





श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुये पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, लौकिक सुख, मोक्ष तथा स्वर्ग आदि प्रदान करते हैं। जब भी तीर्थ स्थान पर जायें वहाँ स्नान करके तर्पण व श्राद्ध अवश्य करें क्योंकि ये सभी पितरों को शांति प्रदान करता है। शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्ण पक्ष साथ ही पूर्वाह्न की तुलना में अपराह्न श्राद्ध कर्म के लिये श्रेष्ठ होता है। पूर्वाह्न में, शुक्ल पक्ष में, रात्रि के समय, अपने जन्मदिन पर और युग्म दिनों में श्राद्ध नहीं करना चाहिये।
दिन के आठवें भाग (मुहुर्त) में जब सूर्य का तप घटने लगता है, उस समय का नाम ‘कुतप’ है। उसमें पितरों के निमित्त दिया गया दान अक्षय होता है। खड्ग पात्र, कम्बल, चाँदी, कुश, तिल, गौ इन्हें दान करना अत्युत्तम है। दोहित्र द्वारा तर्पण, श्राद्ध अत्यन्त फलकारी है।
श्राद्ध कर्म में तीन वस्तुयें अत्यन्त पवित्र हैं – दुहितापुत्र (पुत्री व पुत्र), कुतपकाल तथा तिल। ध्यान में रखने वाली तीन वस्तुयें हैं- बाहर व भीतर की शुद्धि, क्रोध न करना तथा जल्दबाजी न करके समस्त क्रिया आराम से, पूर्ण श्रद्धाभाव से पितरों की शांति के ध्यान में रहते हुये सम्पन्न करनी चाहिये।
दूसरे की भूमि पर जहाँ आपका स्वामित्व न हो, ऐसे स्थान पर श्राद्ध न करें। जंगल, पर्वत, पुण्यतीर्थ, मन्दिर, देव-स्थान- ये सभी दूसरे की भूमि में नहीं आते, क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं होता। श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है। इसीलिये इस समय ब्राह्मण को निमन्त्रित करना आवश्यक है। बिना ब्राह्मण किये गये श्राद्ध में पितर भोजन नहीं करते, वह मनुष्य पाप का भागी भी बनता है।
देवकार्य में दो, पितृकार्य में तीन अथव दोनों में एक-एक ब्राह्मण को भोजन कराना पर्याप्त होता है। श्राद्ध में, तर्पण में काले तिल का प्रयोग होना चाहिये, इससे श्राद्ध अक्षय होता है, असुर और पिशाचों से उस स्थान की रक्षा होती है।
सोने, चाँदी और ताँबे के पात्र पितरों के पात्र कहे जाते हैं। चाँदी का प्रयोग करना, दान करना पिशाचों का नाश करता है। चाँदी के पात्र से श्रद्धापूर्वक जल मात्र भी दिया जाये तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है।
तर्पण के समय में भी तर्जनी अंगुली में चाँदी की अंगुठी धारण करनी चाहिये।
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