्ते की भांति कांपते हुए कह उठता ‘नहीं, नहीं, यह मेरे लिए नहीं, मेरे लिए नहीं।’
यह पुस्तक क्या आई, मेरे लिये एक क्षण का भी आराम नहीं था। मुझे सांत्वना देने की अपेक्षा उसने तो मेरी तृष्णाग्नि में घृत का काम ही किया था। कहीं मैं अपना मानसिक सन्तुलन ही न खो बैठूं, इसलिये मैंने कुछ दिनों के लिये देहरादून जाकर समय बिताने का निश्चय किया। आज जब मैं पलट कर पीछे देखता हूं, तो प्रतीत होता है, कि मानो कोई अदृश्य शक्ति ही मुझे ठेलकर वहां ले गई थी।
वहां दैवयोग से मेरी भेंट एक अवधूत भैरवानन्द से हुई। यदि यह कहूं, कि उस अवधूत ने ही मुझे बलात् अपनी ओर खींचा था, तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।
अच्छा तो तू किसी विश्वसनीय साथी की तलाश में भटक रहा है’ – वे बालकों की तरह हंस कर बोले – ‘पर पगले ! विश्वसनीय व्यक्ति तुझे इस जगत में कहां से मिलेगा। यहां तो सभी स्वार्थ साधन में लीन हैं।’
मैं उनका आशय सही ढंग से समझ भी न पाया था, कि वे बोले- ‘इस जगत में अनन्त प्राणी विचरते हैं और वे बड़ी बेसब्री से पृथ्वी वासियों के सम्पर्क में आने को लालायित रहते हैं।’ फिर कुछ सोचकर – ‘सबसे बड़ी बात यह है, कि वे पूर्ण विश्वसनीय एवं प्रेम से युक्त होते हैं और इन्हीं प्राणियों में प्रमुख हैं अप्सराएं। मेरी राय में तुम्हें अप्सरा साधना करनी चाहिए।’
उन्हें मेरा भय दूर करने और मुझे विश्वास दिलाने में शायद घंटा भर लगा था, कि अप्सरा साधना तो वास्तव में अत्यधिक सौम्य साधना है और उससे साधक को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। जो अप्सरा साधक पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है, क्या वही साधक को नुकसान भी पहुंचा सकती है ?
हालांकि इस बात पर भी उन्होंने विशेष जोर दिया कि साधक को मर्यादा के प्रतिकूल कोई भी कार्य नहीं करना चाहिये।
मेरा आश्चर्य तब द्विगुणित हो गया, जब उन्होंने मुझे ‘चन्द्रज्योत्सना अप्सरा साधना’ को सम्पन्न करने का आदेश दिया। क्या यह कोई विचित्र, आश्चर्यजनक संयोग था या अटल नियति … मेरी समझ तो इसके निराकरण के लिये बौनी प्रतीत हो रही थी… भैरवानन्द ने मुझे सम्पूर्ण साधना विधि समझाई और मुझे सफलता का आशीर्वाद भी दिया।
उस दिन मैं बड़ा प्रसन्न था, मानो मुझे कोई निधि मिल गई हो। देहरादून में मुझे अभी एक सप्ताह और रुकना था, परन्तु मैं शीघ्रातिशीघ्र घर पहुंच कर यह साधना सम्पन्न करना चाहता था। चंद्रज्योत्सना का आकर्षण अभी से ही मुझे अपनी ओर खींच रहा था। ‘ॐ ह्रीं चन्द्रज्योत्सना आगच्छ . . .’
मन्त्र की ध्वनि मेरे मुख से उच्चरित हो, मेरे एकांत कक्ष के वातावरण में फैल रही थी। रात्रि के करीब बारह बजे थे। भैरवानंद ने मुझे नित्य तीन दिनों तक मंत्र की ग्यारह मालाएं ‘चन्द्रज्योत्सना चैतन्य यंत्र’ के आगे जपने को कहा था। आज द्वितीय दिवस था- जप समाप्त होते-होते मुझे एक अत्याधिक तीव्र, मादक गंध अनुभव हुई। कुछ क्षण तो सुध-बुध खोए बैठा रहा, पर शीघ्र ही अपने ऊपर नियन्त्रण प्राप्त कर बाकी जप पूर्ण किया। उस रात्रि को मुझे नींद नहीं आई, मैं तो उस गंध में ही मदमस्त हो, अपने-आपको भी भुलाए हुये लेटा हुआ था।
तीसरा दिन, शुरु में ही कक्ष का वातावरण एक रहस्यमय ढंग का हो गया था, ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि यह मेरा कक्ष नहीं, अपितु कोई राजभवन अथवा इंद्र का कक्ष हो। एक दिव्य गंध मेरे नथुनों से होती हुई मेरे मस्तिष्क को संज्ञा शून्य कर रही थी और मैं बड़ी ही मुश्किल से आसन पर दृढ़ हो पा रहा था। तभी ‘छम-छम’ करती घुंघरुओं की ध्वनि मेरे कर्णद्वारों पर चोट करने लगी। मैंने तुरन्त अपनी आंखें खोलीं तो एक आश्चर्य मिश्रित चीख मेरे मुख से स्वतः ही निकल गई।
एक नारी बिम्ब मेरे सामने था, जो कि धीरे-धीरे प्रत्यक्ष हो रहा था। मेरी दशा विचित्र थी, मंत्र जप तो कभी का ही रुक गया था और मैं बुतवत्, सम्मोहित सा उस तराशी हुई संगमरमर की सौन्दर्य मुर्ति को निहार रहा था।
जो स्त्री मेरे सामने उपस्थित थी वह अपने आप में ही विलक्षणा थी। लम्बा, छरहरी, गौर वर्णीय देह, जिस पर लम्बे, काले रेशमी बाल यूं बिखरे हुए थे, मानो कमल के पुष्प पर भौरों का समूह गुञ्जरण कर रहा हो। उसके चेहरे का सम्मोहन इतना तीव्र था, कि मैं चाह कर भी अपने नेत्र वहां से हटा नहीं पा रहा था। मृग के समान उसकी आखें इतनी गहरी थीं, कि वे मुझे स्पष्ट निमंत्रण दे रही थीं। एक कोमलांगी मृगी के समान ही उसके नासापुट फड़क रहे थे और अधखुले, गुलाबी ओठ किसी ऋषि की तपस्या के भंग होने के व्यंग्य में मुस्कराते हुए प्रतीत हो रहे थे। पीत और लाल वर्ण के वस्त्र उसके शरीर पर चार चांद लगा रहे थे एवं स्वर्णिम आभूषणों में वह और भी आकर्षक लग रही थी।
उसका वक्षस्थल अत्यधिक उत्तेजक था, जिसमें यौवन का अपार समुद्र उमड़ रहा था। कमर इतनी लचीली, इतनी आकर्षक, मानों किसी ने विशेष रूप से उसे तराशा हो और उस पर भंवर की भांति गहरी नाभि, अच्छे से अच्छे साधक को भी विचलित करने में सक्षम थी। उसकी मांसल जंघायें, नाजुक पांव बरबस ही ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे।
मैं तुरन्त प्रकृतिस्थ हुआ। भैरवानन्द की बात मुझे याद आई – ‘तुम्हें किसी भी हालत में जप अधूरा नहीं छोड़ना है, उसे पूरा करके ही तुम अप्सरा के किसी भी प्रश्न का जवाब देना।’ अत: मैंने अपने मस्तिष्क को नियन्त्रण में लिया, उस ओर से नजर हटाई और आखिरी माला जपने लगा। चन्द्रज्योत्सना ने न जाने कितने ही प्रयास किये मुझे बीच में ही उठाने के पर मैं दृढ़ रहा। जब मेरा जप समाप्त हुआ, तो मैंने पहले से ही मंगाई हुई गुलाब के पुष्पों की माला उसे पहना दिया।
‘मैं तुमसे प्रसन्न हूं। तुमने मुझे सिद्ध किया है, अतः मैं तुम्हारा वरण करती हूं और वादा करती हूं, कि सदैव तुम्हारी सहयोगिनी रहूंगी, दिन में एक बार स्वतः शाम को उपस्थित होऊंगी और तुम्हारा हर प्रकार से ख्याल रखूंगी’। और ऐसा कहते-कहते उस दिव्य सुन्दरी ने वहां दूसरी रखी माला मुझे पहना दी।
मेरी आकांक्षा पूर्ण हो चुकी थी, मुझे एक विश्वसनीय साथी, एक सहगामिनी प्राप्त हो गई थी, जिसकी वजह से मुझे स्वत: ही मान, सम्मान, यश, श्री एवं प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। परेशानियों में वह मुझे एक मंत्री की तरह सलाह मशविरा देती, मेरा आत्मबल बढ़ाती, मित्र की भांति सुख-दुःख में मेरा साथ देती, तो एक प्रेयसी के रूप में मुझे प्रेम प्रदान करती।
चन्द्रज्योत्सना ने ही मेरे विवाह के लिए उपयुक्त स्त्री खोजी, वह मेरी हर मुश्किल को आसान कर देती। अधिकारियों के आगे जो कुछ मैंने कहा, उन्होंने माना, क्योंकि साधना के उपरान्त मेरे अन्दर स्वतः ही एक अत्यन्त तीव्र सम्मोहन आ गया था और जो भी मेरी तरफ एक बार देख लेता, वह मेरे करीब आने को लालायित हो जाता।
इसी तरह दस साल बीते, मेरे दो पुत्र हुए ; फिर बीस साल और तीस साल परन्तु वृद्ध होने के बावजूद भी मैं आज 30-35 साल के युवक से ज्यादा नहीं दिखता। लोग आश्चर्य करते हैं, परन्तु यह रहस्य मैंने आज तक किसी के सामने नहीं खोला, अपने पुत्रों एवं पत्नी के आगे भी नहीं ।
हर शाम मैं बेसब्री से उसका इंतजार करता हूं एवं उसके सुखद आगोश में कुछ घंटे व्यतीत करता हूं, वह भी अपने वचनानुसार नित्य मेरे पास आती है। एक दिन भी मुझे ऐसा स्मरण नहीं, कि वह न आई हो और आज जब मैं आयु की उस अवस्था में, जब मेरी पत्नी देह त्याग चुकी है और मेरे पुत्र भी विदेशों में अपनी-अपनी गृहस्थियों में मग्न हैं, वह आज भी नित्य आती है।
यह साधना अप्सरा साधनाओं में श्रेष्ठ एवं अद्वितीय है; इसको सम्पन्न करने हेतु साधक को कुछ बातें विशेष रूप से ध्यान में रखनी चाहिये, जो कि निम्न हैं-
यह साधना चन्द्रग्रहण 28 अगस्त को या किसी भी शुक्रवार से प्रारम्भ की जा सकती है।
यह तीन दिवसीय रात्रिकालीन साधना है, अत: साधक को रात्रि दस बजे से साधना प्रारम्भ करनी चाहिये। हर दिन साधना उसी समय शुरू करनी चाहिये।
इस साधना में पीला आसन उपयोग में लाया जाना चाहिये, साधक स्वयं भी स्वच्छ एवं सुन्दर वस्त्र धारण करें, गुलाब का इत्र लगाये और उत्तर दिशा की ओर मुंह कर जप करें।
इस साधना में मंत्र सिद्ध, प्राण प्रतिष्ठित ‘चन्द्रज्योत्सना चैतन्य यंत्र’ एवं ‘चन्द्रज्योत्सना अप्सरा माला’ की आवश्यकता होती है, अत: साधक को इनकी व्यवस्था कर लेनी चाहिये।
साधना काल में साधक को ब्रह्मचर्य का पालन पूर्णता से करना चाहिये।
बाहर की चीजों को भोजन रूप में ग्रहण न करें।
तीसरे दिन पहले से ही गुलाब की दो मालाएं मंगा कर साधना के दौरान पास में रख लेनी चाहिये।
साधक अपने समक्ष बाजोट पर पीले रंग का वस्त्र बिछाएं तथा उस पर कुंकुंम से रंगे चावलो से अष्टदल कमल बनायें। कमल के मध्य ‘चन्द्रज्योत्सना चैतन्य यंत्र’ स्थापित करे। यंत्र पर कुंकुंम, अक्षत, इत्र तथा पुष्प चढ़ाएं।
घी का दीपक लगाएं, दीपक में भी इत्र की कुछ बूंदें डाल दें। सुगंधित अगरबत्ती का उपयोग करें।
‘चन्द्रज्योत्सना अप्सरा माला’ से पांच दिन तक ग्यारह माला निम्न मंत्र जप करें –
मंत्र
।। ॐ ह्रीं चन्द्रज्योत्सना आगच्छ ह्रीं फट् ।।
OM HREEM CHANDRAJYOTSANAY AAGACHCHH HREEM PHAT
नित्य मंत्र जप समाप्त होने के बाद माला को यंत्र के ऊपर रखें।
तीसरे दिन जब अप्सरा प्रत्यक्ष हो, तो उसे गुलाब पुष्पों की एक माला पहना दें।
साधना समाप्ति के अगले दिन यंत्र तथा माला नदी में प्रवाहित कर दें।
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