





भगवान की वाणी गीता है जो स्वयं श्री कृष्ण ने वर्णित किया है। अपने भक्त, अपने शिष्य को ज्ञान प्रदान किया है। वहीं रामायण ईश्वर का कृत्य है जिसे स्वयं भगवान ने दर्शाया है। स्वयं एक मानव जाति की भांति अपने जीवन कर्त्तव्य का, दायित्व का, पितृ कर्म, मातृ कर्म, वचन कर्म, पति कर्म, भ्राता कर्म, गुरु कर्म का जीवन जीया व निभाया है।
जब स्वयं ईश्वर अवतरित होकर अपने कर्म की पूर्ति करते हैं क्योंकि अपने कर्मों से आप हर परिस्थितियों को अपने योग्य बना सकते हैं।
पूरी सृष्टि में अपने कर्मों द्वारा अपने भाग्य को अपने अनुकूल करना व अपने जीवन में सार्थक परिवर्तन लाना केवल हमारे हाथ में है। न ही पितरों के लिये यह संभव है कि वे कर्मों द्वारा भाग्य परिवर्तित कर सकते हैं, न ही ईश्वर में। उन्हें भी अपना काल बदलने के लिये काल चक्र में अवतरित या जन्म ही लेना पड़ा।
मानव जन्म और यह शरीर आपको चौरासी लाख योनियों में भटकने के उपरांत प्राप्त हुआ है। परन्तु यह भी सत्य है इस जीवन काल में अत्यधिक कष्टों को भोगा है। उन कष्टों का निवारण आप अपने कर्मों के माध्यम से कर सकते हैं। भगवान की वाणी गीता और कृत्य रामायण, वहीं सक्षम गुरु अपनी वाणी से, अपने कृत्यों से, मंत्रों की चेतना से अपने साधक, अपने शिष्यों का कल्याण करते हैं।
इस पितृ पक्ष 26 सितम्बर पूर्णिमा श्राद्ध से लेकर 10 अक्टूबर अमावस्या श्राद्ध तक आप अपने कृत्यों से अपने जीवन में यश, कीर्ति, सुख, बल-बुद्धि की प्राप्ति कर सकते हैं।
एक गुरु का दायित्व ज्ञान को केवल अपने पास नहीं रखकर अपितु उससे अपने शिष्यों को चैतन्य करना होता है। ‘प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान’ के इस व प्रत्येक अंक में विस्तृत साधना व मंत्र प्रकाशित होते हैं।
इन 16 दिन विधि अनुरुप अपने परिवार के मृत सदस्यों व ऋषि संतो का श्राद्ध करें। तिथि का ज्ञान न हो तो 26 सितम्बर पूर्णिमा श्राद्ध से लेकर 10 अक्टूबर अमावस्या श्राद्ध तक नीचे दिये गये विधि अनुसार श्राद्ध कर्म कर सकते है। साधकों हेतु श्राद्ध पक्ष के प्रत्येक दिन अपने पितरों, पूर्वजों और अतृप्त आत्माओं हेतु अलग- अलग दिवसों में अलग- अलग मंत्र जप सम्पन्न किया जाता है। साधक प्रात: ॥ ॐ पितृभ्यः स्वधायै नमः॥ का 21-51 या 108 बार जप कर निम्न मंत्रों की 1 माला मंत्र जप सम्पन्न करें-
प्रतिपदा : इस साधना मे आने वाली बाधाओं के निवृत्ति हेतु – ॥ ॐ श्री गणेशाय नमः॥
द्वितीया : पूर्वजों का आवाह्न करने हेतु – ॥ ॐ पितृदेवाय नमः॥
तृतीया : पितरों का आभार प्रकट करने हेतु – ॥ ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः॥
चतुर्थी : शांति एवं सुरक्षा हेतु – ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
पंचमी : सूर्य की तेजस्विता आत्मसात् करने हेतु – ॥ ॐ सूर्याय नमः॥
षष्ठी : पितरों की शांति, शुद्धि, मुक्ति प्राप्ति हेतु – ॥ ॐ नमः शिवाय॥
सप्तमी : आशीर्वाद एवं ज्ञान-प्रकाश प्राप्ति हेतु – ॥ ॐ आदित्याय नमः॥
अष्टमी : अपने सद्गुरू और पूर्वजों के आवाह्न हेतु – ॥ ॐ श्री गुरुभ्यो नमः॥
नवमी : दैवीय सुरक्षा एवं शक्ति हेतु – ॥ ॐ दुर्गायै नमः॥
दशमी : शुभ मंगलमय शांति प्राप्ति हेतु – ॥ ॐ विष्णवे नमः॥
एकादशी : दैविक कृपा और परिवार में प्रेम सांमजस्य हेतु – ॥ ॐ नमो नारायणाय॥
द्वादशी : पितृ आत्मा की शांति हेतु शारीरिक आंतरिक शुद्धि हेतु – ॥ ॐ माधवाय नमः॥
त्रयोदशी : अकाल मृत्यु प्राप्त आत्माओं की शांति हेतु – ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
चतुर्दशी : ऐसे पूर्वज जिनकी श्राद्ध तिथि ज्ञात न हो – ॥ ॐ नमः शिवाय॥
सर्वपितृ अमावस्या : श्राद्ध तर्पण के माध्यम से तृप्ति प्राप्ति हेतु – ॥ ॐ पितृदेवाय स्वधा नमः॥
तथा इस चैतन्यता प्राप्ति हेतु 01-02 अक्टूबर को सपरिवार सर्व पितृ दोष संताप निवृत्ति सौभाग्य सुखदा प्राप्ति साधना महोत्सव, बालांगीर ओडिसा में अवश्य पधारें।
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