





शिक्षक और सद्गुरु का मूल कार्य समान है। अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाकर भ्रम और अहंकार से मुक्त करना और अपने साधक और शिष्य का सर्वांगीण विकास करना। एक तरफ जहाँ साधक की पूर्णता उसके सद्गुरु से है, वहीं एक शिष्य की पूर्णता उसके शिक्षक से है।
एक सुयोग्य साधक का निर्माण तभी हो सकता है जब त्रिमुर्ति स्वरुप में त्रिवेणी तत्व को प्राप्त कर लेता है। त्रिवेणी अर्थात् ‘विद्या, विवेक और वैराग्य का संगम।’ जहाँ विद्या, सरस्वती से प्राप्त होती है; वहीं विवेक और निर्णय लेने की क्षमता की प्राप्ति शिक्षक द्वारा होता है। इस तत्वों की प्राप्ति के बाद ‘वैराग्य’ (आत्मज्ञान) की प्राप्ति एक योग्य सद्गुरु से होती है। यही एक साधक के जीवन का प्रकाशपुंज है, तिमिर से तेजस की यात्रा है, त्रिवेणी संगम की डुबकी है। शिक्षक दिवस के पर्व पर प्रत्येक विद्यार्थी, माता-पिता, तथा अभिभावक को यह विशिष्ट लेख अवश्य ही पढ़ना चाहिये-
प्रत्येक सांसारिक बालक-बालिका, स्त्री-पुरुष के लिये तथा उनके जीवन में वृद्धि के लिये ज्ञान की आवश्यकता श्रेष्ठ रुप में रहती है। क्योंकि ज्ञान के द्वारा ही जीवन की मलिनता-विषमता को समाप्त किया जा सकता है और यह ज्ञान हमें शिक्षक के द्वारा, अध्यापक के द्वारा प्राप्त होता है। माता-पिता हमें एक अनगढ़ स्वरुप में, कच्ची मिट्टी के रुप में संसार में लाते हैं और उस कच्ची मिट्टी युक्त शरीर में गुरु के द्वारा, शिक्षक के द्वारा सही मूर्त रुप प्रदान किया जाता है, श्रेष्ठ पूज्यनीय रुप में मूर्तिमय निर्मित किया जाता है। शिक्षक के द्वारा ज्ञान के फलस्वरुप ही बालक-बालिका अपने आप को सुश्रेष्ठमय बना सकते हैं। क्योंकि शिक्षक निरन्तर अपने शिष्य को सजग और चैतन्य रहने का ज्ञान प्रदान करता है तथा किस तरह से जीवन में निरन्तर ज्ञान के द्वारा अपने आप को सुश्रेष्ठमय बनाया जाय; यह चेतना शिक्षक के द्वारा ही प्राप्त होती है और उस चेतना के फलस्वरुप ही हम अपनी सामाजिक स्थितियों का निर्माण करते हैं। इसीलिये ज्यों-ज्यों हम शिक्षा से युक्त होते हैं त्यों-त्यों हमारे जीवन में संस्कारों की वृद्धि होती है और जैसे ही सुसंस्कारों की वृद्धि होती है तो हम जीवन के श्रेष्ठताओं तथा उच्चताओं से युक्त होते हैं।
यह सब सुसंस्कार स्वयं माता-पिता के शिक्षित होने और बच्चों को सही शिक्षा के लिये प्रेरित करने से आता है। बच्चों को अपने अध्यापक से, अपने गुरुजनों द्वारा सही ज्ञान को आत्मसात करने से ही वह धीरे-धीरे सुसंस्कारों से युक्त होता है और इन्हीं सुसंस्कारों से फलिभूत होकर वह जीवन की उच्चताओं, श्रेष्ठताओं को प्राप्त कर पाता है। इसलिये हमें निरन्तर ज्ञान का अर्जन अवश्य ही करते रहना चाहिये ताकि हम जीवन में वृद्धि के साथ, ज्ञान के अर्जन के फलस्वरुप उस वृद्धि को सही रुप से प्राप्त कर सकें।
इसीलिये कहा जाता है कि –
शिष्य वही जो सीख ले, गुरु का ज्ञान अगाध।
भक्ति भाव मन में रखे, चलता चले अबाध।।
अर्थात्, शिष्य कौन है? जो गुरु द्वारा प्रदान किये गये ज्ञान को आत्मसात कर ले।
भक्ति भाव मन में रखे,
अर्थात्, जब ज्ञान को प्राप्त करना है तो अपने भक्ति भाव को अपने भीतर, अपने मन में रखना आवश्यक है, आत्मा में रखना आवश्यक है। ‘चलता चले अबाध’ तब वह निरन्तर अबाध गति से अर्थात् निर्विघ्न रुप से गतिशील होता है।
गुरू बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान,
अर्थात्, गुरु के बिना हम ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते। केवल पुस्तकों को पढ़ने से या उनका अध्ययन करने से ही ज्ञान प्राप्त नहीं होता है। जब तक गुरु अथवा शिक्षक उन पुस्तकों में लिखे ज्ञान को सही रुप से क्रियान्वित न कर दे।
गुरू बिन इन्द्रिय न सधें,
हमारी कर्मेंद्रियाँ, ज्ञानेंद्रियाँ हैं, वो गुरु के बिना जागृत नहीं होती हैं। और
गुरू बिन बढ़े न शान।
बिना गुरु के शान भी नहीं बढ़ती है। शान का मतलब कीर्ति, यश, सम्मान की भी वृद्धि नहीं होती है, गुरु के ज्ञान के बिना। इसलिये निरन्तर गुरु के ज्ञान को आत्मसात करने से ही हमें जीवन में सही दिशा तथा सही स्थितियों का ज्ञान प्राप्त होता है, हम सही दिशा की ओर क्रियाशील हो पाते हैं तथा अपने आप को सुश्रेष्ठमय स्थितियों से युक्त करते हैं।
साथ ही साथ हमारे अन्दर जो कर्म करने की चेतना है, हमारी शारिरिक इन्द्रियां हैं, ज्ञानेंद्रियाँ हैं, वे सब चैतन्य और जागृत रहती हैं। और साथ ही साथ हम जीवन में यश, कीर्ति, सम्मान तथा सुश्रेष्ठताओं से युक्त होते हैं इसीलिये निरन्तर ज्ञान को आत्मसात करना चाहिये। इस शिक्षक दिवस प्रातः कालीन वन्दना में सरस्वती की वन्दना करें और उस सरस्वती वन्दना में –
।। या कुन्देन्दु शुभ्रवस्त्रावृता वीणावर सरस्वती गुरुवे नमः।।
।। Yaa Kundendu Shubhra Vastra-Avritaa Viinnaa-Vara Saraswati Guruve Namah।।
अर्थात्, गुरु के माध्यम से ही मैं सरस्वती महाशक्ति को, ज्ञानशक्ति को आत्मसात कर पाता हूँ और तब ही जीवन में पूर्णता प्राप्ति संभव है। साथ ही साथ पूर्णता की प्राप्ति के लिये –
“ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।”
।। OM Poornamadah Poornamidam Poornaat PoornaMudachyate
Poornasya PoornaMaadaaya PoornamevaaVashishyate ।।
अर्थात्, मैं जीवन में हर रुप से पूर्णता से युक्त हो सकूं।
‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते’ अर्थात् मेरे जीवन में कोई भी रिक्तता नहीं रहे, खालीपन नहीं रहे, किसी प्रकार का अभाव नहीं रहे। ‘पूर्णस्य पूर्णमादाय’ अर्थात् मैं हर स्वरुप में सुश्रेष्ठमय, सामाजिक, पारिवारिक रुप से और अपने कर्म क्षेत्र में भी सदैव पूर्णता से युक्त हो सकूं। ‘पूर्णमेवावशिष्यते’ और वही शिष्य उत्तरोत्तर धीरे-धीरे श्रेष्ठताओं से युक्त हो सकता है अतः पूर्ण आनन्द, प्रसन्न भाव से अपने संतान के लिये, स्वयं के लिये इस शिक्षक दिवस पर प्रातः सरस्वती वंदना करते हुये, अपने गुरु को नमन करते हुये आप शिक्षक दिवस को पूर्ण आनन्द, प्रसन्न भाव से नियोजित करें। और यह विचार करें कि मेरे अन्दर किस तरह से अज्ञानता का विस्तार हो रहा है। मैं इस अज्ञानता को किस तरह से समाप्त कर सकता हूँ और किस तरह से मैं ज्ञान से परिपूर्ण हो सकता हूँ।
इसलिये हमेशा सजग रहना, चैतन्य रहना आवश्यक है। जो निरन्तर सजग, चैतन्य रहता है; तो मान के चलिये कि उसके बुद्धि का भाव-चिन्तन शुद्ध और श्रेष्ठ है। सजग का तात्पर्य- “प्रकाशमयीस्थितियां।”वहअपनेजीवनकोउज्ज्वलतथाप्रकाशमय बनाने की ओर क्रियाशील होता ही है।
एक सामान्य सी लधु कथा याद आती है-
अनेक-अनेक शिष्य गुरुकुल में ज्ञान प्राप्त कर रहे थे। जब उनकी शिक्षा पूरी हो गयी तो गुरु ने कहा-“मेरेप्रियशिष्यों! इसपूर्णताकेदिवसपरमैंआपसेचाहताहूँ।आपमुझेकुछप्रदानकरें और उसी के लिये मैनें दौड़ की व्यवस्था की है। इस दौड़ में कुछ जगह पथरीली झाड़ियां भी आयेगीं, कुछ जगह पत्थर भी आयेंगे, कुछ गंदे स्थान भी आयेंगे, थोड़ी उबड़-खाबड़ स्थितियां भी बनेंगी।”आपसभीकोउसदौड़मेंहिस्सालेनाहै।
सभी शिष्य तैयार हो गये। दौड़ प्रारम्भ हो गयी। सब एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में थे। दौड़ते-दोड़ते ही उन्हें अंधेरी गुफ़ा मिली और उन्हें गुफा़ को भी पार करना था। ज्योंहि वे अंधेरी गुफ़ा में घुसे तो उन्हें जगह-जगह पैरों में पत्थर लगने लगे, पैरों में पत्थर चुभने लगे। उन पत्थरों के चुभने के फलस्वरुप अनेक शिष्य एक-दूसरे को धक्का देते हुये आगे निकलने का प्रयास कर रहे थे। कुछ उनमें से सफल भी हुये और कुछ शिष्य बीच में रुक-रुक कर, जहाँ-जहाँ उन्हें पत्थर चुभ रहे थे, उन पत्थरों को उठाकर अपने जेब में, अपने Pocket में डाल रहे थे। दौड़ सम्पन्न हो गयी और गुरु ने सबको बुलाकर बैठाया। फिर पूछा-“आपनेइसदौड़सेक्यासीखा…?”
सभी शिष्यों ने कहा-“हमनेइसदौड़सेयहीसीखाकिजीवनमेंनिरन्तरगतिकाभावरहनाआवश्यकहैऔरइसगतिकेभावमेंकुछअवरोध, कुछ बाधायें भी आयेंगी।”
फिर आचार्य ने पूछा कि “मेरेकुछशिष्यपीछेक्यों रह गये?”
दो-तीन शिष्य खड़े हुये और उन्होंने कहा- “हमसबबराबरआगे-आगेदौड़रहेथेपरन्तुजबअंधेरीगुफ़ाआयीतोदौड़तेसमयहमारेपैरोंमेंपत्थरचुंभनेलगेथे।तोहमनेउनपत्थरोंकोउठाकरअपनेजेबमेंडाललियाजिससेपीछेआनेवालेसाथीहैंउन्हेंपत्थरनहीं चुभे।”
गुरुजी ने कहा-“वहपत्थरमुझेदेदो।”उनलड़कोंनेज्योंहीअपनीजेबसेपत्थरनिकाले; तो वास्तव में वे पत्थर हीरे थे। गुरुजी ने पुनः कहा कि ये हीरे मैनें ही उस गुफा में बिखेरे थे। वास्तव में आप बहुत ही श्रेष्ठ शिष्य हैं जो यह चिन्तन करते हैं कि मेरे पीछे आने वाले जो भी मेरे भाई-बन्धु हैं, उनके पैरों में किसी तरह का चुभन नहीं हो, दर्द नहीं हो इसलिये यह उठाकर अपने जेब में डाल लिया।
“सही शिष्य वही होता है जो सदैव इस प्रकार का भाव रखता है कि मेरे पीछे आने वाले जो भाई-बन्धु, साथी हैं, वे भी अविरल रुप से सदैव गतिशीलता से, उन्नति, प्रगति से क्रियाशील रह सकें।”
यही ज्ञान, यही चेतना प्रत्येक सांसारिक मनुष्य में होना चाहिये कि हम जीवन के पारिवारिक दौड़ में, सामाजिक दौड़ में हमेशा क्रियाशील रह सकें। इस तरह की स्थिति नहीं बने कि हम दौड़ते गये और जो पीछे वाले आ रहे हैं, उनके लिये हम कांटे बोते रहें। वास्तव में सही साधक, शिष्य, छात्र वही है जो सदैव उन कांटों को निकालता रहता है और निर्बाध गति से क्रियाशील रहता है। हमें इस प्रकार का ज्ञान आत्मसात करना है और साथ ही साथ उच्च संस्कारों से युक्त होने हेतु. . . मैनें पहले ही बताया कि हमें ज्ञान की परम आवश्यकता है।
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकया।
उच्च संस्कारों से युक्त होने पर ही जीवन की नारकीय कुस्थितियों को, विकटताओं को, अंधकार के पक्ष को हम समाप्त कर पाते हैं इसलिये प्रत्येक माता-पिता का भी ये कर्तव्य है कि अपने संतान में इन उच्चकोटि के संस्कारों की वृद्धि हेतु बराबर क्रियान्वित करते रहें। और अपने आप में प्रेरित भी रहें, माता-पिता के अन्दर किसी तरह का कोई कुसंस्कार नहीं रहे। हमारी चेतना के माध्यम से हमारे संतान में किसी भी तरह का अनर्गल विचार-चिन्तन, कुसंस्कार नहीं आये।
तो ये शिक्षक दिवस (Teacher’s Day) सही रुप में सुसंस्कारों से युक्त होने का महापर्व है। मैनें बताया कि सरस्वती वंदना से “याकुन्देन्दुशुभ्रवस्त्रावृतावीणावरसरस्वतीगुरुवेनमः”इसकाआपग्यारहबारउच्चारणकरेंया“ऊँपूर्णमदःपूर्णमिदंपूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।”अर्थात्मैंकिसतरहसेहररुपमेंपूर्णतासेयुक्तहोसकूं।
हमारे जीवन में जो भी खालीपन, अधूरापन है, उस अधूरेपन को उस रिक्तता को उस न्यूनता को केवल ज्ञान के द्वारा ही समाप्त कर सकते हैं और उस ज्ञान का अर्जन हमेशा अपने गुरु के माध्यम से, अपने ईष्ट के माध्यम से और जैसा मैनें बताया कि हमारे सर्वश्रेष्ठ शिक्षक माता-पिता होते हैं जोकि हमें कच्ची मिट्टी के स्वरुप में उत्पन्न करते हैं और जिस प्रकार के संस्कारों से वे युक्त होते हैं वैसे ही संस्कार संतान ग्रहण करती है इसलिये माता-पिता को सुसंस्कारों से युक्त होना परम आवश्यक है। गुरु का सानिध्य, गुरु की चेतना और हमारी आर्य संस्कृति के नियमानुसार ईश्वरीय अराधना, ईश्वरीय भक्ति करने का मुख्य मंतव्य यही है कि उस भक्ति के माध्यम से मैं अपने-आपको सर्वश्रेष्ठ निर्मित करता रहूँ।
ईश्वरीय भक्ति या ईश्वरीय वन्दना, दैवीय भक्ति या दैवीय वन्दना करने का उद्देश्य यही रहता है कि मैं उन शक्तियों को अपने अन्दर आत्मसात कर रहा हूँ। शिष्य बनकर, साधक बनकर ही ज्ञान से युक्त हुआ जा सकता है। किसी उच्च पद पर रहते हुये कि मैं बहुत ज्यादा ज्ञानी हूँ, श्रेष्ठ पद पर हूँ, गुरु हूँ, महान हूँ, बड़ा शिक्षक हूँ, बड़ा प्रोफेसर हूँ, उससे कुछ नहीं होता।
प्रोफेसर को भी, गुरु को भी, शिष्य को भी, आचार्य को भी सदैव ज्ञान का अर्जन करना आवश्यक होता है। उसी अर्जन के फलस्वरुप उसके ज्ञान में प्रगाढ़ता आती है। और उसी प्रगाढ़ता को वह अपने साधकों, शिष्यों, अपने छात्रों, अपने Students को प्रदान करता है जिससे कि उनके शिष्य धीरे-धीरे और अधिक ऊर्जा से युक्त हो सकें। उस ज्ञान के माध्यम से जो अर्थोपार्जन प्राप्त होता है, उसके माध्यम से सामाजिक, परिवारिक स्थितियों को सुश्रेष्ठमय बना सकते हैं, जो अर्थोपार्जन की क्रिया है जिसके माध्यम से हम अपने परिवार का संचरण करते हैं, क्रियान्वित करते हैं या क्रियाशील रहते हैं, उसे केवल ज्ञान के फलस्वरुप ही आत्मसात कर सकते हैं।
मैनें अपने अधिकांश शिष्यों में देखा है कि उनके अन्दर बहुत अच्छा Talent है और बहुत अच्छा Knowledge है। परन्तु थोड़े से कुज्ञान के फलस्वरुप या बहुत ही छोटी मानसिकता के फलस्वरुप वे अपने Talent को, अपने Startup को उजागर नहीं कर पाते हैं। हमारे अन्दर कुछ मानसिकतायें भी व्याप्त होती हैं कि मैं अपनी जन्मभूमि को नहीं त्याग सकता, मैं शायद इस कार्य में असफल हो जाउंगा, और कुछ लोग तो केवल ये सोचते हैं कि मुझे खाना-पीना मिल रहा है, बस।
कई शिष्यों में अच्छी चित्रकारी का Talent होता है, कुछ अच्छा निर्माण करने का, नूतन चीजें बनाने का, Talent होता है। उस Talent को निरन्तर विकसित करना चाहिये, उन्हें बाहर निकालने की क्रिया करनी चाहिये, उन्हें Practice रुप प्रदान करनी चाहिये। और माता-पिता को भी चाहिये कि उनके अन्दर जो प्रतिभा है। उस प्रतिभा को क्रियान्वित करेंगे तो जीवन में अच्छी सुस्थितियों से युक्त हो सकेंगे। इसलिये इस छोटी मानसिकता को निकाल देना चाहिये कि मैं अपने जन्म भूमि को, गांव को नहीं छोड़ सकता…। जब तक आप अपना, स्वयं का विस्तार नहीं करेंगे, इस छोटी स्थितियों से निकलकर बाहर बड़ी जगहों पर नहीं जायेंगे तब तक आपके जीवन में जो भी थोड़ी बहुत प्रतिभा, क्षमता है, एक रूचि है, वह सही रुप से श्रेष्ठता को प्राप्त नहीं हो सकेगा।
इसलिये प्रत्येक माता-पिता को चाहिये कि बच्चों के अन्दर जो अच्छी प्रतिभायें हैं, उन्हें निरन्तर प्रोत्साहित करें। उसमें छोटी-छोटी अवरोध, बाधायें आयेंगी ही, परन्तु उस प्रतिभा के द्वारा वे स्वयं ही अपनी बाधाओं को समाप्त कर सकेंगे। आपके साथ Teacher’s की शक्ति है साथ में गुरु के ज्ञान की शक्ति है और सबसे अधिक माता-पिता का शुभाशीर्वाद भी है। तो जो भी उनकी Hobbies हैं, रुचि हैं, उन रुचि के माध्यम से वे अपने आप को सुशोभित कर सकते हैं। इसलिये थोड़ा सा अपनी मानसिकता को परिवर्तित करना चाहिये और ज्ञान के माध्यम से ही हम सुसंस्कार युक्त संतान की भी प्राप्ति करते हैं। इसी ज्ञान के द्वारा ही श्रेष्ठ वंश की, उच्च कुल की वृद्धि होती है। और उच्च कुल-वंश के माध्यम से ही सृष्टि में, प्रकृति में, ध्रुव तारे के समान दैदीप्यमान बनते हैं, सूर्य के समान अपने आप को प्रकाशवान, चैतन्यवान बनाने की क्रिया सम्पन्न करते हैं।
इसलिये इस Teacher’s Day को केवल फार्मल रुप में सम्पन्न न करके भीतर से ये समझाना है कि मेरे अन्दर अमुख-अमुख खुबियां हैं। उन खुबियों को किस तरह से मैं विस्तृत रुप प्रदान करुँ। उसे क्रियान्वित करने के लिये मुझे किस प्रकार से क्रिया करनी है। इस प्रकार के भाव को लेकर निश्चित ही इस महापर्व को, शिक्षक दिवस को; जो कि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के जन्मदिवस के रुप में सम्पन्न किया जाता है। वे भारत के दूसरे राष्ट्रपति भी बने, साथ ही साथ उन्होंने 40 वर्षों तक अध्यापन का कार्य किया और एक महान संत के रुप में वे उच्च स्थितियों तक क्रियान्वित हुये। जितने भी महान संत हुये, महात्मा गांधी से लेकर नरेन्द्र मोदी जी तक या और जो भी ऋषि हुये हैं, सबने ज्ञान के द्वारा ही अपने आप को बहुत उच्चतम स्थितियों तक पहुँचाया है। अनेक ऋषियों में अनेक साधनाओं का ज्ञान-शक्ति था। उस ज्ञान शक्ति के द्वारा ही उन्होंने जो छोटे से छोटे कुरुपता का परित्याग किया। उसके परिणाम स्वरुप ही वे उच्चताओं से युक्त हुये।
आपके भीतर में उनसे ज्यादा, एक अच्छे ज्ञान-चिन्तन और चेतना का विचार है। आपके भीतर आपके शिक्षक से, आपके गुरु से भी अधिक चेतना है परन्तु जब उसे सुस्थितियों की ओर, सद्मार्ग की ओर क्रियान्वित करेंगे तो निश्चित रुप से आपके जीवन का मार्ग बहुत ही सीधा, सरल, श्रेष्ठ और उच्चताओं को प्राप्त करने हेतु मील का पत्थर साबित होगा।
मैं आप सभी को शुभ-मंगलमय आशीर्वाद प्रदान करता हूँ कि इस शिक्षक दिवस महापर्व पर आप पूर्ण आनन्द भाव से, अपने भीतर में अग्नि भाव को जागृत कीजिये। और यह विचार कीजिये कि मेरे अन्दर जो इतना Talent है, Knowledge है, हुनर है उसे किस तरह से और अधिक विस्तार प्रदान करुँ। जिससे मैं अपने समाज में, अपने क्षेत्र में, अपने देश में अत्यधिक सुस्थितियों से युक्त हो सकूं। मैं उन होनहार बालकों की योग्यता को प्रणाम करता हूँ और उनके माता-पिता से निवेदन करता हूँ कि उनके ज्ञान को और अधिक सुशोभित और अधिक प्रकाशित करने की क्रिया करें जिससे आपकी संतान आप से भी ज्यादा श्रेष्ठ बन सके।
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