





ब्रह्मांड में ऐसा कोई बिंदु नहीं है जहाँ प्रकृति का अंत हो और सद्गुरु का आरंभ हो। प्रकृति स्वयं सूक्ष्म विलीन प्रक्रिया द्वारा सद्गुरु रुप में परिवर्तित हो जाती है और सद्गुरु स्वयं सूक्ष्म प्रकटीकरण द्वारा प्रकृति के रुप में होता है।
जून माह का विशेषांक ऊर्जा रुपांतरण के माध्यम से शक्ति जागरण, आत्म जागरण तथा किस प्रकार से शुद्ध चिंतन द्वारा अमृतत्व की प्राप्ति हो सके, इन विषयों को समेटे हुये था। जुलाई माह का विशेषांक भौतिक जीवन के विभिन्न समस्याओं से निवृत्ति प्राप्त कर तथा संकल्प शक्ति को साधकर जीवन में उच्चताओं की प्राप्ति पर केन्द्रित था।
आज मनुष्य ने क्षणिक आनन्द, क्षणिक मुस्कुराहट के कुएं में ही जीवन यापन करना स्वीकार कर लिया है। जिसके कारण वह नदी और सागर तुल्य बनने की चेष्टा करना भी भूल गया है तथा सदैव नकारात्मकता के जंजाल में स्वयं को फंसा हुआ अनुभव करता है। इन्हीं नकारात्मक जंजालों की निवृत्ति हेतु ही ‘गुरु तत्व’ के चेतना की आवश्यकता इस ब्रह्माण्ड को है।
पूर्ण पुरुष की शून्यता सकारात्मक और पूर्ण होती है, वह हर क्षण जीवंत और गतिशील होते हैं। हमारे भीतर असीमित शक्ति सुप्त अवस्था में विद्यमान है। अतः सद्गुरु अपने परमतत्व की ऊर्जा (Active Energy) और चेतना को शिष्य के अन्दर प्रवाहित कर उसे जागृत अवस्था प्रदान करते हैं। इस जागृत अवस्था की प्राप्ति कैसे हो। इन्हीं तत्वों का विवेचन श्रृंखला के इस अंक में-
हम मानसिक रुप से जितना गुरुमय रहेंगे, हमारे जीवन में उतना ही प्रसन्नता व्याप्त होती है। प्रसन्नता की प्राप्ति हेतु स्वयं को किसी न किसी रुप में खुश, आनन्दमय रखने का भाव-चिन्तन करना चाहिये। हमारे ईष्ट से, कुल गुरु से, कुल देवता से या हम जिसकी भी अराधना, उपासना करते हैं उनसे हमारे भीतर उच्छवास की भावना आती है, भीतर से मन प्रसन्न हो जाता है कि आज प्रातः मैंने अपने सद्गुरु का स्मरण किया या मैंने विधि-विधान से पूजन सम्पन्न किया। कोई भी उत्सव, पर्व, त्यौहार आता है और उसे आनन्द भाव से सम्पन्न करते हैं तो हमारे भीतर में आनन्द की वृद्धि होती है और फार्मल रुप में करते हैं तो जीवन में केवल औपचारिकता मात्र रह जाती है। इसलिये जीवन औपचारिकता को करने हेतु प्राप्त नहीं हुआ है बल्कि सदैव खुश, प्रसन्न रुप में निखिलमय ऊर्जा को प्राप्त करने का चिन्तन हेतु; जिससे हमारा पूरा रोम-प्रतिरोम गुनगुनाने लगे। तब उत्तरोत्तर हम जीवन के सभी श्रेष्ठताओं को आत्मसात कर पाते हैं। कुछ ही क्षणों में आषाढ़ी पूर्णिमा प्रारम्भ हो जायेगी। गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर निरन्तर हमारे सद्गुरु से जुड़ाव हो सके। उनसे हमारी आत्मियता के चिन्तन में वृद्धि हो सके। इसी हेतु सात्विक रुप से हम जिन शक्तियों को आत्मसात करते हैं उन्हीं शक्तियों से हम परिपूर्ण होते हैं।
इसलिये ऐसे शुभ अवसर पर अपने सद्गुरु से, अपने ईष्ट से पुनः तादात्म्य हो सके, इसके लिये पहले आपको गुरुत्व चेतना अर्थात् गुरु दीक्षा से अभिभूत होना होगा। गुरु दीक्षा का अर्थ ही है कि जिस तरह से मेरे सद्गुरु पूर्ण हैं, उस प्रकार सद्गुरु के समान ही मैं अपने आप को परिपूर्ण कर सकूँ, जिससे की मेरे जीवन में कोई भी दुर्गन्ध, मलिन और सड़ान्धमय कुस्थितियाँ नहीं रहे। गुरु पूर्णिमा ऐसा दिवस है जब पुनः अपने को सद्गुरु से जोड़ने की क्रिया, ऐसा गठबंधन होना चाहिये जिसका कभी विघटन नहीं हो सके। यदि बार-बार हमारा जुडाव होता रहेगा तो अनेकों प्रकार के संताप-कष्ट आयेंगे तो गुरु-शिष्य का, शिष्य-गुरु का गठबंधन टुटेगा नहीं। संकल्प का तात्पर्य है-“मैंउनक्रियाओंसे, उन श्रेष्ठताओं से युक्त हो सकूं जो भविष्य में मुझे प्राप्त करनी है।”उसकेलियेहमेंशक्तिकीआवश्यकताहोतीहै।मैंनेकईबारकहाहैकिशक्तिहमारेभीतरअसीममात्रामेंभरीहुईहै।बसउसेउजागरकरनाहै।उसीभावकीप्राप्तिकेलियेहमसीधे (दाहिने) हाथमेंजललेतेहैं।
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरंगं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।।
इस प्रकार के शुभ-मांगलिक अवसर का मूल्य, अमुल्य होता है, जब सैकड़ों साधकों के द्वारा गुरु मंत्र, चेतना मंत्र, महामाया मंत्र, गायत्री मंत्र का उच्चारण हो रहा होता है तथा हम अपने कानों और नेत्रों के माध्यम से, आत्मचिंतन के माध्यम से अपने रोम-प्रतिरोम धारण करते हुये आत्मा को जागृत करते हैं। तो कोटि-कोटि गुना हमें लाभ की प्राप्ति होती है और वह लाभ हमारे जीवन में जीवन्त-जागृत बन सके। गुंजरण के साथ-साथ ही हमारे जीवन में पूर्ण रुप से नारायणमय शक्तियों का विस्तार हो सके, हमारे रोम-प्रतिरोम में उनकी चेतना आ सके।
हमारे भीतर की उद्विग्नता, आलस्य-प्रमाद हैं, वे हमारे रोम-प्रतिरोम के जागृत होने से ही समाप्त हो सकेंगी। उसके लिये सदैव साधनात्मक चिंतन भी रहना चाहिये, जिससे की हम अपने जीवन के साधनों, संसाधनों को प्राप्त कर सकें। पूर्णिमा तो आने वाली है और हम भी जीवन में पूर्णता से युक्त होना चाहते हैं, हमारे जीवन में कोई अपूर्णता ही नहीं रहे। जब हम पूर्ण-पूर्ण रहेंगे तो…….., यदि पूर्ण के अन्दर और पूर्ण मिल जाता है तो वह सदैव ‘पूर्णमदः’ ही रहता है और जो आधा-अधूरा रहता है तो उसका जीवन बराबर डोलता रहता है। कहते हैं न –
सही राह से फरकत जाय, अधजल गगरी छलकत जाय।।
अर्थात्- आधे पानी से भरे हुए घड़े को यदि अपने सिर पर, कन्धे पर रखकर जाते हैं तो छलकती है वह; डगमग-डगमग होती रहती है।
हमारा जीवन ऐसा नहीं होना चाहिये। हम प्रत्येक रुप से, देव स्वरुप स्थितियों की प्राप्ति करें, हर रुप से हम परिपूर्ण हो सकें। हमारे अन्तसः में इस प्रकार का भाव होना चाहिए। और वह परिपूर्णता…. ऐसे शुभ अवसर पर आप कोई हेतु-उद्देश्य लेकर आये हैं, उस उद्देश्य को नियोजित करने से ही वह पूर्ण हो सकेंगे, हमारे जीवन के जितने भी दुःख-संताप, कष्ट हैं; वे विलगित हो सकेंगे, समाप्त हो सकेंगे। अगर सद्गुरु के इन चरणों में, ईष्ट के श्रीचरणों में ये संताप दोष समाप्त नहीं हो सकेंगे तो और कहाँ होंगे। हमें यह चिन्तन करना है-
पापान्धकारार्क परम्पराभ्यां तापत्रयाहीन्द्र खगेर्श्वराभ्याम्।
जाड्याब्धि संशोषण वाडवाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम्।।
स्वयं सद्गुरु या उनकी चरण पादुका पाप रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश लाती हैं, वे ‘तापत्रय’ अर्थात् तीन तरह के तापों-दुःखों (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) को दूर करते हैं और अज्ञानता के समुद्र को सुखाकर ज्ञान प्रदान करते हैं। ऐसे सद्गुरु तथा उनके चरण पादुका को मैं बारंबार नमन करता हूँ।
एक बार शिष्य ने अपने गुरु से पूछा कि “गुरुजीमैंअपनेजीवनमेंबहुतहीहताशहूँ, निराश हूँ, जीवन में बहुत दुःख और कष्ट है। कोशिश तो मैं सदैव करता रहता हूँ परन्तु मेरे कष्ट समाप्त ही नहीं होते हैं। क्या करुँ…..?” हर समय मैं तो परिवार के लिये कार्य करता हूँ फिर भी किसी भी प्रकार का खुशी या आनन्द की प्राप्ति ही नहीं हो पाती है।
गुरु ने कहा कि “चलो थोड़ा जंगल का भ्रमण करके आते हैं। वहाँ जाकर मैं तुम्हें, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा।”
वह साधक गुरु के साथ में गया। थोड़ी ही दूर जाने पर एक बड़ा पत्थर दिखाई दिया। गुरुजी ने कहा-“रुको! इसपत्थरकोसरपरउठाकरलेचलो।”
गुरु ने आज्ञा दी। साधक ने प्रसन्न भाव से उठा तो लिया, सर पर तो रख लिया। वह चलता रहा। कुछ समय बाद उसे महसूस हुआ कि मेरे सिर पर काफी बोझ है। अब चला नहीं जा रहा है।
गुरुजी ने कहा-“थोड़ीऔरहिम्मतकरो।”
जब गुरु ने कहा तो थोड़ा और हिम्मत किया। काफी देर चलने के बाद बोला-“गुरुजी! अबतोअसहनियसाहो रहा है।”
गुरुजी ने कहा-इस पत्थर को नीचे रख दो।
ज्यों ही उसने पत्थर को नीचे रखा तो उसके भीतर में आनन्द का भाव जागृत हुआ। मेरे सिर पर बहुत बड़ा बोझ था, उस बोझ को मैंने नीचे उतार दिया।
गुरुजी ने कहा-“अबकैसालगरहाहै?”
साधक बोला-“गुरुजी! अबआनन्दमयलगरहा है।”
फिर गुरुजी ने बोला कि “यहीतुम्हारेप्रश्नकाउत्तरहै।”शिष्यसमझनहींपाया।
उन्होंने बोला कि “जीवनमेंजबतकहमदुःखरुपीभारकोअपनेसिरपरलेकरचलतेरहेंगे, तब तक हमें जीवन बोझमय लगेगा, पीड़ामय लगेगा।”
हम दूसरों के दुःखों को पत्नी के, पति के, बच्चों के कष्ट-पीड़ाओं को बराबर लेकर चलते रहते हैं, इसलिये ही हमें आनन्द की, खुशी की प्राप्ति नहीं हो पाती है और ज्योंहि तुमने पत्थर नीचे रखा, तो हल्कापन महसूस किया न; तो ठीक इसी प्रकार से जीवन में जो भी कष्ट-पीड़ा आती है उनको यह सोचकर किनारे करना कि यह तो जीवन की एक क्रिया है, यह तो बराबर चलती रहेगी। उसके कारण से आप अपने जीवन के आनन्द को क्यों खो रहे हैं। हमें खुशी पत्नी पत्नी से नहीं मिलती है, बच्चों से नही मिलती है या धन से नहीं मिलती है। वह तो हमें क्षणीक सुख प्रदान करते हैं। हम जितना ही अपने सिर का या जीवन का बोझ निकालते हैं, उतनी ही हमें खुशी-प्रसन्नता मिलनी प्रारम्भ हो जाती है।
परन्तु हम ऐसी क्रिया करते नहीं है। पूरा जीवन भर हम खटते रहते हैं-खटते रहते हैं, चलते रहते हैं, बराबर बोझ ढ़ोते रहते हैं और एक दिन समाप्त हो जाते हैं। फिर जीवन के अंतिम अवसर में सोचते हैं कि कुछ प्राप्त नहीं कर पाये। क्यों नहीं कर पाये….? क्योंकि केवल दुःखों को ओढ़ते रहे; हमने उनको साइड में नहीं किया। जीवन में जो गतिशीलता का भाव होना चाहिये, उस गतिशीलता को हमने समाप्त सा कर दिया और केवल और केवल उसी मकड़जाल में, मकड़ी की तरह… दो-तीन बच्चे और पति-पत्नी…., इतने में ही हम उलझे रहे। इसके कारण ही जीवन दुर्गंधयुक्त बन गया।
अघायुः इन्द्रियारामः मोघं पार्थ स जीवति।
स्वयं का एक आनन्द-मस्ती वाला भाव होना चाहिये। ठीक है जीवन में कष्ट है, पीड़ा है, संतान नहीं पढ़ रहा है तो इसके लिये क्या चिंता करना; वह स्वयं का भाग्य बनायेगा। पति शराबी है, जुआरी है, मदिरापान करता है, आपने उसे समझा दिया; अब यदि उसके बाद भी वह उसका त्याग नहीं करता है तो यह उसका जीवन है। उसके मृत्यु पर साथ थोड़ी न जायेंगे हम। घर में कलह है, ठीक है, एक सीमा तक हमनें कलह को शांत कर दिया समाप्त करने के बाद यदि वह समाप्त नहीं हो रहा है तो यह उनका जीवन है। उनके पीड़ा के कारण अपने जीवन को दुर्गंध, सड़ांधयुक्त क्यों बनायें? हमें इस बात का चिन्तन करना है। मेरा जीवन है, मुझे किस प्रकार से अपने जीवन में श्रेष्ठता की ओर बढ़ना है ताकि इस जन्म के बाद अगला जन्म इससे भी अच्छा श्रेष्ठतम रुप में प्राप्त हो सके। जीवन तो प्राप्त होना ही होना है; जन्म से आप मुक्त नहीं हो सकते। यह तो सदैव एक चक्र चलता रहता है तभी तो सृष्टि में वृद्धि होती है।
ज्यों-ज्यों हम उच्चताओं से, दिव्यताओं से युक्त होते हैं; त्यों-त्यों हम अपने सद्गुरु को, अपने ईष्ट को आत्मसात कर पाते हैं। तब हमें पूर्ण रुप से नरकतुल्य, सड़े-गले जीवन से मुक्ति मिल पाती है, तब हमें ‘मोक्षदा’ की प्राप्ति होती है अर्थात् जब मनुष्य धर्म-अर्थ-काम से परिपूर्ण हो जाता है। वह आनन्द भाव के साथ जीवन को व्यतित करते हैं।
खाना खा रहे हैं तब भी दुःखी हैं, सो रहे हैं तब भी चिन्ता से ग्रस्त हैं, सुबह-सुबह उठ रहे हैं तब भी तनाव है, काम पर जा रहे हैं तब भी लड़ाई-झगड़ा है, घर में आ रहे हैं तो बहुत उद्विग्न होकर। तब आप किस समय अपने जीवन में प्रसन्नता से पूरित रह पाते हैं….? इस बात का विचार कब किया आपने कि इस समय मैं खुश रहता हूँ। क्या टी. वी. देखने से आनन्द की प्राप्ति होती है? क्या फिल्में देखने से आनन्द की प्राप्ति होती है? हमें यह विचार करना पड़ेगा। वास्तव में यह तो एक क्षणीक आनन्द है। दो घण्टे का फिल्म देख लिया, यह क्षणीक आनन्द है, चेहरे पर क्षणीक मुस्कराहट आ जाती है, परन्तु उन मुस्कुराहटों के पीछे जो अनेक प्रकार की समस्यायें दफ़न हैं उनसे हमें किस प्रकार से निवृत्ति प्राप्त हो सकेगी।
मुझे जिस प्रकार की जिम्मेदारी का कार्य मिला है वो पूर्ण होना चाहिये। बाकि सब कुछ मैंने अपने परमात्मा पर, अपने इष्ट पर छोड़ दिया है। वे मुझे और मेरे कार्यों को एक चेतना और गति प्रदान करेंगे, निरन्तर आगे बढ़ानें की क्रिया करेंगे। हम तो गुनगुनाते भी हैं –
अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में।
है जीत तुम्हारे हाथों में और हार तुम्हारे हाथों में।।
मैनें अपने बच्चों का, पति-पत्नी का कोई ‘कॉन्ट्रैक्ट’ (Contract) नहीं ले रखा है कि उनको सुश्रेष्ठ बनाना है, उनको ज्ञान-चिंतन देना है। आप उनको ज्ञान-चिंतन कब देंगे…? जब हमारे अंदर ज्ञान रहेगा, भीतर में शांतता की भावना रहेगी, आनन्द का जीवन होगा। जब हमारे भीतर में आनन्द रहेगा तब हम अपने पत्नी को, पति को, बच्चों को आनन्द दे पायेंगे। जब हमारे भीतर में ज्ञान रहेगा तब हम अपने पति को, पत्नी को, बच्चों को ज्ञान दे पायेंगे। जब हम स्वयं कुमार्ग पर चलेंगे तब बच्चों को मार्ग कैसे दिखा पायेंगे। स्वयं हम अप्रसन्न हैं और बच्चों को ज्ञान दिये जा रहे हैं- “सदाखुशरहो, माता-पिता के आज्ञा का पालन करो?” हमने कितना किया अपने माता-पिता के आज्ञा का पालन? हम स्वयं के आज्ञा का पालन कितना कर रहे हैं? हमनें स्वयं के विकास के लिये जो संकल्प लिया था, उसे पूर्ण करने का कितना प्रयास कर रहे हैं।
यह गुरु पूर्णिमा संकल्प का दिवस है, शक्ति का दिवस है। हमारे संकल्प की पूर्णता शक्ति के माध्यम से ही संभव है। गुरु पूर्णिमा की रात्री समाप्त होते ही श्रावण मास प्रारम्भ हो जाता है। हजारों बार हमने शिवाभिषेक किया है परन्तु इस बार हमें अपने सद्गुरु का, अपने ईष्ट का, निखिलेश्वरानन्द महाराज का रुद्राभिषेक संपन्न करना है। जिससे कि जिस तरह से हमारे सद्गुरुदेव शिव की शक्तियों से परिपूर्ण हैं, उसी तरह निखिलमय शक्तियाँ, नारायणमय शक्तियाँ मेरे भीतर स्थापित हो सकें, उन्हें मैं प्राप्त हो सकूँ। उनका अभिषेक सम्पन्न करने से मेरा स्वयं का भी अभिषेक हो सके। मेरा और उनका एकरुपता बन सके। मेरे में और निखिल में कोई भेद नहीं रहे।
अगले दिन श्रावण मास के प्रथम दिवस से ही हमारा जीवन सावनयुक्त, उल्लासयुक्त आनन्दमय बन सके। परन्तु उस उल्लास-आनन्द तत्व की प्राप्ति के लिये क्रिया तो करनी पड़ेगी न। केवल भोग लगाने से और प्रार्थना करने से सद्गुरुदेव भी आपके भावों को पूर्णता प्रदान नहीं कर पायेंगे। हमारे भीतर से एक छटपटाहट होनी चाहिये कि किस तरह से हम अपने सद्गुरुदेव से संपर्क स्थापित कर सकें। जब आप अपने मोबाइल से किसी का नंबर लगाते हो तभी तो उनसे बात हो पाती है न। आप मोबाईल से नंबर ही नहीं लगाओ और सोचो कि पत्नी से बात करनी है, बेटे से बात करनी है तो बात ही नहीं हो पायेगी। ठीक उसी प्रकार से जब हम अपने गुरु की सामिप्यता को आत्मसात करेंगे तभी तो उनसे जुड़ाव हो पायेगा न। केवल दूर से चित्र पर प्रणाम करने से जुड़ाव या अटैचमेंट थोड़ी हो पाता है। इसलिये प्रत्येक साधक-साधिका को रुद्राभिषेक अवश्य ही सम्पन्न करना है और पुनः नये रुप में गुरु दीक्षा से भी अभिभूत होना है ताकि इन साल-दो साल में जो भी मलिनता व्याप्त हुई है आप उनको गुरु दीक्षा तथा अभिषेक की तेजस्विता से परित्याग कर सकें, समाप्त कर सकें।
थोड़ा प्रयास करना पड़ता है, कोशिश करना पड़ता है जो लोग कोशिश करते हैं उन्हीं को सफलता मिलती है। रामकृष्ण परमहंस का नाम हम सब ने सुना है। उन्होंने शक्ति को सिद्ध किया और उनका शिष्य विवेकानन्द बहुत ही ओजस्वी-तेजस्वी बनकर पूरे संसार में अपने आप को प्रकाशित किया। रामकृष्ण परमहंस तो बंगाल के रहने वाले थे। एक बार वे नदी के किनारे खड़े थे तो वहाँ के मछुवारे ने वहाँ के बहुत सारे मछलियों को इकट्ठा कर लिया और नाव में डालने लगा। सामने उनका शिष्य भी था। रामकृष्ण परमहंस ने कहा कि “इसमेंतीनप्रकारकीमछलियाँहैं।”
तब शिष्य ने पूछा-“कैसे?”
एक वे मछलियाँ जिन्होंने यह सोच लिया है कि अब हमारी मृत्यु हो गयी है। उन्होंने अपने आप में हार मान लिया।
दूसरे तरह की मछली वो है जो चाहती तो है कि पुनः हम जल में जायें और पुनः हमें जीवन की प्राप्ति हो जाये। परन्तु उसके लिये वह कोई प्रयास नहीं कर रही हैं। सोच कैसी है उन मछलियों की…? कि अब तो हमारी मृत्यु निश्चित है, अब हमें समाप्ति की ओर ही अग्रसर होना है। सामने वाला हमारा भक्षण करेगा ही।
तीसरी प्रकार की मछलियाँ वे हैं जो प्रयास कर रही हैं, कोशिश कर रही हैं, उस नाव के बाहर निकलने की और वे प्रयास में सफल भी हो जाती हैं। वे वापस नदी में चली जाती हैं, उन्हें पुनः एक नवीन जीवन की प्राप्ति हो जाती है।
हमारा भी जीवन ऐसा ही है। हम क्या चिन्तन करते हैं…? कि बस जीवन मिल गया। ठीक है अब आये ही हैं, मरना तो अब है ही। जब तक भोजन मिल रहा है तब तक खा लेते हैं फिर मर जायेंगे तो मर जायेंगे। जिंदा रहने के लिये, अपने आपको उच्चताओं पर पहुँचाने के लिये प्रयास नहीं करते हैं। “ऐसेव्यक्ति, ऐसे साधक, ऐसे मनुष्य मृत समान हैं।”आजनहींमरेंगेतो20 साल बाद मरेंगे, 20 साल बाद नहीं मरेंगे तो 30 साल बाद, 50 साल बाद मरेंगे। वे पूर्णतः मृत्यु के समान हैं। क्योंकि उन्होंने अपने जीवन को बाँध लिया है कि मेरे जीवन में मृत्यु तो आनी ही आनी है। जन्म से लेकर मरण तक के बीच में जो समय है उसे किस तरह से आनन्दयुक्त चेतनाओं से परिपूर्ण करना है हमें उसका चिन्तन नहीं है। दूसरा हम केवल सोचते रहते हैं कि ये करना है, वो करना है, ऐसे करना है, वैसे करना है; करते कुछ नहीं हैं। जन्म मिल गया है शादी कर लेना है, बच्चे पैदा कर लेना है। बच्चों को चाहे कृषि का काम मिले, छोटा-मोटा नौकरी मिल जाये, कोइ धंधा मिल जाये बस कर लेंगे, जीवन चला लेंगे। इस प्रकार के लागों के बारे में चाणक्य निति सदैव कहती है-
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः!
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति!!
अर्थात्, “जिनके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण या धर्म नहीं है, वे इस मृत्युलोक में भूमि पर भारस्वरूप हैं और मनुष्य के रूप में पशु के समान विचरण करते हैं।”
दूसरे जो चिंतन तो करते हैं कि हमें कुछ करना है, परन्तु प्रयास नहीं करते और तीसरे वे जो ये सोचते हैं कि मुझे इस दरिद्रता को, इस गरीबी को, इस अंधकार को समाप्त करना है। वह उसी दिन से प्रयास करने लगते हैं जिस दिन से उन्होंने इन जर्जरता से निकलने का सोचा था। वे निरन्तर प्रयास करते रहते हैं और अंततः उन्हें सफलता की प्राप्ति होती है।
अब आप खुद विचार कीजिये कि मैं कौन से कैटेगरी में हूँ? क्या मेरा जन्म केवल मृत्यु को प्राप्त होने के लिये हुआ है…? अगर हाँ; तब तो कुछ नहीं करना है आपको। ऐसा मुझे नहीं लगता है। आपका चिंतन इस प्रकार का नहीं है। अगर ऐसा चिन्तन होता तो आप इस महोत्सव में आते नहीं। निश्चित रुप से आपके अन्दर दूसरे प्रकार का चिन्तन है कि मुझे अपने जीवन को परिवर्तित करना है पर आप प्रयास नहीं कर रहे हैं। कुछ ऐसे साधक-साधिकायें हैं जो प्रयास नहीं करना चाहते हैं। कल मैनें बताया था कि हमारे अंदर डर-भय बना रहता है कि मुझसे यह कार्य नही होगा, मैं नहीं कर पाउंगा, मेरे लिये असंभव है। हमारे भीतर में इस तरह की नेगेटिव थिंकिंग (Negative Thinking) समाहित रहती हैं। पहले ही हमने अपने आप से हार मान लिया, हताश हो गये। “ऐसेलोगहीजीवनमेंसफलनहींहोपाते।”
इसीलिये प्रत्येक शिष्य को, साधक-साधिका को तीसरे प्रकार का बनना पड़ेगा। कोशिश तो करो। अगर कोशिश करके एक कदम आगे बढ़ाया तो तुम्हे नाइन्टी-नाइन कदम ही आगे बढ़ाने हैं। अगर दो कदम बढ़ाया तो नाइन्टी-एट ही आगे बढ़ाने हैं। “कोशिशकरनेवाले, बार-बार प्रयास करने वाले ही सफलमय होते हैं।”
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती।
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।।
आपके अन्दर वह भावना होना चाहिये कि मुझे अपने मलीन और सड़े-गले जीवन से बाहर निकलना है। हताश नहीं होना है, अपने जीवन में हताशा वाली भावनाओं को व्याप्त नहीं होने देना है। उसके लिये कुछ साधनात्मक प्रयास करना पड़ेगा। मैनें बताया था कि जब साधनात्मक प्रयास करते हैं तब योग वाली स्थितियाँ बनती हैं। हमारे द्वारा साधना करने का जो प्रयोजन होता है, उस प्रयोजन का हमसे जुड़ाव हो जाता है तथा उसकी चेतना और हमारे प्राणश्चेतना का मिलन हो जाता है तो वास्तव में हमें सफलता मिलती ही मिलती है। इसलिये महादेव स्वरुप में, शिव स्वरुप में, माता भगवती के स्वरुप में, शक्ति के स्वरुप में ‘सद्गुरुदेव नारायण’ का रुद्राभिषेक हमें अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये ताकि उनसे हमारा सामंजस्य स्थापित हो सके। तब जाकर हमारा जीवन भी नारायणमय, विष्णुमय, गुरुमय बन सकेगा। हमारे जीवन के जो श्रेष्ठ आयाम हैं, जो भी ईच्छायें, कामनायें हैं वह भगवान विष्णु और सद्गुरु की चेतना से परिपूर्ण हो सकेंगी।
कामनाओं को परिपूर्ण करने के लिये ही हम संसार में आये हैं, इसलिये कामनायें, ईच्छायें तो जीवन में होनी ही चाहिये। और केवल ईच्छा-ईच्छा करने से नहीं होगा; उन ईच्छाओं को परिणीत भी करना है, पूर्ण करने का आत्मविश्वास भी रखना है। उसी के लिये तो हम गुरु पूर्णिमा में आते हैं। कोई दो सौ किलो मीटर दूर से आया है, कोई पाँच सौ किलो मीटर दूर से आया है, कोई नेपाल, राजस्थान से आया है तो कोई उत्तर प्रदेश से आया है। ताकि वह अपनी ईच्छाओं को परिपूर्ण कर सके।
अभिषेक तो हमारा स्वयं का ही होगा। अभिषेक का मतलब हम जीवन में ‘विजय श्री’ से युक्त हो रहे हैं। अभिषेक तो उन्हीं का किया जाता है न। पहले राजा-महाराजाओं को शीर्ष महल में बैठाते थे, यहाँ जब कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनता है तो राज्यपाल या राष्ट्रपति उनको शपथ दिलाता है अर्थात् हमने, जनता ने उनको एक पोस्ट पर शुशोभित किया है, तो वह भी अभिषेक की क्रिया ही है। उसी प्रकार जब हम अभिषेक करेंगे तो निश्चित ही हम उच्च स्थितियों की ओर, अपने कामनाओं-ईच्छाओं, लक्ष्यों की ओर अग्रसर हो पायेंगे।
मैं पुनः ही कहूंगा कि अभिषेक के लिये ‘दिव्य पारद विग्रह’ आप प्राप्त कर लें। प्रातः उठते ही, गुरु-पूर्णिमा का दिव्य काल है और स्वयं को ‘सद्गुरु नारायण’ की चेतना से युक्त होने हेतु सबसे पहले हम ‘गुरु दीक्षा’ को आत्मसात करेंगे और उनका अभिषेक प्रारम्भ करेंगे। जिससे मेरे अन्दर सद्गुरु की चेतना व्याप्त हो तथा सदैव मेरे भीतर में नारायण तत्व का भाव….., ‘ऊँ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः’ अर्थात् गुरुत्वमय, नारायणमय शक्तियों से मैं परिपूण हो सकूँ और साथ ही उसी विग्रह के माध्यम से नारायण के रुद्राभिषेक की क्रिया को भी सम्पन्न करेंगे जिससे कि उसे अपने पूजा स्थान में स्थापित कर सकें। तो वास्तव में जो नारायण का ओज है वह पूरे घर में व्याप्त हो जाता है।
क्यों कहा जाता है कि अपने पूजा स्थान को साफ-सुथरा बना कर रखें, रसोईं को साफ-सुथरा बना कर रखें, बाथरूम को साफ-सुथरा बना कर रखें। ताकि जब पूरा स्थान साफ और स्वच्छ रहता है तब ईश्वर भी प्रसन्न भाव से आते ही हैं। रसोई को साफ-सुथरा रखने से अन्नपूर्णा हमारे लिये सुपाच्य बन पाती हैं। विश्राम कक्ष, जहाँ हम आराम करते हैं, यदि वह भी साफ़-स्वच्छ हो तो पूरे शरीर की थकान समाप्त होकर हमें निद्रा भी आती है और बुरे स्वप्न भी नहीं आते। बाथरुम को साफ-सुथरा रखने से जो Germs या गंदगी होती है वह निकल जाती हैं और हमारे शरीर में, रोम-प्रतिरोम में गंदगी व्याप्त नहीं हो पाती। इन चार तत्वों को बराबर हमें ध्यान में रखना चाहिये।
इन कार्यों के बाद हमें अपने विचारों में भी शुद्धता को व्याप्त करना है। जब हमारे विचारों में शुद्धता का भाव आयेगा तो जो भी हमारे जीवन में अशुद्धता है, विषम परिस्थितियाँ हैं, वो चाहे हमारे अन्दर हो या हमारे जीवन में हो, उनका निस्तारण होता ही है। हमें इन्हीं उच्च चेतनाओं की प्राप्ति के लिये विशेष रुप से संपुटित ‘पारद नारायण विग्रह’ पर अभिषेक सम्पन्न करना है और आपको पूरे श्रावण मास में जब भी समय मिले, ये आवश्यक नहीं कि केवल सोमवार को ही सम्पन्न करना है। पूरे श्रावण महीनें में चार बार ही उनका अभिषेक सम्पन्न करना है यदि आप चार बार से अधिक भी करें तो कोई दोष नहीं है। प्रातः कालिन बेला या संध्या बेला में जब भी आपको समय मिले तो उस चैतन्य पारद विग्रह का अभिषेक सम्पन्न कर लिया। चार बार करने का तात्पर्य यही कि चारों दिशाओं में मेरे वर्चस्व, कीर्ति, यश का विस्तार हो सके और मैं हर तरफ से धर्म, अर्थ, काम और पूर्णता से परिपूर्ण हो सकूँ। इसलिये मैनें आपको चार बार अभिषेक करने का निर्देश प्रदान किया।
“श्रद्धा से ही सुस्थितियाँ जागृत होती हैं।”औरश्रद्धाहीनहींहै, भक्ति ही नहीं है, समर्पण ही नहीं है तो भक्त, ईश्वर से अथवा अपने सद्गुरु से सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकता। श्रद्धा से शांतमय व्यक्तित्व का निर्माण भी होता है, अगर श्रद्धा ही नहीं है तो मन में सदैव अशांतता व्याप्त रहती है।
श्रद्धा अरू विश्वास बटोरी। बांधे तुमहि प्रेम की डोरी।।
जहाँ पर विश्वास डगमग हो गया कि मुझे तो अपने गुरु पर विश्वास ही नहीं है, अपने संतान पर विश्वास नहीं है, पत्नी पर विश्वास नहीं है तो वहाँ कोई शुभ वातावरण नहीं बन सकता, बस कलह वाला माहौल बन जाता है, दुःख-संताप बढ़ जाता है। इसलिये पहले स्वयं के प्रति श्रद्धा का भाव होना चाहिये, परिवार में आत्मीयता का भाव होना चाहिये, फिर जो हमारे सद्गुरु हैं, ईष्ट हैं, कुल देवी-देवता हैं उनके प्रति समर्पण का विचार होना चाहिये। समर्पण का तात्पर्य क्या है…? “समर्पण का तात्पर्य है कि मैं आपके समकक्ष बनाना चाहता हूँ।”आपकोSurrender नहीं होना है, लाश (शव) नहीं बनना है। इन्हीं उच्चताओं को लिये हमें दीक्षा को आत्मसात करना है। आपको बनिया नहीं बनना है कि गुरु पूर्णिमा है कल हम शक्तिपात ले लेंगे। हमें जब शुभ समय मिले, उचित अवसर मिले उसका हमें लाभ प्राप्त करना है। थोड़ा गिनना-जोड़ना बंद कर देंगे न तो जीवन में सब कुछ अच्छा हो जायेगा।
गाँव में गाय जब बछड़ा उत्पन्न करती है तो पहला-पहला दूध निकलता है तो वह बहुत गाढ़ा होता है और साथ ही बहुत पौष्टिक भी होता है। नार्मल में तो दूध 50-60 रुपये लीटर मिलता है। परन्तु वह गाढ़ा-पौष्टिक दूध मिलता है 100-120 रुपये किलो। उसके ग्रहण करने से कई लोगों को ऊर्जा की प्राप्ति होती है। ठीक उसी प्रकार से जब गुरु अपना ऊर्जा, ज्ञान-चिन्तन प्रदान करता है और हम ऊर्जा-दीक्षा से युक्त हो जाते हैं जिससे हमारे जीवन में उच्चता आने लगती है। दीक्षा रुपी गाढ़े दूध में हम पानी नहीं मिला सकते और अगर किसी ने मिलाया तो वह घुलेगा भी नहीं। दूध प्राप्त करके जितना हम उसे गर्म करते हैं; वह उतना पौष्टिक, ऊर्जा से भरपूर होता जाता है। और वहीं नार्मल दूध कुछ दिनों में ही फट सा जाता है। जितना हम किसी मिठाई में गुण अथवा शक्कर डालते हैं उतनी ही अच्छी मिठास आती है। हमें आज की चीजें कल पर नहीं थोपनी है, कल-कल करते-करते ही हमनें अपने जीवन का इतना समय व्यतीत कर दिया।
इसलिये आपको जितना भी समय मिले उसका हमें लाभ उठाना है। हमें अमृतत्व की प्राप्ति करना है, तो उसकी प्राप्ति कैसे होगी? जब हमारे भीतर का विष समाप्त होगा तभी हमें अमृतत्व की प्राप्ति होगी। हमारे अन्दर विष भरा हुआ है और हम अमृत को मिला देंगे तो विष ही बनेगा और कुछ भी नहीं प्राप्त होगा। आपके अन्दर अच्छी-अच्छी Quality है, अच्छे-अच्छे गुण हैं परन्तु कुछ अवगुण भी हैं यदि दोनों मिले हुये रहेंगे तो आपके गुण साकार नहीं हो पायेंगे। आप में कर्म करने की अच्छी शक्ति है परन्तु भीतर में क्रोध, उन्माद, अनर्लन कार्यों का जब सामंजस्य होगा तो कर्म करने की शक्ति खत्म हो जाता है। हमें अकर्मण्यता को समाप्त करना ही होगा, अपने शरीर के अन्दर व्याप्त कुकृत्यमयी स्थितियों को समाप्त करना ही होगा। तब जाकर हमें अमर तत्व की, श्रेष्ठता की प्राप्ति होगी। तब हम जो संकल्प लेंगे, वह परिपूर्ण होगा। केवल होठों पर मंत्र लेने से संकल्प पूर्ण नहीं होता है। संकल्प कर्मशक्ति के माध्यम से पूर्ण होता है।
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव प्रलीयते।
सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैव प्रपद्यते।।
अर्थात्, मनुष्य कर्म के कारण ही जन्म लेता है और कर्म से ही विलीन होता है। सुख, दुःख, भय और कल्याण; यह सब कर्म के कारण ही प्राप्त होते हैं।
इसीलिये पूर्णिमा प्रारम्भ होते ही मैं आपको चेतना प्रदान कर दूंगा। कहते हैं ना “First Impression is last Impression’’ हमारा पहला ईम्प्रेशन ही अच्छा हो। यदि पूर्णिमा की रात्रि में शक्तिपात ग्रहण करेंगे तो उस समय चन्द्रमा धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर जा रहा होगा, पूर्णिमा समाप्ति की ओर जायेगी। इसीलिये प्रारम्भ में क्रिया करेंगे तो निश्चित ही क्षय की क्रिया से स्वयं को लाभ होगा। मेरे क्रिया से बच्चे का लाभ नहीं होगा, बच्चे को स्वयं करना होगा और जब इनके बच्चे समर्थ हो जायेंगे तो उनको भी सम्पन्न करना होगा। ऐसा नहीं है कि केवल मेरे करने से मेरे नाति-पोतों का, कुल-वंश भविष्य एकदम अच्छा हो जायेगा। इसलिये ‘अप्प दीपो भव’ अर्थात् मैं किस तरह से अपने अन्दर के अंधकारमय स्थितियों को समाप्त कर सकूं। आपके भीतर कोई बाहर से प्रकाश लाकर नहीं डालेगा, गुरु आपको चेतना तो प्रदान कर देगा, मार्ग तो प्रदान कर देगा; परन्तु चलना हमें ही होगा। यदि आप कुमार्ग पर चलेंगे तो कुस्थितियाँ आनी ही आनी है और यदि सद्मार्ग पर चलेंगे तो जीवन में श्रेष्ठता और उच्चता की ओर अग्रसर होंगे।
इसीलिये मैं कहता हूँ ‘सत्संग’। सत्संग का मतलब “हमारेजीवनकेसारतथ्योंकोअपनेजीवनमेंउतारनेकीप्रक्रिया।”जीवनमेंअपनेगुरुकेसाथसंघकरना, गुरु के सानिध्यता को आत्मसात कराना, गुरु का ही संगत करना। यह सत्संग का तात्पर्य है। ऐसा नहीं कि मैंने प्रवचन दे दिया, आपने प्रवचन सुन लिया और अपने जीवन में एक भी लाईन नहीं उतार पाये, आपके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। क्यों परिवर्तन नहीं हुआ क्योंकि तुमने प्रयास नहीं किया, कोशिश नहीं किया। इसीलिये जब हम सदैव प्रयास करते हैं न तो धीरे-धीरे अपने मंजिल पर पहुँच कर, उच्चताओं से अभिभूत हो जाते हैं।
मैं कोटि-कोटि आशीर्वाद प्रदान करता हूँ कि इस ‘गुरु पूर्णिमा महोत्सव’ में आपका जीवन नारायणमय, निखिलमय शक्तियों से परिपूर्ण हो सके और जिस तरह से ‘सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द महाराज’ पूर्ण रुपेण हैं, उसी तरह से आप भी निखिलमय, नारायणमय हो सकें।
परम पूजय सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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